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आंखों देखी – 13 पुराने दिन नयी बातें

आंखों देखी – 13 पुराने दिन नयी बातें

रूसी आतिथ्य के शानदार अनुभव (देखिये आंखों देखी – 12) के बाद नोवो स्टेशन जाने का आकर्षण स्वत: कम हो गया था. हम लोगों ने शिर्माकर ओएसिस के खूबसूरत झील ‘प्रियदर्शिनी’ के किनारे स्थित भारतीय शिविर को साफ़ किया. डेढ़ दो महीने बाद अगले अभियान दल को पहुँचना था अत: यह सुनिश्चित करना कि नए दल के सदस्यों को “मैत्री” पहुँचकर कोई असुविधा न हो हमारा नैतिक दायित्व था. शिर्माकर में हम लोग 12 दिन रहे जिस दौरान हिमनदीय, भूवैज्ञानिक और जीवविज्ञान सम्बंधी…

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Added by sharadindu mukerji on March 21, 2014 at 4:48am — 6 Comments

एक गज़ल ( कवि - "राज बुन्दॆली")

एक गज़ल



(मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन)



कहीं सूरत नहीं मिलती,कहीं सीरत नहीं मिलती ॥

वफ़ा करकॆ मुनासिब सी,हमॆं कीमत नहीं मिलती ॥१॥



लियॆ उल्फ़त फिरॆ दर-दर,वफ़ाऒं का भरम पालॆ,

ज़हां मॆं प्यार की हमकॊ,खरी दौलत नहीं मिलती ॥२॥



मिटा दीं आज हमनॆ सब, लकीरॆं हाँथ की अपनॆ,

मिटा दूँ नाम इक तॆरा,  यही ताक़त नहीं मिलती ॥३॥



सुनॆं हैं प्यार कॆ किस्सॆ, ज़मानॆ कॊ बहुत कहतॆ,

किताबॊं मॆं लिखा तॊ है,मगर चाहत नहीं मिलती ॥४॥



दिलॆ -…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 21, 2014 at 2:30am — 9 Comments

दोहे-१५ (खिचड़ी)

नयनों की इस झील का, कितना निर्मल नीर।

बूँद बूँद कहती रही, देखो तल की पीर॥

वो आती हैं जब यहाँ, होता है आभास!

तपते पग को ज्यों मिले,पथ पर कोमल घास!!

मन शुक फिर बनने लगा,चखने चला रसाल !!

कितना मोहक रूप है,कितने सुन्दर गाल!!

केश कहूँ या तरु सघन,होता है यह भ्राम!!

इन केशों की छाँव में,कर लूँ मैं विश्राम!!

प्रेममयी इस झील का,अविरल मंद प्रवाह!

इसकी परिधि अमाप है,और नहीं है थाह!!

रंगों की वर्षा…

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Added by ram shiromani pathak on March 20, 2014 at 8:00pm — 11 Comments

आत्मनिंदा

ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब यौन शोषण की घटनाएँ खबरों में नहीं आती। खबर पढ़कर हृदय ग्लानि और अपराध-बोध के दलदल में धँस जाता है। खुद से पूछता हूँ- यह यौन शोषण है क्या? अब आप कहेंगे- कैसा अनपढ़ और गवाँर हूँ। यौन शोषण का अर्थ तक नहीं समझता। तो मैं आपसे पूछता हूँ। क्या आप सही मायने में इसका उत्तर बता सकते हैं? मेरा तात्पर्य उस प्रश्न से ही जुड़ा है। आखिर यह शोषण हमेशा स्त्रियों के साथ ही क्यों होता है? क्या यह शारीरिक रूप से पीड़ादायी है या मानसिक रूप से भी? क्या यह केवल शारीरिक है या पूर्णतः मानसिक?…

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Added by Kundan Kumar Singh on March 20, 2014 at 4:00pm — 1 Comment

अपने [कुण्डलिया]

अपने आँसू दे गए ,किया हमें बेहाल
नया साल लाये नई खुशियाँ करें कमाल /
खुशियाँ करें कमाल, दूर हों उलझन सारी
छाए नया बसंत, खिले अब बगिया न्यारी
सरिता करे गुहार, पूरे हों सभी सपने
करना रक्षा ईश ,बिछुड़े नहीं अब अपने//

...................................................

...........मौलिक व अप्रकाशित.............

