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साथी! तोड़ न मेरे पात...

साथी! तोड़ न निर्दयता से चुन चुन मेरे पात...



नन्हीं एक लता मैं  निर्बल,

मेरे पास न पुष्प न परिमल,

मेरा सञ्चित कोष यही बस,

कुछ पत्ते कुम्हलाये कोमल,

तोड़ न दे यह शाख अकिञ्चन, निर्मम तीव्र प्रवात...



मैं हर भोर खिलूँ मुस्काती,

पर सन्ध्या आकुलता लाती,

साँस साँस भारी गिन गिन मैं,

रजनी का हर पहर बिताती,

एक नये उज्ज्वल दिन की आशा, मेरी हर रात...



पड़ती तेरी ज्वलित दृष्टि जब,

भीत प्राण भी हो जाते तब,

सहमी सकुचायी मैं…

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Added by अजय कुमार सिंह on January 22, 2014 at 3:30pm — 20 Comments

चिंता के कुछ दोहे

नैतिकता के पतन से, फैला कंस प्रभाव॥
मात- पिता सम्मान नहि, नस नस में दुर्भाव॥

पश्चिम संस्कृति जी रहे, हम भूले निज मान।
कहते हम संतान कपि, जबकि हैं हनुमान॥

निज गौरव को भूलकर, बनते मार्डन लोग।
ये भी क्या मार्डन हुए, पाल रहे बस रोग॥

अपने घर में त्यक्त है, वैदिक ज्ञान महान।
महा मूढ़ मतिमंद हम, करते अन्य बखान॥

लौटें अपने मूल को, जो है सबका मूल।
पोषित होता विश्व है, सार बात मत भूल॥

मौलिक व अप्रकाशित

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on January 22, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

नवगीत: आकाश उसी का है !

नवगीत 
********
उड़ने की जो ठान ले 
आकाश उसी का है  
पंखों में हो 
कमी अगरचे 
या फिर ना-ना 
के हो चर्चे 
इन बातों से ना घबराना 
दिल ने सीखा है
…… आकाश उसी का है  
अगर-मगर जो  
अगर करेगा 
कैसे पहली 
पेंग भरेगा 
सच कहता हूँ सुनो कसम से 
मुद्दा तीखा है  
..... आकाश उसी का है…
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Added by AVINASH S BAGDE on January 21, 2014 at 11:30pm — 10 Comments

गजल (कल्पना रामानी)

मात्रिक छंद

जो रस्मों को मन से माने, पावन होती प्रीत वही तो!

जीवन भर जो साथ निभाए, सच्चा होता मीत वही तो!

 

रूढ़ पुरानी परम्पराएँ, मानें हम, है नहीं ज़रूरी।

जो समाज को नई दिशा दे, प्रचलित होती रीत वही तो!

 

मंदिर-मंदिर चढ़े चढ़ावा, भरे हुओं की भरती झोली।

जो भूखों की भरे झोलियाँ, होता कर्म पुनीत वही तो!

 

ऐसा कोई हुआ न हाकिम, जो जग में हर बाज़ी जीता,

बाद हार के जो हासिल हो, सुखदाई है जीत वही…

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Added by कल्पना रामानी on January 21, 2014 at 11:00pm — 18 Comments

उत्तर खोजो श्रीमान जी...

एकदम से ये नए प्रश्न हैं

जिज्ञासा हममें है इतनी

बिन पूछे न रह सकते हैं

बिन जाने न सो सकते हैं

इसीलिए टालो न हमको

उत्तर खोजो श्रीमान जी....

ऐसे क्यों घूरा करते हो

हमने प्रश्न ही तो पूछा है

पास तुम्हारे पोथी-पतरा

और ढेर सारे बिदवान

उत्तर खोजो ओ श्रीमान...

माना ऐसे प्रश्न कभी भी

पूछे नही जाते यकीनन

लेकिन ये हैं ऐसी पीढ़ी

जो न माने बात पुरानी

खुद में भी करती है शंका

फिर तुमको काहे छोड़ेगी

उत्तर तुमको देना…

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Added by anwar suhail on January 21, 2014 at 9:35pm — 5 Comments

छलक छलक जाती है अँखियाँ -(घनाक्षरी छंद ) !!

छंद पर मेरा प्रथम प्रयास 

छलक छलक जाती अँखियाँ हैं प्रभुश्याम 

आपके दरस को उतानी हुई जाती हूँ ।

ब्रज के कन्हाइ का मुझे भरोसा मिल गया ,

खुशी न समानी मन  मानी हुई जाती हूँ ।

भक्ति रस मे ही डूबी श्याम मै पोर पोर 

भावना मे डूबी पानी पानी हुई जाती हूँ ।

सांवरे का जादू ऐसा चढ़ा तन मन पर ,

राधिका  सी प्रेम की दीवानी हुई जाती हूँ । 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Added by annapurna bajpai on January 21, 2014 at 8:30pm — 16 Comments

मौन जब मुखरित हो जाता है (महेश्वरी कनेरी)

मौन जब मुखरित हो जाता है

मौन जब मुखरित हो

शब्दों में ढल जाता है

मिट जाते भ्रम सभी

मन दर्पण हो जाता है

मौन जब मुखरित हो जाता है…..

