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February 2016 Blog Posts (161)

कलयुग के साथी

हॉल में बेचैनी से चहलकदमी करता हुआ दिनेश पत्नी के पास आकर बैठ जाता है। "बरखा तुम्हें पता ही है, मैं और विक्रम कितने गहरे मित्र हैं। तुम भी तो हमारी सहपाठी थी"। कहते हुए दिनेश ने पत्नी की ओर सहमति की आस से देखा। "हाँजी पता है, और मुझे आपके विश्वास पर पूर्ण विश्वास भी"। कहते हुए बरखा ने पति की ओर देखा।

"विक्रम भाई साहब तुम्हारे एहसानों का बदला चुकाते हुए इस जनहित प्रनेजेक्ट के साथ अवश्य न्याय करेंगे" ।

दिनेश ने बड़े ही आत्मविश्वास से बरखा के हाथ पे थपकी दी और उठ खड़ा हुआ। "कहाँ जाते…

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Added by shikha tiwari on February 29, 2016 at 9:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल-आश फिर भी न बाज आती है।

२१२२ १२१२ २२

वक्त बेवक्त याद आती है।
बेहया रात दिन रुलाती है।

तेरे खत से महक चुराता हूँ।
तब कहीं एक साँस आती है।

रोज किस्मत मेरी मुहब्बत में।
दर पे आ आ के लौट जाती है।

साफ कह बेवफा सनम तू अब।
मेरी गुरबत से हिचकिचाती है।

जिन्दगी कोसती रही दिल को।
आश फिर भी न बाज आती है।

दिल के हर इक गली मुहल्ले में।
रात भर हिज्र खूं बहाती है।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi on February 29, 2016 at 1:16pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बरसों बाद भी देखो- शिज्जु शकूर

212 1222 212

बरसों बाद भी देखो, इक जगह पड़े हो तुम

संग की तरह बेहिस, सख़्त हो गये हो तुम



जन्म तो लिया था पर, गाह जी नहीं पाये

अपनी लाश का कब से, बोझ ढो रहे हो तुम



ऐसे छटपटाओ मत, और डूब जाओगे

दलदली जगह है ये जिस जगह खड़े हो तुम



बेकराँ समंदर है, और लहरें तूफ़ानी

थोड़ी देर ठहरो तो, ज़िद पे क्यों अड़े हो तुम



हर बयान पर मेरा, इख़्तिलाफ़ करते हो

दिल में अपने क्या-क्या भ्रम, पाल के रखे हो तुम



शहर की हवाओं के, हर… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on February 29, 2016 at 8:00am — 4 Comments

प्रश्न लियें हैं एक (दोहा-गीत)

मातृभूमि के पूत सब, प्रश्न लियें हैं एक ।

देश प्रेम क्यों क्षीण है, बात नही यह नेक ।।

नंगा दंगा क्यों करे, किसका इसमें हाथ ।

किसको क्या है फायदा, जो देतें हैं साथ ।।

किसे मनाने लोग ये, किये रक्त अभिषेक । मातृभूमि के पूत सब

आतंकी करतूत को, मिलते ना क्यों दण्ड ।

नेता नेता ही यहां, बटे हुये क्यों खण्ड़ ।।

न्याय न्याय ना लगे, बात रहे सब सेक । मातृभूमि के पूत सब

गाली देना देश को, नही राज अपराध ।

कैसे कोई कह गया, लेकर मन की…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 29, 2016 at 7:30am — 4 Comments

मन तू भला बात कब मानता है- ग़ज़ल ( सुझाव अवश्य दें)

2212 2122 122 2212 2122 122



बोला तो था प्यार करना नहीं पर, मन तू बता, बात काहें न मानी।

इस राह में मुश्किलें हैं बहुत सी, बोला तो था, बात काहें न मानी।।



समझाया था है अगन पथ मुहब्बत, जलने से आगाह तुमको किया था।

छालों की सौगात लेकर तड़प अब, तेरी ख़ता, बात काहें न मानी।



तूफ़ाँ वहीँ अपने भीतर में ही रख, गर्जन ये दिल की तू खुद में चुरा ले।

नैनों से नदिया बहाना मना है, अब सह सज़ा, बात काहें न मानी।।



खामोशियों की चदरिया में अब तो, बांधों समेटो हाँ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 29, 2016 at 12:30am — 9 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
उड़ रही हो तो ज़रा पंख क़तर जाती हूँ (एक ग़ज़ल)....//डॉ. प्राची

