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पांच दोहे - लक्ष्मण लडीवाला

झूठ सत्य की ओट रख, दे दूजे को चोट,

कडुवापन आनंद दे, जब हो मन में खोट |

 

मीठा लगता झूठ है, सनी चासनी बात 

पोल खुले से पूर्व ही, दे जाता आघात |

 

जैसी जिसकी भावना, वैसा बने स्वभाव 

मन में जैसी कामना, मुखरित होते भाव |

 

जितनी सात्विक भावना, तन में  वैसी लोच

पारदर्शी भाव बिना, विकसित हो ना सोच |

 

हिंसा की ही सोच में, प्रतिहिंसा के भाव,

सत्य अहिंसा भाव का, सात्विक पड़े प्रभाव |

(मौलिक व्…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 20, 2014 at 9:30am — 8 Comments

कह मुकरियाँ - सरिता भाटिया

प्रथम प्रयास कह मुकरियाँ पर आप सब सुधीजनों के मार्गदर्शन की अभिलाषी हूँ ...

1.

लीला सखिओं संग रचाता

मन का हर कोना महकाता

भागे आगे पीछे दैया

क्यों सखि साजन ? ना कन्हैया

2.

जिसको हमने स्वयं बनाया

मान और सम्मान दिलाया

उसको हमारी ही दरकार

क्यों सखि साजन ? नहीं सरकार

3.

बच्चे बूढ़े सबको भाए

नाच दिखाए खूब हँसाए

सबके दिल का बना विजेता

क्यों सखि साजन ? ना अभिनेता

4.

उसके बिना चैन ना आए

पाकर उसको मन…

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Added by Sarita Bhatia on February 20, 2014 at 9:30am — 7 Comments

कह मुकरियाँ -- शशि पुरवार

इस विधा में प्रथम प्रयास है -- ( १- ४ )

सुबह सवेरे रोज जगाये

नयी ताजगी लेकर आये

दिन ढलते, ढलता रंग रूप

क्या सखि साजन ?

नहीं सखि धूप

साथ तुम्हारा सबसे प्यारा

दिल चाहे फिर मिलू दुबारा

हर पल बूझू , यही पहेली

क्या सखि साजन ?

नहीं सहेली

रोज ,रात -दिन चलती जाती

रुक गयी तो मुझे डराती

झटपट चलती है ,खड़ी - खड़ी

क्या सखि साजन ?

ना काल घडी

धन की गागर छलकी…

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Added by shashi purwar on February 20, 2014 at 9:00am — 15 Comments

तसव्वुरात ... (विजय निकोर)

तसव्वुरात

रुँधा हुआ अब अजनबी-सा रिश्ता कि जैसे

फ़कीर की पुरानी मटमैली चादर में

जगह-जगह पर सूराख ...

 

हमारी कल ही की करी हुई बातें

आज -- चिटके हुए गिलास

के बिखरे हुए टुकड़ों-सी ...

 

कुछ भी तो नहीं रहा बाकी

ठहराने के लिए

पार्क के बैंच को अब

अपना बनाने के लिए

 

फिर क्यूँ फ़कत सुनते ही नाम

मैं तुम्हारा ... तुम मेरा ...

कि जैसे सीनों पर हमारे किसी ने

मार…

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Added by vijay nikore on February 19, 2014 at 11:30am — 20 Comments

कह मुकरियाँ-11से 16 (कल्पना रामानी)

(11)

थक जाऊँ तो पास बुलाए।

नर्म छुअन से तन सहलाए।

मिले सुखद, अहसास सलोना।

क्या सखि साजन?

नहीं, बिछौना!

12)…

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Added by कल्पना रामानी on February 19, 2014 at 10:30am — 16 Comments

है करम उसको ये, शायर बना दिया मुझको..

