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क्या तुम्हें उपहार दूँ : एक गीत (नीरज कुमार नीर)

क्या तुम्हें उपहार दूँ,

प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

 

तुम वसंत हो, अनुगामी

जिसका पर्णपात नहीं.

सुमन सुगंध सी संगिनी,

राग द्वेष की बात नहीं.

 

शब्द अपूर्ण वर्णन को

ईश्वर के वरदान का.

 

विकट ताप में अम्बुद री,

प्रशांत शीतल छांव सी,

तप्त मरू में दिख जाए,

हरियाली इक गाँव की.

 

कहो कैसे बखान करूँ

पूर्ण हुए अरमान का.

 

मैं पतंग तुम डोर प्रिय,

तुम बिन गगन अछूता…

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Added by Neeraj Neer on February 9, 2014 at 4:41pm — 33 Comments

भावों के विहंगम

तेरे फड़फड़ाते पंखों की छुअन से

ऐ परिंदे!

हिलोर आ जाती है

स्थिर,अमूर्त सैलाब में

और...

छलक जाता है 

चर्म-चक्षुओं के किनारों से

अनायास ही कुछ नीर.

हवा दे जाते हैं कभी

ये पर तुम्हारे

आनन्द के उत्साह-रंजित

ओजमय अंगार को,

उतर आती है

मद्धम सी चमक अधरोष्ठ तक,

अमृत की तरह.

विखरते हैं जब

सम्वेदना के सुकोमल फूल से पराग,

तेरे आ बैठने…

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Added by Vindu Babu on February 9, 2014 at 2:00pm — 32 Comments

किसी के दिल को छू पाया

2122  2122  2122  2122

राज की बात कहता हूँ समझ अब तक न तू पाया ।

सुकूँ देकर किसी को ही आदमी ने  सुकूँ  पाया ।

दौलतें शोहरतें जिनको कमानी हैं क़मा लें वो ,

मुझे इतना बहुत है जो किसी के दिल को छू पाया ।

बढ़ाये हाथ जब मैंने किसी को थाम लेने को ,

ख़ुशी का सिलसिला दिल में अचानक ही शुरू पाया ।

यहाँ हर शै से हर शै का एक अनबूझ रिश्ता है ,

जब दिल में चुभा काँटा तो आँखों में लहू आया ।

ढूँढ़ने ज़िन्दगी का राज मै…

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Added by Neeraj Nishchal on February 9, 2014 at 11:30am — 8 Comments

बदलता मौसम

लो .... 

ये क्या मौसम बदलते ही 

तुमने रिश्तों का स्वेटर 

खोल दिया ... 

एक एक फंदे 

जो तुमने चढ़ाये थे 

इतने जतन से 

अचानक ही 

उन्हे उतार दिया .... 

इतने जल्दी तुम 

भी बदल गए 

इस मौसम की तरह 

चलो .... 

ऐसा करना 

मेरी यादों की सलाईयों को 

सहेज कर रख लेना 

फिर कभी ठंड आएगी 

और उस सलाईयों 

पर अहसासों के ऊन से 

फिर रिश्तों का स्वेटर 

बना लेना ... 

किसी…

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Added by Amod Kumar Srivastava on February 8, 2014 at 9:15pm — 10 Comments

दरख़्त की आशा

आस बांधे खड़ा था

धूप से तन जल रहा था 

जेष्ठ भी तो तप रहा था

आस थी बरसात की

प्यास थी एक बूंद की

आ गिरेगी शीश पर

तृप्त होगी देह तब

यह सोच कर उत्साह मन में हो रहा था

घन-घटा चहूँ ओर छाती जा रही थी

मलय शीतल उमड़-घुमड़ के बह रही थी 

मेघ घिर-घिर आ रहे थे

मोर भी संदेश मीठा दे रहे थे

हर्ष दिल में हो रहा था

आनंद से छोटे बड़े सब घूमते

बाल मन से थे धरा को चूमते

एक दूसरे से मिल रहे जैसे गले

उल्लास…

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Added by kalpna mishra bajpai on February 8, 2014 at 4:30pm — 6 Comments

दोहा-----------बसन्त

दोहा-----------बसन्त

आम्र वृक्ष की डाल पर, कोयल छेड़े तान।

कूक कूक कर कूकती, बन बसंत की शान।।1

वन उपवन हर बाग में, तितली रंग विधान।

चंचल मन उदगार है, प्रीति-रीति परिधान।।2

क्षितिज प्रेम की नींव है, कमल भवन, अलि जान।

दिन भर गुन गुन गान है, सांझ  ढले  रस  पान।।3

मन मन्दिर है प्रेम का,  जिसमें  रहते   संत।

विविध रंग अनुबंध में, खिल कर बनों बसंत।।4

पुरवार्इ मन रास है,  सकल  बहार  उजास।

किरनें जल…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 7, 2014 at 9:30pm — 9 Comments

दुख और जीवन (सवैया गीत)

