For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,163)

एक विचार---

एक विचार---
तुम महामंत्र पावन सुधा सी,मैं गरल का महानिंदय प्याला
मरते प्राणों की संजीवनी तुम, रूप पल-पल तुम्हारा निराला ॥ [१]
माँ तेरे दिब्य दर्शन में मैने, चाँद तारों का दर्शन किया है,|
तेरे नयनों के काजल ने जग में,रात का रूप धारण किया है ||[२]
मैने हर रूप की चाँदनी में, तेरी करुणा की रातें गिनी है|
मैने हर राग की रागिनी को,शक्ति के गीत गाते सुनी है||[३]
------------k. उमा

Added by uma katiyar on September 27, 2014 at 2:29pm — 2 Comments

ग़ज़ल

खेतों के दरके सीने पर बादल बनकर आ रामा

होठों के तपते मरुथल पर छागल बनकर आ रामा

 

बोली लगकर बिकता है अब आशीषों का रेशम भी

निर्वसना है श्रध्दा मेरी मलमल बनकर आ रामा

 

भक्ति युगों से दीवानी है राधा मीरा के जैसी

मन से मन मिल जाये अपना पागल बनकर आ रामा

 

दीप बुझे हैं आशाओं के रात घनेरी है गम की

प्राची से उजली किरनों का आँचल बनकर आ रामा

 

छप्पन भोगों के लालच में क्यूं पत्थर बन बैठा है

भूखों की रीती थाली में…

Continue

Added by khursheed khairadi on September 27, 2014 at 12:30pm — 9 Comments

तेरे बिन ..........

तेरे बिन अपना हाल ....सखी री तुझे क्या बतलाऊं

गुल बिन ज्यों गुलदस्ता है

भूले को ज्यों इक रस्ता है

कॉपी बिन ज्यों इक बस्ता है

और दाल बिना ज्यों खस्ता है

वसंत...बिना इक साल ......सखी री तुझे क्या बतलाऊं



माँ बिन .. जैसे लोरी है

भ्रात बिना वो डोरी ..सखी

चोर बिना ..ज्यों चोरी है

पनघट है बिन गोरी..सखी

राधा बिन ज्यों गोपाल.......सखी री तुझे क्या बतलाऊं



ज्यों अंगना है बिन नोनी के         

ब्रिटेन   है..... बिन टोनी…

Continue

Added by anand murthy on September 27, 2014 at 12:00pm — 2 Comments

गज़ल//कल्पना रामानी

फूल हमेशा बगिया में ही, प्यारे लगते।

नीले अंबर में ज्यों चाँद-सितारे लगते।

 

बिन फूलों के फुलवारी है एक बाँझ सी,

भरी गोद में  माँ के राजदुलारे लगते।

 

हर आँगन में हरा-भरा यदि गुलशन होता,

महके-महके, गलियाँ औ’ चौबारे लगते।

 

दिन बिखराता रंग, रैन ले आती खुशबू,

ओस कणों के संग सुखद भिनसारे लगते।

 

फूल, तितलियाँ, भँवरे, झूले, नन्हें बालक,

मन-भावन ये सारे, नूर-नज़ारे लगते।

 

मिल बैठें, बतियाएँ…

Continue

Added by कल्पना रामानी on September 27, 2014 at 10:51am — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मजदूर

ये गाथा मजदूर की, जिसके नाना रूप।

पत्थर तोड़े हाथ से, बारिश हो या धूप।।

 

कड़ी धूप में पिस रही, रोटी की ले आस।

पानी की दो घूँट से, बुझा रही है प्यास।।

 

सर पर ईंटें पीठ पर, लादे अपना लाल।

मानवता कुछ ढूँढती, लेकर कई सवाल।।

 

वे भी जन इस देश के, करते हैं निर्माण।

पर खुद जीने के लिये, झोंके अपने प्राण।।

 

उनको हो सबकी तरह, जीने का अधिकार।

उनके कर्मठ हाथ हैं, विकास का आधार

-मौलिक व…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on September 27, 2014 at 8:04am — 10 Comments

तेरी किताब का तो दिल धड़क रहा होगा (ग़ज़ल)

