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सुख के सागर.....

आनंद..!

आनंद का आकार.....

निराकार!

बात-बात पर अट्टहास करते

पल झपकते ही स्वर

हवा में बह जाते.

दिशाओं की कोंख

नित्य जन्मतीं

सूर्य-चंद्र अगणित तारे

सृष्टि के सृजन में

सत्यम शिवम सुंदरम

स्वयं शव!

शांति का संदेश देते ब्रह्म !

ऊंकार,

जीवन पुष्ट करता

जीव !

चक्रवत निरंतर खोजता

जीवन का आनंद..

परमानंद...पर,

आनंद की अनुभूति कभी न हो पाती

मिलता केवल दु:ख

सुख…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 17, 2016 at 8:17am — 4 Comments

वापसी जीवन के उस पार से /कहानी / कान्ता रॉय , भोपाल।

अचानक से कुछ होने लगा था । हल्का सा चक्कर और  पेपर हाथ से सरककर नीचे गिर पडा़ । उठाने को हाथ बढाया तो एहसास हुआ कि  शिथिल पड़ चुका  था मै । देह भी निष्प्राण से हो चले थे । आँखों में ही अब   होश बाकी था शायद ।सब देख और सुन पा रहा था  ।  बगल वाले कमरे में नये साल की पार्टी  अब भी जारी  थी । घर के सब सदस्य ,  बेटे- बहू, नाती- पोते , आज इकट्ठे हो गये थे  जश्न मनाने के लिए ।

मुझे पार्टी में ही तबियत नासाज   लग  रही थी । मै चुपके से  अपने कमरे में आकर  इस आराम चेयर पर एकदम…

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Added by kanta roy on February 16, 2016 at 11:45pm — 7 Comments

प्यार में ....

प्यार में .......

नहीं नहीं

मैं अभी मृत्यु को

अंगीकार नहीं करना सकता//

अभी तो प्रेम सृजन का

शृंगार अधूरा है//

वृक्ष विहीन प्रेम पंथ पर

तलवों की तपिश का

संहार अधूरा है//

पाषाण बने पलों में

किसी लहर के

तट से मिलन का

इंतज़ार अधूरा है//

अभी तो मृत्यु से पूर्व

मुझे उसके लिए जीना है

जिसने आसमान के टूटे तारे से

बंद आँखों से

संग संग जीने की

दुआ माँगी है…

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Added by Sushil Sarna on February 16, 2016 at 9:02pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
सूफी शैली में एक गीत ............//डॉ० प्राची सिंह

माही मुझे चुरा ले मुझसे, मेरी प्याली खाली कर दे।

रम जा या फिर मुझमे ऐसे, छलके प्याली इतना भर दे।



मैं बदरी तू फैला अम्बर

मैं नदिया तू मेरा सागर,

बूँद-बूँद कर प्यास बुझा दे

रीती अब तक मन की गागर,

लहर-लहर तुझमें मिल जाऊँ, अपनी लय भीतर-बाहर दे।

रम जा या फिर मुझमे ऐसे, छलके प्याली इतना भर दे।



शब्द तू ही मैं केवल आखर

तू तरंग, मैं हूँ केवल स्वर,

रोम-रोम कर झंकृत ऐसे

तेरी ध्वनि से गूँजे अंतर,

माही दिल में मुझे बसा कर, कण-कण आज तरंगित…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 16, 2016 at 1:37pm — 3 Comments

धन के बल पर नदी मुहाने -ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2222    2222    2222    222

********************************

कौन कहेगा  यारो  बोलो बस्ती की मनमानी की

दोष लगाता हर कोई है गलती कहकर पानी की /1



राह रही जो नदिया की वो घर आगन सब रोक रहे

खादर  बंगर पाट रखी  है  नींव नगर रजधानी की /2



भीड़ बड़ी हर ओर  साथ  ही कूड़े का अम्बार बढ़ा

धन के बल पर नदी मुहाने आज पँहुच शैलानी की /3



हम को नादाँ  कहकर कोई बात न कहने देते पर

यार सयानों ने हर दम ही बात बहुत बचकानी की /4



माना सुविधाओं का यारा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 16, 2016 at 12:23pm — 6 Comments

वो बचपन .......

