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होली के दोह - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

होली के दोह

मन करता है साल में, फागुन हों दो चार

देख उदासी नित डरे, होली  का त्योहार।१।

चाहे जितना भी  करो, होली  में हुड़दंग

प्रेम प्यार सौहार्द्र को, मत करना बदरंग।२।

तज कृपणता खूब तुम, डालो रंग गुलाल

रंगहीन अब ना रहे, कहीं किसी का गाल।३।

फागुन  में  गाते  फिरें, सब  रंगीले फाग

उस पर होली में लगे, भीगे तन भी आग।४।

घोट-घोट के पी  रहे, शिव बूटी कह भाँग

होली में जायज नहीं, छेड़छाड़ का…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 1, 2018 at 7:43pm — 23 Comments


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अब कहाँ वो मर्द साहिब (ग़ज़ल 'राज' )

2122  2122  2122  2122

इन बहारों में भी गुल ये हो गये हैं ज़र्द साहिब 

चढ़ गई वहशत कि इनपर क्यूँ अभी से गर्द साहिब 



जब जहाँ चाहा किसी ने सूँघ कर फिर फेंक डाला 

पूछने वाला न कोई नातवाँ का दर्द साहिब



जो रफू कर  दें किसी औरत के आँचल को नज़र से 

अब कहाँ हैं ऐसी नजरें अब कहाँ वो मर्द साहिब



हो गये पत्थर के जैसे  फ़र्क क्या पड़ता इन्हें कुछ 

हो झुलसता दिन या कोई शब ठिठुरती सर्द साहिब 



क्या बचा है मर्म इसमें  क्या करोगे इसको…

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Added by rajesh kumari on March 1, 2018 at 6:35pm — 14 Comments

रूठो न दिलदार कि होली आई है- होली गीत-सलीम रज़ा

रूठो न दिलदार कि होली आई है

झूम उठा संसार कि होली आई है

-

साजन हैं परदेस न भाए रंग-अबीर 

गोरी के आँखों से बहता झर-झर नीर

ख़त में साजन को ये लिखकर भेजा है 

तुम बिन नहीं क़रार कि होली आई है

-

होली के दिन बदला हर रुख़सार लगे 

रंग-बिरंगा होली का श्रंगार लगे

पिए भांग हैं मस्त फाग की टोली में 

बरसे रंग-फुहार कि होली आई है

-

होली के दिन बड़ों का आशीर्वाद रहे 

छोटो के संग होली का पल याद रहे

हर मज़हब के लोग खुशी मे खोए हैं 

रंगो का…

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Added by SALIM RAZA REWA on March 1, 2018 at 5:51pm — 25 Comments

कविता- वो आँखें


समय का काला
क्रूर धुआँ
आख़िरकार
तैर गया आँखों में
बन के मोतियाबिंद
बड़ा चुभता है आठों पहर
उन दिनों आँखें
बड़ी व्यस्त रहती थी
किसी के दिल को लुभाती थी
किसी के मन को भाती थी
सारा संसार समाया था इनमें
लेकिन धीरे-धीरे
इनका यौवन फीका पड़ गया
पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा
अब ये आँखें
पथराई-सी
डबडबाई-सी
लाचार-सी रहती है
बस यही पहचान रह गई है इनकी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on March 1, 2018 at 5:00pm — 16 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तरही ग़ज़ल : कभी पगडंडियों से राजपथ के प्रश्न मत पूछो // -सौरभ

1222 1222 1222 1222

 

अभी इग्नोर कर दो, पर, ज़बानी याद आयेगी

अकेले में तुम्हें मेरी कहानी याद आयेगी

 

चढ़ा फागुन, खिली कलियाँ, नज़ारों का गुलाबीपन

कभी तो यार को ये बाग़बानी याद आयेगी

 

मसें फूटी अभी हैं, शोखियाँ, ज़ुल्फ़ें, निखरता रंग

इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

 

मुबाइल नेट दफ़्तर के परे भी है कोई दुनिया

ठहर कर सोचिए, वो ज़िंदग़ानी याद आयेगी

 

कभी पगडंडियों से राजपथ के प्रश्न मत पूछो

सियासत की उसे हर…

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Added by Saurabh Pandey on February 28, 2018 at 2:30am — 28 Comments

इन्सान रहने दो इन्सान को !

