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खोटा सिक्का (लघुकथा)

"ये लो! मैं बुध ग्रह को जीत गया।" उस सितारे की तीव्र तरंगदैर्ध्य वाली खुशी से भरपूर ध्वनि से आसपास की आकाशगंगाएं गुंजायमान हो उठीं।

 

सूदूर अंतरिक्ष में, जहाँ समय और विस्तार अनंत हैं, चार सितारे अपने ही प्रकार का जुआ खेल रहे थे। दांव पर लग रहे थे, उनके सौरमंडल के विभिन्न छोटे-बड़े ग्रह, उपग्रह, उल्कापिंड आदि। मनुष्यों से प्रेरित हो हमारा सूर्य भी उनमें से एक था। हालांकि उस समय उसका समय सही नहीं था। वह लगातार हार रहा था।

 

शनि के वलय, मंगल का सबसे ऊंचा पर्वत,…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 2, 2018 at 7:00pm — 3 Comments

रूह से भी यारी है - ग़ज़ल

जिस्म से रूह से भी यारी है

इश्क़ में इक सदी गुजारी है

उनसे मिलके भी दिल नहीं भरता

बढ़ रही फिर से बेकरारी है

उनकी बातें हैं जाम की बातें

फिर से चढ़ने लगी खुमारी है

सारी खुशियाँ उन्हें मुअस्सर हैं

सिर्फ अपनी ही गम से यारी है

उनके लब पे भी नाम हो अपना

ये  कवायद  हमारी  जारी  है

एक दिन वो मिलेंगे हमको ही

इश्क़  से  क़ायनात  हारी  है

मैं भी मिल पाऊँगा यक़ीन हुआ

उनके अपनों…

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Added by विनय कुमार on August 2, 2018 at 3:00pm — 3 Comments

ये क्या देखता हूँ

किसी बुरी शै का असर देखता हूं ।

जिधर देखता हूं जहर देखता हूं ।।

रोशनी तो खो गई अंधेरों में जाकर।

अंधेरा ही शामो शहर देखता हूं ।।

किसी को किसी की खबर ही नहीं है।

जिसे देखता हूं बेखबर देखता हूं ।।

ये मुर्दा से जिस्म जिंदगी ढो रहे हैं।

हर तरफ ही ऐसा मंजर देखता हूं ।।

लापता है मंजिल मगर चल रहे हैं।

एक ऐसा अनोखा सफर देखता हूँ।।

चिताएं चली हैं खुद रही हैं कब्रें।

मरघट में बदलते घर देखता हूं ।।

परेशां हूं दर्पण ये क्या देखता…

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Added by Pradeep Bahuguna Darpan on August 1, 2018 at 9:56pm — 4 Comments

नारी

​​​​​नारी

सबकुछ है नारीमें लेकिन एक कमी रहजाती है

उसकी सारी खूबियाँ केवल आँसूमें बहजाती है



वज्र के जैसा सीना उसका, अमीधार छलकाती है

सन्तानों के पालनमें ही,

अपना आप खपाती है

उससे ही परिवार पूर्ण फिर,आधी क्यों कहलाती है

सबकुछ है नारीमे लेकिन, एक कमी रहजाती है



हँसती है जब रोना होता, मौन रहे जब कहेना होता

परिणाम सबकी भूलोंका उसको ही क्यों सहेना होता

झूठी इक मुस्कान बस उसकी भेद सभी कहजाती है

सबकुछ है नारीमे लेकिन एक कमी रहजाती…

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Added by Kishorekant on August 1, 2018 at 7:11pm — 4 Comments

उम्मीदों की मशाल [लघु कथा ]

रामू की माँ तो अपने पति के शव पर पछाड़ खाकर गिरी जा रही थी.रामू कभी अपने छोटे भाई बहिन को संभाल रहा था ,तो कभी अपनी माँ को.अचानक पिता के चले जाने से उसके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा था.

