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मैं वक्त कहाँ कब रुकता हूँ .

22-22-22-22

मैं कुछ और कहाँ कहता हूँ।।
गैरों से लिपटा - अपना हूँ।।

वैमनष्यता न सर उठा पाए।
दुश्मन की तरहा रहता हूँ।।

दरपण भी छू सकता है क्या।
बस ये ऐसे ही - पूछा हूँ।

कलियाँ खुशबू बिखरायेंगी।
मैं वक़्त कहाँ कब रुकता हूँ।।

आमोद रखो, बिश्वास रखो।
पग पग जीवन में अच्छा हूँ।।


..अमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2019 at 11:30am — 5 Comments

कुण्डलिया छंद -

बेटा-बेटी    में    करें, भेदभाव    क्यों    लोग।
सबका अपना भाग्य हैं, जब हो जिसका योग।।
जब हो जिसका योग, और प्रभु की जो मर्जी।
कौन  श्रेष्ठ  या  हेय,  धारणा  ही   ये    फर्जी।।
पुत्री  हो   या   पुत्र, नहीं   इसमें   कुछ   हेटी।
दोनों    एक    समान, आज   हैं    बेटा-बेटी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on March 10, 2019 at 10:30am — 7 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

दरमियाँ    हुस्न    पर्दा    दारी   है ।

कैसे    कह   दूँ  के   बेक़रारी   है ।।

ऐ  कबूतर  जरा  सँभल   के  उड़ ।

देखता  अब   तुझे    शिकारी   है ।।

कौन  कहता  बहुत  ख़फ़ा  हैं  वो ।

आना  जाना  तो  उनका   जारी है ।।

सब   बताता   है   नूर   चेहरे   का ।

रात    उसने   कहाँ    गुजारी    है ।।

कैसे  कर  लूं …

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 10, 2019 at 9:00am — 5 Comments

प्लेन उड़ाती लडकियां

प्लेन उड़ाती लडकियां

(लघुकथा)

एयरोनॉटिकल शो। किस्म किस्म के हवाई जहाज़ आसमान में करतब दिखाते उड़े जाते हैं। अधिकतर प्लेन लड़कियां उड़ा रही हैं।

"पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी...।" एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है।

लड़कियां आसमान में प्लेन उड़ा रही हैं। लड़कियां आसमान छू रही हैं। लड़कियों का आत्मविश्वास आसमान पर है और एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है, "पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी।"

लोग कहते हैं, “लड़कियों को पंख लग गये…

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Added by Mirza Hafiz Baig on March 9, 2019 at 7:58pm — 8 Comments

सच की झूठी जिल्दकारी क्या करूँ ..

2122-2122-212

याद आती है तुम्हारी क्या करूँ ।।

छाई रहती है खुमारी  क्या करूँ।।

अब नहीं चलता , मेरे पे बस मेरा।

बढ़ रही नित बेक़रारी क्या करूँ।।

खुद मुआफ़िक आयत ए कुरआन हो।

इसमें अच्छी अर्श कारी क्या करूँ।।

झूठा' सिक्का अब चलन बाजार का

सच की झूठी जिल्दकारी क्या करूँ।।

हर्ज़ कोई बात से…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 9, 2019 at 3:30pm — 4 Comments

सरसी छंद - "अरुणोदय"

1-

धीरे-धीरे आसमान का, रंग हो रहा लाल।

अतिमनभावन दृश्य सुहावन,है अरूणोदय काल।।

पसरा था जो गहन अँधेरा, अब तक चारों ओर।

उसे चीरकर आयी देखो, प्राणदायिनी भोर।।

2-

नवप्रभात ने फूँक दिए ज्यों, सकल सृष्टि में प्राण।

मंगलमय हो गया सबेरा, मिला तिमिर से त्राण।।

जलनिधि की जड़ता का जैसे, किया सूर्य ने अंत।

जीव-जंतु जड़-जंगम जलधर, हुए सभी जीवंत।।

3-

सागर की गहराई में भी, जीवन है संगीन।

घड़ियालों के बीच वहाँ पर, प्राण बचाती मीन।।

सूरज के आ जाने…

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Added by Hariom Shrivastava on March 8, 2019 at 1:41pm — 6 Comments

मैं एक स्त्री भी हूँ

"अंतर्रष्ट्रिय  महिला दिवस पर विशेष"

सिर्फ माँ बहन पत्नी बेटी की,

परिभषा में मत उल्झओ

सबसे पहले मैं एक स्त्री हूँ,

मुझे मेरा सम्मन दिलवाओ।।

 

सिर्फ वंश…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on March 8, 2019 at 11:30am — 2 Comments

हाँ मैं नारी हूँ

हाँ मैं नारी हूँ

घर की मर्यादा हूँ…

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Added by Neelam Upadhyaya on March 8, 2019 at 10:30am — 6 Comments