वो मुझे याद है, उसने भुला दिया मुझको

आज की रात फिर उसने रुला दिया मुझको,

ये बताओ कि आजकल हो किसके साथ सनम

किसी को ना मिले, जैसा सिला दिया मुझको।

रुह तो मर गई लेकिन, शरीर जिंदा है

जहर वो कौन सा तुमने पिला दिया मुझको।

हमने उस शख्स को बरसों से नहीं देखा था

उसी की याद ने उससे मिला दिया मुझको।

वो तो कहती थी, उसके दिल का शहंशाह है अतुल

है करम उसको ये, शायर बना दिया मुझको।।

                               …

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Added by atul kushwah on February 18, 2014 at 10:30pm — 3 Comments

जो छत हो आसमां सारा यहाँ ऐसा मकाँ इक हो [गजल]

दिलों में रंजिशें ना हों यहाँ ऐसा जहाँ इक हो

जो छत हो आसमां सारा यहाँ ऐसा मकाँ इक हो /



नया हर जो सवेरा हो मिले सुख शांति हर घर में

मिटे ना वक्त के हाथों जो ऐसा आशियाँ इक हो /



बुराई लोभ भ्रष्टाचार धोखा दूर हो कोसों

हो केवल प्यार हर घर में बसेरा अब वहाँ इक हो /



मिले केवल सुकूं अब और हो मुस्कान होठों पर

घुली मिश्री हो बातों में यहाँ ऐसी जुबाँ इक हो /



निशानी अब हसीं यादों की लम्हा लम्हा मुस्काये

हों चर्चे कुल जहां…

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Added by Sarita Bhatia on February 18, 2014 at 3:44pm — 19 Comments

यक्ष प्रश्न !! ( लघु कथा)

यक्ष प्रश्न 

सास बहू के बिगड़ते सम्बन्धों पर बहुत ही प्रभावशाली जोशपूर्ण भाषण देने के बाद अब राधा देवी मीडिया वालों के सवालों के उत्तर दे रही थी. 

"मैडम ! लोग बेटी और बहू में अंतर क्यों करते हैं?"

"यह लोगों की नादानी ही नहीं बल्कि घोर पाप है। जो लड़की अपना मायका छोड़ कर ससुराल घर आई हो उसको तो सोने मे तौल कर रखना चाहिए।"

"लेकिन मैडम, हम ने सुना है कि आपकी अपनी बहू से नहीं बनती और आपने उसे घर से निकाल दिया है और बेटे को भी नहीं मिलने देती है ।…

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Added by annapurna bajpai on February 18, 2014 at 2:00pm — 15 Comments

पाँच दोहे -- ( अन्नपूर्णा बाजपेई )

दोहे

1)  नारी है सुता ,दारा  धारे  रूप अनेक ।

     बंधन बांधे नेह का  धीरज धर्म विवेक ॥

2)  ये नारी है सृजक नहि अबला कमजोर ।

     रोम रोम ममता भरी सह पीड़ा घनघोर ॥

3)  महल दुमहले बन रहे वसुधा हरी न शेष ।

    जीव जन्तु भटके सभी  ऐसे महल विशेष ॥

4)  माया माया कर रहा बढ़े चौगुना मोह ।

    पानी पत्थर पूजि के रहा मुक्ति को टोह॥

5)  सन्मार्ग दो प्रभु दिखा,  दो ऐसा वरदान । 

    सब मिल शुचिता…

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Added by annapurna bajpai on February 18, 2014 at 1:00pm — 15 Comments

ग़ज़ल – यही वो हुक्मरां हैं जो कभी बस्तर नहीं आते !

ग़ज़ल –

मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

१२२२    १२२२    १२२२    १२२२

 

है गांवों में भी विद्यालय जहां अक्सर नहीं आते |

कभी बच्चे नहीं आते कभी टीचर नहीं आते |

 …

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Added by Abhinav Arun on February 18, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

अब हरियल नहीं देगी अंडे ..

