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वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर ..... Nazeel



२१२२  २१२२  २१२२  २१२

जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥

ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था  शहर



है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं

सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर   



मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥

घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर



भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे  उसे  ,

वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर



वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,

यूँ अकेला बैठ…

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Added by Nazeel on April 1, 2015 at 8:44pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शह्र छोड़ गई-ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

गई तो रंग बदलता ये शह्र छोड़ गई

घटा बहारों में ढलता ये शह्र छोड़ गई

 

सबा चमन से गुज़रते हुये महक लेकर

रविश-रविश* यूँ टहलता ये शह्र छोड़ गई                                    *बाग़ के बीच की पगडण्डी          

 

फ़िज़ा ए शह्र तलक आके यक-ब-यक आँधी

यूँ मस्तियों में उछलता ये शह्र छोड़ गई

 

तमाम रात भटकती वो तीरगी* आखिर                                        *अँधेरा

पिघलती शम्अ पिघलता…

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Added by शिज्जु "शकूर" on April 1, 2015 at 5:30pm — 20 Comments

चाँद आकाश में खो गया - हिन्दी गजल (एक प्रयास)

मुतदारिक मुसद्दस सालिम

212     212          212

सो गया सो गया सो गया

चाँद आकाश  में खो गया I

 

ढूंढते  थे जिसे  उम्र भर

लो यहीं था अभी तो गया I

 

प्यार का बीज मन में मेरे

कोई चुपके से आ बो गया I

 

नैन जबसे  उलझ ये गये

चैन ना जाने क्या हो गया I

 

चोट खाया  बहुत प्यार में

वो  दिवाना अभी जो गया I

 

था  सहारा बहुत  प्यार से  

दूर लेकिन  चला वो गया…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 1, 2015 at 2:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल : नीली लौ सी तेरी आँखों में शायद पकता है मन

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

यूँ तो जो जी में आए वो करता है, राजा है मन

पर उनके आगे झटपट बन जाता भिखमंगा है मन

 

उनसे मिलने के पहले यूँ लगता था घोंघा है मन

अब तो ऐसा लगता है जैसे अरबी घोड़ा है मन

 

उनके बिन खाली रहता है, कानों में बजता है मन

जिसमें भरकर उनको पीता हूँ वो पैमाना है मन

 

पहले अक़्सर मुझको लगता था शायद काला है मन

पर उनसे लिपटा जबसे तबसे गोरा गोरा है मन

 

मुझको इनसे अक्सर भीनी भीनी…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 12:36pm — 23 Comments

किसको रोऊँ मैं दुखड़ा ?

ग्रीष्म में तपता हिमाचल, घोर बृष्टि हो रही

अमृत सा जल बन हलाहल, नष्ट सृष्टि हो रही

काट जंगल घर बनाते, खंडित होता अचल प्रदेश

रे नराधम, बदल डाले, स्वयम ही भू परिवेश

धर बापू का रूप न जाने, किसने लूटा संचित देश

मर्यादा के राम बता दो, धारे हो क्या वेश

मोड़ी धारा नदियों की तो, आयी नदियाँ शहरों में

बहते घर साजो-सामान, हम रात गुजारें पहरों में.

आतुर थे सारे किसान,काटें फसलें तैयार हुई

वर्षा जल ने सपने धोये, फसलें सब बेकार हुई

लुट गए सारे ही…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 1, 2015 at 11:30am — 19 Comments

अक़्ल पे यकीन नहीं रह गया दोस्तों ---डा० विजय शंकर

पहली अप्रेल की भेंट



अब तो अक़्ल पे यकीन नहीं रह गया दोस्तों ,

आप ही बताएं अक़्ल बड़ी या भैंस दोस्तों ॥

आप कहेंगें अक़्ल बड़े काम की चीज है

मैं कहूँगा, अक़्ल से काम लो , अक़्ल

किसी काम की चीज नहीं है दोस्तों ॥

अक़्ल हमेशा भैंस से मात खा जाती है ,

सामना भैंस से हो तो गुम हो जाती है ॥

अक़्ल अपनी हिफाज़त ही नहीं कर पाती है

भैंस उसे देखते देखते ही चर जाती है ॥

अक़्ल कुछ देती है , पक्का मालूम नहीं ,

भैंस अक्सर दूध देती तो है दोस्तों… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on April 1, 2015 at 10:10am — 14 Comments

ग़ज़ल- निलेश 'नूर' रुसवाइयों से रोज़ मुलाक़ात काटिये

गागा लगा लगा लल गागा लगा लगा 



रुसवाइयों से रोज़ मुलाक़ात काटिये

जबतक है जान जिस्म में, दिनरात काटिये.

.

है आप में अना तो अना मुझ में भी है कुछ 

यूँ बात बात पे न मेरी बात काटिये.  

