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खनिकर्मी का जीवन

कोयला खदान की 

काली अँधेरी सुरंगों में 

निचुड़े तन-मन वाले खनिकर्मी के 

कैप लैम्प की पीली रौशनी के घेरे से 

कभी नहीं झांकेगा कोई सूरज 

नहीं दीखेगा नीला आकाश 

एक अँधेरे कोने से निकलकर 

दूसरे अँधेरे कोने में दुबका रहेगा ता-उम्र वह

पता नहीं किसने, कब बताया ये इलाज 

कि फेफड़ों में जमते जाते कोयला धूल की परत को 

काट सकती है सिर्फ दारु 

और ये दारू ही है जो एक-दिन नागा…

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Added by anwar suhail on January 1, 2016 at 3:30pm — 3 Comments

मैं अपना घर सम्भालूँ वो अपना घर संभालें

१२२२  १२२ १२२२  १२२ 

मैं अपना घर सम्भालूँ वो अपना घर संभालें 

ये बंदूकें हटा लें अमन से हल निकालें 

झुलसती अब है धरती नहीं जमता हिमानी 

अगन पीकर मही की चलो नदियाँ बचा लें 

गले रोजाना मिलते , मिलाते हाथ भी हैं 

कभी तो ऐ पड़ोसी दिलों को भी मिला लें 

कली मुरझा रही है सिसकते हैं ये भंवरे 

जहाँ में है अँधेरा चरागों को जला लें 

बहुत रूठे हुए हैं  हमारे अपने हमसे 

चलो खुद आगे बढ़कर के रूठों…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on January 1, 2016 at 10:34am — 8 Comments

किसे कहें विदा और करें किसका स्वागत जतन।

200

वही रवि, वही किरण, 

वही धरा, वही गगन,

शीत के पुनीत कर्म में जुड़ा वही पवन।

 

वही रजनी, वही दिवा, 

वही संध्या , वही उषा,

मयंक भी भटक रहा लिये सतत जिजीविषा।

 

पुरा वही, वही नया , 

कहें सभी नया, नया,

बदल रहे हैं मात्र अंक, बदल रही सतत प्रभा।

 

इसी गणन में अटका मन 

निहारता रूपान्तरण,

किसे कहें विदा और करें किसका स्वागत जतन।

 

मौलिक  एवं अप्रकाशित 

०१ जनवरी…

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Added by Dr T R Sukul on January 1, 2016 at 9:00am — 6 Comments

गजल

2122 2122 2122 212

कामना आ ओ करें ऐसी जहाँ में रीत हो!

भूल जायें भेद सब नव वर्ष में बस प्रीत हो!!

पुष्प मुकुलित हों प्रिये आये मधुप लेकर नवल

रसभरी मधु-मालती को सिक्त करता गीत हो।

ज्योत्सना ऐसी खिलेअब रे खिले जन-मन मृदुल

हों सभी उन्मुक्त मन फिरअब नहीं कुछ भीत हो।

पी अमर रस पीक जब टेरे खड़ा फिर रे पिकी

छेड़ती हो धुन अमर गुंजित जहाँ हो जीत हो।

हों नियति के सब सभासद रुख लिए अनुकूल ही

हो निशा का अंत फूटे रोशनी नव नीत हो।

चंप-लतिका फेरती हो शीश…

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Added by Manan Kumar singh on January 1, 2016 at 8:30am — 6 Comments

किसकी आजमाईश (लघुकथा ) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (51)

"देख लिया न तुमने , वह बूढ़ी ग़रीब औरत बेहोश पड़ी थी, कितनों ने उस पर ध्यान दिया ?" - पत्रकार ने वीडियो कैमरा बंद करते हुए मित्र से कहा ।



"हाँ, सही कहते हो, ये चचाजान ही रुके वहां। पानी उस बच्ची से लिया, पानी छिड़क कर उसे होश मे ला कर उसे बिठाया , कौन करता है आजकल इतना ?"