Added by Sarita Bhatia on March 20, 2014 at 10:30am — 12 Comments

सिखाता रावणों के गुर - ग़ज़ल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222    1222    1222    1222



किया माथे तिलक झट से कहा नाकाम भी मुझको

बहुत  ठोका  लुहारों  सा  दिया आराम  भी मुझको

*

गिरा तो भी  समझ मेरी  न आयी  शातिरी उसकी

बिठाया  पास  भी अपने किया बदनाम भी मुझको

*

पता  है  साथ  उसके तो  न आया  था कभी  सूरज

जलाता क्यो न जाने फिर शरद का घाम भी मुझको

*

हसाता  चोट  देकर  भी  बड़ा  जालिम  खुदा  पाया

रूला  देता  न मरने  का सुना  पैगाम  भी  मुझको

*

अजब सी रहमतें  उसकी  अजब ही  सब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 20, 2014 at 6:30am — 14 Comments

ग़ज़ल

अपनों नें जो मुझपर फेंका पत्थर है 

वो गैरों के फूलों से तो बेहतर है

 

दुनिया समझी थी वो कोई शायर है

जिसका दामन मेरे अश्कों से तर है

 

ऐ खुशियों तुम सावन बनकर मत आना

पिछली बारिश ने तोडा मेरा घर है

 

भूखा मंदिर जायेगा क्या पायेगा

रोटी बन पाता क्या संगेमरमर है

 

धरती सौ हिस्सों में बाँटो होगा क्या

पक्षी का तो आना जाना उड़कर है

 

चूल्हा जलने से रोको इस बस्ती में

इस बस्ती में आंधी आने का…

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Added by भुवन निस्तेज on March 19, 2014 at 2:00pm — 18 Comments

ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है

इक उसके चले जाने से कुछ पास नही है

ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है



वो दूर गया जब से ये बेजान है महफिल

साग़र है सुराही हैं मगर प्यास नही है



सुनने को तिरे पास भी जब वक़्त नही तो

कहने को मिरे पास भी कुछ ख़ास नहीं है

 

इस रूह के आगोश में है तेरी मुहब्बत

माना के तिरा प्यार मिरे पास नही है



रावण तो ज़माने में अभी ज़िंदा रहेगा

क़िस्मत में अभी राम के बनवास नही है



फिर कैसे यक़ी तुझपे करेगा ये ज़माना,

ख़ुद तुझको…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 18, 2014 at 11:30pm — 21 Comments

फागुन चला गया

फागुन चला गया, अरे फागुन चला गया,

वह खुशमिजाज मौसम सगुन दे चला गया।

बागों में आम बौर बढ़े, फगुआ हवा में,

सर्दी के सितम से भी तो राहत दी पछुआ ने।

हर एक दिल को खुशनुमा करके चला गया,

फागुन चला गया, अरे फागुन ..................

सूरज की चमक को भी तो फागुन ने टटोला,

हर एक दिल को मौसमी अंदाज से तोला।

बूढ़ों को धूप, बच्चों को मुस्कान दे गया।

हर व्यक्ति को राहत भरा उनमान दे गया।

फागुन चला गया, अरे फागुन ..................

हम बात कहें, अन्नदाता के हिसाब…

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Added by Atul Chandra Awsathi *अतुल* on March 18, 2014 at 9:22pm — 2 Comments

संध्या बेला मधुरिम मधुरिम

संध्या बेला मधुरिम पल है

लाल कपोल लिए तन सूरज

ढलता पल-पल छिन-छिन हर पल

सहलाती पद उसके संध्या

करती सेवा उसकी रज-रज। 

मृग़ छौने थक जाते चलकर

दिवा चली सुस्ताने पल भर

स्वप्निल सपने देती संध्या

सब को मंजिल तक पहुंचाकर। 

बीता वासर बिछी चाँदनी

वृक्ष खड़े अलसाए लत-पत

खग और विहग पुकारे हरि को

वन्य माधुरी फैली इत-उत। 

सोचो संध्या गर ना होती

तो क्या सो पाते हम जी भर?

कर पाते,…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 18, 2014 at 9:00pm — 6 Comments

पानी में आग--ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश"

------पानी में आग -----------

पानी में आग वे लगाने लगे है .

भूखे थे पर वे चहचहाने लगे है .

फूलों की मानिंद प्यार करते थे

काँटों से दोस्ती वे निभाने लगे है .

जो स्वयं पास न कर सके परीक्षा

ऐसे शिक्षक आज पढ़ाने लगे है .

पुलिस ने चोरो से की दोस्ती

गश्त में वे अपनी सुसताने लगे .

देशसेवा का जज्बा लिए थे जो

वे अपने देश को ही खाने लगे है…

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Added by Omprakash Kshatriya on March 18, 2014 at 6:30pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फ़क़त दो चार पल की बात है ये ( ग़ज़ल - गिरिराज भन्डारी )

1222     1222     122 

फ़क़त दो चार पल की बात है ये

हाँ, बस इक रात जैसी रात है ये

कबूतर, तुम यक़ीं करना समझ कर

कहूँ क्या? आदमी की जात है ये

 

रफ़ाक़त आप कैसे कह रहे हैं ?

असल में पीठ…

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Added by गिरिराज भंडारी on March 18, 2014 at 5:00pm — 25 Comments

अकेलापन [कुण्डलिया

बैठ अकेले सोचती ,तुमको दिन और रात
जान हमारी ले गए ,बहते हैं जज्बात /
बहते हैं जज्बात सजल हैं आँखें रहती
टूटा है विश्वास, हर निगाह यही कहती
तुम बिन हैं सुनसान सभी दुनिया के मेले
सरिता रही पुकार, हर रोज बैठ अकेले //

.........................................................

