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महिला पार्षद (लघुकथा) :कान्ता राॅय

हर जगह चुनावी माहौल, पार्षद के चुनाव में जाने कहाँ-कहाँ से कुकुरमुत्ते की तरह  नई नई पार्टियां दिखाई देने लगी । जिन्होंने कभी घर से बाहर कदम नहीं निकाले वे स्त्रियां भी गले में माला डाले गली गली घूम रही है । जाने कौन कौन से कोटे के तहत चुनाव लड रही है । बात करने गई तो मालूम हुआ बात करने में नेताईन को पसीना भी आता है ।

"जीत जायेंगी तो कैसे संभालेंगी इतनी जिम्मेदारी ।"

पूछने पर हँसते हुए कहती है ,  

"अरे, मै कहाँ यह सब तो हमारे "वो" ही संभालेंगे । बस मुझे आप लोग जीतवा देना ।…

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Added by kanta roy on January 22, 2015 at 8:00am — 21 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : वात्सल्य (गणेश जी बागी)

च्ची को मोटरसाइकिल पर बैठा छोड़ कस्टमर दुकान के अंदर आया और बोला,

"भाई साहब जरा बिटिया के लिए टॉफी और बिस्किट देना"

अभी मैं बिस्किट निकालने के लिए मुड़ा ही था कि बाहर धड़ाम की आवाज के साथ मोटरसाइकिल गिर गयी और बच्ची भी। कुछ लोगो ने बच्ची को उठाया और उसके हाथ व पैर में लगी चोटों को देखने लगे । इधर कस्टमर भी दौड़ कर बाहर भागा और जल्दी से मोटरसाईकिल उठाया तथा टूटी हुई हेड लाइट को देखते ही चटाक की आवाज ।

बच्ची के गाल पर उँगलियों की छाप व आँखों में…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 21, 2015 at 5:56pm — 38 Comments

विकल नारी आत्मा के स्वर -एक फैंटेसी

 घुप अँधेरे में

रात के सन्नाटे में

मै अकेला बढ़ गया

गंगा के तीर

नदी की कल-कल से

बाते करता

पूरब से आता समीर

न धूल न गर्द

वात का आघात बर्फ सा सर्द

मैंने मन से पूछा –

किस प्रेरणा से तू यहाँ आया ?

क्या किसी अज्ञात संकेत ने बुलाया

अँधेरा इतना कि नाव तक न दिखती

कोई करुणा उस वात में विलखती 

मैं लौटने को था

वहां क्या करता

पवन निर्द्वंद

एक उच्छ्वास सा भरता

तभी मै…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2015 at 4:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल

कर नहीं सकता मैं करतब क्या करूँ

हो गई ताज़ा ग़ज़ल अब क्या करुँ

कोई ना पूछे तो लब ख़ामोश हैं

और जो कोई पूछ ले तब क्या करुँ

तेरी ना अहली पे जब उठठे सवाल

मेरे कहने का है मतलब क्या करुँ

फिर जिहालत का अँधेरा छा गया

तू ही बतलादे मेंरे रब क्या करुँ

अपनी मर्ज़ी से तो जी सकता नहीं

मुझको लिखकर दीजिये कब क्या करुँ

आख़िरत में सुर्ख़रू करना मुझे

लेके इस दुनिया का मनसब क्या…

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Added by Samar kabeer on January 21, 2015 at 2:00pm — 23 Comments

इंसानियत (लघुकथा)

"उतारो कपड़े इसके , देखो किस तरफ का है " , भीड़ चिल्ला रही थी और वो थर थर काँप रहा था | शहर में अचानक दंगा भड़क उठा था और वो भाग रहा था कि किसी तरह अपने घर पहुँच जाए | लेकिन जैसे ही एक मोहल्ले में घुसा , सामने से आ रही भीड़ ने उसे घेर लिया |
अभी वो कपड़ा उतारने ही जा रहा था कि पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज आई और भीड़ भाग खड़ी हुई | अब वो पुलिस की जीप में बैठा सोच रहा था कि आज वो तो नंगा होने से बच गया , लेकिन इंसानियत नंगी हो गयी |

.

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on January 21, 2015 at 2:00am — 23 Comments

गजल-लोग अब आपका बोलते है मुझे!

212 212 212 212



आपके नाम से टोकते है मुझे!

लोग अब आपका बोलते है मुझे!!



रोज में इक नजर देखते भी नहीं!

रात में चाँद से पूछते है मुझे!!



जख्म के पेड को फिर हरा कर चले!

किस तराजू में वे तोलते है मुझे!!



मर गया हूँ मगर चैन अब भी नहीं!

आज तक भी कई कोसते है मुझे!!



नाम दिल से मिटा तो दिया पर सनम!

दर्द बेघर हुए घूरते है मुझे!!



लगता है सांस दो चार ही रह गयी!!

जिस नजर से सभी देखते है मुझे!!



पूछ 'राहुल'… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on January 20, 2015 at 9:10pm — 20 Comments

" हँसकर पतवार चलाना रे "

सुख-दुःख तो आते जाते हैं................................... 

सुख-दुःख तो आते जाते हैं,  राही मत घबरा जाना रे !

