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जलती मुस्कुराहटें

कुछ
छिल रहा है!
भीतर-भीतर!
दुख रहा..
नासूर जैसा!!
क्या है ये!
तुम्हारी चुप्पी?
या मेरी उदासी ??
नस-नस में
बेचैनियाँ!
घड़ी-घड़ी घबराहटें !!
क्यों पड़ी हैं आज ?
जलते तवे पर...
रोटियों की जगह-
मेरी मुस्कुराहटें!!

मौलिक व अप्रकाशित

Added by V.M.''vrishty'' on October 16, 2018 at 9:16pm — 8 Comments

युग द्रष्टा कलाम

युग द्रष्टा कलाम

युग द्रष्टा कलाम की वाणी

हर पल राह दिखाएगी

युगों युगों तक नव पीढ़ी को

मंजिल तक ले जाएगी ll

बना मिसाइल अपनी मेधा

दुनिया को दिखलाए हैं

अणुबम की ताकत दिखलाकर

जग में मान बढ़ाए हैं ll

सपने सच होते हैं जब खुद

सपने देखे जाते हैं

दुख में जो भी धैर्य उठाये

कलाम सा बन जाते हैं ll

क्लास रूम का बेंच आखिरी

शक्ति स्रोत बन जाता है

गुदड़ी में जो लाल छिपा है

काम देश के आता है…

Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 16, 2018 at 2:40pm — 7 Comments

ये जो है लड़की

ये जो है लड़की

उसकी जो आँखे

आँखों में सपना

सपने में घर

उसका अपना घर

जिसके बाहर

वो लिख सके

यह  मेरा घर है दुकान नहीं है…

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Added by amita tiwari on October 16, 2018 at 12:30am — 7 Comments

गजल(डरे जो बहुत....)

122 122  122  12
डरे जो बहुत,बुदबुदाने लगे
मसीहे,लगा है, ठिकाने लगे।1

तबाही का' आलम बढ़ा जा रहा
चिड़ी के भी' पर फड़फड़ाने लगे।2

नचाते रहे जो हसीं को बहुत
सलीके से' नजरें चुराने लगे।3

नहीं कुछ किया,कहते' आँखें भरीं
गये वक्त अब याद आने लगे।4

उड़ाते न तो कोई' उड़ता कहाँ?
यही कह सभी अब चिढ़ाने लगे।5
"मौलिक वअप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 15, 2018 at 9:53pm — 6 Comments

पागल मन ..... (400 वीं कृति )

पागल मन ..... (400 वीं कृति )

एक

लम्बे अंतराल के बाद

एक परिचित आभास

अजनबी अहसास

अंतस के पृष्ठों पे

जवाबों में उलझा

प्रश्नों का मेला

एकाकार के बाद भी

क्यूँ रहता है

आखिर

ये

पागल मन

अकेला

तुम भी न छुपा सकी

मैं भी न छुपा सका

हृदय प्रीत के

अनबोले से शब्द

स्मृतियाँ

नैन घनों से

तरल हो

अवसन्न से अधरों पर

क्या रुकी कि

मधुपल का हर पल

जीवित हो उठा

मन हस पड़ा…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 15, 2018 at 7:48pm — 14 Comments

काली स्याही

सजल आँखें,,बोझल मन !
अनुत्तरित प्रश्न ! टूटता बदन !
कुछ फिक्र ! कुछ लाचारी !
कुछ चाही...........,
कुछ अनचाही जिम्मेदारी !
ये कहानी थी कभी शामों की!
पर अब,,न जाने क्यों...
सूरज सर पे चमकता है,
फिर भी रातों का अंधेरा,,
आँखों से नहीं छंटता है ।
मैं लिख रही दास्तान---
बदलते हुए हालात की !
कि अब सफेद सुबहों में,
घुली है............
काली स्याही...रात की....!


मौलिक व अप्रकाशित

Added by V.M.''vrishty'' on October 15, 2018 at 12:24pm — 9 Comments

दुख बयानी है गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

अब न केवल प्यार की ही दुख बयानी है गजल

भूख गुरबत जुल्म की भी अब कहानी है गजल।१।



कल तलक लगती रही जो बस गुलाबों का बदन

अब पलाशों की  उफनती  धुर जवानी है गजल।२।



वो जमाना और था जब जुल्फ लब की थी कथा

माँ पिता के प्यार की  भी  अब निशानी है गजल।३।



पंछियों की चहचहाहट  फूल की मुस्कान भी

गीत गाती एक नदी की ज्यों रवानी है…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 3:30pm — 23 Comments

सत्यव्रत (लघुकथा)

"व्रत ने पवित्र कर दिया।" मानस के हृदय से आवाज़ आई। कठिन व्रत के बाद नवरात्री के अंतिम दिन स्नान आदि कर आईने के समक्ष स्वयं का विश्लेषण कर रहा वह हल्का और शांत महसूस कर रहा था। "अब माँ रुपी कन्याओं को भोग लगा दें।" हृदय फिर बोला। उसने गहरी-धीमी सांस भरते हुए आँखें मूँदीं और देवी को याद करते हुए पूजा के कमरे में चला गया। वहां बैठी कन्याओं को उसने प्रणाम किया और पानी भरा लोटा लेकर पहली कन्या के पैर धोने लगा।