1212-1122-1212-22    

तमाम उम्र जो ज़ेब-ए-पलक रहा होगा

नज़र से गिर के भी कितना चमक रहा होगा

सफ़र अँधेरों का है, फिर भी इक दिलासा है

कोई चराग़ मेरी राह तक रहा होगा

लिखा है शेर मेरा दरमियानी सफ़हे पर

तेरी किताब का तो दिल धड़क रहा होगा

गुलाबी ख़ुशबुओं की बूँदें बादलों की नहीं

वो छत से गीला दुपट्टा लटक रहा होगा

परिंदे शाम को लौटे तो मुझको याद आया

हमारा साथ भी कुछ शाम तक रहा…

Continue

Added by Zubair Ali 'Tabish' on September 27, 2014 at 12:00am — 7 Comments

मानदंड

 

 

रेखागणित क्या है ?

मै नहीं जानता

रैखिक ज्ञान का पारावार है

मान लेता हूँ

मेरे लिए रेखा मात्र रेखा है

सरल या विरल

सरल यानि मिलन से दूर

मिलन के लिए सरलता नहीं

तरलता चाहिए

अकड़ नहीं विनम्रता चाहिए

इसीलिये सरल रेखा

मुड़ कर ही मिल पाती है

वह भी स्वयं से

उसका पोर-पोर ही है मिलन बिंदु

जिसका चरम रूप है वृत्त

वृत्त क्या ? महज एक शून्य

शून्य अर्थात शून्य

स्वयं से मिलन…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 26, 2014 at 2:57pm — 14 Comments

बड़ी क्षणिकायें -1--एक प्रयोग - डा० विजय शंकर

इतना तो

सब जानते हैं कि

एक रेखा को बिना काटे

छोटा करने का आसान तरीका यह है

कि उसके पास उससे बड़ी एक रेखा खींच दें ॥

आप बैठे बैठे बड़े बने रहे इसका आसान

तरीका यह है कि आप अपने पास

हमेशा अपने से छोटे लोग रखें ,

गलती से भी किसी बड़े

के सामने न आयें ॥

* * * * * * * * * * *

जीवन तो चलता है ,

करुणा , प्रेम ,दया से ,

पर हमनें उन्हें बनाया है ,

पासंगे बट्खरे जीवन के ,

सब नाप-तौल के चलाना है,

कहाँ कितनी दया दिखानी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 26, 2014 at 1:00pm — 19 Comments

है भुजंगो से भरा जग मानता हूँ - (गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122

************************

जिंदगी  का  नाम चलना, चल मुसाफिर

जैसे नदिया चल रही अविरल मुसाफिर /1

***

दे  न  पायें  शूल  पथ  के  अश्रु  तुझको

जब है चलना, मुस्कुराकर चल मुसाफिर /2

**

फिक्र मत कर खोज लेंगे पाँव खुद ही

हर कठिन होते सफर का हल मुसाफिर /3

**

मानता  हूँ  आचरण  हो  यूँ  सरल पर

राह में मुश्किल खड़ी तो, छल मुसाफिर /4

**

रात  का  आँचल  जो फैला है गगन तक

इस तमस में दीप बनकर जल मुसाफिर /5

**

है …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 26, 2014 at 12:30pm — 12 Comments

वक्त

ना रहे जो वक्त तो भी रहेगा वक्त ही

वक्त बेज़ुबां है तो भी कहेगा वक्त ही |

 

यूं तो गुज़र जाता है जिंदगी की तरह

जिंदगी के बाद तो भी रहेगा वक्त ही |

 

मैं उसे थामे चलूँ कितनी भी दूर ही

हाथ मेरा थाम तो भी चलेगा वक्त ही |

 

मेरी हर शै बढे या घटे है हर पल

जितना भी घटे तो भी बढेगा वक्त ही |

 

जो फैला है मार-काट साथ जिंदगी के

मारो किसी को तो भी कटेगा वक्त ही |

 

 (मौलिक और…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 25, 2014 at 9:30pm — 9 Comments

दर्द में वो मुस्कुराया है।।

दर्द में वो मुस्कुराया है।
अज़ब मंज़र नज़र आया है।।

आज भी अकेला नहीं है वो।
वो है और उसका साया है।।

रोते-रोते हँस देता है।
ऐसा उसने क्या पाया है।।

वो मेरी ना हो पायेगी।
खुद को उसने समझाया है।।

उसका अपना कोई ना था।
लेकिन खुद को तो लाया है।।
***********************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 25, 2014 at 7:51pm — 8 Comments