परिस्थिति पर एक आजमाईश करते हुए दृश्य को कैमरे में क़ैद करके दोनों उनके नज़दीक पहुंचे। हालचाल पूछते हुए नाम वगैरह पूछे । बच्ची ईसाई थी, बूढ़ी औरत हिन्दू और चचाजान मुस्लिम । जल था, जुड़ाव था, ज़िम्मेदारी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 31, 2015 at 10:58pm — 8 Comments

गजल - जिन्दगी का एक पन्ना और गया।

२१२२ २१२२ २१२

जिन्दगी का एक पन्ना और गया।
याद तेरी छोडकर सब ले चला।

कुछ तो गम की बेडियों में कैद था।
कुछ हमेशा वक्त को रोता रहा।

हम रखे बस हर घडी तेरी खबर।
दीन दुनिया से हमें लेना है क्या।

जानकर पहचान कर अनजान है।
बेरहम वो बेहया वो बेवफा।

ख्वाइशें सब दिल की दिल में रह गयी।
इसकदर जालिम का हर इक लफ्ज था।

कुछ बहुत खुश हो के मिलते है हमें।
कुछ हमेशा देते रहते बद्दुआ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on December 31, 2015 at 9:40pm — 5 Comments

एक फैसले की उलझने

एक फैसले की उलझने

“तो क्या फैसला लिया?” कुर्सी पर बैठते ही हर्ष ने सुमन की तरफ देखा

“यही तो दुविधा है|पापाजी से बात कि तो उन्होंने कहा कि दो-चार समझदार लोगों से पूछ लो बाकि तुम्हारे हर निर्णय में हम साथ खड़े हैं |- - - - - - -तो अब आप ही बताएँ कि क्या करना चाहिए ?”

“इन्हें क्या पता ?आप ऐसे लोगों से पूछों जो अंदर के हालत समझते हों |वही आपको सही गाइड कर सकते हैं |”

हर्ष के बोलने से पहले ही पल्लवी ने चाय रखते हुए कहा

“मम्मी जीतू,मारा है |”

“मम्मी सन्नी माला है… Continue

Added by somesh kumar on December 31, 2015 at 1:00pm — 2 Comments

आकांक्षा

अरे रे रे...पता नहीं, आजकल के बच्चों को क्या हो गया है, लाईफ में जैसे स्टेबिलिटी तो है ही नहीं, फिर उस पर कोई नकामियाबी बर्दाश्त नहीं होती है, अरे भई जीवन में कभी जीत है तो कभी हार...

अरे क्या हो गया आज सुबह सुबह आपको, रोहित की मम्मी बोली, तो सुरेश जी ने बताया कि कल देर शाम को खन्ना जी के बेटे का बारहवीं का रिजल्ट आया था,नंबर मन मुताबिक न आने की वजह से उसने आत्महत्या कर ली...

आह कितनी दु:ख भरी बात है,रोहित की मम्मी बोली

...रोहित की कल रात ही बात हुई थी अंकुर से,और रोहित ने अंकुर… Continue

Added by Abha on December 31, 2015 at 1:12am — 2 Comments

रात की सरहदें

रात की सरहदें,

चाँद का दबदबा,

जिनको करने फ़तह,

है सुबह चल पड़ी

नींद के सब किले,

बाँध लो तुम ज़रा,

ख़्वाब की ज़िन्दगी,

अब बहुत कम बची

सुबह और रात में,

जंग लो छिड़ गयी,

क़त्लो-ग़ारत हुई,

रात फिर छट गयी,

लाश तारों की उफ़!,

ओस बन बिछ गयी,

रौशनी, रौशनी,

हर तरफ चढ़ गयी

जीत का जश्न फिर,

खूब दिन भर चला,

आसमां रौंद कर,

देखो सूरज चला,

कितना मगरूर था,

हाय! कितना गुमां,…

Continue

Added by Karunik on December 30, 2015 at 11:30pm — 3 Comments

चिता पर हूँ लेटा, जला क्यूँ न देती---ग़ज़ल (पंकज के मानसरोवर से)

