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कंगली (लघुकथा )

साक्षी ने सारी सीमाएं विवाह पूर्व ही तोड़ दी थी ।विवश हो उसके प्रेम विवाह को सहमति देनी पड़ी लेकिन विवाह के मात्र आठ माह बाद तीन माह की पुत्री को लेकर लौट आयी थी । बिटिया तीन वर्ष की हो गयी थी ।साक्षी ने पुनः विवाह कर लिया बेटी ननिहाल में ही पल रही थी।इसी बात से संतोष था की वह ससुराल में रम जाय लेकिन -

" माँ अब मैं उस घर नहीं जाउंगी।"



"क्यों ? अब क्या हो गया ?"



"उसे पत्नी नहीं माँ के लिए नौकरानी चाहिए थी और वह तो पूरा कंगला हैं ,मैंने तो उसकी चमक देख ब्याह किया… Continue

Added by Archana Tripathi on October 27, 2015 at 11:52pm — 13 Comments

हे कलाम शत शत प्रणाम "अज्ञात"

आदरणीय कलाम साहब को समर्पित

सरल, सादगी की वह मूरत,                 

ऐसा पावन दूत हुआ,                        

भारत ही क्या ,उसकी छवि से,                                

जग सारा अभिभूत हुआ,              

आकाश, नाग, पृथ्वी, त्रिशूल से,                  

दाता पैने तीरों का,                                     

भारत को समृद्ध किया और                                           

जीवन जिया फकीरों सा ।                    

जिसकी …

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 27, 2015 at 11:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए (मनोज कुमार अहसास)

2122 2122 2122 212





कल्पना का पथ टटोलें कुछ समय की आह सुन

इस तरह निभ जाये शायद अपनी चाहत अपनी धुन



उनकी यादों की कोई सीमा कोई मंज़िल भी है

मुड़ हकीकी से मजाज़ी या जगत की पीर बुन



बेगुनाही का मज़ा इस बात से दुगना हुआ

मेरे कातिल ने कहा है खुद सजा की राह चुन



एक मिसरा उनपे भी हो जिनसे होती है ग़ज़ल

फाइलातुन, फाइलातुन ,फाइलातुन, फाइलुन



प्रेम की इस व्यंजना में इक अमिट अनुराग है

वो न मेरा नाम लेती है कहती है बस मेरे…

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Added by मनोज अहसास on October 27, 2015 at 2:00pm — 18 Comments

हम दर्द हो कितने बड़े

हमदर्द हो कितने बड़े..

2212-2212-2212-22



हो जो सियासत प्यार में रब भूल जाता हूँ

हमदर्द हो कितने बड़े तब भूल जाता हूँ



उम्दा है जबतक एक हैं कोई न हो मजहब

मैं प्यार में रब सारे मजहब भूल जाता हूँ



समशीर हाथो से हटा सजदा किया मैंने

हाँ मातृभूमी के लिए सब भूल जाता हूँ

रणभूमि में उतरूँ जो मैं सब भूल जाता हूँ

वादी हवा में मिल रहा अब अक्स है उनका

मैंख्वार मेरा मन सब सबब भूल जाता हूँ



हाँ तू वफ़ा है जिंदगी तेरी इनायत सब

तू… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on October 27, 2015 at 8:30am — 9 Comments

ग़ज़ल--( माँ) बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान-    212  212   212  212

 

दर्द सीने में अक्सर छुपाती है माँ|

तब कहीं जाकर फिर मुस्कुराती है माँ|

 

ख़ुद न सोने की चिंता वो करती  मगर,

लोरियां गा के हमको सुलाती है माँ|

 

रूठ जाते हैं हम जो कहीं माँ से तो,

नाज-नखरे हमारे उठाती है माँ|

 

लाख काँटे हों जीवन में उसके मगर,

फूल बच्चों पे अपनी लुटाती है माँ|

 

माँ क्या होती है  पूछो यतीमों से तुम,

रात-दिन उनके सपनों में आती है…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 26, 2015 at 10:30pm — 7 Comments

ज्वालामुखी – ( लघुकथा ) -

 "सुगना, क्या यह सच है कि दशहरे की रात को तुमने चौधरी जगन्नाथ के तीनों बेटों की खलिहान में सोते हुए कुल्हाडी से हत्या की थी"!