ग़ज़ल - मेरी तक़दीर लिख रहा है वो

2122       1212       22

जबसे मुझसे बिछड़ गया है वो

सबमें मुझको ही ढूढ़ता है वो

मैंने मांगा था उससे हक़ अपना

बस इसी बात पर खफ़ा है वो

मेरी  तदवीर को किनारे रख

मेरी तक़दीर लिख रहा है वो

पत्थरों के शहर में जिंदा है

लोग कहते हैं आइना है वो

उसकी वो ख़ामोशी बताती है

मेरे दुश्मन से जा मिला है वो

 

संजू शब्दिता

मौलिक व अप्रकाशित

Added by sanju shabdita on September 25, 2014 at 5:00pm — 26 Comments

पछतावा (लघुकथा)

"भईया,  तुम ऐसा क्यों करते हो, अब तो मेरी सहेलियाँ भी कहती हैं कि तेरा भाई और उसके दोस्त बड़े गन्दे हैं, रास्ते में भद्दे-भद्दे कमेन्ट्स करते हैं"

सन्ध्या अपने भाई से नाराज होते हुए बोली! रोहन उसकी बात को अनसुना करके चला गया। शाम होते ही फिर वह और उसके दोस्त बस स्टाफ की तरफ निकलें, वहां  एक लड़की बस का इन्तजार कर रही थी, चेहरा दुपट्टे से ढका था, उसे देखते ही रोहन कमेन्ट्स करते हुए उसका दुपट्टा खींच लिया, देखा तो अवाक रह गया,…

Continue

Added by Pawan Kumar on September 25, 2014 at 12:00pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेरा ईमान है हिंदी (ग़ज़ल 'राज')

1222  1222

वतन की जान है हिंदी

उपार्जित मान है हिंदी

 

धरा जो गुनगुनाती है

मुक़द्दस गान है हिंदी

 

हिमालय फ़क्र करता है

अजल से शान है हिंदी

 

तेरे वर्के तगाफ़ुल पे

नया  फ़रमान है हिंदी

 

इबादत पे सदाक़त पे

सदा कुर्बान है हिंदी

 

मेरा मजहब मेरी दौलत

मेरा ईमान है हिंदी

हमारी पाक़ संस्कृति में

बसा सम्मान है हिंदी  

------------------

(मौलिक एवं…

Continue

Added by rajesh kumari on September 25, 2014 at 11:03am — 30 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हर सम्त आस पास गुलिस्तान बन गये- ग़ज़ल

221 2121 1221 212

हर सम्त आस पास गुलिस्तान बन गये

ये माहो शम्स गुल मेरी पहचान बन गये

 

जो लोग शह्र फूँक के नादान बन गये

बदकिस्मती से आज निगहबान  बन गये

 

आँखों में धूल झोंक के लोगों की देख लो

मतलब परस्त मुल्क के सुल्तान बन गये

 

चमके तो मेह्र बन गये जो आसमान की

वो आँखों में उतरते ही अरमान बन गये

 

जिनकी ज़बाँ उगलती रही ज़ह्र अब तलक

कैसे ये मान लूँ कि वो इंसान बन गये

 

सूरत बदल गई…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on September 25, 2014 at 7:54am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - तीर के अपने नियम हैं जिस्म के अपने नियम ( गिरिराज भंडारी )

 तीर के अपने नियम  हैं जिस्म के अपने नियम

***********************************************

2122       2122        2122     212

तीर के अपने नियम  हैं जिस्म के अपने नियम

एक  का जो फर्ज़  ठहरा  दूसरे  का  है सितम

 

कुछ हक़ीक़त आपकी भी सख़्त थी पत्थर  नुमा

और कुछ  मज़बूतियों के थे हमे भी  कुछ भरम

 

मंजिले  मक़्सूद  है, खालिश  मुहब्बत  इसलिए

बारहा  लेते   रहेंगे  मर के  सारे  फिर  जनम

 

किस क़दर अपनी मुहब्बत मुश्किलों मे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 25, 2014 at 7:00am — 30 Comments