इस जीवन में दुख ही दुख है, गृह त्याग चलें वन गौतम नाई।

फिर भी संग छूट नहीं दुख से, घर बैठ सुता सुत नारि रोवाई॥

मन सूख रहा जग आतप से, अब नैन वरीष गये हरियाई।

बहु भांति विचार किया हमने, पथ कंटक झेल रहो जग भाई॥



यदि तृप्त नहीं मन तो भटके, जब तोष हुआ दुख तो मिटता है।

पर तृप्त करें किस भांति इसे, यह तो बिन बात के भी हठता है॥

हठवान बड़ा मन मान नहीं, भगवान कहो तुम ही समझाई।

पद पंकज में जब ध्यान लगे, तब छोड़ रहा मन है हठताई॥



मन की हठता सुन है तब ही, जब… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 7, 2014 at 7:52pm — 13 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
शिव का दृढ़ विश्वास मिले अब (नवगीत) // --सौरभ

उमा-उमा मन की पुलकन है

शिव का दृढ़ विश्वास

मिले अब !



सूक्ष्म तरंगों में

सिहरन की

धार निराली प्राणपगी है  

शैलसुता तब

क्लिष्ट मौन थी  …

Continue

Added by Saurabh Pandey on February 7, 2014 at 6:30pm — 44 Comments

कहाँ जाएँ...

भाग कर कहाँ जाएँ
हर जगह तुम्हे पायें

जब से किया किनारा मैंने
दूरियां हैं घटती जाएँ

तुम क्या जानो कैसे-कैसे
बेढंगे से ख्वाब सताएं

गुपचुप-गुपचुप, धीरे-धीरे
माजी के लम्हात रुलाएं

चारों ओर भिखारी, डाकू
मांगें और लूट ले जाएँ

तुमसा दाता कहाँ से पायें
वापस तेरे दर पर आयें

(मौलिक अप्रकाशित)

Added by anwar suhail on February 7, 2014 at 4:04pm — 5 Comments

कुण्डलिया [सरिता भाटिया]

डरना कैसा मौत से, यह तो सच्ची यार
धोखा देती जिन्दगी , मौत निभाए प्यार /
मौत निभाए प्यार , साथ है लेकर जाती
सबक जिंदगी रोज, नया हमको सिखलाती
नेक मौत का काम, सबकी पीर को हरना
सरिता कहे पुकार, मत तुम मौत से डरना //

.....................................................

................मौलिक व प्रकाशित ...........

Added by Sarita Bhatia on February 7, 2014 at 10:02am — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कवि

कवि
कौन कहता है
मैं कवि हूँ और वह नहीं ?
मैं पेट भर खाने के बाद
बरामदे की गुनगुनी धूप में बैठा हूँ
प्रकृति दर्शन के लिए –
वह,
भूखे पेट
एक कटी पतंग की डोर थामने
आसमान की ओर बेतहाशा भागा जा रहा है
मगर,
आसमान है कि
उससे दूर हटता जा रहा है –
बादल, क्षितिज और
एक कटी पतंग को
अपनी नीलिमा की ओढ़नी में छुपाकर,
कविता की लकीर खींचता हुआ !!!

(मौलिक तथा अप्रकाशित रचना)

Added by sharadindu mukerji on February 6, 2014 at 10:52pm — 10 Comments

गुल के बदले में मुझे बस खारों की माला मिली

२१२२        २१२२       २२२२     २१२

ला ल ला ला    ला ल ला ला   ला ला ला ला    ला ल ला 

भेदने जब तम फलक का रवि आमादा हो गया

चाँद पीकर चांदनी अपनी ही नभ में खो गया 

हाथ हम रखते रहे जलते अंगारों पर यूं ही 

एक फरिस्ता जिन्दगी में ख्वाबे गुल ही बो गया 

बज्म में वो गीत गाये झूमे पीकर मस्त हो 

और नन्हा लाल घर पे रोके भूखा सो गया 

घिर के नफरत में जहाँ की सूझा जब कुछ भी नहीं 

चौखटों पे मंदिरों की…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on February 6, 2014 at 1:30pm — 12 Comments

अधिकार..

 “ पिताजी, वो अपनी नदी के पास वाली जमीन लगभग कितनी कीमत रखती होगी, अगर उसे बेच दिया जाय तो कैसा रहेगा ?

“क्यों..? बेटा क्या जरुरत आ पड़ी है ? खुली तिजौरी को बंद करने की..”

“ पिताजी..! ऐसे ही एक प्लान बनाया है, जिससे भविष्य संवर सकता है”

“ अरे बेटा..भविष्य संजोये रखने से संवरता है खोने से नही, वैसे मैंने अपनी नौकरी के रहते तुम्हारी पढाई पर बहुत खर्च किया, यहाँ तक की तुम्हारा घर बसाने में अपना पी.एफ. का पैसा भी झोंक दिया, , मैं तो यहाँ छोटे शहर में अपनी पेंशन से अपना और…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on February 6, 2014 at 12:05pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
(दो कुण्डलियाँ) छोटा परिवार,सुखी परिवार