इस कविता के पूर्व थोड़ी सी प्रस्तावना मैं आवश्यक समझता हूँ. झारखंड के चाईबासा में सारंडा का जंगल एशिया का सबसे बड़ा साल (सखुआ)  का जंगल है , बहुत घना . यहाँ पलाश के वृक्ष से जब पुष्प धरती पर गिरते हैं तो पूरी धरती सुन्दर लाल कालीन सी लगती है . इस सारंडा में लौह अयस्क का बहुत बड़ा भण्डार है , जिसका दोहन येन केन प्राकारेण करने की चेष्टा की जा रही है .. इसी सन्दर्भ में है मेरी यह कविता :

सारंडा के घने जंगलों में

जहाँ सूरज भी आता है

शरमाते हुए,

सखुआ वृक्ष के  घने…

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Added by Neeraj Neer on February 18, 2014 at 9:21am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तीर शब्दों के चला ही दे

1222/1222/1222/1222

अरे नादान ये मय है जिगर को ये जला ही दे

मेरे इस दर्दे दिल के वास्ते कोई दवा ही दे

 

कभी जब खींच ले जाये समंदर साथ अपने तो

गुज़रती मौज कश्ती को किनारे पर लगा ही दे

 

तेरी आँखों में मेरे दर्द की तासीर है शायद       (तासीर= असर)

उदासी भी तेरी इस बात की पैहम गवाही दे      (पैहम= लगातार)

 

इरादों को किया मजबूत तेरे पत्थरों ने ही

तेरा हर वार मेरा हौसला आखिर बढ़ा ही दे

 

बचूँगा कब…

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Added by शिज्जु "शकूर" on February 18, 2014 at 7:30am — 19 Comments

भूल थी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212

**

बचपने  में  चाँद  को  रोटी  समझना  भूल थी

कमसिनी में एक कमसिन से लिपटना भूल थी

**

तात  ने डाटा  किताबें  पढ़, मुहब्बत  में न पड़

तात से  इस बात  पर मेरा  झगड़ना  भूल  थी

**

कोख में जब मात ने  पाला न माना कुछ उसे

इक कली  के द्वार पर  माथा रगड़ना भूल थी

**

मिट गया वो, पात ने कर ली हवा से प्रीत जब

बेखुदी  में  डाल से  उसका  बिछड़ना  भूल थी

**

लूटता इज्जत भ्रमर नित दोष उसको  कौन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 18, 2014 at 7:30am — 11 Comments

लघुकथा - यह भी जीवन है

पत्नी जिस बस से आ रही थीं, उसे घर के पास से ही होकर गुजरना था. रात का समय था. हल्की ठण्ड थी. मैंने हाफ़ स्वेटर पहना और टहलता हुआ उस मोड़ तक पहुँच गया, जहाँ पत्नी को उतरना था. बस के वहाँ पहुँचने में अभी कुछ समय शेष था. ठंडी हवा शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी इसलिए उससे बचने की खातिर मैं फुटपाथ के किनारे बनी दुकान के चबूतरे पर जा बैठा.

कुछ लोग वहीँ जमीन पर सो रहे थे. पास का व्यक्ति चादर ओढे, अभी जग रहा था.

मैंने उत्सुकता वश पूछा 'भैया, यहीं रोज सोते हो?’

'हाँ', वह…

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Added by बृजेश नीरज on February 18, 2014 at 12:00am — 14 Comments

कह मुकरियां (-रमेश चौहान)

कह मुकरियां

1.

श्‍याम रंग तुम्हरो लुभाये ।

रखू नैन मे तुझे छुपाये ।

नयनन पर छाये जस बादल ।

क्या सखि साजन ? ना सखि काजल ।

2.

मेरे सिर पर हाथ पसारे

प्रेम दिखा वह बाल सवारे ।

कभी करे ना वह तो पंगा ।

क्या सखि साजन ? ना सखि कंघा

3.

उनके वादे सारे झूठे ।

बोल बोले वह कितने मिठे ।

इसी बल पर बनते विजेता ।

क्या सखि साजन ? ना सखि नेता ।।

4.

