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गर तुम न होते

गर तुम न होते



सोचती हूँ अक्सर मैं

क्या होता गर

तुम न होते !

क्या बिखर जाती

क्या संवर जाती

दीवारों से पूछ लेती हूँ

शायद यही बता दें

जिसने करी है बातें अनगिनित

वे ही कुछ बतादें।

वो खिड़कियों से झाँकती हुई

कुसुम लताएँ

उस पेड़ पर बने हुए

घोसलें चिड़ियाओं के

आसमान से देखते है जो बादल

यह चाँद जो गवाह था

प्रीत का

यह सूरज जिसने तपते हुए

रिश्तों की लौ को जलाया था ।

बताओ तुम ही किससे पूँछू

क्या होता इस… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 3, 2016 at 7:00am — 1 Comment

वृद्धाश्रम: लघुकथा

कौन है जो घंटी बजा रहा है,?चौकीदार तुम से काम ढंग से नही होता तो काम छोड़ दो।

'मेडम जी एक बुड्डा आया है,जिद्दी है कहता मिलना ज़रूरी है।

"देख राजू आख़िरी चेतावनी है तेरे लिये आलतू ,फ़ालतू लोगों को भगा नही सकता चले आते है समय बेसमय।

लगता हैवह इनाम की आस में आया है , हमारे टामी का विज्ञापन पढ़कर।"

अरे! क्या कह रहे हो राजू उसे बैठक में बैठाओ ,पानी,चाय लेते आना ,अभी आती हूँ।

बाहर ससुर को देखकर मालकिन के पाँव तले ज़मीन खिसक गई ।

"बेटा ,टामी वृद्धाश्रम आ गया था मेरे…

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Added by Nita Kasar on August 2, 2016 at 9:00pm — 8 Comments

कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा लगता है

फर्श पर

चाबी के चलते खिलौने देखकर

एक ही गति

एक ही भाव

न किसी से कोई गिला

न शिकवा

ऐ ख़ुदा

कितना अच्छा होता

ग़र तूने मुझे भी

शून्य अहसासों का

खिलौना बनाया होता

अपना ही ग़म होता

अपनी ही ख़ुशी होती

न लबों से मुस्कराहट जाती

न आँखों में नमी होती

सब अपने होते

हकीकत की ज़मीं न होती

ख़्वाबों का जहां न होता

बस ऐ ख़ुदा

तूने हमें भी वो चाबी अता की होती…

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Added by Sushil Sarna on August 2, 2016 at 7:30pm — 24 Comments

लजाते क्यूँ हो?

2122 2122 22

अपने बच्चों को आज़माते क्यूँ हो?
निर्धनों को यूँ सताते क्यूँ हो?

वो तो वैसे ही है अभिशापित; फिर।
ख़्वाब मुफ़लिस को दिखाते क्यूँ हो?

जो कि रिश्ते में #भसुर# है धन का।
उसको महफ़िल में बुलाते क्यूँ हो?

जिसकी कुटिया में नहीं दरवाज़े।
बाप बेटी का बनाते क्यूँ हो?

मैं ख़फ़ा हूँ तेरी मनमानी से।
सामने आओ लजाते क्यूँ हो?

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 2, 2016 at 6:12pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - खंज़र वाले हाथ कभी काँपे क्या उनके ? ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22  22   बहरे मीर

फोकट की ये बातें हमको मत गिनवाओ

नकली उख़ड़ी सांसें, हमको मत गिनवाओ

 

खंज़र वाले हाथ कभी काँपे क्या उनके ?

आज हुई प्रतिघातें, हमको मत गिनवाओ

 

वर्षों से सूरज का ख़्वाब दिखाते आये

अब तो काली रातें हमको मत गिनवाओ

 

शहर शहर को तोड़ तोड़ के गाँव करो तुम

बची खुची चौपालें हमको मत गिनवाओ

 

फुलवारी के बीच बनी थी हर पगडंडी

कोलतार की सड़कें हमको मत गिनवाओ 

 

क्षितिज…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 2, 2016 at 1:05pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कैसे दुर्योधन को कोई मोहन कह ले ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22  22 

