Added by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2014 at 10:36am — 14 Comments
दूर किसी स्टेशन से
शहर के ट्रैफिक को चीरते हुए
फुटपाथ पर उनींदे पड़े बच्चे का स्पर्श लिए
चौथे माले पर बेरोजगारों के कमरे तक
तुम्हारा आना
उन उखड़ी सड़कों से होते हुए
जहाँ की धूल विकास के नारों पर मुस्कुराती है,
बस की पिछली सीढ़ियों से लटकते हुए
बेटिकट पहुँचना मेरे गाँव
और मुझे छज्जे के कोने पर बैठा देख
यक-ब-यक मुस्कुराना
तुम्हारा आना
छिपकली की तरह दीवार पर
आँधियों की तरह…
ContinueAdded by आशीष नैथानी 'सलिल' on October 6, 2014 at 11:34pm — 2 Comments
वहशतों का असर न हो जाये
आदमी जानवर न हो जाये
शाम के धुंधलके डराने लगे हैं,
हमसे ओझल नगर न हो जाये
अपने रिश्तों को अपने तक रखना,
मीडिया को खबर न हो जाये
ग़म का पत्थर मुझे दबा देगा,
आपकी हाँ अगर न हो जाये...
आप झुक जाएंगी जवानी में,
टहनियों सी कमर हो जाये
आपका इन्तजार जहर बना,
“सब्र वहशत असर…
Added by सूबे सिंह सुजान on October 6, 2014 at 9:00pm — 2 Comments
"क्या बात है, आपने कुर्बानी क्यों नहीं दी इस बार ? "
"दरअसल क़ुरआन मजीद फिर से पढ़ ली थी मैंने |"
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(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by विनय कुमार on October 6, 2014 at 9:00pm — 15 Comments
212 212 212 212
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इश्क़ मैंने किया दिलज़ला हो गया
उम्र भर के लिये मसख़रा हो गया
कुछ ग़लत फहमियाँ इस क़दर बढ़ गयीं
एक तू क्या मिला मैं ख़ुदा हो गया
चाँद भी सो गया रात तन्हा कटी
लुट गयी महफ़िलें सब ये क्या हो गया
एक लौ दिख रही थी कहीं दूर फिर
देख़ते देख़ते रतज़गा हो गया
दर्द बढ़ता गया आँख बहती गयीं
आँसुओं का समन्दर ख़ड़ा हो गया
आसमाँ फट पडा जब ये उसने कहा
हाथ छोड़ो मेरा मैं बड़ा हो…
Added by umesh katara on October 6, 2014 at 5:40pm — 3 Comments
लगे हैं जोडने में फिर भी अक्सर टूट जाते हैं,
यहां रिश्ते निभाने में पसीने छूट जाते हैं,
भले रंगीन हैं इनमें हवाएं कैद हों लेकिन
ये गुब्बारे जरा सी देर में ही फूट जाते हैं।।
आपका हाथ थामकर मैं चल ही जाऊंगा,
अगर मना करोगे तो मचल ही जाऊंगा,
मैंने माना कि रेस कातिलों से होनी है,
मुझे यकीन है बचकर निकल ही जाऊंगा।।
आजकल ये मन मेरा जाने कहां खोने लगा
जब कभी भी गम लिखा तो ये हृदय रोने लगा,
हाथ में थामी कलम तो खुद—ब—खुद चलने…
Added by atul kushwah on October 6, 2014 at 5:30pm — 1 Comment
अपने जज्बात दिखाओ तो क्या बात हो
खुल के हर बात बताओ तो क्या बात हो
सभी ने दिन में हैं तारे ही दिखाये मुझको
तुम कभी चाँद दिखाओ तो क्या बात हो
वो अकेला ही चल पड़ा राहे-सच्चाई
दो कदम साथ मिलाओ तो क्या बात हो
मेरे…
ContinueAdded by Pawan Kumar on October 6, 2014 at 5:30pm — 4 Comments
जैऽऽ…….दुर्गामइया की जैऽऽऽ……
नाव के एकबारगी हिचकोले खाने के साथ ही दुर्गा एवं संलग्न प्रतिमाओं का विसर्जन हो गया. माता, माता के शृंगार, शेर के अयाल, महिष के सींग, असुर की फैली भुजायें, सबकुछ एक साथ जल में समाने लगे.