2122.1122.1122.22



मेरी हस्ती ही मिटा दे! यूँ अखर जाती हूँ।

उसकी नफरत का ज़हर देख सिहर जाती हूँ।



कश्ती कागज़ की हूँ पतवार कहाँ हासिल है,

बह चले धार जिधर संग उधर जाती हूँ।



आ! बिछा दे, मेरी राहों में ज़रा अंगारे

जितना जलती हूँ मैं उतना ही निखर जाती हूँ।



ज़िन्दगी देख मुझे खुश, यूँ पलट कर बोली-

"उड़ रही हो तो ज़रा पंख क़तर जाती हूँ !"



बुतशुदा काँच हूँ पत्थर के शहर में साकी,

जोड़ लो कितना भी, हर बार बिखर जाती हूँ।



आस… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 28, 2016 at 12:30pm — 7 Comments

डॉक्टर सड्डन (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

मुश्किल से माँ-बाप सालों बाद अपने बेटों से मिलने मुंबई पहुंचे थे। एक के बाद एक पांचों मुंबई में बस गए थे और उनमें से एक खो दिया था। डर लग रहा था कि कहीं ग़लत धंधों में तो नहीं पड़ गये फ़िल्मी दुनिया में दाख़िला पाने के मोह में। दो दिन ही हुये थे माहिम में बड़े बेटे के घर में रुके हुए । बेटे की वास्तविक माली हालत उसकी सेहत और घर देख कर कुछ समझ में नहीं आ रही थी। एक दिन चावल न खाने की बात पर बेटा बाप पर बरस पड़ा।

 "अबे, बुढ़ऊ जो मिल रहा है चुपचाप खा ले, मेरी बीवी के पास इत्ता टाइम नहीं है…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 28, 2016 at 12:00pm — 6 Comments

लिटिल चैम्पियन ( लघुकथा )

"महज़ सात वर्ष की उम्र में "सिल्वर स्क्रीन लिटिल चैम्पियन" जीतने वाला तुम्हारे डांसर बेटे का ,ये क्या हाल हो गया रेखा ?"

 " उस लिटिल चैम्पियनशिप ने ही तो उसको बरबाद किया है " उसने अपने आँखों में उतरे समंदर को संभालते हुए कहा ।

 " ये क्या कह रही हो तुम ! "

 "हाँ ,सच कह रही हूँ , उस चैम्पियनशिप जीतने के बाद नाचने में ही वह लगा रहा , पढ़ाई छूट गयी उसकी , और तुम तो जानती हो कि फिल्मी दुनिया के भाई -भतीजेवाद में कहाँ मिलता है बाहर वालों को स्थान ? "

 " वह स्टेज परफॉर्मर तो बन…

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Added by kanta roy on February 28, 2016 at 11:00am — 6 Comments

अधकढ़ा गुलाब (कहानी)

अधकढ़ा गुलाब

“अरे, आप अँधेरे में क्या कर रही हो? कौन सा खजाना खोल कर बैठी हो, मम्मा, जो हमारी आवाज़ तक नहीं सुन पा रही हो?”

शैली की आवाज़ से विचारों मे डूबी मृदुला वर्तमान में वापस आई.

“नहीं बेटा कुछ नहीं,” कह सामान समेटना चाह ही रही थी, कि दूसरी बेटी शिल्पी भी आ खड़ी हुई.

“प्लीज़ मम्मा, आज तो दिखा ही दो क्या है इस बैग में जो आप हमेशा अकेले में खोलती हो और किसी दूसरी दुनिया मे चली जाती हो!”

“क्या है? ऐसा कुछ भी तो नहीं. बस कुछ पुराने कपड़े और कागज़ वगैरहा हैं. चलो छोड़ो! तुम… Continue

Added by Seema Singh on February 28, 2016 at 8:06am — 8 Comments

नयी क़बा ....

नयी क़बा ....