कैसे दुर्योधन को कोई मोहन कह ले  

और सुदामा मित्र बने तो, दुश्मन कहले

 

मुझको तेरी बाहों का घेरा जन्नत है

मेरी बाहों को चाहे तू बन्धन कह ले

 

मै रातों को चीख, नींद से उठ जाता हूँ

तू समझे तो इसको मेरी तड़पन कह ले

 

अब केवल कंक्रीट दिखेंगे शहर नगर में

बन्द आँख कर तू इसको ही मधुबन कह ले

 

विष ही वमन किया हर पत्ता, हवा चली जब

तू उन बीजों को बोया, तू चंदन कह…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 2, 2016 at 1:03pm — 17 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शक (लघु कथा 'राज')

  

“अब बोल चारू कैसे आना हुआ कैसे याद आ गई आज मेरी ” जूही ने चाय  के  प्याले  हटाते  हुए प्यार से ताना देते हुए कहा|

 “बस ये समझ ले मेरा उस जगह से मन भर गया तू यहाँ मेरे लिए मकान ढूँढ ले ”|

  “फिर भी बता न क्या हुआ?”

 “तुझे याद होगा मैंने एक बार बताया था कि मेरे घर के ठीक सामने  सड़क  के  दूसरी पार गाडियालुहारों ने अपनी झोंपड़ियाँ डाल  रक्खी हैं | जिनका काम लोहे से औजार व् बर्तन बनाना फिर उनको आस पास के घरों में बेचना होता है”  |

“हाँ हाँ याद है…

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Added by rajesh kumari on August 2, 2016 at 11:28am — 23 Comments

एक तुम्हारे होने से / कविता

साक्षी है सिंधू मन मेरा एक तुम्हारे होने से

हृदय की भित्तियों में चित्तियाँ तुम्हारे होने से



ऊँची काली दीवारें थाह पता कोई ना जाने

जीने -मरने में भेद मिटा संत्रासों के ढोने से

हृदय की भित्तियों में चित्तियाँ तुम्हारे होने से .......



उलट-पुलट है यह जग सारा पुरवाई भी व्याकुल है

लहरों की उछ्वासित साँसों को क्या मलाल अब खोने से

हृदय की भित्तियों में चित्तियाँ तुम्हारे होने से ........



लय की अनंतता में अंतर्मन का रमकर रमना

नित्य-निरंतर… Continue

Added by kanta roy on August 2, 2016 at 10:26am — 20 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 40

कल से आगे ...........

‘‘इतनी देर लगा दी आने में ! जाओ मैं तुमसे बात नहीं करती।’’ यह चन्द्रनखा थी। उसका यौवन उसके भीतर हिलोरें मार रहा था। अब वह कोई कुछ वर्ष पहले वाली अल्हढ़ बालिका नहीं रही थी, पूर्णयौवना हो गयी थी। भाइयों का अंकुश उस पर था नहीं। एक भाई वर्षों से लंका से दूर था, दूसरा महाआलसी, सदैव नशे की सनक में रहता था और तीसरे को अपने धर्म-कर्म और राज-काज से ही अवकाश नहीं था। भाभियों को उसकी गतिविधियों का पता ही नहीं चलता था, चलता भी तो वह उनका अंकुश मानने को तत्पर ही कहाँ…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 2, 2016 at 9:43am — 2 Comments

पिंजड़ा -- डॉo विजय शंकर

पिंजड़ा भी ,

एक अजीब बंधन है ,

दाना भी , पानी भी , बस ,

बंद पंछी उड़ नहीं सकता।

हौसलों से कहते हैं कि

क्या कुछ हो नहीं सकता ,

हो सकता है , बस पंछी ,

पिंजड़ा लेकर उड़ नहीं सकता।

कितने आज़ाद हैं हम ,

फिर भी उड़ नहीं पाते ,

मुक्त हो नहीं पाते ,

उन्मुक्त होकर जी नहीं पाते ,

बाहर से आज़ाद हैं , बस ,

कुछ पिंजड़े हैं हमारे अंदर ,

बाँधे हैं , कुछ ढीले , कुछ कस कर।

रूढ़ियाँ कब बन जाती हैं बेड़ियाँ ,

बंधे रह जाते हैं हम , पता… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 2, 2016 at 9:30am — 17 Comments

