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उनका अभिनंदन है जो कुछ कर गुजरते हैं - सुलभ अग्निहोत्री

उनका अभिनंदन है जो कुछ कर गुजरते हैं ।

भाग्य की प्राण-प्रतिष्ठा के हवन में भी

कर्म ही यजमान बनकर होम करते हैं ।

मेरे शब्दों को अभी स्वर की तमन्ना है,

फड़फड़ाते पंख को आकाश बनना है,

वेदना के गर्भ में संकल्प पलता है

हर अमा को चीर कर सूरज निकलता है

आश्वासन आस से परिहास मत करना

आँसुओं से अन्ततः अंगार झरते हैं ।

चेतना की बाँसुरी को स्नेह की सरगम,

भावना को दे नये उद्गम, नये संगम,

ओस बन अन्तःकरण के कुसुम को धो दे

बीज…

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Added by Sulabh Agnihotri on October 2, 2014 at 8:30pm — 12 Comments

दोगलापन (लघु कहानी)

"कुछ पुन्य कर्म भी कर लिया करो भाग्यवान, सोसायटी की सारी औरतें कन्या जिमाती है, और तू है कि कोई धर्म कर्म है ही नहीं|"

"देखिये जी लोग क्या कहते है, करते है इससे हमसे कोई मतलब ......"

बात को बीच में काटते हुए रमेश बोले- "हाँ हाँ मालुम है तू तो दूसरे ही लोक से आई है, पर मेरे कहने पर ही सही कर लिया कर|"

नवमी पर दरवाजे की घंटी बजी- -सामने छोटे बच्चों की भीड़ देख सोचा रख ही लूँ…

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Added by savitamishra on October 2, 2014 at 7:00pm — 6 Comments

राम के वंशज कहाँ खो गये --डा० विजय शंकर

राम के वंशज कहाँ खो गये ,

उत्तराधिकारी रावण के

क्यों प्रबल हो गये ॥



कितना कठिन है राम के

रूप को लोगों में ज़िंदा रखना ,

राम की मर्यादा बनाये रखना ,

रावण तो है , स्वतः है ,

अपने आप ज़िंदा रहता है |



कैसे कुछ लोग राम राम जपते हैं ,

रावण जैसा बनने को तरसते हैं ।

मौक़ा मिलते ही रावण बनने के

हर एक जतन करते हैं |



उन्हें भी सोने की लंका चाहिए ,

सोने का हिरन चाहिए ,

सुंदरी हरण का मौक़ा चाहिए |



राम का त्याग… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 2, 2014 at 1:43pm — 11 Comments

नवरात्रि के जश्न में कुछ सुलगते प्रश्न

 नवरात्रि के जश्न में कुछ सुलगते प्रश्न - डॉ हृदेश चौधरी  

हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार कुंवारी कन्याएँ माता के समान ही पवित्र और पूजनीय होती है साक्षात देवी माँ का स्वरूप मानी जाती है इसलिए “ या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता” भाव के साथ अष्टमी और नवमी के दिन कन्या (कंजिका) पूजन किया जाता है। वेदिक काल के पूर्व से ही कन्या पूजन का विधान रहा है और धर्मशास्त्रों में भी इस बात की स्वीकारोक्ति…

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Added by DR. HIRDESH CHAUDHARY on October 2, 2014 at 1:30pm — 4 Comments

झाड़ू

" अम्बे है मेरी माँ , दुर्गे है मेरी माँ " गुनगुनाते हुए बटोही गली में झाड़ू लगा रहा था | अचानक सामने से एक भीड़ आई और वो किनारे हट गया |

" अरे मिल गया रे झाड़ू " चिल्लाते हुए लोगों का हुजूम , जिसमे कुछ खद्दरधारी भी थे , बटोही की ओर बढ़ा | जब तक वो कुछ समझे , झाड़ू छीन लिया गया था और फिर भीड़ ने बारी बारी से झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचाई | इसी छीना छपटी में बेचारे बटोही का झाड़ू भी टूट गया |