 

लेकिन यह क्या! कन्या के पैरों पर उसे उसका हाथ राक्षसों के हाथ जैसा…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on October 14, 2018 at 2:23pm — 17 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६२

2122 1122 1122 22/ 112

 

याद की तह से कई भूले फ़साने निकले

आज हम तेरे लिखे ख़त जो जलाने निकले //1

 

चाहता हूँ मैं तुझे अपनी अना से बढ़कर

इस यकीं तक तुझे लाने में ज़माने निकले //२ 

 

ये भी अहसान जताने की नई कोशिश है

ख़त्म जब हो चुका रिश्ता तो मनाने निकले //3

 

अब कोई इनको बताए कि क़ज़ा क्या शय है

जा चुके छोड़ के दुनिया तो बुलाने निकले //4

 

जिनने खाई थी क़सम मुझको नहीं देखेंगे

आज काँधे पे मेरी लाश…

Continue

Added by राज़ नवादवी on October 14, 2018 at 10:00am — 13 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६१

2122 1122 1122 112/22

--------------------------------

जिसको भी चाहा मुहब्बत में हमारा न हुआ

दिल हमारा किसी सूरत भी गवारा न हुआ //1



मेरे क़िरदार में पाने की लियाक़त नहीं थी 

मुझपे जो फैज इनायत का दुबारा न हुआ //2



आज फिर बाम पे छाई थी अमावस काली 

आज फिर बिन्ते अशीयत का नज़ारा न हुआ //3



है जईफी तो सताती है हमें तन्हाई 

जब जवाँ थे तो मुहब्बत का इशारा न हुआ //4



मौजें उठतीं है मगर रोक लेता है…

Continue

Added by राज़ नवादवी on October 14, 2018 at 10:00am — 8 Comments

मत्तगयंद सवैया-रामबली गुप्ता

हे! जगदीश! सुनो विनती अब, भक्त तुम्हें दिन-रैन पुकारे।
व्याकुल नैन निहार रहे पथ, पावन दर्शन हेतु तुम्हारे।।
कौन भला जग में अब हे हरि संकट से यह प्राण उबारे।
आ कर दो उजियार प्रभो! हिय, जीवन के हर लो दुख सारे।।

रचनाकार-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

सूत्र-भगण×7+गुरु गुरु; 211×7+22

Added by रामबली गुप्ता on October 13, 2018 at 9:48pm — 6 Comments

मौत की उम्मीद पर (ग़ज़ल)

मौत की उम्मीद पर जीने की आदत हो गयी
जिंदगी सूखे हुए पत्ते की सूरत हो गयी
ठंड ओलों की सही सूरज के अंगारे सहे
पीढ़ियों को पाल कर जर्जर इमारत हो गयी
चेहरा पैमाना बना है खूबियों का आज-कल
रंग गोरा है मगर गुमनाम सीरत हो गयी
धो दिया है तेज़ बारिश ने मकानों को मगर
टूटी फूटी झोंपड़ी वालों की शामत हो गयी
मैं! मेरा उत्कृष्ट सबसे! बाकी सब बेकार है
बस यही समझाने में अब हर जुबाँ रत हो गयी
©vrishty
मौलिक व अप्रकाशित

Added by V.M.''vrishty'' on October 13, 2018 at 12:34pm — 12 Comments

'मेरी आवाज़ सुनो!' (लघुकथा)

"सुनो, किसी से चर्चा मत करना! अपने दफ़्तर का प्रोजेक्ट अधूरा भी छोड़ना पड़े, तो भी तुरंत ही अगली बस से यहां लौट आओ!"

"क्यों? क्या हुआ? घबराई हुई सी क्यों हो?"

"ऑफ़िस से लौटने पर आज तो मुझे मेरा सूटकेस ही पूरा खुला हुआ मिला.. और कपड़े बिखरे हुए!"

"कोई क़ीमती सामान चोरी तो नहीं हुआ?"

"क़ीमती ही नहीं.. हमारे जिगर का टुकड़ा भी! .. स्मिता अभी तक घर नहीं लौटी है! ... सूटकेस से मेरी कुछ मंहगी ड्रेसिज़, महंगा हेअर रिमूवर और सेनेटरी नैपकिन्ज़ वग़ैरह सब ग़ायब हैं!"