मंज़िल की तलाश

कितनी दूर निकल आई हूँ , अपनी मंज़िल की तलाश में ।
कुछ देर बैठ लेती हूँ , घनघोर बादलों की छांव में ।

ये सफ़र बड़ा लम्बा है , और दूर तलक जाना है ।
साथी है न हमसफ़र है, फिर भी मंज़िल को पाना है ।

ठंडी हवाएँ करती हैं इशारा,
सुकून देती है ये नदिया की धारा।

खुला आसमान हौंसला बढ़ाता है,
वो लाल पुल रास्ता दिखता है ।

चलो अब चला जाय, उस पुल के पार।
मंज़िल जहाँ कर रही, मेरा इंतज़ार ।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Ashutosh Kumar Gupta on August 2, 2016 at 3:20am — 7 Comments

गीत (गीतिका छंद)/सतविन्द्र कुमार

भारती को अब नहीं फिर से सताना चाहिए

दुश्मनों को देश के अब ये बताना चाहिए



आज अपने देश में जो ये घृणा का दौर है

पागलों ने सब किया है ये नहीं कुछ और है

नफरतों को बेचते जो काम ऐसे कर रहे

बांटते हैं देश को बस जेब अपनी भर रहे

उन सभी के चेहरे से पट हटाना चाहिए

दुश्मनों को देश के अब ये बताना चाहिए।।१।।





देश के जो रक्षकों को पत्थरों से मारते

दुश्मनों से जा मिलें वो क्या कभी हैं हारते

आज मिलकर हम सभी उत्तर उन्हें देते चलें

साथ आएँ वो… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 1, 2016 at 9:30pm — 15 Comments

सवैये : रामबली गुप्ता

वागीश्वरी सवैया



वशीभूत जो सत्य औ स्नेह के हो, जहाँ में उसे ढूंढना क्या कहीं?

न ढूंढो उसे मन्दिरों-मस्जिदों में,शिवाले-शिलाखण्ड में भी नहीं!

जला प्रेम का दीप देखो दिलों में, मिलेगा तुम्हें वो सदा ही यहीं।

जहाँ नेह-निष्काम निष्ठा भरा हो, सखे! ईश का भी ठिकाना वहीं।।



दुर्मिल सवैया



दुख जीवन में अति देख कभी, मन को नर हे! न निराश करो।

रहता न सदा दुख जीवन में, तुम साहस से मन धीर धरो।।

रजनी उपरांत विहान नया, अँधियार घना मत देख डरो।

लघु-दीप जला…

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Added by रामबली गुप्ता on August 1, 2016 at 8:30pm — 10 Comments

यूँ ज़िन्दगी में अब मेरी वो बात नहीं है

221 1221 1221 122

यूँ ज़िन्दगी में खुशियों सी वो बात नहीं है,

बिछुड़ा है जरा साथ मगर मात नहीं है |

मैं शिकवों भरी शामो सहर देख रहा हूँ,

ये घाव उठा दिल पे है सौगात नहीं है |

चलने लगी है आखों में रुक-रुक के ये नदिया,

ये गम का दिया रंग है बरसात नहीं है |

क्यूँ काल से उम्मीद रखूँ कोई रहम की,

है कर्मों की ये बात कोई घात नहीं है |

कुछ लोग लुटाते हैं शबो रोज़…

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Added by Harash Mahajan on August 1, 2016 at 3:00pm — 12 Comments

वर्षा

वर्षा की बूंदों में कहीं

उमड़ते घुमड़ते बादल है

हरयाली है हर तरफ

प्रेम प्रीत की बौछार है

सावन के हैं गीत कहीं

कहीं त्योहारों की माला है

मौसम है यह सुहाना

हर मन को यह भाता है ।



गिली मिटटी पर फसल होती

देश के लोगों की भूख है मिटती

किसान की खुशहाली से

धरा भी खुश खुश है रहती ।

सुखी प्यासी धरा बनती दुल्हन

हाथों पर महेंदी है रचती ।



कहीं कटे है पेड़ सभी

कहीं नहर को रोका है

पानी भी अपने राह पर चलता

कभी हंसाता… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 1, 2016 at 2:30pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मसअले कितने मुझे तेरे सवालों में मिलें