बोझिल मन शान्त हो

सागर सा लहराता है

वेदना सब हवा हो जाती

भोर दस्तक दे जाता है ।

मौन जब मुखरित हो जाता है…..

धैर्य मन का सघन हो

विश्वास सबल हो जाता है

पतझड़ मन बसंत बन

कोकिल सा किलकाता है ।

मौन जब मुखरित हो जाता…

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Added by Maheshwari Kaneri on January 21, 2014 at 7:00pm — 8 Comments

दुर्मिल सवैया - दो छंद

हर बार यही दिल बोल रहा , उनका पिय जो अब मीच जली 
अपना अपराध नहीं कुछ था,फिर भी कहि कै तुम नीच जली  
उस राह सिवाय विकल्प नहीं, बन प्रेम धरा इहि कीच जली 
हमसे वह क्यूँ टकराय गयी , इहि कारन टोकरि बीच जली 
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++

खनकी,झनकी,लिपटी मुझसे पियकी चुटकी चटकी सि भली   

हलकी फुलकी छलकी बलकी, ठुमकी सिमटी सलकी सि कली 

अछरी, लहरी गहरी उमरी ,  अंधरी बिजुरी धुंधरी सि गली 
निकरी निय टोकरि प्रेम…
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Added by Ashish Srivastava on January 21, 2014 at 11:08am — 6 Comments

आत्म-धन - (विजय निकोर)

आत्म-धन

 

होगी ज़रूर कोई गहरी पहचान

दर्द की तुम्हारे इस दर्द से मेरे

कि जाने किन-किन तहों से उभरती

छटपटाती

लौट आती है वही एक याद तुम्हारी

यादों के कितने घने अँधियाले

पेड़ों के पीछे से झाँकती ...

मैंने तो कभी तुमको

इतना स्नेह नहीं दिया था

भीगी आँखों से, हाँ,

भीगी आँखों को देखा था

कई बार... खड़े-खड़े ...  चुपचाप

 

पंख कटे पक्षी-सा तड़पता

ठहर नहीं पाता है मन पल-भर…

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Added by vijay nikore on January 21, 2014 at 11:00am — 23 Comments

गज़ल - नाफरमानी लिखना (अरुन श्री)

आह   लिखो , हुंकार   लिखो ,  कुर्बानी  लिखना

बंद    करो   किस्सों   में    राजा  रानी  लिखना

 

सूखे   खेतों   की   किस्मत  में   पानी  लिखना

अब   लिखना  तो  पीलेपन  को  धानी  लिखना

 

और   भी   हैं   रिश्ते यारों  तुम  छोडो  भी अब

महबूबा   के    दर   अपनी    पेशानी    लिखना

 

मानवता   उन्वान ,  भरा  हो   प्रेम   कहन  में    

अपना   जीवन   ऐसी   एक   कहानी   लिखना

 

जब भी  तुम अपने लब पर मुस्कान लिखो…

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Added by Arun Sri on January 21, 2014 at 11:00am — 32 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फिर हुई जीने की इच्छा आज मन में ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122       2122       2122  

फिर हुई जीने की इच्छा आज मन में

फिर बुलाया आज  कोई  है सपन में

फड़फड़ाने फिर लगा कोई परों को

फिर उड़ेगा वो किसी नीले गगन में

फिर से पीड़ा मीठी सी कुछ हो रही है…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 20, 2014 at 9:30pm — 31 Comments

गजल [सरिता भाटिया]

दिलों को जो सुहाते हैं /
दिलों पे जाँ लुटाते हैं /

निगाहों से क़त्ल करके
मुझे कातिल बनाते हैं /

दिलों के हैं अजब रिश्ते
सदा अपने निभाते हैं /

यूँ पल पल मर रही हूँ मैं
मुझे जिन्दा बताते हैं /

सभी अपने तुम्हारे बिन
मुझे जीना सिखाते हैं /

सुना है ऐसे में अपने
भी दामन छोड़ जाते हैं /

.....................................

..मौलिक व् अप्रकाशित....

Added by Sarita Bhatia on January 20, 2014 at 5:30pm — 20 Comments

मुहब्बतों के पैगाम ..........

मुहब्बतों के पैगाम .....

ये मुहब्बत भी

अजब शै है ज़माने में

उम्र गुज़र जाती है

समझने और समझाने में

कब हो जाती हैं सांसें चोरी

खबर ही नहीं होती

बरसों नहीं आती नींद

उनके इक बार मुस्कुराने में

डूबे रहते हैं पहरों

इक दूसरे के ख्यालों में

जाने गुज़र जाती शब् कैसे

इक दूसरे से बतियाने में

शब् जाती है तो

सहर आ जाती है

सहर क्या आती है…

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Added by Sushil Sarna on January 20, 2014 at 1:00pm — 17 Comments

साया

आज

तुम्हारा प्यार

बना रहा साथ मेरे

साये की तरह

चलता रहा साथ

जहां-जहां मैं गई ।

देता रहा दिलासा

अकेले उदास मन को

जैसे तुम देते थे

मेरे कंधे पर प्यार से थपकी

उसी तरह का दुलार

आज फिर महसूस किया मैंने

जब सांझ की उतरती

गहरी उदासी ने

घेर लिया मन को मेरे ।

तुम ही नहीं

तुम्हारा प्यार भी जानता था

कि सांझ,

मुझे उदास कर देती है ?