मूर्ति के साथ साथ मनुआ भी पानी में कूदा. उसे न तो दानव का कोई डर था, न उसे माता के आशीर्वाद चाहिये थे.
“अबे.. ये मेरी वाली है..”, कहता हुआ वो डूबती हुई प्रतिमाओं की ओर तैर चला.
उसे उनके पास बाकियों से पहले पहुँचना था, ताकि आने वाली ठंड में…
ContinueAdded by Shubhranshu Pandey on October 6, 2014 at 3:30pm — 17 Comments
सहनशक्ति
उदास मन से ही सही,
ले चलो मुझे अपने
उस नरक के अंदर
जिसमे तुम सदियों से
रह रही हो ,
सब दुःख तुम
स्वयं सह रही हो.
एक बार मैं भी तो जानू
स्त्रियों को इतनी
सहनशक्ति
कहाँ से मिलती है?
विजय प्रकाश शर्मा
अप्रकाशित व मौलिक
Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 6, 2014 at 11:50am — 10 Comments
"वैभव छन्द" की रचना- एक भगण, एक सगण तथा लघु गुरू अर्थात्- 211, 112, 12 के योग से की जाती है।
श्वेत बसन शारदे!
नित्य नमन राम को।
प्रेम रमन श्याम को।।
सूर्य प्रखर तेज है।
कंट असर सेज है।।1
रात दिन विचारता।
आर्त जन पुकारता।।
कष्ट तम हरो प्रभू।
ज्योति बल तुम्ही विभू।।2
विश्व सकल आप से।
सृ-िष्ट विकल ताप से।।
पाप-पतित तारना।
सत्य शिवम कामना।।3
जीव जड़…
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 6, 2014 at 11:35am — 6 Comments
प्रेम-कर्तव्य और सदाबहार
संकर-जाती के दो सदाबहार
एक कर्तव्य-बोध दूसरा प्रतीक-प्यार
रोप थे इस बार/देशी के मुरझाने के बाद
उम्मीद थी दोनों बढ़ेंगे-खिलेंगे
मेरे जीवन में नव-रंग भरेंगे
लाएँगे फिर मधुमास
पूरा था विश्वास/मन में था उल्लास |
मगर प्रेम-प्रतीक कुम्हला गया है
उसके अस्तित्व पे संकट आ गया है
बरसात के पानी ने उसकी जड़े गला दी
उसके होने कि प्रासंगिकता घटा दी हैं |
यूँ तो वो शुरु से कमज़ोर था
और यदा-कदा…
ContinueAdded by somesh kumar on October 6, 2014 at 9:30am — No Comments
मां भारती की शान को, अस्मिता स्वाभिमान को,
अक्षुण सदा रखते, सिपाही कलम के ।
सीमा पर छाती तान, हथेली में रखे प्राण,
चैकस हो सदा डटे, प्रहरी वतन के ।
चांद पग धर कर, माॅस यान भेज कर,
जय हिन्द गान लिखे, विज्ञानी वतन के ।
खेल के मैदान पर, राष्ट्र ध्वज धर कर,
लहराये नभ पर, खिलाड़ी वतन के ।
हाथ में कुदाल लिये, श्रम-स्वेद भाल लिये,
श्रम के गीत गा रहे, श्रमिक वतन के…
Added by रमेश कुमार चौहान on October 5, 2014 at 2:00pm — 2 Comments
आँक दूँ ललाट पर
मैं चुम्बनों के दीप, आ..
रात भर विभोर तू
दियालिया उजास दे..