"बिलकुल सच है ज़ज़ साब,मैंने ही मारा उन तीनों राक्षसों को , रावण के साथ उनका  मरना भी ज़रूरी था, "!

"तुम्हें अपनी सफ़ाई में कुछ कहना है"!

"ज़ज़ साब, उन तीनों दरिंदों ने उसी खलिहान में  मुझे भूसा लेने बुलाया था और भरी दोपहरी में मेरी इज़्ज़त तार तार कर दी!मेरा बापू चौधरी के पास शिकायत करने गया तो चौधरी बोला कि सुगना के बापू जब पेड पर फ़ल लदे होते हैं तो…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 26, 2015 at 5:00pm — 9 Comments

अब आँखों से ही बरसेंगे

अंबर से मेघ नहीं बरसे

अब आँखों से ही बरसेंगे

 

शोक है

मनी नहीं खुशियाँ

गाँव में इस बार

दशहरा पर

असमय गर्भ पात हुआ है

गिरा है गर्भ

धान्य का धरा पर

कृषक के समक्ष

संकट विशाल है

पड़ा फिर से  अकाल है

खाने के एक निवाले को

रमुआ  के बच्चे तरसेंगे

 

व्यवस्था बहुत  बीमार है

अकाल सरकारी त्योहार है

कमाने का खूब है

अवसर

बटेगी राहत की रेवड़ी

खा जाएँगे  नेता,…

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Added by Neeraj Neer on October 26, 2015 at 2:51pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
मूक अंतर्वेदना............... (डॉ० प्राची सिंह)

मूक अंतर्वेदना स्वर को तरसती रह गयी

आँख सागर आँसुओं का सोख पीड़ा सह गयी

 

मानकर जीवन तपस्या अनवरत की साधना

यज्ञ की वेदी समझ आहूत की हर चाहना

मन हिमालय सा अडिग दावा निरा ये झूठ था 

उफ़! प्रलय में ज़िंदगी तिनके सरीखी बह गयी

मूक अंतर्वेदना....

 

खोज कस्तूरी निकाली रेडियम की गंध में

स्वप्न का आकाश भी ढूँढा कँटीले बंध में

दिख रही थी ठोस अपने पाँव के नीचे ज़मीं

राख की ढेरी मगर थी भरभरा कर ढह गयी

मूक…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 26, 2015 at 9:30am — 11 Comments

"ममता, दोस्ती और मुहब्बत" - गीतिका -[ 3] / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

[आधार छंद : 'विधाता']

1222 1222 1222 1222





कभी अपने मुसीबत में, ज़रा भी काम आये हैं,

जिन्हें समझा नहीं था दोस्त वे नज़दीक लाये हैं।



जिसे माना, जिसे पूजा, उसे घर से भगा कर के,

बुढ़ापे में, जताकर स्वार्थ, ममता को भुलाये हैं।

तुम्हारे पास दिल रख तो दिया गिरवी भरोसे पर,

पता मुझको चला तुमने, हज़ारों दिल दुखाये हैं।



कभी वे फोन पर बातें करेंगी, स्वर बदलकर के,

कभी वे नेट पर चेटिंग, झिलाकर के बुलाये हैं।



न जाने…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 26, 2015 at 8:30am — 10 Comments

बैरी पिया

"हैलो..शोभा!कैसी हो।"

"मैं ठीक हूं । आप कैसे हैं?"

"बढ़िया,अरे सुनो मैं फिर नहीं आ पा रहा हूं।यहां सीमा पर माहौल लगातार खराब चल रहा है।छुट्टियों की अर्जियां निरस्त हो गयी।"

"दोबारा..भला ये क्या बात हुई"उसके स्वर में उदासी छा गई ।

"यूं उदास ना हो, फौजी की बीबी को हर हाल में सब्र रखना चाहिए।अच्छा ये बताओ..अगर आज स्वयं भगवान तुम्हें कोई वरदान मांगने को कहते तो क्या मांगती? "

"यही मांगती कि बस तुम इसी वक्त मेरे पास आ जाओ"

