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गजल //// खुदा से जो भी डरता है

हजज  मुरब्बा सालिम     

1222            1222

 

खुदा से जो भी डरता है

खुदा को  याद करता है

 

समय  है  जानवर ऐसा

जरा  धीरे से  चरता है

 

कृषक की छातियाँ देखो

पसीना  नित्य  झरता है

 

बिछे  जब राह  में काँटे

पथिक पग सोंच धरत़ा है

 

भला है  जानवर  उससे

उदर  जो आप  भरता…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 14, 2015 at 9:00pm — 20 Comments

एक प्रयास ( ग़ज़ल )

वो पत्थर था , बहुत थे फेंकने वाले
बन गए हीरे पर , उसे तराशने वाले


कब समझा है कोई वक़्त का इशारा
बन गए हैं ख़ुदा , उसे समझने वाले


ख्वाहिशें तो रखते है ज़माने में सब
और ही होते हैं ,उन्हें पूरा करने वाले


ग़ुम है बदगुमानी में ,ये सारी दुनिया
मिलते हैं कहाँ ,अब सच लिखने वाले


तलाश थी सिर्फ , एक फूल की विनय
हज़ार मिले राह में, कांटे रखने वाले !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 14, 2015 at 4:00pm — 16 Comments

उम्र(लघु कथा, मनन कु॰ सिंह)

उम्र

‘आप मुझे जानते हैं ?’

‘आप ही बता दें’।

‘फ्रेंड– रेकुएस्ट तो आपका था न?’

‘हाँ, एक दोस्त के साथ आपका नाम था’।

‘दोस्त का नाम बताइये’।

‘था कुछ नाम जी’।

‘अच्छा चलिये, अपने ही बारे  में बता दीजिये’। उधर से महिला ने संदेश भेजा ।

‘ मेरे बारे में तो मेरे प्रोफ़ाइल में है सब कुछ’।

‘कहाँ रहते हैं?’

‘आप बताइये’।

‘मैं तो जट मारवाड़ से हूँ, आप ?’

‘कोल्हापुर से जी’।

‘पर, आप बावन के हैं , मैं तो बस…

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Added by Manan Kumar singh on June 14, 2015 at 12:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल :- आज जिस रंग में ढालोगे मैं ढल जाऊँगा

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



आज जिस रंग में ढालोगे मैं ढल जाऊँगा

दैर कर दोगे तो हाथों से निकल जाऊँगा



एक हालत में यहाँ कौन रहा है,मैं भी

जैसे हर चीज़ बदलती है,बदल जाऊँगा



ऐसे ही बनते हैं,दुनिया में मिसाली किरदार

मैं भी फूलों की तरह काँटों में पल जाऊँगा



मोम या बर्फ़ के जैसा नहीं,पर जानता हूँ

मैं तिरे जिस्म की गर्मी से पिघल जाऊँगा



मैं तो इक ख़ाक का पुतला हूँ,तू मिस्ल-ए-ख़ुर्शीद

पास आऊँगा अगर तेरे तो जल… Continue

Added by Samar kabeer on June 14, 2015 at 10:57am — 32 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हवा में यूँ तोते उड़ाया न कर(ग़ज़ल 'राज')

१२२ १२२ १२२ १२

मिला कीमती वक़्त जाया न कर

बुरी बात होंठों पे लाया न कर

 

बड़ी जितनी चादर उसी में सिमट    

तू ये नाज़ नखरे दिखाया न कर

 

कभी वो तेरा हाथ देंगे मरोड़

किसी को तू ऊँगली दिखाया न कर

 

अदब से कहेगा सुनेंगे सभी

सुलगती  जुबाँ से सुनाया न कर

 

तवा गर्म है सब्र से काम ले

इन हाथों को अपने जलाया न कर

 

सही है अगर तू दिखा तो सबूत

हवा में यूँ तोते उड़ाया न…

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Added by rajesh kumari on June 14, 2015 at 9:40am — 30 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - फिल बदीह --- वो सुनते नहीं कुछ , पुकारा बहुत है ( गिरिराज भंडारी )