बहर :- 122/122/122/122



हमें प्यार पहलू तू फिर से पढ़ा दे

न चुप बैठ ऐसे हदें सब मिटा दे



तकिया नकूशी रिवाजे बुझा के

तू मजहब भुला प्यार दीपक जला दे



मेरे गांव की तंग गलियों में उनसे

मेरा आमना सामना ही करा दे



बनाये मेरे साथ माटी खिलौने

वो बचपन वो घोड़े वो हांथी दिला दे



वो कश्ती वो बादल वो सावन वो झूले

मुझे आज सारे के सारे हि ला दे



समय तोड़ हद और दे फिर जवानी

मुहब्बत अता कर वो मैकश अदा दे



मेरे… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on February 15, 2016 at 3:33pm — 3 Comments

वेदना

मेट्रो में दो व्यक्तियों को 
वार्तालाप करते हुए पाया 
जब ध्यान से सुना 
तो समझ  में  आया 
ये तो सरकार का 
क्रियाकलाप बता रहे हैं 
देश के भविष्य पर 
भारी चिंता जता रहे हैं 
अपने राजनीतिक ज्ञान पर …
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Added by Sudhanshu Gupta "AGYAAN" on February 15, 2016 at 2:03pm — No Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 5.....डॉ. प्राची

212 212 212 212



मेरा आँगन गुँजाती है नन्ही परी ।

पंछी बन चहचहाती है नन्ही परी ।



उसकी मुस्कान से फूल सारे खिले

हँस के गुलशन सजाती है नन्ही परी ।



पंखुड़ी सी नज़ाकत को ओढ़े हुए

मेरा मन गुदगुदाती है नन्ही परी ।



सुबह की गुनगुनी धूप जैसी निखर

पूरा घर जगमगाती है नन्ही परी ।



अपनी आँखों में झिलमिल सितारे लिए

स्वप्न अनगिन जगाती है नन्ही परी ।



बाँसुरी की मधुर तान सी लोरियाँ

मेरे होठों पे लाती है नन्ही परी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 15, 2016 at 1:22pm — 17 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 4.....डॉ. प्राची

1222 1222 122

मुफाईलुन मुफाईलुन फऊलुन



कहा जो सच तुम्हें दिल में चुभा क्या ?

बनी ये दोस्ती अब आइना क्या ?



कहो इस दिल में कोई आ बसा क्या ?

उसे तुम कर रहे हो अनसुना क्या ?



बुरा सपना समझ भूले जिसे थे

अचानक मोड़ पर वो फिर मिला क्या ?



सहन करती है बेटी त्रासदी जो

कभी उसका थमेगा सिलसिला क्या ?



परों को काट बेड़ी डाल दी क्यों

मेरी चाहत का है ये ही सिला क्या ?



बहुत गुमसुम हो, क्यों हो तुम रुआँसे ?

तुम्हें भी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 15, 2016 at 1:19pm — 3 Comments

चोट खाकर देखिए-ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2122    2122    2122    212



इस नगर में हर किसी को इक फसाना चाहिए

ऊँघते  को  ठेलते  का  इक  बहाना  चाहिए /1



कब से ठहरा ताल अब तो मारिए कंकड़ जरा

जिंदगी का लुत्फ  कुछ तो  यार आना चाहिए /2



बेबसी क्यों  ओढ़नी  जब हाथ लाठी कर्म की

द्वार किस्मत का चलो अब खटखटाना चाहिए /3



चोट खाकर देखिए खुद दर्द की तफतीस को

बोलना  फिर  दर्द में  भी  मुस्कुराना चाहिए /4



हो गयी हो पीर  पर्वत  हर दवा जब बेअसर

आँसुओं को किसलिए फिर छलछलाना चाहिए…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:22pm — 6 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122 2