दोहे

लिखो किसी भी शिल्प में, मोटा लिखो महीन । 
कलम चले पर इस  तरह, पीड़ित  करे यकीन ॥01॥  
  
रिश्तों   के   पर्वत  किए,  हरियाली   से  हीन । 
चाह   रहा   शीतल  हवा,  कैसा   मूरख  दीन ॥02॥  
 
बंधन   तो  था  जनम  का, हुआ बीच में भंग । 
कैसे   चलता   दूर   तक, धुंध - धूप का  संग ॥03॥   
 
पश्चिम  की आँधी  चली,  भूले  पनघट  गीत । 
गमलों…
Continue

Added by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on September 24, 2014 at 9:00pm — 12 Comments

कल

यदि मैं आज हूँ

आज के बाद भी हूँ मैं

तो वह अवश्‍य होगा।

यदि जीवन की गूँज

जीने की अभिलाषा

लय भरा संगीत है, तो

वह अवश्‍य होगा।

यदि उसमें नदी का

कलकल नाद है

पंखियों का कलरव है

कोयल का कलघोष है, तो

वह अवश्‍य होगा।

यदि हम उत्‍तराधिकारी हैं

हमसे वंशावली है

हम योग का एक अंश हैं, तो

वह अवश्‍य होगा।

ब्रह्माण्‍ड की धधकती आग से

निकल कर शब्‍द ब्रह्म का

निनाद यदि है, तो

वह…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 24, 2014 at 8:24pm — 1 Comment

आपकी ये खामुशी चुभती है नश्तर सी हमें

2122  2122   2122   २१२ 

 

आज ये महफ़िल सजाकर आप क्यूँ गुम हो गये

हमको महफ़िल में बुलाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

पोखरों को पार करना भी  न सीखा है अभी

सामने सागर दिखाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

लहरों से डरकर खड़े थे हम किनारों पर यहाँ

हौसला दिल में जगाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

तीरगी के साथ में तूफ़ान भी कितने यहाँ

इक दफा दीपक जलाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

आपकी ये खामुशी चुभती है नश्तर सी हमें

हमको यूं…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 24, 2014 at 3:01pm — 15 Comments

नवगीत:चलता सूरज रहा अकेला

नवगीत..चलता सूरज रहा अकेला

घूमा अम्बर मिला न मेला,

चलता सूरज रहा अकेला.

--

गुरु मंगल सब चाँद सितारे,

अंधियारे में जलते सारे.

बृथा भटकता उनपर क्यों मन,

होगा उनका अपना जीवन.

कोई साथ नहीं देता जब,

निकला है दिनकर अलबेला.

..चलता सूरज रहा अकेला.

--

पीपल के थर्राते पात,

छुईमुई के सकुचाते गात.

ऊषा की ज्यो छाती लाली,

पुलकित हो जाती हरियाली.

सभी चाहते भोजन पानी,

जल थल पर है मचा…

Continue

Added by harivallabh sharma on September 24, 2014 at 1:19pm — 8 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्र को साकार करती बहुत सुंदर चौपाइयाँ हुई हैं। बहुत बहुत…"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, यह संशोधित छंद और भी उत्तम हुए हैं। यह पूर्ण रूप से चित्र को संतुलित कर रहे हैं।…"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्र पर सुंदर छंद हुए हैं । हार्दिक बधाई।"
1 hour ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद ( संशोधित) +++++++++++++++ स्थान एक तीरथ लगता है। जमघट संतों का रहता है॥ कितनी सुंदर है…"
2 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  आपका कहन सही है। इतनी सुंदर  गोरी चिट्टी  कन्या पर ध्यान ही नहीं…"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई ****** करे मरम्मत चप्पल- जूते । चलता जीवन इसके बूते।।दोजून कभी खाता काके। और कभी हो जाते…"
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"   आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, सादर नमस्कार, प्रदत्त चित्र पर आपने सुन्दर…"
17 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई * बन्द शटर हैं  खुला न ताला।। दृश्य सुबह का दिखे निराला।।   रूप  मनोहर …"
23 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"शुभ प्रभात,  आदरणीय! चौपाई छंद:  भेदभाव सच सदा न होता  वर्ग- भेद कभी सच न…"
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद +++++++++ करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥ कटे फटे सब को सीता है। सदा…"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
yesterday
Admin posted discussions
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service