" सर , मेरी फोटो देखी आपने , आजके सांध्यकालीन अखबार में छपी है " , बताते हुए नेताजी बहुत प्रसन्न थे |…

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Added by विनय कुमार on October 2, 2014 at 1:00pm — 10 Comments

कल के लिए (लघुकथा)

"रागिनी ! इन छोटी छोटी बातों को नजरंदाज करना सीखो I"
"तो आप क्या चाहते हैं कि मैं चुप बैठी रहूँ ?"
"देखो अकेली यात्रा करोगी तो कोई न कोई ऐसा व्यवहार करेगा ही I अब क्या मिलेगा पुलिस में शिकायत करने से ?"
राजेंद्र ने छोटी बहन को समझाया।
"आपकी बेटी भी तो कुछ ही सालों में जवान हो जाएगी भाईसाब I "
भाई के माथे पर अचानक पसीने की बूँदें चुहचुहा उठीं।
"रुक रग्गो, गाड़ी निकालने दे मुझे, हम सब तुम्हारे साथ चलेंगे रिपोर्ट लिखवाने I "
(संशोधित)
मौलिक व अप्रकाशित

Added by वेदिका on October 2, 2014 at 12:30pm — 11 Comments

हमारे पास जो आता

हमारे पास आता जो वही दिल तोड़ जाता है

रहे जलता हमारा दिल मगर वो मुस्‍कुराता है

हमारी जिन्‍दगी में क्‍यों अधेरा ही रहे छाया

मिले न चैन दिल को क्‍यों भटकती है मेरी काया

न कोई दो कदम चल कर हमें जीना सिखाता है

रहे जलता हमारा दिल मगर वो मुस्‍कुराता है

हमारे पास आता जो वही दिल तोड़ जाता है

न नदियों को कभी देखा मिलाते दो किनारो को

बचाते फूल को मैने नहीं देखा बहारो को

जिसे हम खास कहते है वही हमको मिटाता…

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Added by Akhand Gahmari on October 2, 2014 at 10:21am — 6 Comments

पटियाला से ऊना-हरियाली और रास्ता (दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे – यात्रावृतांत-२ )

पटियाला-शांत शहर और दिलवाले लोग (यात्रा वृतांत-१) से आगे …

संगीत-संध्या में धमाल करते-करते और रात्री-भोजन के सुस्वादु व्यंजनों के दौरान भी एक दूसरे की जम कर खिंचाई हुयी और भोजपुरी गाने के बोल पर ठहाके पर ठहाके लगे | आ. बागी जी, आ. सौरभ जी ने कई भोजपुरी-ठुमके वाले…

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Added by MAHIMA SHREE on October 2, 2014 at 8:30am — 14 Comments

भारत की कुण्डली में तीन अमंगल ग्रह ( आल्हा छंद ) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

आल्हा छंद 

बरसों पहले बंधु बनाकर, चाउ -माउ चीनी मुस्काय।                                       

और उसे हम बड़े प्यार से,  भैया कहकर गले लगाय।।                            

 

हर आतंकी पाकिस्तानी, चाल चीन की समझ न आय ।                                                             

दो मुँह वाला अमरीका है, विकिलीक्स दुनिया को बताय।।                       

 

एक ओर है  पाक समस्या , और कहीं चीनी घुस जाय ।                           

*राम -…

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Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 1, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

शोकाग्नि का भोज (लघुकथा)

जवान बेटा मरा था उसका I मातम फैला हुआ था परिवार में, परिवार के हरेक सदस्य में, सदस्यों के दिलों में I लेकिन, श्राद्धकर्म तो करना ही पड़ेगा, गाँववासियों को भोज तो खिलाना ही पड़ेगाI