पढ़ाई छोड़,घर में चूल्हा जलाने के वास्ते रामू काम की तलाश में सड़को की छान मारता।अंततःउसने घर-घर जाकर रद्दी बेचने का काम पकड़ लिया।रद्दी में मिलती किताबों को देख उसके अंदर का किताबी कीड़ा जाग उठा.किताबे बचाकर,बाकी रद्दी बेच देता।और रात में लालटेन में अपने पढ़ने की भूख को  तृप्त करता।

समय बीतता…

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Added by babitagupta on August 1, 2018 at 7:00pm — 4 Comments

याद तेरी - ग़ज़ल

याद तेरी कुछ इस कदर आए
तुझसे मिलने तेरे नगर आए

तुझको देखा करें हरेक लम्हा
वक़्त ऐसे ही अब ठहर जाए

अच्छी बातें ही बचें तेरे लिए
जो बुरा दौर हो गुजर जाए

बेकरारी है तुझको पाने की
हर तरफ तू ही तू नज़र आए

तेरी खुशबू हो हर तरफ मेरे
मेरी साँसों में ये असर आए

खार चुन लेंगे तेरी राहों से
राह में तेरे बस शजर आए !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on August 1, 2018 at 2:00pm — 7 Comments

सैलाब - लघुकथा

पिता के बार बार आग्रह करने पर रोहन उनके मित्र की इकलौती बेटी चेतना से एक बार मिलने को राजी हो गया। हालाँकि वह पिता से स्पष्ट कह चुका था कि यदि आपको चेतना पसंद है तो मुझे शादी मंजूर है| इसके बावज़ूद पिता की इच्छा थी कि रोहन एक बार चेतना से अवश्य मिले। शायद वे अकेले निर्णय करने से बचना चाहते थे।

चेतना दिल्ली में एम बी ए कर रही थी अतः हॉस्टल में रहती थी। उन दोनों ने रेस्त्रां में मिलना तय किया। औपचारिक मुलाक़ात के बाद मुद्दे की बात शुरू हुई। पहल चेतना ने की,

"क्या तुम एक बलात्कार…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 1, 2018 at 9:30am — 8 Comments

ग़ज़ल

सब समझ पातेहों ऐसे इल्म क्यों होते नहीं

सबको रक्खें साथ ऐसे बज्म क्यों होते नहीं

सिर्फ़ खँजरही नहीं कुछ लब्जभी घायल करें

दर्दसे महरूम कोइ ज़ख़्म क्यों होते नहीं

हर अंधेरी रातका रोशन सवेरा तो सुना

बदनसीबीके ये दिन फिर ख़त्म क्यों होते नहीं

आमलोगों केलिये बनते हैं सब क़ानून क्यों

ख़ासलोगों केलिये कोई हुक्म क्यों होते नहीं

सब सवालोंके तुम्हारे पास हैं गर हल तो फिर

पूछनेके सिलसिले ये ख़त्म क्यों होते नहीं…

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Added by Kishorekant on July 31, 2018 at 7:20pm — 2 Comments

ग़ज़ल

सब समझ पातेहों ऐसे इल्म क्यों होते नहीं

सबको रक्खें साथ ऐसे बज्म क्यों होते नहीं

सिर्फ़ खँजरही नहीं कुछ लब्जभी घायल करें

दर्दसे महरूम कोइ ज़ख़्म क्यों होते नहीं

हर अंधेरी रातका रोशन सवेरा तो सुना

बदनसीबीके ये दिन फिर ख़त्म क्यों होते नहीं

आमलोगों केलिये बनते हैं सब क़ानून क्यों

ख़ासलोगों केलिये कोई हुक्म क्यों होते नहीं

सब सवालोंके तुम्हारे पास हैं गर हल तो फिर

पूछनेके सिलसिले ये ख़त्म क्यों होते…

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Added by Kishorekant on July 31, 2018 at 7:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