तेरे रुखसार हैं या दहके गुलाब-------ग़ज़ल

1222 1222 2121

तेरे रुख़्सार हैं या दहके ग़ुलाब

ये तेरी ज़ुल्फ़ है या तेरा हिज़ाब

हटा के ज़ुल्फ़ का पर्दा, उँगलियों से

बिखेरो चाँदनी मुझ पर माहताब

करीब आ तो, निगाहों के पन्ने पलटूँ

मैं पढ़ना चाहूँ तेरे मन की किताब

महज़ चर्चा तुम्हारा, बातें तुम्हारी

इसे ही सब कहें, चाहत बे-हिसाब

ज़माना तुहमतें चाहे जितनी भी दे

ग़ज़ल पंकज की, है तुझको इंतिसाब

===============================

कठिन शब्दों के…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 8, 2019 at 8:24am — 2 Comments

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा (३६)

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा 

कैसे मुमकिन है वो बाँहों में जहाँ देखेगा 

** 

कितना बारूद भरा होगा बताना मुश्किल 

लफ्ज़ से कोई निकलता जो धुआँ देखेगा 

**

दिल की रानाई का अंदाज़ा लगाए कैसे 

जो फ़क़त हुस्न कि फिर शोला-रुख़ाँ* देखेगा 

**

दर्द महसूस भला ग़म का उसे हो क्यों कर 

ज़िंदगी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 8, 2019 at 1:00am — 1 Comment

गज़ल: बच्चा बच्चा मर मिटेगा अपने हिंदुस्तान पर

2122 2122 2122 212

आंच आई गर कभी इस देश के अभिमान पर

बच्चा बच्चा मर मिटेगा अपने हिंदुस्तान पर//1

ये तिरंगा झुक नहीं सकता किसी के सामने

सर कटा देंगे हम अपना इसकी ऊंची शान पर//2

चाहे जितनी मुश्किलें आएं हमारी राह में

दाग़ हम लगने न देंगे देश के सम्मान पर//3

जीत लेंगे जंग हम दुश्मन लड़े चाहे जहां

ख़ौफ़ बरपा हम करेंगे शत्रु की मुस्कान पर//4

ज़ुल्म हम करते नहीं पर ज़ुल्म सहते भी नहीं

है भरोसा हमको अपने शांति के…

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Added by क़मर जौनपुरी on March 7, 2019 at 10:30pm — 2 Comments

दो हमशक्ल ग़ज़लें

एक बह्र ---दो हमशक़्ल ग़ज़ल

2122--2122--212

रस्म-ए-उल्फ़त है य' ऐसा कीजिए

रात-दिन उसको ही चाहा कीजिए

बदनसीबी का तमाशा कीजिए

आज फिर उसकी तमन्ना कीजिए

यूँ न हरदम मुस्कुराया कीजिए

जब सताए ग़म तो रोया कीजिए

ख़ुद को मसरूफ़ी दिखाया कीजिए

जब कभी बेकार बैठा कीजिए

अच्छा तो 'खुरशीद' जी हैं आप ही

आइए साहब उजाला कीजिए

©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर । 9413408422



2122--2122--212

आइने में ख़ुद को देखा कीजिए

फिर…

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Added by khursheed khairadi on March 6, 2019 at 8:24pm — 1 Comment

कोई उम्मीद का सूरज कहीं पर है खड़ा सायद

1222-1222-1222-1222

जो नजरें अब तलक बेख़ौफ़ दौड़ी जा रहीं हैं यूँ।।

कई आशाएं तपती रेत को खंघला रहीं हैं यूँ।।

कोई उम्मीद का सूरज , कहीं पर है खड़ा सायद।

पहल की किरने ये पैग़ाम लेकर आ रहीं हैं यूँ।।

ये सन्नाटा जो पसरा चीख़ के कुछ अंश बांकी हैं।

दिशाएँ इंतक़ाम-ए-जंग को दुहरा रहीं हैं यूँ।।

विषमता में खड़ी हो लोकधर्मी जंग लड़कर अब।

रिसाल ए रौशनाई हौसले उमड़ा रहीं हैं यूँ।।

कोई तो लिख रहा बेशक नया भारत किताबों में।…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 6, 2019 at 7:39pm — 1 Comment

यह खबर इज़्तिराब की सी है

2122 1212 22



यह ख़बर इज़्तिराब की सी है ।

बात जब इंकलाब की सी है ।।

वह बगावत पे आज उतरेगा ।

उसकी आदत नवाब की सी है ।।

हम सफ़र ढूढना बहुत मुश्किल ।

सोच जब इंतखाब की सी है ।।

देखकर जिसको बेख़ुदी में हूँ ।

उसकी फ़ितरत शराब की सी है ।।

आ रहे रात में सनम शायद ।

रोशनी आफ़ताब की सी है ।।

रोज पढ़ता हूँ उसको शिद्द्त से ।

वो जो मेरी किताब की सी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 6, 2019 at 6:55pm — No Comments