जीवन की गहरी नदियाँ में, हँसकर पतवार चलाना रे !

 

हमने कुछ देखी रीत यहाँ,..................................

हमने कुछ देखी रीत यहाँ, श्रम से ही सब कुछ मिलता है !

ईमान –धरम के काँटों में, तब फूल मुकद्दर खिलता है !

 

दौलत तो आनी जानी है.................................

दौलत तो आनी जानी है, ना मन इसमें उलझाना रे…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on January 20, 2015 at 6:00pm — 21 Comments

ग़ज़ल: मर्ज़ अपने हैं सभी...

मर्ज़ अपने हैं सभी कोई न बेगाना

मेरे घर का एक कोना है दवाखाना



इक नशा सा है मगर साकी न पैमाना

ज़ख़्म अपने पास हैं और दूर मैखाना



किस बीमारी का पता क्या है, वतन क्या है

पूछना कुछ हो तो मेरे घर पे आ जाना



आह भी है, ऊह भी है, शाम है ग़मगीन

शम्अ जलती दर्द की, मैं मस्त परवाना



कोई काँटा, कोई पत्थर, कोई ख़ंजर है

दर्ददाताओं से ही अपना है याराना



इक ग़ज़ल आयी ठिठुरती, कह गयी मुझसे

जम न जाना, जनवरी में ठंड है, माना ।…

Continue

Added by Krishnasingh Pela on January 20, 2015 at 10:30am — 19 Comments

जन भ्रमित है , मन भ्रमित है -- डॉ o विजय शंकर

जन भ्रमित है ,

मन भ्रमित है ,

जन-इच्छा , बनी नहीं ,

जन-शक्ति , जगी नहीं ,

जनतंत्र है , तंत्र को

जन की ही खबर नहीं ,

कोई फ़िकर नहीं |

तंत्र जन जन से दूर है ,

जन तंत्र से मजबूर है ,

विवश है, लाचार है,

डरा ,सहमा , बीमार है,

कुछ कह नहीं पाता ,

जनादेश देने वाला,

आदेश , किसी को ,

दे नहीं पाता ,

तंत्र व्यस्त है , स्वयं में मस्त है ,

जन उपेक्षित है , हालात से त्रस्त है ,

तंत्र क्या क्या पा रहा है,

जन क्या क्या खो… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 20, 2015 at 9:07am — 23 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - अज़ब बनाया हुआ फरिश्तो (मिथिलेश वामनकर)

121 - 22 / 121 - 22 / 121 - 22 / 121 – 22

 

बड़े ही जोरो से इस ज़हन में अज़ब धमाका हुआ फरिश्तो

फिज़ा में हलचल, हवा में दिल का गुबार छाया हुआ फरिश्तो

 

किसे पड़ी है…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2015 at 2:19am — 36 Comments

ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२ २१२ २२


गम तुम्हारा नहीं होता
तो गुजारा नहीं होता


लूटते प्यासे ये सागर
गर ये खारा नहीं होता


मौत तेरे बुलावे से
अब किनारा नहीं होता


तेरी सौगात है वरना
जख्म प्यारा नहीं होता


है खुदा साथ जिसके वो
बेसहारा नहीं होता


मौलिक व अप्रकाशित


गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on January 19, 2015 at 8:30pm — 17 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण रामानुज

कच्ची डोरी सूत की, बल दे तब मजबूत,

अँखियों से ही प्रेम का, हमको मिले सबूत |

हमको मिले सबूत, ह्रदय में कुसुम खिलावें

बिन श्रद्धा के प्रेम, कभी न ह्रदय को भावे

कह लक्ष्मण कविराय, संत ये कहती सच्चीं 

बिखरे मनके टूट, अगर हो रेशम कच्ची |

(2)

सर्दी भीषण पड़ रही,थर थर काँपे गात,

सर्द हवा चुभती घुसें, कैसे बीते रात | 

कैसे बीते रात, सभी पटरी पर सोते

मन भी रहे अशांत, बिलखतें बच्चें रोते 

यही कष्ट की बात, समाज हुआ बेदर्दी 

रेन…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 19, 2015 at 6:30pm — 14 Comments

सोचता हूँ मैं ,तुम कौन हो ?

सोचता हूँ मैं ,तुम कौन हो ?

 

सखी हो ,ईश्वर हो,

तुम मेरा प्यार हो,

तुम मेरा संसार हो !

 

करुणा हो, दुलार हो,

प्रेम की पुकार हो ,

तुम जीवन-आधार हो !

 

जीवन हो, स्पन्दन हो,

साँसों का गुंजन हो ,

तुम मेरा चिंतन हो !

 

हिम्मत हो जोश हो,

शक्ति का श्रोत हो,

प्रेम से ओत-प्रोत हो !

 

गगन हो , सर्जन हो,

सृष्टी का वरदान हो,

तुम मेरा अभिमान हो…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on January 19, 2015 at 6:27pm — 16 Comments

प्यार का समन्दर हो .....

प्यार का समन्दर हो .....