ज़ख्म मेरे जब कभी तुम पर बयाँ हो जाएंगे 

सामने के सब नज़ारे बेजुबाँ  हो जाएंगे 

हाथ में  पत्थर नहीं कुछ ख्वाब दो कुछ काम दो 

हाथ ये नापाक के  कठपुतलियाँ हो जाएंगे 

खेलने दो आज इनको फ़िक्र सारी छोड़कर 

ज़िन्दगी उलझा ही देगी जब जवाँ हो जायेंगे 

जब कभी अफवाह उठ्ठे तुम यकीं करना नहीं 

झूठ की इस आग में ही घर धुवां हो जायेंगे 

ये सफर तन्हा नहीं है साथ गम यादें तेरी 

गम…

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Added by gumnaam pithoragarhi on July 31, 2018 at 5:00pm — 7 Comments

एक गजल - जानता हूँ चुनाव होना है

रोज ही भाव-ताव होना है

जानता हूँ चुनाव होना है

 

पाँच वर्षों में’ भर गया वो तो

फिर नया एक घाव होना है

 

कूप सड़कों पे’ बन गये अनगिन

उनका अब रखरखाव होना है

 

कौन कितना…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 31, 2018 at 9:00am — 18 Comments

ग़ज़ल

१२२२,१२२२,१२२२,१२२२ 

अता.........करदी

हमारेही मुक़द्दर में जुदाई क्यों अता करदी०

ज़रा इतना तो बतलाओ,कि ऐसी क्या खता करदी ।०

मेरी खामोशियोंको, नाम रुसवाई दिया तुमने०

कहाँ कुछ हम थे बोले, बात ऐसी, क्या, बता करदी । ०

कहाँ माँगी कहो जन्नत , ज़माने भर की दौलत भी०

मेरी तक़दीरसे, ख़ुशियाँ सभी क्यों लापता करदीं ।०

पढी बस इक ग़ज़ल हमने,कभी यारोंकी महेफिल में ०

तुम्हारा ज़िक्र क्या आया,खुदा या दासताँ करदी…

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Added by Kishorekant on July 30, 2018 at 6:36pm — 15 Comments

आज के दोहे....

आज के दोहे :.....



चरणों में माँ बाप के, सदा नवाओ शीश।

इनमें चारों धाम हैं, इनमें बसते ईश।। १



पथ पथरीला सत्य का , झूठी मीठी छाँव।

माँ के आँचल में मिले ,सच्चे सुख की ठाँव।। २



पग-पग पर घायल करें, पुष्प वेश में शूल।

दर्पण पर विश्वास के, जमी छद्म की धूल।।३



समय सदा रहता नहीं, जीवन के अनुकूल।

एक कदम पर फूल तो , दूजे पर हैं शूल।।४



शादी करके सब कहें, शादी है इक भूल।

जीवन में न संग मिले, जीवन के अनुकूल।।५



सदा लगे…

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Added by Sushil Sarna on July 30, 2018 at 2:30pm — 17 Comments

ऊपरवालों से गठजोड़ - (लघुकथा)

"जो भी हो रहा है, हमारे पक्ष में अच्छा ही हो रहा है! बस, थिंक पॉज़िटिव! तीखे बयानों, वायरल अफ़वाहों और चुनौतियों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है!" एक वरिष्ठ ज़िम्मेदार नेता ने गोपनीय सभा में अपने साथियों से कहा - "अपने पक्ष में लहर बरकरार रखने के लिए विरोधी दलों की सत्ता वाले इलाक़ों में बदलते हालात पर गिद्धों जैसी नज़र रखो! सदैव अलर्ट रहो और हर अवसर को पकड़ कर अपने दल के पक्ष में बस तुरंत ही कुछ पॉज़िटिव सा करते रहो साम-दाम-दंड-भेद और चाणक्य जैसी नीतियों के साथ! पुलिस से भी डरने की ज़रूरत नहीं है,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 30, 2018 at 4:30am — 9 Comments

ग़ज़ल (क्या ख़ता कोई रशके क़मर हो गई)

ग़ज़ल (क्या ख़ता कोई रशके क़मर हो गई)

(फाइ लुन _फाइ लुन _फाइ लुन _फाइ लुन)