शायद इसीलिए,

साये की…

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Added by mohinichordia on January 20, 2014 at 9:00am — 10 Comments

ग़ज़ल - छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या

छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या

इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या



ख़ुद से कर देगा बदगुमान भी क्या 

कोई ठहरेगा मेह्रबान भी क्या



है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या

इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है

काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को

लूट लेंगे ये सायबान भी क्या



इस क़दर जीतने की बेचैनी

दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या



अब के दावा जो है मुहब्बत का

झूठ ठहरेगा ये…

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Added by वीनस केसरी on January 20, 2014 at 12:30am — 26 Comments

आज ....शाम कुछ अच्छी लगी !

मन शाम के बहानों से उदास

सोच के सागर किनारें

गुज़रते लम्हों के

सफ्हें बदलता रहा

कब आँखे थक कर

बैठ गयी ख़बर नहीं

ज़ेहन में एक तस्वीर

उभर आयी

शांत चेहरे पर

झीनी सी मुस्कराहट

होठों की नमी उड़ी थी कहीं

पर आँखे शरारती

जैसे कह रही थी मुझे

''अच्छा तो तुम अब ऐसे याद करोगी''

 

आँखे खुल गयी चौंक कर

कुछ नहीं था, कोई नहीं था

बस वो ख्याल था और

बहुत देर तक साथ रहा

 

आज…

Continue

Added by Priyanka singh on January 19, 2014 at 4:36pm — 19 Comments

बिटिया के जन्म पर ( घनाक्षरी छंद)

5 जनवरी 2014 को रात्रि 8.45 बजे मेरी बिटिया ने जन्म लिया। मैं उसे माँ दुर्गा का प्रसाद मानता हूँ। पिता बनने का सुख ही कुछ दिव्यानुभूतिकारी होता है। गदगद् भाव से मैं अपनी पुत्री को माँ दुर्गा का स्वरूप मान कर एक घनाक्षरी छंद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

*****************************

सुता रूप धार मात, गेह जो पधारी आप,

चरण युगल माथ, कोटिश: नवाता हूँ।

आह्लादकारी जन्म, किलकारी रही गूँज,

मुग्धकारी महतारी, आप गुन गाता हूँ॥

जैसे लिया जन्म मात, किया उपकार बहु,

वैसे जियो शत… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on January 19, 2014 at 12:00pm — 22 Comments

ग़ज़ल महफ़िल की नज़र

ज़िन्दगी का पलसफा है।
मौत हर ग़म की दवा है।

एक ही खामी है उसमे।
सच हमेशा बोलता है।

दूर मूझसे हो गयी जो।
ज़िन्दगी वो बेवफा है।

राहे सब आसां हुई है।
साथ जब से हौसला है।

काम भर ही बोलिए बस।
बे सबब क्या बोलना है।

हर मुसीबत से लड़ो यूँ।
साथ में समझो खुदा है।

लाज रखना मेरे मौला।
आज खुद से सामना है।

अप्रकाशित और मौखिक

Added by Ketan "SAAHIL" on January 19, 2014 at 10:54am — 10 Comments

आत्मकथन

आत्मकथन



जब जब बनाना चाहा

शब्दों को मिसरी

कुछ पूर्वाग्रह

घोल गये कड़ुवाहट

नहीं बना पाया मैं

खुद को मधुमक्खी

तब कैसे होते मधु

मेरे कहे गये शब्द

मैंने चाहा दिखना

बगुले सा धवल

तब कहां से आती

कोयल सी मधुरता

काक होकर भी

कहां निभा पाया

काक का धर्म

बस जमाये रखी

गिद्ध दृष्टि  

हर जीवित-मृत पर

समझ सकते हैं आप

कितना तुच्छ जीव

बनकर रह गया हूं मैं…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2014 at 6:00am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल (212- 212- 212- 212)

क्या कहूँ साथ अपने वो क्या ले गई

आँधी थी सायबाँ ही उड़ा ले गई

 

मैंने बस एक ही गाम उठाया मुझे

रहनुमा बन के तेरी दुआ ले गई

 

काम आये सितारे अँधेरो में रात

जब चिरागों की लौ को हवा ले गई

 

मुझको लहरों से क्यूँ हो शिकायत भला

गल्तियों को मेरी वो बहा ले गई

 

जीने की कोशिशें उसकी बेजा नहीं

क्या हुआ गर खुशी वो चुरा ले गई

 

रात के ख़्वाब बाकी थे आँखों में कुछ

सुब्ह की बेरहम धूप उठा ले…

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Added by शिज्जु "शकूर" on January 18, 2014 at 7:35pm — 21 Comments

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