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दिल जो टूटा अभी तक जुड़ा ही नहीं

212 212 212 212

कैसे कह दूं हुआ हादसा ही नहीं ।

दिल जो टूटा अभी तक जुड़ा ही नहीं।।

तब्सिरा मत करें मेरे हालात पर ।

हाले दिल आपको जब पता ही नहीं ।।

रात भर बादलों में वो छुपता रहा ।

मत कहो चाँद था कुछ ख़फ़ा ही नहीं ।।

आप समझेंगे क्या मेरे जज्बात को ।

आपसे जब ये पर्दा हटा ही नहीं ।।

मौत भी मुँह चुराकर गुज़र जाती है ।

मुफ़लिसी में कोई पूछता ही…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 26, 2018 at 6:02pm — 9 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८८

2212 1212 2212 12



रुक्का किसी का जेब में मेरी जो पा लिया

उसने तो सर पे अपने सारा घर उठा लिया //१



लगने लगा है आजकल वीराँ ये शह्र-ए-दिल

नज्ज़ारा मेरी आँख से किसने चुरा लिया //२



ममनून हूँ ऐ मयकशी, अय्यामे सोग में

दिल को शिकस्ता होने से तूने बचा लिया //३



सरमा ए तल्खे हिज्र में सहने के वास्ते

दिल में बहुत थी माइयत, रोकर…

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Added by राज़ नवादवी on December 26, 2018 at 4:00pm — 20 Comments

गर मीर* ही न ध्यान रखेगा अवाम का। .....(४)

गर मीर* ही न ध्यान रखेगा अवाम का (*नायक )

फिर क्या करे अवाम भी ऐसे निज़ाम का 

***

अब तक न याद आई थी उसको अवाम की 

क्या रह गया यक़ीन फ़क़त आज राम का 

***

दौलत कमाई ख़ूब मगर इतना याद रख-

"बरकत नहीं करे कभी पैसा हराम का "

***

बेकार तो जहाँ में नहीं जिन्स* कोई भी (*वस्तु )

गर्द-ओ-गुबार भी कभी होता है काम…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 26, 2018 at 2:30pm — 14 Comments

एक ही  सपना  हमारा  जी  हजूरी की जगह - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

अब किसी के मुख न उभरे कातिलों के डर दिखें

इस वतन में हर तरफ खुशहाल सब के घर दिखें।१ ।



काम हासिल हो सभी को जैसा रखते वो हुनर

फैलते सम्मुख किसी के अब न यारो कर दिखें।२।



भाईचारा जब हो कहते हम सभी के बीच तो

आस्तीनों में छिपाये  लोग  क्यों खन्जर दिखें।३।



हौसला कायम रहे  यूँ सच बयानी का सदा

आईनों के सामने आते न अब पत्थर दिखें।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2018 at 10:51am — 3 Comments

क़ैद मैं....संतोष

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फेलुन

क़ैद मैं, कैसे दायरे में हूँ

कौन है जिसके सिलसिले में हूँ

आप तो मीठी नींद सोते हैं

और मैं सदियों…

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Added by santosh khirwadkar on December 26, 2018 at 7:00am — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जश्न सा तुझको मनाऊँ (एक गीत )

गुनगुनी सी आहटों पर

खोल कर मन के झरोखे

रेशमी कुछ सिलवटों पर सो चुके सपने जगाऊँ..

इक सुबह ऐसी खिले जब जश्न सा तुझको मनाऊँ..