आज उसी का भोज है I लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले हैं I  भोज है, जबकि एक घर शोकाग्नि में तप रहा हैं और इसी तपन पर ऊफन रहा है - चावल, दाल, सब्जी ...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Vivek Jha on October 1, 2014 at 12:30pm — 5 Comments

प्राथमिक शिक्षा के डगमगाते कदम

विश्व गुरु कहलाने वाले भारत की बुनियादी शिक्षा सरकार के हाथों की कठपुतली बनकर रह गयी है। कहते हें बुनियाद जितनी मजबूत होगी, इमारत उतनी ही बुलंद होगी I इसी तरह प्राथमिक शिक्षा का स्तर जितना बेहतर होगा, देश के नौनिहालों का भविष्य उतना ही उज्जवल होगा । आज एक तरफ हम विकास की तमाम राहें क्यू न तय कर रहे हों और देश की तरक्की के लिए विदेशों के साथ दोस्ती का ख्वाब बेशक सज़ा रहे हो, लेकिन दूसरी तरफ  इन सबके साथ एक बहुत बड़ा कड़वा सच जो हम अपनी आंखो से देख रहे है वो है प्राथमिक शिक्षा का डगमगाता स्वरूप,…

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Added by DR. HIRDESH CHAUDHARY on October 1, 2014 at 11:40am — 4 Comments

अब ऐसा क्यूँ होता है

मिलती है तूँ ख्वाबो में,
अक्सर ऐसा क्यूँ होता है!
तेरी यादों के घेरे में,
ये दिल चुपके से रोता है!
आँखों का भी क्या कहना,
ना जाने कब सोता है!
दीदार तेरे कब होंगे,
सपने यही संजोता है!
मन रहता है विचलित सा,
क्या पाया, क्या खोता है!
तन भी लगता है मैला
पापो की गठरी ढ़ोता है!
खुद की भी परवाह नही,
अब ऐसा क्यूँ होता है!!

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on October 1, 2014 at 10:30am — 6 Comments

नवगीत//कल्पना रामानी//

माँ

ज़िक्र त्याग का हुआ जहाँ माँ!

नाम तुम्हारा चलकर

आया।

 

कैसे तुम्हें रचा विधना ने

इतना कोमल इतना स्नेहिल!    

ऊर्जस्वित इस मुख के आगे

पूर्ण चंद्र भी लगता धूमिल।

 

क्षण भंगुर भव-भोग सकल माँ!

सुख अक्षुण्ण तुम्हारा   

जाया।

 

दिया जलाया मंदिर-मंदिर

मान-मनौती की धर बाती।

जहाँ देखती पीर-पाँव तुम  

दुआ माँगने नत हो जाती।

 

क्या-क्या सूत्र नहीं माँ…

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Added by कल्पना रामानी on October 1, 2014 at 9:30am — 9 Comments

पटियाला-शांत शहर और दिलवाले लोग (यात्रा वृतांत-१)

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री ऋषि प्रभाकर जी के मंगल विवाह में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ | 25 सितम्बर की शाम को लेडीज संगीत के आयोजन में शामिल होना तय था | हमारी ट्रेन दिल्ली से राजपुरा तक थी वहाँ से हमने  बस पटियाला तक की ली फिर पंजाबी यूनिवर्सिटी बस स्टैंड पर हमें प्यारे से रोबिन और मनु जी लेने आ गए | इस बीच में लगातार प्रभाकर सर, आ. गणेश जी बागी से…

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Added by MAHIMA SHREE on September 30, 2014 at 11:30am — 33 Comments

मंथर गति से.......