.

ये कामयाबियों के सफ़र के पड़ाव हैं  

अय्यारियाँ भी सीखिए जज़्बात काटिये.

.

अगली फसल कटे तो करें इंतज़ाम कुछ

तब तक टपकती छत में ही बरसात काटिये.

.

ये इल्तिज़ा है आपसे इस मुल्क के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 1, 2015 at 7:57am — 28 Comments

गज़ल,,,,,,

ज़मानॆ का चलन यारॊ यहाँ इक-दम निराला है !!

गिरा जॊ राह मॆं उसकॊ कहॊ किसनॆं सँभाला है !!(१)



चला जॊ राह ईमाँ की उसी पर है उठी उँगली,

सरीखा आँख मॆं चुभता सभी की तॆज भाला है !!(२)



चलीं हैं आँधियाँ कैसी बुझानॆ अब चिराग़ॊं कॊ,

कभी सॊचा नहीं उन नॆं अँधॆरा स्याह काला है !!(३)



लिखी किसनॆ यहाँ तहरीर है ख़ूनी लिबासॊं की,

जहाँ दॆखॊ वहीं पॆ बस क़ज़ा का बॊल-बाला है !!(४)



वफ़ा की राह चलनॆं का नतीज़ा खून कॆ आँसू,

मग़र फिर भी वफ़ाऒं कॊ ज़हां मॆं खूब…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on April 1, 2015 at 1:30am — 7 Comments

सर्वश्रेष्ठ कविता : लघुकथा –हरि प्रकाश दुबे

“ कवि सम्मलेन का भव्य आयोजन हो रहा था, सभागार श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था , देश के कई बड़े कवि मंच पर उपस्तिथ थे, मंच संचालक महोदय बार –बार निवेदन कर रहे थे की अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना का पाठ करें, इसी श्रृंखला में उन्होंने कहा, अब मैं आमंत्रित करता हूँ, आप के ही शहर से आये हुए श्रधेय कवि विद्यालंकार जी का, तालियों से सभागार गूँज उठा !”

“तभी मंच संचालक महोदय ने उनके कान में कहा ‘सर कृपया १५ मिनट से ज्यादा समय मत लीजियेगा’ !”

“विद्यालंकार जी ने मंच पर आसीन कवियों एवम् श्रोताओं से…

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Added by Hari Prakash Dubey on April 1, 2015 at 12:53am — 2 Comments

दफन है बहुत आग सीने में जिसके ------ग़ज़ल उमेश कटारा

122 122 122 122



बहुत हो चुकी हैं शराफत की बातें

चलो अब करें कुछ व़गाव़त की बातें

....

हसद है उन्हें अब मेरी शौहरतों से

जो करते कभी थे रियाज़त की बातें

.....

दफन है बहुत आग सीने में जिसके

वो कैसे   करेगा नज़ाकत की बातें

.....

बुजुर्गों की सेवा जरूरी बहुत है

करो सिर्फ इनकी इवादत की बातें

......

मुआफी के काबिल नहीं बेवफाई

न मुझसे करो तुम नदामत की बातें

......

जिसे जिन्दगी देके मैंने बचाया

वो करने लगा है…

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Added by umesh katara on March 31, 2015 at 7:30pm — 17 Comments

खटें गदहें

शुरू है पत्‍नी सेवा दल मुझे हर दम बताती है

दिखा बेलन सुबह से शाम तक मुझको डराती है

बदन में दर्द हो उसके करो तुम तेल से मालिश

रहेगी खुश सदा तुमसे लगाओ जब उसे पालिश

सुबह पूजा करो उसकी न है अब वो चरण दासी

अगर ऐसा न कर पाये मिले भोजन तुम्‍हें बासी

बनाना रोज वो मुझका नया एक डिस सिखाती है

शुरू है पत्‍नी सेवा दल मुझे हर दम बताती है

दिखा बेलन सुबह से शाम तक मुझको डराती है

अगर उसके कभी भाई चले आये तुम्‍हारे घर

न…

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Added by Akhand Gahmari on March 31, 2015 at 7:18pm — 12 Comments

रेत की दीवार वो कुछ ही पलों में ढह गया |

२१२२ / २१२२/ २१२२/ २१२
राह चलते दिल मिला फिर याद बनकर रह गया | 
ख़्वाब  जो देखा कभी वो अश्क बनकर बह गया |
रात     बीती   चांदनी  में खाब  आँखों  में  लिये…
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Added by Shyam Narain Verma on March 31, 2015 at 4:38pm — 6 Comments

जो न सोचा था कभी............'जान' गोरखपुरी

२१२२ २१२२ २१२१२

जो न सोचा था कभी,वो भी किया किये

हम सनम तेरे लिये,मर-मर जिया किये

***

तेरी आँखों से पी के आई जवानियाँ

दम निकलता गो रहा पर हम पिया किये

***

आँख हरपल राह तकतीं ही रही सनम..

फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये

***

आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके

और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये

***

जख्म को अपने कभी मरहम न मिल सका

गैर के जख्मों को हम तो बस सिया…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 31, 2015 at 4:30pm — 15 Comments

दाग दार न करे ........

दाग दार न करे ........

बहुत्  हाय हाय मचेगी रे राम सुख ! तुम देखत रहो, इहाँ - बहुत मारामारी होवेगी। ई ससुरी कुर्सी की खातिर हमका न जाने कौन कौन से पहलवानी करनी पड़ेगी। सरकार,…

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Added by Sushil Sarna on March 31, 2015 at 3:30pm — 8 Comments

तरही ग़ज़ल....-महिमा श्री

1.बरसों के बाद खुद को यूँ पहचान तो गया

 सीने में दफ्न इश्क जुनूं जान तो गया

2.बीती तमाम उम्र तेरी  आरज़ू में बस

 चाहत भरा सफ़र हो ये अरमान तो गया

3.हमको कहाँ खबर थी कि दिल हार जाएगें

  छो़ड़ो चलो कि दिल तेरे कुर्बान तो गया

4.मांगा खुदा से जिसको था सजदों में बारहा

 मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

5. हमसे न हो सके थे जमाने के चोंचले

सब खुश हुए कि दौड़ से नादान तो गया

यह भी…

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Added by MAHIMA SHREE on March 31, 2015 at 2:00pm — 14 Comments

आतंक - पंकज त्रिवेदी

वो ख़ूबसूरती नहीं है उनमें 

काली अंधेरी रात सी चमड़ी

जैसे अमावस की रात मुखरित

काली नदी की तरह बहाव है

उन्माद भी उनमें, आग भी 

सीसम की लकड़ी सी चमक भी

मजबूरी से कसमसाती हुई

मर नहीं पाती उनके भोगने तक 

 

ज़िंदगीभर खूबसूरती खोजती

आँखों में चकाचौंध करने वाला

सफ़ेद घोडा दौड़ता है ताकत से

चने खाता तो मानते, जिस्म खाता है

भाता है केवल रूह छोड़कर सबकुछ

 

जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर…

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Added by Pankaj Trivedi on March 31, 2015 at 10:00am — 16 Comments

फाइनल कट्

अस्थियाँ चटकीं थीं तेरी कलाई की,
मुझसे हाँथ मिलाते हुए.

इसे समझी थी तुम, शायद,
मेरी शरारत, और,
मैं क्या समझा था, मुझे कुछ याद नही.

और अब- जबकि उसके बाद,
तुम आज तक न मिल सकी ,
सोचता हूँ - -

अस्थियों की वो चटक,
क्या एक प्रहेलिका थी
जिसका अर्थ था-
रिश्ते का 'फाइनल कट्'.

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on March 30, 2015 at 11:30pm — 18 Comments

हादसा : लघुकथा : हरि प्रकाश दुबे

“ए बच्ची सुन,यहाँ जेल में किससे मिलने आई है !”

“जी सरकार ,अपने पिताजी से !”

“ पर तू तो भले घर की लगती है, और तेरा बाप जेल में, क्या हुआ था ?”

“साहब एक हादसा हो गया था !”

“कैसा हादसा ,कब ?

“ जी ,सब कहतें हैं मेरे पैदा होने के समय !”

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Hari Prakash Dubey on March 30, 2015 at 9:52pm — 12 Comments

ग़ज़ल -नूर -मुश्किल सवाल ज़ीस्त के आसान हो गए

22 12 12 11 22 12 12

मुश्किल सवाल ज़ीस्त के आसान हो गए,

ता-हश्र हम जो कब्र के मेहमान हो गए.

.


जब से कमाई बंद हुई सब बदल गया

अपनों पे बोझ हो गए सामान हो गए.

.

मेरे ये हर्फ़ बन न सके गीत और ग़ज़ल

उनके तो वेद हो गए कुर’आन हो गए.

.

उसने बना के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 30, 2015 at 1:50pm — 28 Comments

चांदनी रात है //// हिन्दी गजल (एक प्रयास)

   (212 212)

मुतदारिक मुरब्बा सालिम

चांदनी रात है

वाह क्या बात है I

रात का तम गया

अब धवल प्रात है I

मौन वंशी लिए

वह खड़ा तात है I

पुष्प के बाण से

काम का घात है I

राग-अनुराग की

दिव्य बरसात है I

कामना है मधुर

भाव अवदात है I

नन्द का लाडला

नेह  निष्णात  है I

आपगा तीर पर

राधिका स्नात है I

नेह…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 30, 2015 at 1:37pm — 29 Comments

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