साँझ की दीवानगी से कुछ महकते पल चुराकर

गुनगुनाती इक सुबह की जेब में रख दूँ छिपाकर

थाम कर जाते पलों का हाथ लिख दूँ इक कहानी

उस कहानी में लिखूँ बस साथ तेरा सब मिटाकर

हर छुपे एहसास को…

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Added by Dr.Prachi Singh on December 25, 2018 at 11:12pm — 7 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ अपनी कुछ जग की : तब और अब बनाम बच्चे परिवार को वृत बनाते हैं // -- सौरभ

 

आज मन फिर से हरा है। कहें या न कहें, भीतरी तह में यह मरुआया-सा ही रहा करता है। कारण तो कई हैं। आज हरा हुआ है। इसलिए तो नहीं, कि बेटियाँ आज इतनी बड़ी हो गयी हैं, कि अपनी छुट्टियों पर ’घर’ गयी हैं, ’हमको घर जाना है’ के जोश की ज़िद पर ? चाहे जैसे हों, गमलों में खिलने वाले फूलों का हम स्वागत करते हैं। मन का ऐसा हरापन गमलों वाला ही फूल तो है। इस भाव-फूल का स्वागत है।

अपना 'तब वाला' परिवार बड़ा तो था ही, कई अर्थों में 'मोस्ट हैप्पेनिंग' भी हुआ करता था। गाँव का घर, या कहें,…

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Added by Saurabh Pandey on December 25, 2018 at 2:00pm — 2 Comments

कुछ अलग सी वजह-- लघुकथा



आज उसके छह महीने पूरे हो रहे थे, कल से वह वापस अपनी खूबसूरत और आरामदायक दुनिया में जा सकता था. उसे याद आया, जब से सरकार ने नियम बनाया था कि हर डॉक्टर को छह महीने गांव में प्रैक्टिस करनी पड़ेगी, उसके लिए यह करना सबसे कठिन था. पिताजी की अच्छी खासी दुनिया थी उस महानगर में, बड़ी हवेली, भरा पूरा परिवार और हर तरह की सुख सुविधा. एम बी बी एस करने के बाद सबने यही कहा था कि छह महीने तो फटाफट गुजर जायेंगे और उसके बाद पिताजी महानगर में ही सब इंतज़ाम करा देंगे.

गांव में जिसके घर वह रह रहा था,…

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Added by विनय कुमार on December 25, 2018 at 1:12pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८७

2212 1212 2212 12



आती नहीं है नींद क्यों आँखों को रात भर

हमने तो उनसे की थी बस दो टूक बात भर //१



दिल में न और ज़िंदगी की ख्व़ाहिशात भर

हस्ती है सबकी नफ़सियाती पुलसिरात भर //२



पढ़ ले तू मेरी आँख में जो है लिखा हुआ

गरचे किताबे दिल नहीं है काग़ज़ात भर //३



हर आदमी में मौत की ज़िंदा है एक लौ

तारीकियों की बज़्म ये रौशन है रात भर //४…

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Added by राज़ नवादवी on December 25, 2018 at 12:17pm — 15 Comments

विरासत ...

विरासत ...

तुम

देर तक

ठहरे रहे

मेरे संग

बरसात में भीगते हुए

जो सोचा था

वो कह न सकी

जो कहा

वो सोचा न था



लबों की जुम्बिश से

यूँ लगता था जैसे

तुमने भी

मुझसे मिलकर

कुछ कहना था शायद

जो कह न सके

मेरी तरह

देर तक

तुम्हारी नज़रों के

लम्स

ख़ामोश अहसासात का

तर्ज़ुमा करते रहे

बरसात होती रही

अलफ़ाज़

इश्क की इबारत गढ़ते रहे

अपनी अपनी खामोशी में

हम…

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Added by Sushil Sarna on December 24, 2018 at 7:51pm — 4 Comments

ग़ज़ल:पुरखार रहगुज़र है चलना सँभल सँभल के......(३)

(221 2122 221 2122 )