कभी सोचता हूँ यदि ईश्वर-अल्लाह इत्यादि एक ही है

तो हम सबको अलग-अलग पैदा क्यों किया ?

इस बारे में क्या सोचते है आप ?

और माना कि पैदा  किया  भी तो फिर बीच में

कहाँ से आ टपके हमारे माँ-बाप ?

और पर्वत-पहाड़ नदियाँ तो बनते बिगड़ते है अपने आप

फिर इन सबको भी ऊपर वाले ने बनाया क्यों कहते है आप ?

और कभी सड़क पर आपको ड्राईवर टक्कर से बचा भी दें

तो आप पूरा श्रेय देते हैं भगवान को !

और मर गए तो आफत आती है ड्राईवर की जान को !

थोडा  सोचो…

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Added by Naval Kishor Soni on February 27, 2018 at 12:30pm — 3 Comments

कंटक ही कंटक हैं, जीवन के पथ में

गीत 

कंटक ही कंटक हैं, जीवन के पथ में !

प्राणों पर संकट है, काया के रथ में !

क्षण-क्षण यह चिंतन

जीवन बीहड़ वन !

इस वन में एकाकी

प्राणों का विचरण…

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Added by नन्दकिशोर दुबे on February 27, 2018 at 11:30am — 7 Comments

मुक्तक

मुक्तक

(आम आदमी)

1.सारी फिक्रें अभी उलझी हुईं हैं एक सदमें में

 मैं मर जाऊँ तो क्या !मैं खो जाऊँ तो क्या !

 

2.मैं रोज़ मरता हूँ कोई हंगामा नहीं होता

 सब सदमानसी है मुमताज़ की खातिर |

       (इस्तेमाल )

3.खम गज़ल लिखता हूँ दिल तोड़ कर उसका

 हुनर ज़ीना चढ़ता है बुलंदी हासिल होती है |

        (वापसी )

4.शराब ने टूटकर घर का पानी गंगा कर दिया

 उसने कपड़े उतारे मेरी सोच को नंगा कर दिया |

       …

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Added by somesh kumar on February 27, 2018 at 10:58am — 5 Comments

बैल (लघुकथा)

बापू हुकुम चलाते थे और अम्मा घर। रंजन के और कोई भाई बहन न था। बापू के मुँहफट स्वभाव के कारण पड़ोसियों से भी वैर ही रहता था। चूल्हा चौका गाय गोरू और बापू की चाकरी से फुरसत मिल जाने पर अम्मा कभी कभी उसे प्यार भी कर लेती थी।

बचपन से यही चल रहा था। अब जब दसवीं की परीक्षा सर पर है ,गाय के बछड़ा हो गया है। अम्मा उसी में लगी पड़ी है। खाना भी खुद बनाया आज रंजन ने।

मामा के यहाँ जाना है वहीं रहकर परीक्षा देनी है रोज रोज बीस किलोमीटर आना जाना करेगा तो पढ़ेगा कब।

जब वह बछड़े को देखने गया तो बापू… Continue

Added by Kumar Gourav on February 27, 2018 at 1:49am — 6 Comments

बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)

मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन 

वो    प्यार    का    हमारे,    इस्बात    चाहते    हैं।

बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं।।

होकर     खड़े      हुए    हैं,    बेदार    सरहदों    पर,

जो    अम्न-ओ-चैन   वाले,   हालात   चाहते   हैं।।…

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Added by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on February 26, 2018 at 11:00pm — 9 Comments

*** खाद ***(लघुकथा)राहिला

"तेरी ननद, तेरे लिए भी कभी कुछ लाई या बस खाली हाथ हिलाती हुई आ जाती है सब समेटने के लिए ...? "