122-122-122-122

.
मैं रूठा हूँ तुमसे, मना क्यूँ न लेती।
अदाओं का जादू, चला क्यूँ न लेती।।

गज़ब का नशा है जो,तेरी नज़र में।
तो हाला ये तू, आज़मा क्यूँ न लेती।।

पता है मुझे सिर्फ़, धोखाधड़ी है।
हक़ीक़त पता तू,लगा क्यूँ न लेती।।

जो डरती है हासिल,गँवाने से ग़र तू।
तो इन आंसुओं को छिपा क्यूँ न लेती।।

सुना है तेरे जिस्म में दामिनी है।
चिता पर हूँ लेटा,जला क्यूँ न देती।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 30, 2015 at 10:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२  २१२ 

आपका नाम था

मेरा तो जाम था

हर किसी धर्म में

प्यार पैगाम था

रब मिला ही नहीं

उससे कुछ काम था

वो ख़ुदा था कहीं

पर कहीं राम था

थी ख़ुशी ख़ास में

गम मगर आम था

प्रेम इंसानियत

अब भी गुमनाम था

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on December 30, 2015 at 7:28pm — No Comments

कविता के मर जाने तक

उस दिन जब हम मिले थे 

पहली बार

हम चुप रहे

या यूँ कहो बोल ही न सके

और फिर यूँ ही मिलते रहे

तब तक  

जब तक तुमने शुरु नही किया

बोलना

हालांकि मैं 

बोल न सकी फिर भी

अधर थरथराये जरूर

पर खोल न सकी मुख

पर तुमने जब शुरू किया

तो जाने कहाँ से

शब्दों का समंदर उमड़ पड़ा  

और मैं

उसके घात-प्रतिघात के बीच

खाती रहे हिचकोले

मंत्र-मुग्ध, आतुर, विह्वल  

 

मैं जानती…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 30, 2015 at 4:37pm — 4 Comments

कटे नहीं जीवन का तार ।

फूल बिना भौंरे का जीवन ,  जग में   है  कितना लाचार ।
जब  बाग वन कहीं खिले कली , आ जाये बिकल बेकरार ।
रंग रूप ना  दूरी देखे ,     नैनों    से    करता    इजहार ।
खार वार कुछ भी ना देखे ,    जोश     में  आये बार…
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Added by Shyam Narain Verma on December 30, 2015 at 12:30pm — 1 Comment

जतन कछ तो करो पेड़ों भले ही भार जादा अब -(गजल)- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

1222    1222    1222    1222



सियासत काम कम करती मगर तकरार जादा अब

बुढ़ापा  चढ़  गया  है  या  पड़ी   बीमार  जादा  अब /1



जवानी   क्या   खुदा  ने  दी  फरामोशी  चढ़ी  सर  पर

लगे कम माँ की ममता जो सनम का प्यार जादा अब /2



बहुत था शोर पर्दे में रखे हैं खूब अच्छे दिन

उठा पर्दा तो  ये जाना  पड़ेगी मार जादा अब /3



कहा हाकिम ने है यारो चलेगी सम विषम जब से

हुए खुश यार  निर्माता  बिकेंगी  कार जादा अब /4



जहर लगती है मुझको तो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2015 at 11:00am — 4 Comments

सक्षम कटी पतंग (लघुकथा) ['आकांक्षा' संदर्भित-2] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (50)

"और क्या चाहती हैं आप इस उम्र में मेरे बाबूजी से ? हर महीने बिज़ली का बिल जमा करा देते हैं, गैस सिलेन्डर का भुगतान करा देते हैं, पीने के पानी का टेंकर डलवा देते हैं अपनी पेन्शन में से और हमारे बेटे की सालाना बीमा किश्त भी तो !" - विजय ने अपनी पत्नी के भाषण के जवाब में कहा।



" तुम्हारी हैसियत नहीं है, सो कर देते हैं, मुझे इन बातों से क्या मतलब, नहीं करेंगे तो मैं तो सक्षम हूँ न !” - ऑफिस जाने के लिए अपना पर्स उठाते हुए निशा ने अपने तकिया कलाम दोहरा दिये ।



"बाबूजी को नाश्ता… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 30, 2015 at 8:40am — 1 Comment


सदस्य टीम प्रबंधन
देहात में, सिवान से (नवगीत) // --सौरभ

क्या हासिल हर किये-धरे का ?