122    122   122   122

जो कहते थे उनको इशारा बहुत है

वो सुनते नहीं कुछ , पुकारा बहुत है

 

ऐ तन्हाई आ मेरी जानिब चली आ

कि यादों को तेरा सहारा बहुत है

 

तबीयत से इक फूँक भारो तो यारों

जलाने को दुनिया, शरारा बहुत है

 

ये मजहब का ठेका हटा लो यहाँ से …

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Added by गिरिराज भंडारी on June 14, 2015 at 7:30am — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जिज्ञासा

जिज्ञासा

प्रश्न?

केवल प्रश्नों के घेरे में

छटपटाता जीवन,

चीर दिया आकाश

फिर भी चंचल था यह मन

वह था मेरा प्यारा बचपन ;

हाईफन –

यौवन का हाईफन लाया

तटस्थ जीवन

क्या किसीसे हो पाया

कोई सेतु बंधन !

व्यर्थ,

व्यर्थ ही कुछ क्रंदन ;

अल्पविराम ,

प्रौढ़त्व के अल्पविराम पर

टिका हुआ है जीवन

इच्छाओं के जंगल से निकलकर

जान पाया मन

जीवन है एक उपवन ;

अंत में,

पूर्णविराम के साथ

हे मेरे…

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Added by sharadindu mukerji on June 14, 2015 at 4:52am — 14 Comments

रातभर(गजल,मनन कु.सिंह)

गजल
2 2 2 2 2 2 1 21 2
बरसी है कल बरसात रातभर,
तरसा है पल कल रात रातभर।
धरती है अब तक भींग भींग कर,
तड़पा है मन कल रात रातभर।
पड़ती थीं बूँदें रात-गात पर,
बढ़ती थीं बातें रात रातभर।
झोंके थे पावन वात वान-से,
लहरी थी लगती रात रातभर।
तेरी थीं यादें रात घाव-सी,
मुझको थी लगती घात रातभर।
@मनन
वात=हवा
वान=युक्त
घात=चोट/घाव
गात=शरीर/देह

Added by Manan Kumar singh on June 13, 2015 at 11:00pm — 1 Comment

नवगीत : पत्थर-दिल पूँजी

पत्थर-दिल पूँजी

के दिल पर

मार हथौड़ा

टूटे पत्थर

 

कितनी सारी धरती पर

इसका जायज़ नाजायज़ कब्ज़ा

विषधर इसके नीचे पलते

किन्तु न उगने देता सब्ज़ा

 

अगर टूट जाता टुकड़ों में

बन जाते

मज़लूमों के घर

 

मौसम अच्छा हो कि बुरा हो

इस पर कोई फ़र्क न पड़ता

चोटी पर हो या खाई में

आसानी से नहीं उखड़ता

 

उखड़ गया तो

कितने ही मर जाते

इसकी ज़द में आकर

 

छूट मिली…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 4:15pm — 12 Comments

बदगुमानी ( लघुकथा )

" बहुत गुमान था तुमको सृजन पर , देखो मेरी ताक़त ", विनाश इतरा रहा था । पूरा इलाका तबाह हो गया था , दूर दूर तक कहीं जीवन का कोई नामोनिशान नज़र नहीं आ रहा था ।
लेकिन श्रृष्टि अभी भी मुस्कुरा रही थी " तुमने शायद पीछे मुड़ कर नहीं देखा "।
विनाश ने पलट कर देखा , उसका दर्प चूर चूर हो गया ।
एक नन्हीं सी कोंपल सृजन की विजय पताका फहरा रही थी , जीवन पुनः जीत गया था ।
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 13, 2015 at 1:38pm — 20 Comments

मेरे 3 मुक्तक ....

1.

थोड़ा सा झूठा  हूँ  ....