क्या ख़ता कोई रशके क़मर हो गई |

जो खफा मुझसे तेरी नज़र हो गई |

आँख में तेरी अश्के नदामत न थे

इस लिए हर दुआ बे असर हो गई |

ग़म तबाही का तुमको नहीं है अगर

आँख क्यूँ देख कर मुझको तर हो गई |

ख़त्म शिकवे गिले सारे हो जाएंगे

गुफ्तगू उनसे तन्हा अगर हो गई |

यह करामत हमारे अज़ीज़ों की है

यूँ न उनकी अलग रह गुज़र हो गई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on July 29, 2018 at 3:21pm — 18 Comments

आ जाती है मौत यहाँ अनजाने में

22 22 22 22 22 2



भीड़ बहुत है अब तेरे मैख़ाने में ।।

लग जाते हैं दाग़ सँभल कर जाने में ।।1

महफ़िल में चर्चा है उसकी फ़ितरत पर ।

दर्द लिखा है क्यों उसने अफ़साने में ।।2

इस बस्ती में मुझको तन्हा मत छोडो ।

लुट जाते हैं लोग यहाँ वीराने में ।।3

वह भी अब रहता है खोया खोया सा ।

कुछ तो देखा है उसने दीवाने में ।।4

होश गवांकर लौटा हूँ मैख़ानों से।

जब उभरा है अक्स तेरा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 28, 2018 at 10:50pm — 13 Comments

संताप - लघुकथा –

संताप - लघुकथा –

"माधव, मुझे शाँति चाहिये। मेरा मन बहुत व्याकुल है।इस युद्ध के लिये मेरी अंतरात्मा मुझे कचोट्ती है"?

"क्या हुआ अर्जुन, तुम इतने निर्बल कैसे हो गये"?

"मित्र, युद्ध की विनाश लीला मुझे धिक्कारती है? मेरी आँखों के सामने उस विनाश की समस्त वीभत्स घटनांयें एक सैलाब की तरह मेरे मस्तिष्क को घेरे रहती हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेरे समूचे अस्तित्व को बहा ले जायेंगी और मुझे नेस्तनाबूद कर देंगी”?

“स्वयं को संभालो अर्जुन। तुम कायरों जैसा व्यवहार कर रहे…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 28, 2018 at 8:06pm — 10 Comments

एक गीत -सब कुछ पाना हमें यहाँ है

जीवन की राहें अनजानी,

मंजिल का भी पता कहाँ है.

चले जा रहे अपनी धुन में,

सब कुछ पाना हमें यहाँ है.

 

कहीं बबूलों के जंगल हैं,

कहीं महकती है अमराई.

फूल शूल के साथ…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 28, 2018 at 11:50am — 10 Comments

*" गुरु पूर्णिमा "* - कविता/अर्पणा शर्मा, भोपाल

गुरू-महात्म्य है अपरंपार,

गुरूवर नमन आपको बारंबार,

सर्वप्रथम गुरू हैं मात-पिता,

जग से जोड़ा अपना नाता,

पालन-पोषण-शिक्षा सँभाल,

दायित्वपूर्ण इनका सब संसार,

गुरूवर नमन आपको बारंबार,

ज्ञान दीप प्रज्वलित किये,

अज्ञान-तम सब हर लिये,

अहसान हैं हम पर अपार,

कैसे चुके इस ऋण का भार,

गुरूवर नमन आपको बारंबार,

हमें थे अविदित ईश्वर भी,

उनकी भी प्रतीति गुरू से ही,

गुरू से जाने…

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Added by Arpana Sharma on July 27, 2018 at 7:54pm — 6 Comments

मैं और मेरे गुरु [कविता]

क्षण-प्रतिक्षण,जिंदगी सीखने का नाम  

सबक जरूरी नहीं,गुरु ही सिखाए

जिससे शिक्षा मिले वही गुरु कहलाये 

जीवंत पर्यन्त गुरुओं से रहता सरोकार 

हमेशा करना चाहिए जिनका आदर-सत्कार 

प्रथम पाठशाला की गुरु माँ बनी …

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Added by babitagupta on July 27, 2018 at 1:00pm — 2 Comments

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