संयमी बना रहा
ये मौन भी विचित्र है
शब्द-शब्द पी
करे निनाद-ब्रह्म का वरण..…
Added by Saurabh Pandey on October 5, 2014 at 11:30am — 34 Comments
“नमस्कार बाबू जी..! मुझे इस खसरे की नकल जल्द से जल्द निकलवाना है, यह रहा मेरा आवेदन” रमेश ने सरकारी दफ्तर में फाइलों के बीच सिर दिए बाबू से कहा
“ अरे भाईसाहब..! जिसे देखो उसे जल्दी है. यहाँ इतना काम फैला पड़ा है और स्टाफ भी कम है, अपना आवेदन दे जाइए और आप १५ दिनों के बाद आइयेगा. आपको नकल मिल जायेगी. हाँ..! अगर जरुरी काम हो ,जल्दी चाहिए तो थोड़ा सेवा-शुल्क कर दीजिये. कल ले जाना अपनी नकल” बाबू ने रमेश का आवेदन लेकर फ़ाइल कवर में रखते हुए कहा
“ अरे बाबू जी..! कैसी…
ContinueAdded by जितेन्द्र पस्टारिया on October 4, 2014 at 11:59am — 14 Comments
२१२२ २१२२ २१२२
ढूँढती इक मौज तूफां में किनारा
क्यूँ समझता ही नहीं सागर ईशारा
तिश्नगी उसको कहाँ तक ले गई है
अक्स अपना झील में उसने उतारा
फ़र्क क्या पड़ता चमकती चाँदनी को
छटपटाता फिर कहीं टूटा सितारा
फट गया जो पैरहन तो ग़म नहीं है
चाक दिल सिलता नहीं देखो दुबारा
डोलती किश्ती बढ़ाती हाथ अपना
उस तरफ़ तुम मोड़ लो अपना शिकारा
खोल दो गर तुम लटकती उस पतंग को
लोग…
ContinueAdded by rajesh kumari on October 4, 2014 at 10:30am — 27 Comments
गैर कोई है छिपा सा देखता हूँ
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2122 2122 2122
जब अंधेरों में उजाला देखता हूँ
सच में रोशन भी हुआ क्या, देखता हूँ
मैंने कल काँटा चुभा तो, फूल माना
कुछ असर उसपे हुआ क्या, देखता हूँ
लोग इंसानों की भाषा बोल लें पर
गैर कोई है छिपा सा देखता हूँ
अश्क़ कोई देख लेता है निहानी
तब ख़ुदाई, मैं ख़ुदाया देखता हूँ
ख्वाब सारे थे…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on October 3, 2014 at 8:30pm — 9 Comments
उनका अभिनंदन है जो कुछ कर गुजरते हैं ।
भाग्य की प्राण-प्रतिष्ठा के हवन में भी
कर्म ही यजमान बनकर होम करते हैं ।
मेरे शब्दों को अभी स्वर की तमन्ना है,
फड़फड़ाते पंख को आकाश बनना है,
वेदना के गर्भ में संकल्प पलता है
हर अमा को चीर कर सूरज निकलता है
आश्वासन आस से परिहास मत करना
आँसुओं से अन्ततः अंगार झरते हैं ।
चेतना की बाँसुरी को स्नेह की सरगम,
भावना को दे नये उद्गम, नये संगम,
ओस बन अन्तःकरण के कुसुम को धो दे
बीज…
Added by Sulabh Agnihotri on October 2, 2014 at 8:30pm — 12 Comments
"कुछ पुन्य कर्म भी कर लिया करो भाग्यवान, सोसायटी की सारी औरतें कन्या जिमाती है, और तू है कि कोई धर्म कर्म है ही नहीं|"
"देखिये जी लोग क्या कहते है, करते है इससे हमसे कोई मतलब ......"
बात को बीच में काटते हुए रमेश बोले- "हाँ हाँ मालुम है तू तो दूसरे ही लोक से आई है, पर मेरे कहने पर ही सही कर लिया कर|"
नवमी पर दरवाजे की घंटी बजी- -सामने छोटे बच्चों की भीड़ देख सोचा रख ही लूँ…
Added by savitamishra on October 2, 2014 at 7:00pm — 6 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on October 2, 2014 at 1:43pm — 11 Comments
नवरात्रि के जश्न में कुछ सुलगते प्रश्न - डॉ हृदेश चौधरी
हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार कुंवारी कन्याएँ माता के समान ही पवित्र और पूजनीय होती है साक्षात देवी माँ का स्वरूप मानी जाती है इसलिए “ या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता” भाव के साथ अष्टमी और नवमी के दिन कन्या (कंजिका) पूजन किया जाता है। वेदिक काल के पूर्व से ही कन्या पूजन का विधान रहा है और धर्मशास्त्रों में भी इस बात की स्वीकारोक्ति…
ContinueAdded by DR. HIRDESH CHAUDHARY on October 2, 2014 at 1:30pm — 4 Comments
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