बाहर से सदा रूखा दिखता ।

भीतर मुलायम हृदय रखता ।।

ईश्‍वर भी…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 17, 2014 at 9:28pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
लफ़्ज़ कब जज़्बात को पूरे पड़े ? ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122     2122        212 ( पूरा ) 

 

इस फ़िज़ा के शोख नज़्ज़ारे भी देख

बाग  मे  पानी के  फौव्वारे भी देख

 

सिर्फ  सूखे  तू शज़र   देखा  न  कर

हो  रहे  पत्ते   हरे   सारे  भी   देख  

 

तू अमा में चाँद  खातिर , ज़िद  न कर…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 17, 2014 at 6:00pm — 32 Comments

ग़ज़ल- सारथी || इशारों से दिल का जलाना तेरा ||

इशारों से दिल का, जलाना तेरा

अजब! हुस्नवाले, बहाना तेरा /१ 

हमें क्या फ़िकर, ग़र जमाना कहे

दीवाना- दीवाना, दीवाना तेरा /२ 

हुआ जब से रिश्ता, हयाई बढ़ी

यूँ साड़ी पहन के, लजाना तेरा /३ 

अभी तो जवां हूँ, है गुंजाइशें

जिगर पे उठा लूँ, निशाना तेरा /४  

न नासाज कर दे, कहीं आपको

सनम सर्दियों में, नहाना तेरा /५  

बड़प्पन कहीं से, दिखे तो कहूँ

सुना तो, बड़ा है घराना तेरा /६ 

ये तेवर, ये अंदाज़, आसां नहीं

ग़ज़ल, 'सारथी'…

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Added by Saarthi Baidyanath on February 17, 2014 at 5:00pm — 11 Comments

फिर बसंत आया (गीत) - कल्पना रामानी

रंग-रँगीले रथ पर चढ़कर।

रस-सुगंध की झोली भरकर। 

फिर बसंत आया।

 

आज नई फिर धूप खिली है।

दिशा दिशा उजली उजली है।

कुहरे वाली बीती रातें।

नया सूर्य है, सुबह नई है।

 

नई इबारत फिर गढ़ने को   

परिवर्तन लाया।

 

गाँव गाँव में झूल पड़ गए।

अमराई के भाग्य खुल गए।  

अँबुआ पर नव अंकुर फूटे।

कुहू कुहू के बोल घुल गए।

 

मृदुल तान मृदु साज़ छेड़कर

कुंज-कुंज गाया। 

 

देख-देख…

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Added by कल्पना रामानी on February 17, 2014 at 10:30am — 17 Comments

वो मिल ही गयी.......

वो मिल ही गयी.......

जिंदगी के हर मोड़ पर

बरसों से मै उसे देख रहा था

और वो मुझे देखती रहती थी

वक्त ही ना मिला जो उससे पूछता

क्यूँ वो मेरा इंतज़ार कर रही थी

अब थक सा गया था

धीरे धीरे दोड रहा था

आज मुझे वो ज्यादा करीब लगी

पूछ ही लिया रुक कर

मुद्दतों से देख रहा हूँ

तुम यूँ ही खड़ी हो

क्यूँ मुझसे मिलने की जिद्द पर अड़ी हो

मुस्कुरा कर बोली बस

तुम्हारा ही इंतज़ार था

मेरी भी मज़बूरी है,

इसलिए कंही नहीं…

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Added by pawan amba on February 16, 2014 at 1:30pm — 10 Comments

ऐ जिन्‍दगी मुझ पे भरोसा ना करना गीत

ऐ जिन्‍दगी मुझ पे भरोसा ना करना

हमें तो है किसी की चाहत पे मरना

 

सवाँर पाओ ना तु बिखर जायेगे हम

आपकी दुनिया से चले जायेगें हम

हँसते रहेगें वो तुम रोते रहना

हमें तो है किसी की चाहत पे मरना

ऐ जिन्‍दगी मुझ पे भरोसा ना करना



आँख मे अश्‍क उसके दे जायेगें हम

तड़पते रहो तुम चले जायेगें हम

हमे हैं जमाने से कभी कुछ न कहना

हमें तो है किसी की चाहत पे मरना

ऐ जिन्‍दगी मुझ पे भरोसा ना करना

 

बैठा करे हम कभी नदीया किनारे

लेकर वो…

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Added by Akhand Gahmari on February 16, 2014 at 12:18pm — 12 Comments

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