किसको लिखता

और क्या लिखता

भीड़ थी अपनों की

पर कहीं अपनापन न था

एक दूसरे को देखकर

बस मुस्कुरा भर देना

हाथों से हाथ मिला लेना ही

शायद अपनेपन की सीमा थी

खोखले रिश्ते

बस पल भर के लिए खिल जाते हैं

इन रिश्तों की दिल में

तड़प नहीं होती

यादों का बवण्डर नहीं होता

बस एक खालीपन होता है

न मिलने की चाह होती है

न बिछुड़ने का ग़म होता है

इसलिए ट्रेन छूटने के बाद

मैंने उसे देने के लिए

हाथ में…

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Added by Sushil Sarna on January 19, 2015 at 3:55pm — 17 Comments

रेलवे पुलिस (लघुकथा )

"साहब इस डिब्बे में एक आदमी अचेत पड़ा है,शायद जहरखुरानी  का शिकार है " रेलवे पुलिस का कर्मचारी बोला |

"देख अपने लिए भी कुछ छोड़ा है या सब ले गए ?- अफसर 

"सब ले गए साहब "- कर्मचारी 

"कहता हूँ ,सालों से किसी की चीज मत खाया करो ,छोड़ ये सब चल एक कप  चाय पिला "- अफसर कहते हुए बाहर निकल आते हैं |

"मौलिक व् अप्रकाशित "

Added by maharshi tripathi on January 19, 2015 at 3:00pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
( ग़ज़ल ) कोई ये कहे कैसे , मैं ही था गलत यारों - ( गिरिराज भंडारी )

212  1222     212    1222

क्या हुआ है रातों में, झुरमुटों से पूछो तुम

रो रहीं हवायें क्यूँ , डालियों से पूछो  तुम

 

ग़ायबाना भौंरों  के , फूल  क्यूँ   अधूरे हैं    --  ग़ायबाना - अनुपस्थिति में

सच तुम्हें बतायेंगीं , तितलियों से पूछो तुम

 

क्या हुआ है चंदा को, क्यूँ नज़र नहीं आता

ये चकोर क्या जाने, बदलियों से पूछो तुम

 

कोई ये कहे कैसे , मैं ही था गलत यारों

गोलियाँ चलीं कैसे , घाटियों से पूछो तुम

 

बे…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 19, 2015 at 2:30pm — 23 Comments

प्यार माथे का पसीना पोछ दे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२   २१२२२ २१२

*********************

हो गया  है  सत्य  भी मुँहचौर  क्या

या  दिया हमने ही उसको कौर क्या

****

कालिखें  पगपग  बिछी  हैं निर्धनी

तब  बताओ  भाग्य होगा गौर क्या

****

मार  डालेगा  मनुजता  को  अभी

जाति धर्मो का उठा यह झौर क्या

****

हैं  परेशाँ   आप   भी   मेरी   तरह

धूल पग की हो गयी सिरमौर क्या

****

फूँक  दे  यूँ  शूल  जिनके घाव को

मायने  रखता है  उनको धौर क्या

****

प्यार  माथे  का …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2015 at 11:46am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पत्ता बोलेगा (लघु कथा )

रोज की तरह ऑफिस में घुसने से पहले उसने झुक कर उस भिखारी को कुछ पैसे दिए बहुत जल्दी में था पर्स पाकेट में रखने की बजाय वहीँ गिर गया जो उस भिखारी ने तुरंत लपक लिया| भिखारी ने देखा कुछ पैसों के साथ पर्स में दो तीन तरह के कार्ड थे|

कुछ देर बाद बाहर के ऑफिस से ऊँची आवाज आवाज आई अरे अरे ये भिखारी अन्दर कैसे आ गया?’ “साब बड़े साहब का ये पर्स गिर गया था सो उसे ही देने आया था”|  “अच्छा अच्छा लाओ मैं दे दूँगा लेते हुए बाबू का  चेहरा चमक उठा|

“साहब इस गमले से एक…

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Added by rajesh kumari on January 19, 2015 at 11:08am — 30 Comments

खामोशी ने ऐसी खता की ......

खामोशी ने ऐसी खता की 
बात न की पर उसने जता दी

दिए हैं उसने ज़ख़्म अगर तो 
दवा भी उसने हमें लगा दी

न जाने क्या-क्या था सोच रखा 
मिला जो उसने , शरत लगा दी

मेरी अना थी , गुरूर उसका 
मगर ये रिश्ते में इक वफ़ा थी

खत इक लिखा , फिर ज़वाब उसका 
था काम इतना , उमर लगा दी

बग़ैर उसके , सफ़र कहाँ था 
कभी था चेहरा , कभी सदा थी

अजय कुमार शर्मा
मौलिक प्रकाशित

Added by ajay sharma on January 18, 2015 at 11:08pm — 7 Comments

विकलांगता--

" देखो तो , आज माँ के लिए मैं क्या लाया हूँ "|
" क्या जरुरत थी माताजी को इतनी बढ़िया साड़ी लाने की !" , पत्नी की आवाज में आश्चर्य झलक रहा था |
" माँ की आँखें नहीं हैं लेकिन मेरी तो हैं ना "|

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on January 18, 2015 at 11:05pm — 20 Comments

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