पुरखार रहगुज़र है चलना सँभल सँभल के

आसाँ नहीं निभाना मत लेना इश्क़ हल्के

***

सच कह रहे हैं हमने देखा बहुत ज़माना

रह जाएँ आग में सब आशिक़ कहीं न जल के

***

दम तोड़ती यहाँ पर आई नज़र है हसरत

देखे हैं लुटते अरमाँ हर पल मचल मचल के

***

जो चाहते हैं अपना चैन-ओ-सुकून खोना

मैदाँ में वो ही आये हाथों में थूक मल के

***

अक़्सर यहाँ पे पड़ता मिर्गी के जैसा दौरा

कटती है रात सारी करवट बदल बदल के

***…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 24, 2018 at 11:30am — 6 Comments

कुण्डलिया छन्द

कुण्डलिया

जन को ढलना चाहिए, मौसम के अनुकूल

संकट होगा स्वास्थ्य पर, अगर करेंगे भूल

अगर करेंगे भूल, बात यह सही विचारो

खान-पान औ वस्त्र, सही ऋतुशः ही धारो

सतविंदर व्यवहार, सही हो रख पक्का मन

तन इसके अनुरूप, नहीं मन मौसम हो जन!

2.

जय-जय जय-जय हे अरुण!, तुम आभा भंडार

मिलती तुमसे जब किरण, तब चालित संसार

तब चालित संसार, प्रेरणा बात तुम्हारी

ऊर्जा तुमसे देव, मही अम्बर ने धारी

सतविंदर हर श्वास, सतत चलता है निर्भय

युग-युग रहो…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 24, 2018 at 7:00am — 8 Comments

विरासत- लघुकथा

लगभग सभी रिश्तेदार अब जा चुके थे, चौथी बाहर दालान में बैठे बैठे खलिहान की तरफ देख रहे थे. आज पिताजी को गुजरे १५ दिन बीत गए थे, तेरही ठीक तरह से निपट गयी थी, गांव घर के लोग भी भोज से संतुष्ट थे. बहनें जाते जाते उसको समझा गयी थीं कि अब तुम्हीं घर के बड़े हो और घर की सारी जिम्मेदारी अब तुम्हारी है. माँ बगल की खाट पर लेटी थी, उधर खलिहान में बंधी काली गईया नांद पर चुपचाप खड़ी थी, उसका मुंह नांद में कम ही जा रहा था.

"क्या पिताजी, आप रोज इस काली गईया को क्यों खाते समय सहलाते हैं. अरे आख़िरकार यह… Continue

Added by विनय कुमार on December 24, 2018 at 12:07am — 4 Comments

फ़न-फ़ेअर (संस्मरण)

पिछले महीने की ही बात है। गुड्डू को लेकर हम सभी सपरिवार अपने बच्चों के स्कूल में आयोजित 'फ़न-फ़ेअर' दिखाने ले गये। उसके दोनों बड़े भाई-बहन ने मेले में समोसे-पकोड़े की स्टॉल में सहभागिता की थी। बच्चों के प्रोत्साहन और टिकट-ड्रॉ की लालसा में हमने बीस टिकट पहले ही ख़रीद लिये थे, जो गुड्डू के ही पर्स में सुरक्षित रखे हुए थे।

"वाओ! कितना सुंदर गेट सज़ा है! हमारे स्कूल का फ़न-फ़ेअर देखते ही रह जाओगे आप लोग!" वह ऐसे बोला जैसे कि वह यह मेला पहले ही घूम चुका हो या बहुत जानकारी हासिल कर चुका हो।…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 23, 2018 at 5:30pm — 3 Comments

है बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बहतर है।।

बह्र- 2122-2122-2122-22

है बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बहतर है।।

जो समझ पाए न तुम क्या फायदा कहकर है।।

शोर कितना ही मचाये, या करे अब बकझक।

मैं समझ लेता हूँ मेरा दिल भी इक दफ्तर है।।

खुश नशीबी है मेरी नफ़रत मुहब्बत जंग की।

हार कर भी जीतने जैसा ही इक अवसर है।।

अब मैं ढक लेता हूँ  खुद-का ये बदन अच्छे से।

अब नहीं मैं पहले जैसा गन्दगी अंदर है।।…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on December 23, 2018 at 3:01pm — 2 Comments