थोड़ा सा झूठा  हूँ थोड़ा  सा सच्चा हूँ

थोड़ा सा  बुरा  हूँ थोड़ा  सा अच्छा हूँ

भुला देना दिल से  मेरी गल्तियों को

दिल से तो यारो मैं थोड़ा सा बच्चा हूँ

सुशील सरना

......................................................

2.

तेरे अल्फ़ाज़ों से....

तेरे अल्फ़ाज़ों से हसीन जज़्बात बयाँ होते हैं

तेरे ख़तूत में कुछ बीते लम्हात निहाँ होते हैं

हर शब तेरे जिस्म की बू  से लबरेज़ होती है

हर ख़्वाब में बस तेरे…

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Added by Sushil Sarna on June 13, 2015 at 1:30pm — 4 Comments

कुदरत - लघुकथा

"खुदा का कहर तो खुदा का ही है पर ये सब तो हमने किया। टूटे हुए आशियाने, स्याह काले रंगों में बदलती हरियाली और उपजाऊ जमीन को बंजर करती बारूदी तबाही। आखिर दहशतगर्दी को ख़त्म करने के लिए क्या यही एक रास्ता था?" अपनी 'कमांडरशिप' में किये 'आपरेशन' के बाद इलाके को एक नज़र देखते हुए वो सोच रहा था।

इस वीरान धरती को देख, इस खेल में खुद की हिस्सेदारी के लिए, बतौर इनाम लगे तमगे भी अब उसे चुबने लगे थे। मन का बोझ जब खुद का भार सहने में नाकाम हो गया तो अश्को के रस्ते बह निकला। फलक की और देखता हुआ वो कह…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 13, 2015 at 1:01pm — 9 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

जिंदगी से जो चली अपनी ढ़िठाई दोस्तों

खाक में ही उम्र सारी यूँ  बिताई दोस्तों

अम्न की वंशी बजाई और गाये गीत भी

नफरतों की होलिका हमने जलाई दोस्तों

जब कभी दुश्वारियाँ आयी हमारी राह में

एक माँ की ही दुआ फिर काम आई दोस्तों

दोस्ती है एक नेमत टूटना अच्छा नहीं

साथ चलने में कहाँ कोई बुराई दोस्तों

हो भला सबका यहाँ मेरी दुआ है बस यही

ना करें कोई भी मज़हब की लड़ाई…

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Added by MAHIMA SHREE on June 13, 2015 at 12:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- ये ज़मीं सारी मेरा घर कह लें ( गिरिराज भंडारी )

2122   1212    22  / 112 

ये ज़मीं सारी मेरा घर कह लें

आप आयें जहाँ से, दर कह लें

 

जो कमाता है…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 13, 2015 at 9:00am — 28 Comments

नैतिक शिक्षा ( लघुकथा )

" मम्मी , आज तो बहुत आसान टास्क मिला था मुझे स्कूल में ", मन्नू बोला ।
" अच्छा , क्या था , जरा मैं भी सुनूँ "।
मन्नू ने चहकते हुए कहा " घर की सबसे यूज़फुल और सबसे यूज़लेस चीज़ लिखना था "।
" सबसे यूज़फुल तो आप ही हो मम्मी "|
" और सबसे यूज़लेस चीज़ तो आपने कितनी बार बताया है ", दरवाजे पर स्तब्ध खड़े दादाजी अपनी उपयोगिता समझ गए थे ।
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 13, 2015 at 12:02am — 22 Comments

पुलक तरंग जान्हवी

पुलक तरंग जान्हवी,

हरित ललित वसुंधरा,

गगन पवन उडा रहा है

मेघ केश भारती।

श्वेत वस्त्र सज्जितः

पवित्र शीतलम् भवः

गर्व पर्व उत्तरः

हिमगिरि मना रहा।

विराट भाल भारती

सुसज्जितम् चहुँ दिशि

हरष हरष विशालतम

सिंधु पग पखारता।

कोटि कोटि कोटिशः

नग प्रफ़्फ़ुलितम् भवः

नभ नग चन्द्र दिवाकरः

उतारते है आरती।

ओम के उद्घोष से

हो चहुँदिश शांति

हो पवित्रं मनुज मन सब।

और मिटे सब…

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Added by Aditya Kumar on June 12, 2015 at 12:48pm — 19 Comments