कितनी अजब होती है

वो प्रथम अभिसार की रात

पुष्पों से सेज सुरभित रहती है

पलकों में उनींदे ख्वाब रहते हैं

एक जिस्म

दो कबाओं में सिमटा

किसी अनजाने पल के इंतज़ार में

ख़ौफ़ज़दा होता है

न चाह कर भी

अपने हाथों से

कुवांरे ख़्वाबों की क़बा का

कत्ल करना पड़ता है

मुहब्बत के

रेशमी  अहसासों का नया पैराहन

खामोश वज़ूद को

एक नया नाम दे देता है

कुवारी क़बा

इक चुटकी भर सिन्दूर में लिपट…

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Added by Sushil Sarna on February 27, 2016 at 8:00pm — No Comments

गजल(मनन)

2212 2212 22

कितना कहूँ सपना अधूरा है

मन तो महज अपना जमूरा है।1



लगता रहा तबसे हुआ मन का

होता कहाँ पर चाँद पूरा है?2



इक खूबसूरत-सी अदा ने तो

बनकर बला हर बार घूरा है।3



चाहा कभी नभ ने जमीं मिलती

छिटकी रही ठगता कँगूरा है।4



बस देखता चलता नदी में चुप

जो है छला शशि अक्श पूरा है।5



पिसती गयी है तिष्णगी रस की

निकला कहाँ यूँ आज बूरा है।6



कितनी मनौव्वल हो गयी अबतक

दिल तो रहा बदरंग भूरा है।7

मौलिक… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 27, 2016 at 7:48pm — 2 Comments

​ग़ज़ल...धर्म के नाम पर

कर रहा क्या करम धर्म के नाम पर

आदमी बेशरम धर्म के नाम पर

दान की लाडली देव घर के लिये 

बन गये वो हरम धर्म के नाम पर

लूटते मारते काटते आदमी

ज़न्नतों का भरम धर्म के नाम पर

​​कर दिये हैं फ़ना बेजुबां जानवर

​जुल्म का है चरम धर्म के नाम पर

कौन साईं हुये?और शनि देव है?

है बहस ये गरम धर्म के नाम पर

मिट गया बाँकपन खोइ शालीनता

भाड़ में गइ शरम धर्म के नाम पर…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 27, 2016 at 6:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल- वक्त को मौत का इनाम आए।

2122 1212 22

तेरे हक में खुशी तमाम आए।
मेरा हिस्सा भी तेरे नाम आए।

तेरी पलके कभी न हो गीली।
और मुस्कान सुब्हो शाम आए।

बेरहम वक्त ने किया है जो।
वक्त को मौत का इनाम आए।

तुझे लवकुश कि इतनी राहत दे ।
याद तुझको कभी न राम आए।

दिल जिगर रूह राह देखे है।
कौन पहले तुम्हारे काम आए।

अपना मतलब तो सिर्फ इतना है।
तेरे लब पर मेरा कलाम आए।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi on February 27, 2016 at 3:39pm — 6 Comments

फाउंटेन पेन (लघुकथा)

उस जमाने में बी ए प्रथम श्रेणी से पास होने पर बाबू जी को कालेज के प्राचार्य ने पारितोषिक स्वरूप दिया था ।बाबू जी ने न जाने कितनी कहानियाँ,कविताएँ लिखी इस पेन से। हमेशा उनकी सामने की जेब में ऐसे शोभा बढ़ाये रखता जैसे कोई तमगा लगा हो। मेरी पहली कहानी सारिका में प्रकाशित होने पर बाबू जी ने प्रसन्न हो कर मेरी जेब में ऐसे लगाया जैसे कोई मेडल लगा रहे हों और साथ में हिदायत दी कि इस पेन से कभी झूठ नहीं लिखना,और न ऐसा सच जिससे किसी का अहित हो। आज बाबू जी की पुण्य तिथि पर उनकी तस्वीर पर माला चढा कर…

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Added by Pawan Jain on February 27, 2016 at 11:30am — 8 Comments

कृष्ण ने कहा था

वह समय था

जब हम जाते थे माँ के साथ

नीरव-विजन मंदिर में

देव-विग्रह के समक्ष

सांध्य-दीप जलाने

क्रम से आती थी गाँव की

अन्य महिलाएं  

मिलता था तोष

एक अनिवर्चनीय सुख

जबकि नहीं देते थे भगवान्

कुछ भी प्रत्यक्षतः

सिर्फ रहते थे मौन

आज वही विग्रह

करते है अवगाहन रात भर

ट्यूब–लाइट की दूधिया रोशनी मे

नहीं आती अब वहां ग्राम की बधूटियां

पर उपचार, देव-कार्य करते हैं

एक उद्विग्न कम उम्र के…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 27, 2016 at 11:04am — 1 Comment

पंचामृत......दोहे

पंचामृत......दोहे

सावन-भादों सूखते, ठिठुरी आश्विन-पूस.