एक ग़ज़ल रुबाइ की बह्र में

मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़अल

221     1221   1221    12

पाना जो शिखर हो तो मेरे साथ चलो

ये अज़्म अगर हो तो मेरे साथ चलो

दीवार के उस पार भी जो देख सके

वो तेज़ नज़र हो तो मेरे साथ चलो

होती है ग़रीबों की वहाँ दाद रसी

तुम ख़ाक बसर हो तो मेरे साथ चलो

पत्थर पे खिलाना है वहाँ हमको कँवल

आता ये हुनर हो तो मेरे साथ चलो

हर शख़्स वहाँ कड़वा…

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Added by Samar kabeer on March 6, 2019 at 5:55pm — 27 Comments

क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गए---ग़ज़ल

1212 1222 1212

हमारे वार से जब अरि दहल गए
क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गए

ख़बर ख़बीस के मरने की क्या मिली
वतन में कईयों के आँसू निकल गए

वो बिलबिला उठे हैं जाने क्यूँ भला
जो लोग देश को वर्षों हैं छल गए

नसीब-ए-मुल्क़ पे उँगली उठाए हैं
सुकून देश का जो खुद निगल गए

मिलेगा दण्ड ए दुश्मन ज़रु'र
वो और ही थे, जो तुझ पर पिघल गए

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत (३५)

मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत 

डरे फ़िराक़-ओ-ग़मों से उसको न इश्क़ फरमाने की ज़रूरत 

**

सफ़र मुहब्बत की मंजिलों का हुज़ूर होता कभी न आसाँ 

यहाँ न साहिल का कुछ पता है न तय सफ़र की है कोई मुद्दत

**

न जाने कितने हैं इम्तिहाँ और क़दम क़दम पर बिछे हैं कांटे 

रह-ए-मुहब्बत पे है जो चलना तो दिल में रक्खें ज़रा सी हिम्मत 

**

रक़ीब गर मिल गया कोई तो बढ़ेंगी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 5, 2019 at 10:30am — 4 Comments

परिचय [लघु कथा ]

परिचय

मेला प्रांगण में आयोजित बारहवाँ साहित्य सम्मेलन में देशभर के साहित्यकारों का जमावड़ा लगा हुआ था,जिसमें माननीय राज्यपाल के करकमलों से पुस्तक का विमोचन किया जाना था.

आगंतुकों में शहर के प्रतिष्ठित,मनोहर बाबू भी विशिष्ठजन की पंक्ति मंं विराजमान थे.शीघ्र ही मंच पर राज्यपाल की उपस्थित से सन्नाटा खिंच गया.औपचारिकताओं के पश्चात,जिस लेखक की किताब ‘मेरा परिचय’का अनुमोदन किया जाना था,उसे संबोधित कर मंच पर आने का आग्रह किया गया.तो सभी की उत्सुकता में एकटक निगाहें मंचासीन होने वाले के…

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Added by babitagupta on March 4, 2019 at 10:45pm — 7 Comments

ग़ज़ल (जो वाकिफ़ ही नहीं नामे वफ़ा से)

ग़ज़ल (जो वाकिफ़ ही नहीं नामे वफ़ा से)

(मफाई लुन _मफाई लुन _फ ऊलन)

जो वाकिफ़ ही नहीं नामे वफ़ा सेl

लगा बैठा हूँ दिल उस दिलरुबा से l

वो बिन मांगे ही मुझको मिल गए हैं

करूँ कोई दुआ अब क्या ख़ुदा से l

झुका मुंसिफ़ भी ज़र के आगे वर्ना

बरी होता नहीं क़ातिल सज़ा से l

परायों का करूँ मैं कैसे शिकवा

मुझे लूटा है अपनों ने दगा से l

ये है फिरक़ा परस्तों की ही साज़िश

बुझा कब दीप उलफत का हवा से…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 4, 2019 at 7:49pm — 8 Comments

-कह मुकरिंयाँ -

महाशिवरात्रि की शुभकामनाओं सहित कुछ

- कह मुकरिंयाँ-

---------------------

1-

उसे कहें सब औघड़दानी,

फिर भी मैं उसकी दीवानी,

बड़ा निराला उसका वेश,

क्या सखि साजन? नहीं महेश !!

2-

खाता है वह भाँग धतूरा,

फक्कड़नाथ लगे वह पूरा,

पर मेरा मन उस पर डोले,

क्या सखि साजन ? ना बम भोले !!

3-

लोग कहें वह पीता भंग,

मुझ पर चढ़ा उसी का रंग,

मेरा मन उस पर ही डोले,

क्या सखि साजन ? ना बम भोले !!

4-

भस्म रमाता वह …

Continue

Added by Hariom Shrivastava on March 4, 2019 at 2:00pm — 6 Comments

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