स्मृतियाॅ....(कविता)

स्मृतियाॅ लेने लगी हैं आकार मूरतों का

स्मृतियाॅ वो....जो बह चली थी खुलते ही गाॅठ ओढनी की।

इक इक कर दाने यादों के आज के आॅगन में गिरने लगे

कुछ को देख हॅसी आॅखें,कुछ पे आॅखों से आॅसू गिरने लगे

कुछ जख्म नये देकर गये तो कुछ से जख्म पूराने भरने लगे।

कि स्मृतियाॅ................

खुशबुएॅ कुछ गुलाबों की करके कैद रखदी थी मैंने किताबों में 

पन्ने फडफडानें लगे अतीत के औ होकर आजाद वो बहने लगी

पंख तितलियों के भी मिल गये कुछ बसीयत की तरह दबे दबे

कुछ ने गिले…

Continue

Added by vandaanamodi goyal on June 12, 2015 at 11:00am — 4 Comments

कविता

बचपन भटक रही है ( कविता )





हैरी पोर्टर की दुनिया में

वो रहता मसगूल

नोमिता और सिंगचेन बनकर

ही होना है मशहूर

वो कहता है माँ से

मुझे चाहिए माॅसमेलो

चावल दाल भूल कर

बन गया राईस केक का फैलो

खीर हलवा पूरी

अब हुई पुरानी बात

करना हो तो करो चाऊमिन पिज़्ज़ा

रोल वोल की बात

माँ बन गई माॅम

पापा का तो काम तमाम

ऐश और पिकाचू लेकर

याद रहा बस पोकीमोन

स्पाइडर मैन का जादू

ऐसा सर चढकर बोला

सुपर मैन और आयरन… Continue

Added by kanta roy on June 11, 2015 at 11:55pm — 7 Comments

दो दिल दो रास्ते(कहानी,सोमेश कुमार )

दो दिल दो रास्ते

मोबाईल पर मैसेज आया –“गुड बाय फॉर फॉरएवर |”

कालीबाड़ी मन्दिर पर उस मुलाकात के समय जब तुमने आज तक का एकमात्र गिफ्ट प्यारा सा गणेश दिया था तो उसके रैपर पर बड़े आर्टिस्टिक ढंग से लिखा था-फॉर यू फॉरएवर और अब ये !|

यूँ तो तुम सदा कहते थे -मुझे एक दिन जाना होगा |

पर इसी तिथि को जाओगे जिस रोज़ मेरी ज़िन्दगी में आए थे दो साल पहले |वो भी इस तरह |इसकी कल्पना भी ना की थी |

अगला मैसेज-मुझे याद मत करना |अगर तुम मुझे याद करोगी तो मैं स्थिर नहीं रह…

Continue

Added by somesh kumar on June 11, 2015 at 11:30pm — 1 Comment

कला गीतिका-दौर गम का ये पिघलने दो जरा

बहरे रमल मुसद्दस महजूफ

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 212

--------------------------

हसरतें बेताब जलने दो ज़रा।

दौर गम का ये पिघलने दो जरा।

*****

मन जला है तन जला है इश्क में,

प्यार की अब साँझ ढलने दो ज़रा।

*****

प्यास होठों को सुखाये जा रहा,

भर नजर से जाम चलने दो ज़रा।

*****

होश में हम रोज रोते ही रहें,

अश्क पीकर आज हँसने दो ज़रा।

*****

आ उजाड़ो शौक से ऐ आँधियों,

बस्तियां दो चार बसने दो ज़रा।

******

आप… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 11, 2015 at 9:04pm — 20 Comments

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