..................मौलिक व अप्रकाशित .............

Added by Sarita Bhatia on March 18, 2014 at 10:03am — 9 Comments

आया लो फागुन का मौसम

     आया लो फागुन का मौसम

 

आया लो फागुन का मौसम, मुझको पागल हो जाने दो !

वासंती  बयार ने  तेरे -

कोमल कुंतल को बिखराए,

गजब ढा रही तेरी बिंदिया-

गालों पर फागुन छा जाये ।

तेरा बदन गुलाल हुआ , अपनी ज़ुल्फों मे खो जाने दो

आया लो फागुन का मौसम, मुझको पागल हो जाने दो !

फागुन के मौसम मे तुम पर

फूलों की  बरसात  हुयी  है,

अंग अंग फागुनी हुआ ,और –

कामदेव  की  दुआ हुयी  है।

कैसे संयम करूँ प्रिये…

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Added by S. C. Brahmachari on March 17, 2014 at 10:30pm — 4 Comments

कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

 होली का तौहार ये, रंगों का तौहार,

प्रेम भाव बढ़ता रहे, माने सब आभार 

माने सब आभार, प्रकृति की छटा निराली 

मिटा कर भेद भाव, चखे प्रेम भरी प्याली

मित्रो से अनुरोध, बना रसियों की टोली 

टेसू का हो रंग, प्रेम से खेले होली  |

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 17, 2014 at 12:30pm — 4 Comments


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जब से तेरी जुस्तजू होने लगी

2122- 2122- 212

जब से तेरी जुस्तजू होने लगी             (जुस्तजू=तलाश)

अजनबी सी मुझसे तू होने लगी

 

वक्त का होने लगा है वो असर

अब महक फूलों की बू होने लगी

 

भागता था जिस बला से दूर मैं

हर तरफ वो रू-ब-रू होने लगी

 

मुस्तकिल ये ज़िन्दगी होती नहीं           (मुस्तकिल= स्थाई)

क्यूँ इसी की आरज़ू होने लगी

 

उम्र के फटने लगे हैं अब लिबास

सो दवाओं से रफ़ू होने लगी

 

नफरतें ही…

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Added by शिज्जु "शकूर" on March 17, 2014 at 7:58am — 16 Comments

"विडम्बनाएं"

किरणों को अभिशाप पड़ेंगी वे जिन जिन पर

कर देंगी परछाईं काली किसी पटल पर ।

हर जीवन के संग जनमती मृत्यु, अजय है

हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥

धन औ ऋण का योग बनाता सदा शून्य है

गोल शून्य सा भाल किन्तु रत धन औ ऋण में ।

हासिल जिसका शून्य पराजय वह कहलाती

किन्तु शून्य को छू पाऊँ तो अजय विजय है ॥

हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥

जन्मदिवस कि ख़ुशी प्रसव के पीर से उपजी

राम नाम का ज्ञान मरा में छुपा मिला था…

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Added by Pradeep Kumar Shukla on March 17, 2014 at 12:41am — 4 Comments

सार ललित छंद -- शशि पुरवार

छन्न पकैया छन्न पकैया ,छंदो का क्या कहना

एक है हीरा दूजा मोती, बने कलम का गहना

छन्न पकैया छन्न पकैया ,राग हुआ है कैसा

प्रेम रंग की होली खेलो ,दोन टके का पैसा



छन्न पकैया छन्न पकैया ,रंग भरी पिचकारी

बुरा न मानो होली है ,कह ,खेले दुनिया सारी

छन्न पकैया छन्न पकैया , होली खूब मनाये

बीती बाते बिसरा दे ,तो , प्रेम नीति अपनाये



छन्न पकैया छन्न पकैया ,दुनिया है सतरंगी

क्या झूठा है क्या…

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Added by shashi purwar on March 16, 2014 at 10:30pm — 3 Comments

फाग

होली है .............


तुम रचाओं रास, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
राधा बुलाओ खास, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
हम होली मनाये आज, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
भक्त गाये फाग, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
उड़े हे रंग गुलाल, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
ब्रज लगे हमारे गांव, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
तुम रचाओं रास, रे कृष्‍णा
तुम रचाओ रास
---------------------
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on March 16, 2014 at 5:53pm — 1 Comment

कहमुकरियाँ-36 से 50/कल्पना रामानी

३६)

प्यारा लगता उसका साथ।

रोज़ मिलाता मुझसे हाथ।

बने हमकदम अपना मान,

क्या सखि साजन?

ना सखि लॉन!

37)

जब से वो जीवन में आया।

रोम-रोम में प्यार समाया।

खिले फूल सा महका तन-मन,

क्या सखि साजन?

ना सखि, यौवन!

38)

सखी! रात खिड़की से आया।

फूँक मारकर दिया बुझाया।

चैन लूट ले गया ठगोरा,

क्या सखि साजन?

नहीं, झकोरा!

39)

उससे जुड़े हृदय के तार।

मुझे बुलाता…

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Added by कल्पना रामानी on March 16, 2014 at 3:30pm — 9 Comments

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