For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

September 2014 Blog Posts

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

कुण्डलिया छंद (हिंदी दिवस पर विशेष)

हिंदी निज व्यवहार में, भरती मधुर सुगंध,

देवनागरी में मिले, संस्कृति की चिरगंध |

संस्कृति की नवगंध, और सुगन्ध सी वाणी

सीखे नैतिक मूल्य, पढ़े जो हिंदी प्राणी ||

लक्ष्मण कर सम्मान, सजे माथे जो बिंदी

करती रहे प्रकाश, सरस यह भाषा हिंदी ||

(2)

आता है हिन्दी दिवस, जाने को तत्काल

अपनी भाषा का सदा उन्नत रखना भाल |

उन्नत रखना भाल,करे विकास तब भाषा

हिंदी में हो बात, रहे क्यों भाव…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 14, 2014 at 3:55pm — 5 Comments

चलो मयकदे मेँ

चलो मयकदे मेँ जमाने मेँ क्या हैँ ।

अगर लुत्फ है तो उठाने मेँ क्या है ।



न पाया जमाने मेँ कुछ भी रहकर ,

अब मयकदा आजमाने मेँ क्या है ।



भर जायेगी जब पैमानोँ मेँ मय ,

फिर उसको पीने पिलाने मेँ क्या है ।



खुदा का तसव्वुर जब हर जगह है ,

फिर सर यहाँ भी झुकाने मेँ क्या है ।



जब राज दिल के सब खुल गये होँ ,

परदा नजर का गिराने मे क्या है ।



न इन्सान समझे जब दिल की कीमत ,

दिल मयकशी से लगाने मेँ क्या है ।



सिवा तेरे तू… Continue

Added by Neeraj Nishchal on September 14, 2014 at 1:42am — 17 Comments

नवगीत. आओ यह संकल्प उठाएं

आओ यह संकल्प उठाएं*



आओ यह संकल्प उठाएं

सब मिल पर्यावरण बचाएं



जंगल सूने सूने लगते

साँसों में जो जीवनभरते

पेड़ काट घर रोज

सजाते,

पेड़ कहीं तो एक उगाएं

आओ यह संकल्प उठाएं



धरती को यूं बंजर न करें

प्रकृति के कोप से सभी डरें

सुन लें पुकार हम

धरनी की,

अब विष की ना बेल बिछाएं

आओ यह संकल्प उठाएं



और निकट संसृति के जाएं

हम पेड़ों को मित्र बनाएं

स्वस्थ सुगन्धित वायु

के तले,

पढ़ें लिखें औ… Continue

Added by seemahari sharma on September 14, 2014 at 1:35am — 2 Comments

नफ़रतों का जवाब मैं रक्खूं

नफ़रतों का जवाब मैं रक्खूं

ख़ार तू रख गुलाब मैं रक्खूं

 

बीत जाये इसी में उम्र तमाम

ज़ख्मों का गर हिसाब मैं रक्खूं

 

मै ग़मों की रवाँ है रग रग में

होश कैसे जनाब मैं रक्खूं

 

सामने तेरे बेहिजाब हुआ

क्या बुतों से हिजाब मैं रक्खूं

 

दर्दे-उल्फ़त पलेगा क्या मुझसे

क्यूं कफ़स में उक़ाब मैं रक्खूं

 

शमा सी वो पिघलती है हर शब

कब सिरहाने किताब मैं रक्खूं

 

पेट में भूख का शरारा …

Continue

Added by khursheed khairadi on September 13, 2014 at 10:00pm — 5 Comments

हिन्दी की जय !

हिन्दी दिवस पर विशेष

           

माँ तुझको  याद  नहीं करते  तू तो धमनी  में है बहती I

तू ह्रदय नही इस काया की  रोमावली  प्रति में  है रहती I

अपने  ही पुत्रो से  सुनकर  भाषा  विदेश  की  है सहती I

पर माते ! धन्य नहीं मुख से कोई भी अपने दुःख कहती I

 

होते कुपुत्र  भी इस जग में  पर माता उन्हें  क्षमा करती I

सुंदरता  और  असुंदर  को  जैसे  धारण  करती  धरती I

जो सेवा-रत अथवा …

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 13, 2014 at 8:44pm — 6 Comments

माँ के माथे की बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

गोल बड़ी सी बिन्दी

माथे पर कान्ति बन

खिलती है बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

सजाती सवाँरती

पहचान बनाती बिन्दी

मान सम्मान

आस्था है बिन्दी

शीतल सहज सरल

कुछ कहती सी बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

थकान मिटा,उर्जा बन

 मुस्काती बिन्दी

पावन पवित्र सतित्व की

 साक्षी है बिन्दी

परंपरा संस्कारों का

आधार है बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

अपनी हिन्दी भी…

Continue

Added by Maheshwari Kaneri on September 12, 2014 at 6:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२ २१२ २१२ २१२