माघ-फाल्गुनी रक्त रस, रही प्रेम से चूस. १

अपने सारे दर्द हुए, जीवन के अभिलेख.

कुछ पन्ने इतिहास से, कुछ इस युग के देख. २

सत्य अहिंसा प्रेम-धन, सब पर्वत के रूप.

मन-मंदिर को ठग रहे, जैसे अंधे कूप.  ३

राग-द्वेष नेतृत्व की, धारा प्रबल प्रवाह.

जन गण मन को डुबा कर, कहें स्वयं को शाह. ४

मौसम के हर रंग हैं, जीवन के संदेश.

कभी…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 26, 2016 at 9:30pm — 1 Comment

किसान का बेटा....

किसान का बेटा...

गंदे फटे वस्त्रों में उलझी धूल

झाड़ती सोंधी-सोंधी खुशुबू.

नीम की छांव में बैठ कर

निमकौड़ी !

खुद पिघल कर रचती

नये-नये अंकुर.

सावन मस्त होकर झूमता

वर्षा निछावर करती

जीवन के जल-कण

छप्पर रो पड़ते

किसान फटी आंखों से सहेज लेता...

जल-कण

बटुली में

थाली में.

धान के खेत लहलहाते

गंदे-फटे वस्त्र धुल जाते

चमकते सूर्य सा

साफ आसमान…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 26, 2016 at 6:00pm — No Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२२  २१२२  २१२२  २१२

बेवफा ने जब जफ़ा के दस बहाने रख दिए

हमने भी तब जख्म अपने सब छुपा के रख दिए

भूख भी ये हार बैठी हौसले को देख कर

मुफलिसों ने आज फिर से देख रोजे रख दिए

फोन ने तो चीन डाला बचपना अब बच्चों का

टाक पर दादी के किस्से हमने सारे रख दिए

अब बुजुर्गों की कोई कीमत नहीं संसार में

आश्रमों के द्वार पर बूढ़े बिचारे रख दिए

जालिमों का जोर क्यों बढ़ने लगा है आज कल

यूँ भला सच की जुबां पर…

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Added by gumnaam pithoragarhi on February 25, 2016 at 10:02pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बगावत

बगावत

बगावत की है कलम ने

उसे भी अब आरक्षण चाहिए-

कुछ भी लिख दे

पुस्तकाकार में छपना चाहिए!

मैं अड़ गया अपना ईमान लेकर

तो

कलम ने अट्टहास किया,

तोड़ा, मरोड़ा, उखाड़ फेंका

उन शब्दों की पटरी को

जिन पर भूले-भटके

मेरी कल्पना की रेलगाड़ी

कभी-कभी खिसकती महसूस होती थी

और मैं बंद खिड़की के भीतर से

अनायास देखता रहता था पीछे सरकते

लहलहाते हुए, सूखाग्रस्त या

बाढ़ के गंदे पानी में…

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Added by sharadindu mukerji on February 25, 2016 at 9:52pm — 1 Comment

तुम्हारा काम इतना भर है

जवाब मेरे पास हैं
और बहुत खास हैं
तुम्हारा काम इतना भर है
कि सवाल भर बनाना है
भुरभुरी रेत पे लिखना है
कोई नाम ही तो मिटाना है
हालत मेरे पास हैं
और बहुत खास हैं
तुम्हारा काम इतना भर है
कि उनको उलझाना है
एक अफवाह फैंकनी है
बस्ती को ही तो  जलवाना है
विश्वास मेरे पास है
और बहुत खास है
तुम्हारा काम इतना भर है
कि बस तोड़ते जाना…
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Added by amita tiwari on February 25, 2016 at 9:04pm — No Comments

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