"तो क्या…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2018 at 6:35am — 5 Comments

इंसान का अस्तित्व

जीवन !
एक तराजू ।
आशा और निराशा !
पीड़ा और आनंद !
प्रेम और नफरत !
इन्हीं दो पलड़ों के बीच
इंसान का अस्तित्व !
जैसे--
लकड़ी का एक टुकड़ा !
जो जुड़ा है ....
दोनों पलड़ों से !
अस्थिर...विचलित...
डगमगाता.. लड़खड़ाता..
उसी काष्ठ की भाँति
मनुष्य भी,
दोनों पलड़ों से बंधा
स्थिर होने का
प्रयत्न करता !!
©vrishty
मौलिक व अप्रकाशित
(अतुकांत)

Added by V.M.''vrishty'' on October 13, 2018 at 12:09am — 8 Comments

मेरी हर निशानी मिटाने से पहले

122 122 122 122 

मेरी हर निशानी मिटाने से पहले ।

वो रोया बहुत भूल जाने से पहले ।।1

गयी डूब कश्ती यहाँ चाहतों की ।

समंदर में साहिल को पाने से पहले ।। 2

जफ़ाओं के मंजर से गुज़रा है कोई ।

मेरा ख़त गली में जलाने से पहले ।।3

वो दिल खेलने के लिए मांगते हैं ।

मुहब्बत की रस्मे निभाने से पहले ।। 4



ये तन्हाइयां हो न जाएँ सितमगर ।

चले आइये याद आने से पहले ।।6



मेरे हाल पर छोड़ दे मुझको जालिम ।

मुझे और…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 12, 2018 at 11:15pm — 20 Comments

पढ़ो तो इसको’ फाड़ो मत- गजल

© बसंत कुमार शर्मा

मापनी - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

सदा देता, न लेता कुछ, बुरी नजरों से ताड़ो मत

शजर है घर परिंदों का, उसे तुम यूँ उजाड़ो मत

 

बड़ी उम्मीद होगी, मगर कुछ भी न पाओगे

सयानी है बहुत जनता, यूँ मंचों पर दहाड़ो…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on October 12, 2018 at 5:27pm — 16 Comments

"एक शहर का दु:ख"

ये क्या हो रहा मेरे प्यारे शहर को,

कहीं क़त्ल-ओ-गारत कहीं ख़ून के छीटें,

के घायल हैं चंदर कहीं पे सिकंदर,

के हर ओर फैले हुए अस्थि पंजर,

के तुम ही कहो कैसे देखूँ ये मंजर,

के आँखों के सूखे पड़े हैं समंदर ।।…

Continue

Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on October 12, 2018 at 3:00pm — 3 Comments

बाज़ (लघुकथा)

बाज

--

चिड़िया ने पंख फड़फड़ाये।उड़ने को उद्यत हुई।उड़ी भी,पर पंख लड़खड़ा गये।उसे सहसा एक झोंका महसूस हुआ।।वह गिरते-गिरते बची,उसमें कुछ दूर उड़ती गयी।वह एक बड़ा पंख था,जो उसे हवा दे रहा था।वह उड़ती जा रही थी।कभी-कभी उसे उस बड़े पंख का दबाव सताता।वह कसमसाती,पर और ऊपर तक उड़ने की ख्वाहिश और जमीन पर गिरने के भय में टंगी वह घुटी भी,उड़ी भी......उड़ती रही।ऊँची शीतल हवाओं का सिहरन भरा स्पर्श उसे आंनदित करता।वह उस कंटकित पंख की चुभन जनित अपने सारे दुःख-दैन्य भूलकर उड़ती रही,तबतक जबतक उसे एक ऊँचाई न मिल…

Continue

Added by Manan Kumar singh on October 12, 2018 at 1:30pm — 16 Comments

मस्तिष्क और हृदय

मस्तिष्क !
और... हृदय!
जैसे जमी
और आसमान !
जैसे नदी के
दो किनारे !
जैसे--
पूरब और पश्चिम !
इनके बीच
इंसान का,
रफ्ता रफ्ता
पिस जाना ।
जैसे-
दो पाटों के बीच
गेहूं का एक दाना ।
महाभारत से भयावह है
इनके द्वंद का मंजर
अभी बाकी है कुरुक्षेत्र
मेरे भीतर ,,,आपके अंदर !!
©vrishty
मौलिक व अप्रकाशित
(अतुकांत)

Added by V.M.''vrishty'' on October 12, 2018 at 8:44am — 11 Comments

ऐ अब्र जरा आग बुझाने के लिए आ

221-1221-1221-122.



तपती जमीं है आज तू छाने के लिए आ ।

ऐ अब्र जरा आग बुझाने के लिए आ ।।

यूँ ही न गुजर जाए कहीं तिश्नगी का दौर ।

तू मैकदे में पीने पिलाने के लिए आ ।।

ये जिंदगी तो हम ने गुज़ारी है खालिस में ।

कुछ दर्द मेरा अब तो बटाने के लिए आ ।।

जब नाज़ से आया है कोई बज़्म में तेरी ।

क़ातिल तू हुनर अपना दिखाने के लिए आ।।

शर्मो हया है तुझ में तो वादा निभा के देख ।

मेरी वफ़ा का कर्ज चुकाने के…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2018 at 7:30pm — 8 Comments

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