हो रहा है मुझे ये वहम देखिये

आज क़ातिल की भी आँख नम देखिये

आधुनिकता के ऐसे नशे में हैं गुम

नौजवानों के बहके क़दम देखिये

पसरा है नूर सा कमरे में हर तरफ

आये हैं घर पे मेरे सनम देखिये

शहर लगता है शमशान सा इन दिनों

आस्तीनों में किसके है बम देखिये

नाम तेरा लिखा था मैंने इक ही बार

महके उस रोज से ही क़लम देखिये

मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on September 12, 2014 at 8:27am — 11 Comments

क़दमों को आज भी याद है

आज फिर लड़खड़ाते कदमों से

गिरने की कोशिश की

यह लालच संजोये हुए कि

आप आ जाओगे

फिर से मुझे चलना सिखाने को

मेरी अंगुली पकड़ के

मुझे गिरने नहीं दोगे...

काश आपकी पदचाप फिर सुन पाता,

या काश, मेरे क़दमों को गिरते हुए

आपकी आदत ना होती..

 

साथ थे आप तो पैर अल्हड़ थे

घिसटते कदम थे चाल बेताल थी..

विश्वास था फिर भी ना गिरने का 

 

आज आपकी याद है...

पैर तने हैं, कदम सधे हैं

चाल भी सीधी…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 11, 2014 at 9:00pm — 6 Comments

अब भी चेतो मानव मन तू!

कल कल कल कल नदियाँ बहती, झरने गीत सुनाते हैं,

तरु शाखाओं पर छिपकर खग, पंचम सुर में गाते हैं.

गिरि, नद, जंगल, अवनि, पशु सब, सृष्टि के अनमोल रतन,

मानव सबसे बुद्धि शील बन, अपनी राह बनाते हैं.

नदियों की धारा को रोकी, शिखरों को भी ध्वस्त किया,

काटके जंगल, भवन बनाते, अब क्यों वे पछताते हैं.

सीख नहीं कुछ लेते मानव, प्रकृति सब कुछ देख रही,

कभी केदार, कभी कश्मीर में, मानव ही दुःख पाते हैं.  

सेना सीमा की रक्षक है, आपद में करती…

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on September 11, 2014 at 5:27pm — 10 Comments

काशी की दुनिया.........

काशी की दुनिया हो

या काबा की बस्ती हो

यूँ ही न उजड़े चाहे

फ़कीर बाबा की बस्ती हो।।

साहिल से बिछड़ी हुई

मुक़ाम-ए-पास हो जाए

लहरों में फँसती चाहे

केवट की कश्ती हो।।

शोहरत की मस्ती हो

या माले की हस्ती हो

यूँ ही न टूटे कोई चाहे

मुफ़लिसी में घरबां गिरस्ती हो।।

मातहतों की मस्ती…

Continue

Added by anand murthy on September 11, 2014 at 4:00pm — 8 Comments

व्यवस्था (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

कौआ एक बार फिर प्यासा था। बहुत ढूंढने पर उसे फिर एक घड़े में थोड़ा सा पानी दिखाई दिया। एक बार फिर उसने पास पड़े कंकड़-पत्थर उठा उसमें डाले और जैसे ही पानी उसकी पहुँच तक आया तभी कुछ ताकतवर कौऐ एक झुंड में उस पर टूट पड़े और उसे वहां से खदेड़ कर उस पानी पर कब्जा कर लिया। बेचारा प्यासा कौआ एक बार फिर से पानी की तलाश में जुट गया।

.


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on September 11, 2014 at 12:00pm — 8 Comments

सो जाता

हमें भी जिन्‍दगी से प्‍यार हो जाता।।।

हमारे प्यार मे गर कोई खो जाता

शिकायत भी नहीं उनसे दोष मेरा है

निभाते प्‍यार गर हम तो न वो जाता

तड़पता ही रहूँगा रात भर क्‍या मैं

मिलन की अास गर भी होती  सो जाता

न पाये रूह उसकी चैन जन्‍नत में

दिखा सपने सुहाने छोड़ जो जाता

बहे जो आज नफरत की हवा जग में

मिटा मैं काश नफरत प्‍यार बो जाता

मौलिक व अप्रकाशित अखंड गहमरी

Added by Akhand Gahmari on September 11, 2014 at 3:45am — 5 Comments

"खुद से खुद की दूरी क्यों"

खुद से खुद की दूरी क्यों।
ऐसी भी मजबूरी क्यों।।

गर वो सबकुछ जानता है।
उससे बात ज़रूरी क्यों।।

तेरी मेरी इक ज़ुबान।
पूरी बात अधूरी क्यों।।

रात रातभर बातें की।
होती बात न पूरी क्यों।।

गर वो सच में बेगुनाह।
फाँसी की मंज़ूरी क्यों।।

पता नहीं उसमें क्या है।
ऐसे को कस्तूरी क्यों।।
*******************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 10, 2014 at 7:07pm — 11 Comments

पाच दोहे - लक्ष्मण रामानुज

तेरी मेरी बात पर फँस जाता इन्सान,

धन दौलत को देखकर, खो देता ईमान |

 