संशोधित

2122 1122 1122 112/22

मसअले कितने मुझे तेरे सवालों में मिले

यूँ अँधेरों की झलक दिन के उजालों में मिले

 

आपके ग़म से किसी को कोई निस्बत ही कहाँ

बेबसी दर्द हमेशा बुरे हालों में मिले

 

अब मेरे शहर में भी लोग खिलाड़ी हुए हैं

पैंतरे खूब हर इक शख़्स की चालों में मिले

 

चंद लम्हात मसर्रत के सुकूँ के कुछ पल

ऐसे मौके तो मुझे सिर्फ ख़यालों में मिले

 

दोस्ती और मुहब्बत के मनाज़िर हर…

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Added by शिज्जु "शकूर" on August 1, 2016 at 2:30pm — 15 Comments

इक माँ होती है ....

इक माँ होती है ....

कितना ऊंचा

घोंसला बनाती है

नयी ज़िन्दगी का

ज़मीं से दूर

घर बनाती है

अपने पंखों से

अपने बच्चों को

हर मौसम के

कहर से बचाती है

न जाने कहाँ कहाँ से लाकर

अपने बच्चों को

दाना खिलाती है

पंख आते हैं

तो उड़ना सिखाती है

नए पंखों को

आसमां अच्छा लगता है

ज़मी से रिश्ता बस

सोने का लगता है

देर होते ही मां

घोंसले पे आती है

नहीं दिखते बच्चे

तो बैचैन हो जाती है

सांझ होते…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 1, 2016 at 2:27pm — 14 Comments

वक्त लगता है

गुस्से को शांति में बदलने

में वक्त लगता है......

अंधेरों से उजाले चमकने

में वक्त लगता है......

सब्र कर, कोशिशें अपनी

जारी रख

जंग लगे ताले को खुलने

में वक्त लगता है. ....

जब थक जाए तो रूक,

सोच, हिम्मत बुलन्द कर,

हर हार के बाद जीतने

में, वक्त लगता है. .....

फिर से महकेंगे तेरे

घर-आंगन,टूटे सपनों को जोड़,

बोल उठेगी तेरी आत्मा, टूटे को संभलने

में वक्त लगता है. ....

क्या सोच रहा भविष्य बारे,

भरोसा रख,

घटा जब… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 1, 2016 at 2:00pm — 6 Comments

प्रायश्चित (कघु कथा )

प्रायश्चित

सेवा निवृति के 6 माह पूर्व सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए चंदा एकत्रित करने वाली विभागीय समिति को सहयोग करने हेतु कनिष्ठ अधिकारी शुक्ला को लगाया | एक जगह सी.बी.आई द्वारा रिश्वत के मामले में समिति के साथ ट्रैप होने पर उसे भी निलंबित कर दिया गया | सेवा निवृति पर न्यायालय से निर्णय होने तक देय परिलाभ रोक दिए गए | किसी के बताने पर वह एक पहुंचें हुए ज्योतिषी से मिला जिसने शुक्ला की व्यथा सुनाने के बाद बताया कि घर के देवी देवता नाराज है ? उन्हें मनाने का उपाय…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 1, 2016 at 11:58am — 4 Comments

एक सूनी डगर रहा हूँ मैं (ग़ज़ल)

2122 1212 22



टूटकर अब बिखर रहा हूँ मैं।

खुद को आईना कर रहा हूँ मैं।



मुझको दुनिया की है खबर लेकिन

खुद से ही बेखबर रहा हूँ मैं।



चोट खा-खा के, अश्क़ पी-पीकर,

आजकल पेट भर रहा हूँ मैं।



फिर भँवर पार कर के आया हूँ,

फिर किनारे पे डर रहा हूँ मैं।



उम्र-भर ढूँढता रहा खुद को,

उम्र-भर दर-ब-दर रहा हूँ मैं।



पास मंज़िल के आ गया, फिर क्यों,

हर कदम पर ठहर रहा हूँ मैं?



क्या गुज़रता भला कोई उसपर,

एक सूनी… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on August 1, 2016 at 11:28am — 10 Comments

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