मंथर गति से



थमा नहि पल कोई सुहाना

बीत सदा जाता है।

मंथर गति से घट जीवन का

रीत सदा जाता है।



सींचा एक एक पौधा तब

वन उपवन लहराते।

अनजाने से सन्नाटे ये

चुपके चुपके आते।

बड़ा तिलस्मी मरूथल

पग पग

जीत सदा जाता है



अल सुबहा के स्वपन सजीले

दिन भर धूम मचाते।

ऊषा के स्वर्णिम चंचल रँग

साँझ ढले थक जाते।

श्याम निशा के रँग

से जीवन

भीत सदा जाता है

मंथर गति से घट जीवन का

रीत सदा जाता…

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Added by seemahari sharma on September 30, 2014 at 2:00am — 16 Comments

ग़ज़ल: जिंदगी जैसे परायी हो गयी.

पाँव में खुद के बिवाई हो गयी.

आदमी तेरी दुहाई हो गयी.

 

वायु पानी भी नहीं हैं शुद्ध अब,

सांस लेने में बुराई हो गयी.

 

बारिशों का दौर सूखा जा रहा.

मौसमों की लो रुषायी हो गयी.

 

आपदाएं रोज़ होतीं हर कहीं,

रुष्ट अब जैसे खुदाई हो गयी.

 

काट डाले पेड़ सब मासूम से,

जंगलों की तो सफाई हो गयी.

 

काटती है पैर खुद अपने भला,

देखिये आरी कसाई हो गयी.

 

पेड़ दिखते थे जहाँ पर गाँव…

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Added by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 1:00am — 18 Comments

हम फिर...! संघर्ष करेंगे.

चार माह की

तपती धरा पर

जैसे ही बारिश की बूँदे बरसी

बो दिये , नन्हे-नन्हे अंकुरों को

कई कतारों में

सभी ने मिलकर

नन्हें -नन्हे  से हाथो को

ऊँचा उठाकर

दूर कर दी , मिट्टी की चादर  

धीरे से झाँक ने लगे

इस सुंदर सी दुनिया को

दो से चार और फिर छै:

धीरे-धीरे पत्तियां बढ़ने लगी

ढांकने लगी

अपनी ही छाँव से,

नाजुक जड़ों को

धूप में भी बनाये रखी

अपने-अपने हिस्से की नमी

अपनी  एकता की…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on September 29, 2014 at 10:30pm — 14 Comments

लो अब मैं ....

लो अब मैं सुधर गया

उनके दिल से उतर गया

याद न आया उनको मैं भी

मेरी कुरबत भी न भा पाई

उनकी सुधियों से गुजर गया

इक पतझड़ सा बिखर गया

मलूल हुआ आनन्द

सोचकर कि वो

इजहारे-वक्त पर मुकर गया

उसूल देखो यार मेरे

साए में…

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Added by anand murthy on September 29, 2014 at 7:30pm — 4 Comments

हाइकु

(1)

रे दुराचारी
देख ना आयी शर्म
अबला नारी


(2)

बन सबला
कर नाश दुष्टों का
नारी अबला


(3)

नन्ही सी जान
खिलखिला देती थी
आज बेजान


(4)

मन को भाया
घने धूप में पंथी
वृक्ष की छाया


(5)

सांस की जान
काट रहे नादान
होते बेजान

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on September 29, 2014 at 1:00pm — 12 Comments

क्या माली का हो गया, बाग़ों से अनुबंध ?

१.

क्या माली का हो गया, बाग़ों से अनुबंध ?

चित्र छपा है फूल का, शीशी में है गंध |

२.

चूल्हे न्यारे हो गये, आँगन में दीवार

बूढ़ी माँ ने मौन धर, बाँट लिए त्यौहार |

३.

मुल्ला जी देते रहे, पाँचों वक़्त अजान

उस मौला को भा गई, बच्चे की मुस्कान |

 ४.

एक तमाशा फिर हुआ, इन दंगों के बाद

जिनने फूंकी बस्तियाँ, बाँट रहें इमदाद |

 ५.

शीशाघर की मीन सा, यारों अपना हाल

दीवारों में क़ैद है, सुख के ओछे ताल…

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Added by khursheed khairadi on September 29, 2014 at 8:30am — 14 Comments

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