गुमसी रातें

बोझिल भोर !

 

हर मुट्ठी जब कसी हुई है

कोई कितना करे प्रयास

आँसू चाहे उमड़-घुमड़ लें

मत छलकें पर

बनके आस

 …

Continue

Added by Saurabh Pandey on December 30, 2015 at 2:32am — 6 Comments

ग़ज़ल सीमा शर्मा

पहेली दिल की सुलझाऊँ तो कैसे

मैं इससे हार भी जाऊं तो कैसे।



लिपट जातें हैं पावों से बगूले

मैं बाहर दश्त से आऊँ तो कैसे।



पुकारे आसमां बाहें पसारे

परों बिन पास मैं जाऊं तो कैसे ।



धड़कता है वो दिल में दर्द बनकर

मैं उसको भूल भी जाऊं तो कैसे ।



गुलो पर बूँद मैं शबनम की बनके

हवा में फिर से घुल जाऊं तो कैसे।



उमड़ती ज़ह्ण में ख़्वाबों की नदियां

समन्दर मुट्ठी में लाऊँ तो कैसे



बदन पर पैरहन यादों का तेरा

नज़र…

Continue

Added by सीमा शर्मा मेरठी on December 29, 2015 at 10:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कसीदे काम के पिछले सुना है वो पढ़ेगा कल (नव वर्ष पर ग़ज़ल 'राज )

नई हसरत नई हिम्मत नई परवाज़ देगा कल

मिटाने  तीरगी सबकी  नया सूरज उगेगा कल

 

नये सपने उगाये खेत में देखो सियासत ने

फ़लक तक कीमतें पाकर बशर बेबस हँसेगा कल

नये इस दौर में आकर हुआ नेता कलम मेरा

अधूरा छोड़ कर कल का नया वादा लिखेगा कल 

 

किसी भी रोज दफ्तर में किया कुछ भी नहीं जिसने

कसीदे काम के पिछले  सुना है वो पढ़ेगा कल

 

जो पिछले साल सोचे थे हुए पूरे कहाँ उसके  

भुलाकर वो पुराने अब नये संकल्प लेगा…

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Added by rajesh kumari on December 29, 2015 at 8:30pm — 10 Comments

दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको

२१२  २१२  २१२  २१२ 

दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको 

तय ही है प्यार करना नहीं आपको 

चाँद अम्बर पे भी चाँद छत पे भी है 

कुछ भी हो है बहकना नहीं आपको 

रात दिन हुस्न क्यूँ यूं संवरता फिरे 

आँखों से कुछ समझना नहीं आपको 

बात गुल बुलबुलों तोता मैना कि क्या 

है कभी जब चहकना नहीं आपको 

सूखती जूड़े में नित नयी गुल कली 

खूब समझे बदलना नहीं आपको 

कितना भी यूं घटाओं सा उमड़ो मगर 

अब्र जैसे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on December 29, 2015 at 6:30pm — 8 Comments

अन्ना , मेरे भरोसे मत रहना / प्रदीप नील

लगे रहो तुम मेरे प्यारे, पीछे मत हटना अन्ना हज़ारे

सोलह से अनशन ज़रूर करना, अब किसी से ज़रा न डरना

क्योंकि पूरा देश तुम्हारे साथ है

पर ये और बात है,

कि मैं नहीॅं आ पाऊंगा ।

क्योंकि बिजली चोरी करते पकड़ा गया था

ज़ुर्माना भरने अदालत जाऊंगा

मज़बूरी है वर्ना ज़़रूर आता , साथ तुम्हारे नारे लगाता

गली-गली में शोर है, हर एक नेता चोर है ।।

अन्ना, मैं सत्रह को भी नहीं आ पाऊंगा

नया मकान खरीदा है, रजि़स्ट्री कराने जाऊंगा

मैं वहां मौज़ूद रहा तो दो…

Continue

Added by प्रदीप नील वसिष्ठ on December 29, 2015 at 12:49pm — 2 Comments

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