भौंकते कुत्ते ठिकाना चाहिए अपना

टोकते हर शख्स आना चाहिए अपना।1



राह इतनी है नहीं आसां कि चाहे वह

घुस चले घर में बताना चाहिए अपना।2



देख कुत्ते भी नहीं गाते कभी ऐसे

जय कहें घर की फसाना चाहिये अपना।3



पल गये हो पौध तुम रस पी रहे घर का

शाख भटकी क्यूँ बचाना चाहिये अपना।4



साख कुत्तों ने बचायी है अभी तक भी

ताव दुश्मन को दिखाना चाहिये अपना।5



है नहीं पहचान करने क्या चले हो तुम

जल रहे हैं घर बुझाना… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 15, 2016 at 10:08am — 2 Comments

उतार-चढ़ाव (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

घोर निराशा से घिरे पुत्र को जीवन की सच्चाई बताते हुए पिताजी सीख देने की कोशिश कर रहे थे।

"बेटा, ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव से व्यथित मत हो, हर इन्सान के हमसफ़र होते हैं ये सब!"

" लेकिन पिताजी, हमसफ़र के तेवर सबके साथ एक से नहीं होते! स्वाभाविक उतार-चढ़ाव और बनाये गये या थोपे गये उतार-चढ़ाव में ज़मीन आसमान का फर्क है इस स्वार्थी युग में!"- पुत्र ने अपने शैक्षणिक दस्तावेजों की फाइल बंद करते हुए कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 15, 2016 at 9:29am — 8 Comments

चिडिया उड गयी - ( वैलेंटाइन डे पर विशेष ) – ( लघुकथा ) -

चिडिया उड गयी - ( वैलेंटाइन डे पर विशेष ) –  ( लघुकथा ) - 

गोपाल के परिवार को  तीन महीने हो गये थे नये मुहल्ले मेंआये हुए!उसके पडोस में एक सुंदर लडकी रहती थी!शायद कमला नाम था!उसकी मॉ सारे दिन कम्मो कम्मो चिल्लाती रहती थी क्योंकि उसका पैर घर के अंदर नहीं टिकता था!!कमला अधिकतर घर के दरवाज़े पर ,लॉन में,छत पर या झूले पर ही दिखती थी ! धूप हो या ना हो हर समय काला धूप का चश्मा लगाये रहती थी !

गोपाल जब भी उस तरफ़ देखता कुछ ना कुछ इशारे करती दिखती!कभी कभी उसके हाथ में कोई खतनुमा कागज़ भी…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 14, 2016 at 10:08pm — 8 Comments

कबाड़ी काल

 कुछ भी

अनुपयोगी नहीं है

उसके लिए

सभी पर है

उसकी निगाहें 

गहन कूड़े से भी

बीन और लेता है छीन

वह

प्राप्य अपना 

जो है जगद्व्यव्हार में

वह भी

और जो नहीं है वह भी

बीन लेगा एक दिन वह 

पेड़ –पौधे,  नदी=-पर्वत

और पृथ्वी

यहां तक की जायेगा ले    

सूरज गगन, नीहार, तारे

चन्द्र भी

ब्रह्माण्ड के सारे समुच्चय

लोग कहते हैं प्रलय 

कहते रहे  

किन्तु तय है

बीन…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 14, 2016 at 7:22pm — 4 Comments

दर्द खामोशियों

212 212 212 212
दर्द खामोशियों में लिखूंगा तुम्हे
गर मुनासिब हुआ तो सिउँगा तुम्हे

याद हर एक पन्ना किताबां बना
मैं जिगर में हमेशा रखूँगा तुम्हे

मैंकदों से नहीं है मेरा वास्ता
पर जरूरी हुआ तो पिऊंगा तुम्हे

हौसलों इस कदर टूट बिखरे अगर
तुम ही बोलो तो कैसे जिऊंगा तुम्हे

जिंदगी शक न कर तू मेरे वादे पर
मुस्कुराता हुआ ही मिलूँगा तुम्हे

Added by amod shrivastav (bindouri) on February 14, 2016 at 6:03pm — 1 Comment

शहीद हनुमन्थप्पा के नाम [अतुकांत ... प्रतिभा पांडे ]

ठिठका तो था वो 

एक पल को देहरी पर 

और फिर निकल गया I

शायद सुन ली होंगी

घर के अन्दर से आती हुई आवाजें

मुट्ठी भींचे ,नारे लगाती,

भ्रामित भी था

कि बाहर से आ रही हैं 

या घर के अन्दर से 

कि बाहर की  ऐसी ही आवाजों को 

रोकने के लिये ही तो 

ओढ़ी थी सफ़ेद मौत उसने 

फिर ये घर के अन्दर से कैसे ?