ग़ज़ल --ज़मीँ थे तुम मुहब्बत की.......(२)

ज़मीँ थे तुम मुहब्बत की तुम्हीँ गर आस्माँ होते 

हमारे ग़म के अफ़साने ज़माने से निहाँ* होते (*छुपे हुए )

***

बने हो गैर के ,रुख़्सत हमारी ज़ीस्त से होकर 

न देते तुम अगर धोका हमारे हमरहाँ* होते (*हमसफर )

***

तुम्हारी आँख  की मय को अगर पीते ज़रा सी हम 

तुम्हीं साक़ी बने होते तुम्हीं पीर-ए-मुग़ाँ* होते(*मदिरालय का प्रबंधक ) 

***

बनाया हिज़्र को हमने…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 23, 2018 at 2:00pm — 7 Comments

स्वावलम्बी (लघुकथा)

“अरे यार! हद्द है ये तो, अब क्या इसके हाथ का खाना पड़ेगा?”



लोकल ट्रेन में बैठे एक व्यक्ति ने कहा। एक किन्नर इडली-सांभर के डिब्बों का थैला लिए डिब्बे में घूम रहा था| उसकी आवाज़ और उसके हाव-भाव से लोग उसकी ओर आकर्षित तो हो रहे थे | पर उससे सामान कोई नहीं खरीद रहा था| एक मनचले ने कहा, “ क्यों बे हिजड़े अब हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि ...|”



किन्नर ने उसके प्रतिउत्तर में कहा, “ क्यों रे? क्या तू किसी और तरह का अन्न खाता है?|



मनचले ने घृणा से उसकी ओर देखा|



किन्नर… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 22, 2018 at 10:23am — 10 Comments

हमें तुम भी मिटा पाए नहीं क्या

1222 1222 122

नए हालात पढ़ पाए नहीं क्या ।

अभी तुम होश में आए नहीं क्या ।।

उठीं हैं उंगलियां इंसाफ ख़ातिर ।

तुम्हारे ख़ाब मुरझाए नहीं क्या ।।

सुना उन्नीस में तुम जा रहे हो ।

तुम्हें सब लोग समझाए नहीं क्या ।।

किया था पास तुमने ही विधेयक ।

तुम्हारे साथ वो आए नहीं क्या ।।

जला सकती है साहब आह मेरी ।

अभी तालाब खुदवाए नहीं क्या ।।

है टेबल थप थपाना याद मुझको ।

अभी तक आप शरमाए…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2018 at 5:36pm — 3 Comments

बे-हया निशानी .....

बे-हया निशानी .....

हिज़्र की रातों में

तन्हा बरसातों में

खामोश बातों में

अश्कों की सौगातों में

मेरे नफ़्स में

साँसों के क़फ़स में

चांदनी बन कसमसाती

धड़कनों से बतियाती

सच, ओर कोई नहीं

सिर्फ, तुम ही तुम हो

बारिशों के पानी में

प्यासी कहानी में

नादान जवानी में

लहरों की रवानी में

अंगड़ाई की बेचैनी में

लबों की निशानी में

सच, ओर कोई नहीं

सिर्फ, तुम ही तुम…

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Added by Sushil Sarna on December 21, 2018 at 5:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल--फरेब ओ झूठ की यूँ तो सदा.......(१)

बह्र -बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम

अरकान -मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 

मापनी-1222 1222 1222 1222

***

फरेब-ओ-झूठ की यूँ तो सदा जयकार होती है,

मगर आवाज़ में सच की सदा खनकार होती है।

**

हुआ क्या है ज़माने को पड़ी क्या भाँग दरिया में 

कोई दल हो मगर क्यों एक सी सरकार होती है 

***

शजर में एक साया भी छुपा रहता है अनजाना

मगर उसके लिए…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 21, 2018 at 5:00pm — 15 Comments

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