अग्नि परीक्षा दे रही कितनी सीता आज,

दुष्ट दुशासन लूटते, नित श्यामा की लाज |

रिश्ते नातो में भरो मधुर प्रेम का सार

प्यार भरे व्यवहार से मिटते कष्ट हजार |

संस्कारी परिवार में, बच्चें ही जागीर, 

ह्रदय प्रेम उमड़े सदा, दिल से रहे अमीर |

भावुकता वरदान हो, समझे मन की पीर,

गलत काम का खौफ हो, खुशियों में हो सीर |

(मौलिक व…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 10, 2014 at 6:00pm — 9 Comments

स्मृतियाँ और आंसू--डा० विजय शंकर

आँख में आया हरेक आंसू

तेरी वजह से हो ,जरुरी

नहीं होता है .

आँख में पड़ जाये कोई

छोटी सी किरकिरी

तो भी होता है .



दो बून्द आंसू की

एक अधखिला गुलाब,

यही स्मृतियाँ हैं तुम्हारी ,

कोई पर्वत नहीं ,

कोई सागर भी नहीं .

कि संभाल न सकूँ , छिपा न सकूँ ,

कि जिंदगी भर संजों न सकूँ .



हाँ , तुमको अपनी आँखों में जरूर

बसाया था ,और छिपाया भी था,

आंसू की तरह .

एक किरकिरी पड़ी आँख में ,

और तुम जरा भी सह न सके

और… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 10, 2014 at 4:13pm — 12 Comments

हिंदी पखवाड़े/हिंदी दिवस को समर्पित कुछ ग़ज़ले

१.

देश की शान है अपनी हिंदी

फिर भी हल्कान है अपनी हिंदी

 

एक डोरी से जुड़ जाए भारत

एक अभियान है अपनी हिंदी

 

घर में अपने ही होकर पराई

आज हैरान है  अपनी हिंदी

 

अपना सिर क्यूं झुके जग में यारों

अपना अभिमान है अपनी हिंदी

 

सारी दुनिया में फहराया परचम

हिन्द की आन है अपनी हिंदी

 

हिंदी से हैं सभी हिन्दवासी

अपनी पहचान है अपनी हिंदी

 

जितना सीधा सरल मन है…

Continue

Added by khursheed khairadi on September 10, 2014 at 1:30pm — 6 Comments

बोध (नवगीत)

मौत का सघन  साया

अनुभूति बनकर आया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

यह आत्मीयता प्रदर्शन

करुणा  का कलित क्रंदन

चीत्कार आर्त्त रोदन

या नाट्य  अभिनय मंचन

.

इसे देख जी में आया 

छोडूं न अभी काया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

सर्वांग व्यथित परिजन

सूने उदास से मन

इतना असीम कम्पन

तब था न  जब था जीवन

.

यह मोह है या माया

कुछ कुछ समझ में आया

मेरे अंतिम क्षणों में…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 10, 2014 at 1:30pm — 23 Comments

शहरों की भीड़ भाड़ में

शहरों की भीड़ भाड़ में

बस आदमी ही आदमी।

चलता ही जा रहा है

थकता नहीं है आदमी।

वाहनों की दौड़ भाग से

नहीं इसे परहेज

न है इसे प्रतिद्वंद्विता

न द्वेष रखता है सहेज

इसका तो अपना ध्‍येय है

पीढ़ियों से अपराजेय है

फि‍र भी देवताओं सा

लगता नहीं है आदमी।

इसकी अभिलाषाओं का

अभी न अंत होना है

अभी न तृप्‍त होगा यह

अभी न संत होना है

अभी इसे विकास के

सोपानों पर चढ़ना है…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 10, 2014 at 9:40am — 1 Comment

देर हो रही है

देर हो रही है

जागो-जागो

आओ रे भगाओ रे भेडिए

इधर व्यवस्था के पालने में

सोया हे प्रजातंत्र

और सत्ता के गलियारे तक…

Continue

Added by rawal rajesh on September 9, 2014 at 11:00pm — 2 Comments

आलेख- विकास ही गतिमान है।

भारतीय या किसी अन्य देश व प्रांत की भाषा,संस्कृति,धर्म व जीवन शैली वंहा की अपनी मौलिक व प्राकृतिक होती है । जिसका स्वतः विकास होना अति आवश्यक होता है। परंतु अन्य धर्मावलम्बियों द्वारा दूसरे राज्य,संस्कृति,धर्म,पर अनावश्यक दबाव मानवीय मूल्यों को क्षति तो पहुंचाता है साथ ही अनैतिक है। किसी भी सच्चे अर्थों में जो मानव होते हैं उन्हें यह अनैतिक दबाव सहन नहीं होता , जिसके कारण मानव आपस में लडते हैं और मानवीय मूल्यों का ह्रास होता है। सच्चे अर्थों में मानव के लिये ऐसा कार्य निंदनीय होता है। भारतीय…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on September 8, 2014 at 10:27pm — No Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Monday
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service