समझ नहीं सका होगा कुछ 

और फिर थक कर

 निकल गया उस पार 

हर भ्रम से दूर I…

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Added by pratibha pande on February 14, 2016 at 6:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल (निभा रहे हैं )

 ग़ज़ल ( निभा रहे हैं )

  12122 ----12122)

फरेब उल्फ़त में खा रहे हैं /

सितमगरों से निभा रहे हैं /

घटाएं हों क्यों न पानि पानी

वो छत पे ज़ुल्फ़ें सुखा रहे हैं /

हुई है  मुद्दत ये सुनते सुनते

वो मुझको अपना बना रहे हैं /

शराब ख़ोरी तो है  बहाना

किसी को दिलसे भुला रहे हैं /

लगाके इल्ज़ाम दूसरों पर

वो अपनी ग़लती छुपा रहे हैं /

मेरे लिए बज़्म में वो आये

मगर सभी फ़ैज़ पा…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2016 at 11:47am — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 3 ....// डॉ. प्राची



212 212 212 212

संग सुख-दुख सहेंगे ये वादा रहा।

साथ हर वक्त देंगे ये वादा रहा।

चाँदनी रात में ओढ़ कर चाँदनी

तुम जो चाहो, जगेंगे ये वादा रहा।

हाथ सर पर दुआओं का बस चाहिए

हम भी ऊँचा उढ़ेंगे ये वादा रहा।

राह काँटो भरी ये पता है हमें

हौसलों पर बढ़ेंगे ये वादा रहा।

दीप बाती से हम, जब भी मिल कर जले

हर अँधेरा हरेंगे ये वादा रहा।

देह के पार जो चेतना द्वार है

हम वहाँ पर मिलेंगे…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 14, 2016 at 11:30am — 5 Comments

काले काले घोड़े (नवगीत)

पहुँच रहे मंजिल तक

झटपट

काले काले घोड़े

 

भगवा घोड़े खुरच रहे हैं

दीवारें मस्जिद की

हरे रंग के घोड़े खुरचें

दीवारें मंदिर की

 

जो सफ़ेद हैं

उन्हें सियासत

मार रही है कोड़े

 

गधे और खच्चर की हालत

मुझसे मत पूछो तुम

लटक रहा है बैल कुँएँ में

क्यों? खुद ही सोचो तुम

 

गाय बिचारी

दूध बेचकर

खाने भर को जोड़े

 

है दिन रात सुनाई देती

इनकी टाप सभी…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2016 at 11:03am — 4 Comments

चौकीदारी - ( लघुकथा ) –

चौकीदारी -  ( लघुकथा )  –

"तिवारी जी,सुना है आप के तो दौनों बेटे बहुत बडे   गज़टैड अफ़सर हैं!आप कैसे आ फ़ंसे यहां बृद्धाश्रम में"!

"सुनील जी, मैं तो यहां स्वेच्छा से आया हूं, बच्चे तो बहुत ज़िद करते हैं अपने साथ रखने की"!

"क्यों मज़ाक करते हो तिवारी जी,दिल बहलाने को सब यही कहते हैं, पर कौन अपना घर परिवार छोड कर यहां आता है"!

"यह मज़ाक नहीं,हक़ीक़त है"!

"फ़िर इसके पीछे कोई विशेष कारण रहा होगा"!

"ठीक सोचा आपने"!

"अगर ऐतराज़ ना हो तो वह कारण भी बता…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 14, 2016 at 10:56am — 12 Comments

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