ढांचा सुधरे देश का ,सुदृढ़ हो आकार

खुशियाँ बसती हैं जहां ,छोटा हो परिवार

छोटा हो परिवार ,प्रेम से आँगन महके

पुत्री हो या पुत्र ,नीड़ में खुशियाँ  चहके

बूढों का सम्मान ,भरे जीवन का सांचा

हो  जाए उत्थान , देश का सुधरे ढांचा

**************************

           (२)|

पहले दो टुकड़े हुए ,और हुए फिर चार

टूक-टूक रोटी बटे,बढ़े अगर परिवार

बढ़े अगर परिवार, लड़ाई गुत्थम गुत्थी

खिचे बीच दीवार, रोज की माथापच्ची

रिश्तों बीच…

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Added by rajesh kumari on February 6, 2014 at 11:00am — 16 Comments

मन [कुण्डलिया]

मन के जीते जीत है ,मन के हारे हार
मन को समझा ना अगर जीना हो दुश्वार /
जीना हो दुश्वार अगर मन दुख से भारी
सुख से पल संवार, कर के मन संग यारी
मन से कर लो प्रीत ,छोड़ो मोह अब तन के
मन की ना हो हार ,प्यार के फेरो मनके //

..........मौलिक व अप्रकाशित ..............

Added by Sarita Bhatia on February 6, 2014 at 10:00am — 10 Comments

सिर्फ सूरत आइना हो - (ग़ज़ल)- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122     2122    2122     2122

***********************************

दीप  को जलना  नहीं है  भूल से  भी  द्वार मेरे

आप नाहक  कोशिशें क्यों  कर रहे हो  यार मेरे



खून हाथों पर लगा है किन्तु कातिल मैं नहीं हूँ

फूल से  अठखेलियों में  चुभ गये  थे  खार मेरे



छा गया है आजकल जो इस मुहब्बत में कुहासा

क्या  बताऊँ   आपको   मैं   देवता  बीमार  मेरे



दीन में रखना मुझे क्यों आप फिर भी चाहते हो

मयकदे में  भेज  बदले  जब  सदा  आचार …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2014 at 8:00am — 8 Comments

"परिश्रम "

परिश्रम है पारस पत्थर , जीवन को सोना बनाता है।

मेहनत करता जो जीवन में, सबकुछ वह पा जाता है।।

परिश्रम से एक ही पल में ,भाग्य दास बन जाता है।

लक्ष्मी उसके चरण है छूती ,जो मेहनत की खाता है।।

परिश्रम के बल पे टिकी है ,ये दुनियाँ तो सारी।

मेहनत से जिसने आँख चुराई ,ठोंकर उसने खाई।।

गीता के उपदेश ने भी तो ,कर्म की रीत सिखाई।

पाया उसने सभी है जिसने ,कर्म से प्रीत लगाई।।

मेहनत जो भी करता है वो , दुःख नहीं कभी पाता है।

पत्थर खाये यदि मेहनती ,वो भी हजम कर…

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Added by chouthmal jain on February 6, 2014 at 3:00am — 3 Comments

मौत आती है पर मरते-मरते

कोई कैसे सुने दास्ताँ मेरी

खुद को भूल जाते सुनते-सुनते.

 

वो भी साथ होते मेरे लेकिन

पांव थक जाते हैं चलते-चलते.

 

याद आती मुझे जब कभी उसकी

आँसू बहाते हैं चुपके-चुपके.

 

दिल बहुत चाहता आज हँसने को

आँख भर आती है हँसते-हँसते.

 

मर गये होते चाहत में उसके

मौत आती है पर मरते-मरते.

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

अनिल कुमार 'अलीन'

Added by अनिल कुमार 'अलीन' on February 5, 2014 at 11:30pm — 11 Comments

कहानी : कटहल के पेड़ की आत्मकथा

(१)

जब मैंने होश सँभाला तो मेरी और राजू की लंबाई बराबर थी। मुझे आँगन के बीचोबीच राजू के दादाजी ने लगाया था। राजू के पिताजी अपने सभी भाइयों में सबसे बड़े हैं। पिछले पंद्रह वर्षों से घर में कोई छोटा बच्चा नहीं था। ऐसे में जब राजू का जन्म हुआ तो वह स्वाभाविक रूप से परिवार में सबका दुलारा बन गया, विशेषकर अपने दादाजी का। राजू की देखा देखी मैं भी उसके दादाजी को दादाजी कहने लगा। मेरे बारे में लोगों की अलग अलग राय थी। कुछ कहते थे कि आँगन में कटहल का पेड़…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 5, 2014 at 10:00pm — 4 Comments

एक तरही गजल (रमेश कुमार चौहान)

(बहर - 2122,2122,212)

पैर में क्यो गुदगुदी होने लगी
याद तेरी बेबसी होने लगी

वक्त काफी हो गया तुम से मिले
तेरी सूरत अजनबी होने लगी

अपने हाथो घाव ताजा कर रहा
जख्म स्याही लेखनी होने लगी

ये इबारत प्यार का है चेहरा
हर नए गम से खुशी होने लगी

तू नही तेरी निशानी ही सही
देख लो संजीवनी होने लगी
------------------------
मौलिक एवं अप्रका‍शित

Added by रमेश कुमार चौहान on February 5, 2014 at 10:00pm — 7 Comments

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