ससुरालियों की बातें पूछते-पूछते , जब पीहर आयी बिटिया की ननद का जिक्र आया तो अनायास शकुंतला देवी का लहजा थोड़ा तल्ख़ सा हो गया।



"अरे राम भजो अम्माँ ! कैसी बातें करती हो? वह तो छोटी हैं । लाती क्या , उल्टा भारी विदाई देनी पड़ती है। अम्माँजी की बड़ी लाड़ली बिटिया हैं।"

उसने निष्छल सी हंसी हँसते हुए बताया ।



" आय -हाय तुझे इसमें हँसी आ रही है। ठीक है..., जब तक माँ है, तब तक… Continue

Added by Rahila on February 26, 2018 at 10:58pm — 8 Comments

गजल(लूटकर घर का खजाना....)

लूटकर  घर का खजाना भाग जाता आदमी

चंद सिक्कों के लिए भी मार खाता आदमी।1

बिक रहे कितने पकौड़े,चुस्कियों में प्यालियाँ,

और ठगकर आपसे भी मुस्कुराता आदमी।2

योजनाएँ चल रहीं पर हो रहीं नादानियाँ

देखकर यूँ हाल अपना खुद लजाता आदमी।3

सच कहा जाता नहीं,कह दे अगर,बदकारियाँ

तिलमिलाती बात है फिर थरथराता आदमी।4

रोक सकता दुश्मनों को देख लो जाँबाज दिल

भेदियों से घर में लेकिन मात खाता आदमी।5

खेत में होते हवन से हाथ जलते हैं बहुत

कर चुकाने में फसल…

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Added by Manan Kumar singh on February 26, 2018 at 9:00pm — 7 Comments

ख़ाब इतने न दिखा दे मुझको - सलीम रज़ा रीवा

2122 1122 22

पहले ग़लती तो बता दे मुझको
फिर जो चाहे वो सज़ा दे मुझको
oo
सारी दुनिया से अलग हो जाऊँ
ख़ाब इतने न दिखा दे मुझको
oo
हो के मजबूर ग़म-ए-दौरां से
ये भी मुमकिन है भुला दे मुझको
oo
या खुदा वक़्त-ए-नज़ा से पहले
उसका दीदार करा दे मुझको
oo
साथ चलना हो 'रज़ा' नामुमकिन
ऐसी शर्तें  न सुना दे मुझको 


_____________________
 मौलिक व अप्रकाशित

Added by SALIM RAZA REWA on February 26, 2018 at 8:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल- बुढ़ापा आ गया लेकिन समझदारी नहीं आई

बह्र - मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन

बुढ़ापा आ गया लेकिन समझदारी नहीं आई।

रहे बुद्धू के बुद्धू और हुशियारी नहीं आई।

किया ऐलान देने की मदद सरकार ने लेकिन

हमेशा की तरह इमदाद सरकारी नहीं आई।

पड़ोसी के जले घर खूब धू धू कर मगर

साहब,

खुदा का शुक्र मेरे घर मे चिंगारी नहीं आई।

ढिंढोरा देश भक्ति का भले ही हम नहीं पीटें,

मगर सच है लहू में अपने गद्दारी नहीं आई।

बहुत से लोग निन्दा रोग से बीमार हैं…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on February 26, 2018 at 6:34pm — 7 Comments

इक दिन की बात हो तो इसे भूल जाएँ हम - तरही गजल- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"



221   2121     1221      212



सुनता खुदा  न यार  सदाएँ  तो क्या करें

करती असर न आज दुआएँ तो क्या करें ।१।



इक दिन की बात हो तो इसे भूल जाएँ हम 

हरदिन का खौफ अब न बताएँ तो क्या करें।२।



इक वक्त था कि लोग बुलाते थे शान  से

देता न  कोई  आज  सदाएँ  तो क्या करें।३।



शाखों लचकना सीख लो पूछे बगैर तुम 

तूफान बन  के  टूटें  हवाएँ तो  क्या करें।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 26, 2018 at 6:30pm — 6 Comments

आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए

....................ऑंखें...........................

आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए.

तारीकियों को इनकी न इतना बढाइए.

हिन्दोस्तां की दुनिया रोशन इन्हीं से है.

अँधेरों से आज इसको वल्लाह बचाइए.

गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान'

अजमेर (राज.)

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on February 26, 2018 at 5:46pm — 2 Comments

ग़ज़ल : सरसों के फूल खिलते, धानी फसल में जैसे.

तेरी अधखुली सी आँखें, भंवरे कँवल में जैसे.

मदहोश सो रहे हों , अपने महल में जैसे.

 

चुनरी पे तेरी सलमा-सितारे हैं यूँ जड़े.

सरसों के फूल खिलते, धानी फसल में जैसे.

 

शर्मो-हया है इनकी वैसी ही बरक़रार.

देखी थी इनमें मैंने पहली-पहल में जैसे.

 

जुर्मे-गौकशी को कानूनी सरपनाही.

जी रहे हैं अब भी, दौरे-मुग़ल में जैसे.

 

वैसे ही होना होश जरूरी है जोश में.

है अक़ल का होना कारे-नक़ल में जैसे.

 

बहके बहर…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on February 26, 2018 at 5:35pm — 3 Comments

हम भी तो अपने दौर के सुल्तान हैं सनम (इस्लाही)

221 2121 1221 212

...

हम भी तो अपने दौर के सुल्तान हैं सनम,

कुछ भी कहो युँ पहले तो इंसान हैं सनम ।

माना मरीज़ आज मुहब्बत के हो गए,

पर अपनी ज़िन्दगी के सुलेमान हैं सनम ।

ये जो हमारी आंखों में हैं अश्क़ देखिए,

आँसू न इनको समझो ये तूफान हैं सनम ।

हम भूल जाएँगे तुम्हें मुमकिन नहीं मगर,

ऐसा लगे समझना परेशान हैं सनम ।

अब छोड़ दर्द-ए-इश्क़ कभी दर्द-ए-आश्की

इस ज़िन्दगी में अपने भी…

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Added by Harash Mahajan on February 26, 2018 at 3:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल : कुत्तों से सिंह मात जो खाएँ तो क्या करें.

ग़ज़ल : कुत्तों से सिंह मात जो खाएँ तो क्या करें.

बहने लगी हैं उल्टी हवाएँ तो क्या करें.

कुत्तों से सिंह मात जो खाएँ तो क्या करें.

 

वो ही लिखा है मैंने जो अच्छा लगा मुझे.

नासेह सर को अपने खपाएँ तो क्या करें.

 

जल्लाद हाथ में जब खंजर उठा चुका.

खौफे अजल न तब भी सताएँ तो क्या करें.

 

इल्मे-अरूज पर  पढ़ कर के लफ़्ज चार.   .

खारिज बहर ग़ज़ल को बताएँ तो क्या करें.

 

कह तो रहें आप कि रंजिश नहीं मगर.…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on February 26, 2018 at 1:29pm — 3 Comments

दो जिस्मों के मिलने भर से

दो जिस्मों के मिलने भर से

दो जिस्मों के मिलने भर से

प्यार मुकर्रर होता तो

टूटे दिल के किस्सों का

दुनियाँ में बाज़ार न होता

सागर की बाँहों में जाने

कितनी नदियाँ खो जाती हैं

एक मिलन के पल की खातिर

सदियाँ तन्हा हो जाती हैं

तस्वीरें जो भर सकती

इस घर के खालीपन को

उसके आने की खुशबू से

दिल इतना गुलज़ार ना होता |

 

दो जिस्मों के मिलने भर से---

 

बाँहों में कस लेना…

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Added by somesh kumar on February 26, 2018 at 12:41pm — 6 Comments

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