"ओह..प्रिय,कुछ और मांगना था । ये ख्वाइश तो… Continue

Added by Rahila on October 26, 2015 at 7:12am — 24 Comments

ग़ज़ल :- ज़माना जान चुका था,हर इक ख़बर में था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ज़माना जान चुका था,हर इक ख़बर में था

वो इक जुनून जो उस वक़्त मेरे सर में था



हर एक शख़्स खिंचा जा रहा था तेरी तरफ़

न जाने कौन सा जादू तिरी नज़र में था



कभी कभी मुझे उसकी भी याद आती है

सफ़ेद बिल्ली का बच्चा जो अपने घर में था



इसी सबब से परेशान थे मेरे दुश्मन

क़बीला सारा मेरी बात के असर में था



सुनाई देतीं भी कैसे ग़रीब की चीख़ें

तुम्हारा ध्यान तो उस वक़्त माल-ओ-ज़र में था



उड़ान भरते रहे… Continue

Added by Samar kabeer on October 25, 2015 at 10:53pm — 17 Comments

हमें एक बार

हमें एक बार फिर से मुस्कुराना चाहिए----

1222-1222-1222-12



हमें एक बार फिर से मुस्कुराना चाहिए

उसी टूटे ह्रदय से गीत गाना चाहिए



लगी ठोकर मुहब्बत की गिरे जो राह में

हमें तो दिल से दिल को फिर मिलाना चाहिए



जमीं से चाँद तारों तक सजाया प्यार है

सजा में मौत भी हो तो निभाना चाहिए



सफर अपना भले ही साहिले गर्दिश में हो

दिया हो पास में तो फिर जलाना चाहिए



यूँ हिम्मत हार कर ना बैठ मेरे हम सफर

बहरों को हमें फिर से बुलाना… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on October 25, 2015 at 9:42pm — 8 Comments

जीवन की आपाधापी में,

जीवन की आपाधापी में,                     

दिन बचपन के भूल गये,                    

परिवर्तित हो गयी हवायें,                       

मौसम भी प्रतिकूल भये।

वो शाम सुहानी,मित्रों के दल,                   

और किनारा नदियों का,                       

कूद, कबड्डी,गुल्ली डंडा,                          

झर झर झरना सदियों का,                     

खेत और खलिहान की रंगत,                      

लदी डाल  में अमियों का,            

मानचित्र…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 25, 2015 at 3:00pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अतुकांत - समय को भी तो एक दिन बूढ़ा होना है -- गिरिराज भंडारी

वो ममता मयी छुवन हो

जो माँ की कोख से निकलते ही मिली

या हो उसी गोद की जीवन दायनी हरारत

या

तुम्हारी उंगलियों को थामे ,

चलना सिखाते 

पिता की मज़बूत, ज़िम्मेदार हथेली हो

या हो

जमाने की भाग दौड़ से दूर , निश्चिंत

कलुषहीन  हृदय से

धमा चौकड़ी मचाते , गिरते गिराते , खेलते कूदते

बच्चे

या फिर स्कूलों कालेजों की किशोरा वस्था की निर्दोष मौज मस्तियाँ

 

या हो वो जवानी में पारिवारिक , सामाजिक ज़िम्मेदारियों…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 25, 2015 at 1:48pm — 14 Comments

इतने सारे फंदे- डा 0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव

बहुत से फंदे है

उनके पास

छोटे-बड़े नागपाश

इन फंदों में

नहीं फंसती उनकी गर्दन

जो इसे हाथ में लेकर

मौज में घुमाते है

लहराते है

किसी गरीब को देखकर

फुंकारता है यह

काढता है फन 

किसी प्रतिशोध भरे सर्प सा

लिपटता है यह फंदा

अक्सर किसी निरीह के  

गले में कसता है

किसी विषधर के मानिंद

और चटका देता है

गले की हड्डियाँ

किसी जल्लाद की भांति …

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 25, 2015 at 12:26pm — 14 Comments

गुरु दक्षिणा – (लघुकथा ) -

  

  गुरु दक्षिणा – (लघुकथा ) -

 विश्व विद्यालय के प्राचार्य  डॉ टीकम सिंह शिक्षा और साहित्य जगत की जानी मानी हस्ती थे!सुगंधा का सपना था कि वह डॉ सिंह को अपनी पी. एच. डी.  का गाइड बनाये!डॉ सिंह एक सनकी और सिरफ़िरे किस्म के इंसान थे!वह अविवाहित थे!वह महिलाओं को अपने अधीन लेना पसंद नहीं करते थे!

लेकिन सुगंधा भी ज़िद्दी स्वभाव की थी!एक दिन पहुंच गयी डॉ सिंह के बंगले पर!

"सर मुझे आपके अधीन पी. एच ड़ी. करनी है"!

"मैं महिलाओं को अपना शिष्य नहीं…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 25, 2015 at 11:43am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अश्कों का मैं गरीब के सागर समेट लूँ (तरही ग़ज़ल 'राज ')

२२१  २१२१  १२२१   २१२

बलवाइयों के होंसले जाकर समेट लूँ

मासूम गर्दनों पे हैं  खंजर समेट लूँ

 

आये न बददुआ कभी मेरी जुबान  पे

गलती से आ गई तो भी अन्दर समेट लूँ

 

उम्मीद से बनाया हैं बच्चे ने रेत का   

लहरों वहीँ रुको मैं जरा घर समेट लूँ

 

परवाज आज भर रहा पाखी नई नई 

आँखों की चिलमनों में ये मंजर समेट लूँ

 

जिन्दा रहे यकीन मुहब्बत के नाम पर  

फेंके हैं दोस्तों ने जो पत्थर समेट…

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Added by rajesh kumari on October 25, 2015 at 10:30am — 18 Comments

व्यंग्य कविता -"एक बूंद पानी की कीमत "

बिन पानी के अभी से मच रहा,सब ओर हाहाकार।

मई-जून में आयेगा मजा,जब मुंह सूखे लार ।।

नदी,कुंये,ताल का,हो जायगा बुरा हाल ।

पानी के लिये मारामारी,होगी अब की साल ।।

खूब धो रहे घर आंगन, और कर रहे बरबाद पानी।

आटा सानने नहीं मिलेगा,खूब कर लो मनमानी ।।

नहाओ-नहाओ सांझ सबेरे,पर कभी आगे का सोचा ।

गमछा गीला करके बदन पर,लगाना पड़ेगा पोंछा ।।

जो नहा ना पायें बहुत दिनों तक,तो आयेगी ऐसी बास।

कहीं मर गया चूहा या, कहीं सड़ गयी लाश ।।

पटक -पटक के कसेंड़ी बर्तन, होगी… Continue

Added by Rahila on October 24, 2015 at 9:49pm — 14 Comments

नीच कौन – ( लघुकथा )

"चाचू, अपने पास तो ट्रैक्टर है फ़िर अपने खेत में ये बुधिया,उसकी घरवाली और छोकरी, बिना बैल के इस तरह हल क्यों चला रहे हैं"!

"मुन्ना बाबू,इनको बडे दादू ने सज़ा दी है"!

"सज़ा किस बात की"!

"इन लोगों ने हमारे ट्यूबवैल के पानी की नाली में हाथ मुंह धोया और पानी पिया, तो पानी अशुद्ध हो गया"!

"वह पानी तो खेत में जा रहा था ना"!

"ये नीच जाति के लोग हैं, यह सब मना है इनके लिये, ये हमारी कोई चीज़ को नहीं छू  सकते"!

“पर चाचू ये दौनों औरतें तो पहले हमारे घर के सारे काम…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 24, 2015 at 5:30pm — 8 Comments

गज़ल...प्रेम दीवानी होती है.....

प्रेम दीवानी होती है.....

सबको अपनी उम्र निभानी होती है.

खुद अपनी पहचान बनानी होती है.

मत उलझो आडम्बर में यदि हो इंसा,

इंसा की खुद आत्म कहानी होती है.

धर्म कर्म आहार भुनाने में उसको,

सपनों की दीवार गिरानी होती है.

मत उगलो तुम जह्र आग तूफान यहां,

जीवन पानीदार सयानी होती है.

बाल न बांका तुम मेरा कर पाओगे,

सत्य-खुदा से आंख मिलानी होती है.

मत रोना संसार रुलाता है…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 24, 2015 at 3:00pm — 5 Comments

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