अजनबी गलियाँ
चलते चलते
महसूस हुआ
गलियाँ बेगानी लगीं
देखते रहे
इधर उधर
नज़रे बैमानी लगीं
थे बहुत अपने यहाँ
पर सभी बेगाने लगे
खोजा बहुत उन सबको
शायद कोई अपना लगे ।
तंग गलियों में
चिपके हुए घरों के बीच
बस देखती रही यूँही ।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 5, 2016 at 6:30pm —
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काफी समय बीत चुका था, कोठी की दूसरी मंज़िल में बैठे तीनों युवकों को अब तक कुछ भी मन का हासिल नहीं हो सका था। उनमें से एक बोला- "मैंने पहले ही कहा था कि यहाँ कोई स्कोप नहीं है, सारी मेहनत बेकार गई न!"
दूसरे ने कहा- "मैंने भी कई बार वहां के चक्कर लगा लिये, न तो कैमरे के लिए कोई मसाला मिला और न ही भीड़ को भड़काने का कोई मौक़ा! क्या अपलोड करेंगे हम इन्टरनेट पर?"
तीसरे ने तालाब किनारे स्थित उस कोठी की खिड़की से झांकते हुए कहा- "ये तो सामान्य धर्म-भीरू या कट्टर लोगों का जमावड़ा…
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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 5, 2016 at 6:30pm —
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2122 1212 22
कोई खुशबू भरी हवा आई ।
याद शब् भर कई दफ़ा आई ।।
दर्द दिल का नही मिटा पाया।
जब से हिस्से में बेवफा आई ।।
कौन कहता है नासमझ है वो ।
दुश्मनी वक्त पर निभा आई ।।
उम्र गुजरी जिसे मनाने में ।
आज लेकर वही हया आई ।।
कुछ तो नीयत में फासले होंगे ।
वो अदब में नजर झुका आई ।।
चन्द लम्हे थे जिंदगी खातिर ।
बेरहम हो के फिर क़ज़ा आई ।।
है अलग बात भूल जाने की ।
काम उसके मेरी दुआ आई ।।
ये…
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Added by Naveen Mani Tripathi on November 5, 2016 at 4:36pm —
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कुछ प्रतीक्षा सी रहती है,
इक अनकहा सा इंतजार होता है,
हालातों में जहाँ,
सब कुछ मुश्किल,
अनिश्चित और दुश्वार होता है,
जीवन जब अनमना सा,
केवल जीने का व्यापार होता है,
कल्पनाओं में मन की,
कहीं कोई चमत्कार होता है,
कभी सोचते हैं हम
कहीं से आकर कोई हमदम,
कर देगा सबकुछ,
बिल्कुल ठीक और उत्तम,
प्रार्थनाओं और दुआओं में,
यही इज़हार होता है,
मनचाही खुशियाँ पाने को,
दिल सबका बेकरार होता है,
हर मन की परतों में कहीं…
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Added by Arpana Sharma on November 5, 2016 at 3:30pm —
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घरोंदा - लघुकथा –
"सुनोजी, तुम्हारे रिटायरमेंट में डेढ़ साल बचा है।रिटायर होने के बाद यह सरकारी मकान छोड़ना होगा।कुछ सोचा है, कहाँ जांयेंगे"।
"सुधा, अभी अपने पास डेढ़ साल है। कुछ ना कुछ इंतज़ाम हो जायेगा"।
"इतने साल की नौकरी में तो कोई तीर मारा नहीं, अब डेढ़ साल में क्या चमत्कार कर लोगे"।
"सुधा, तुम यह कैसी बातें करती हो।बत्तीस साल, बेदाग नौकरी की है।रिटायर होने पर पी एफ़ और ग्रेचुटी का इतना तो पैसा मिल ही जायेगा कि दो कमरों का फ़्लैट खरीद सकूं"।
" वाह…
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Added by TEJ VEER SINGH on November 5, 2016 at 1:05pm —
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देख पुलिस का पहरा सड़क पर,
गाज गिरी बिन हेलमेट के,
दोपहिया चालक पर,
हड़बड़ाया ,वो घबराया,
जब पुलिस ने उसे,
टिकट चालान का पकड़ाया,
बटुए का उसे खयाल आया,
अभी देता हूँ,
कहते-कहते वो घनचक्कर,
जल्दी से गाड़ी चला,
हुआ रफूचक्कर,
पुलिस ने नया दाँव अजमाया,
आरटीओ से घर का,
पता निकलवाया,
चालान टिकट उसके ,
घर भिजवाया,
अब ऊँट पहाड़ के नीचे आया,
फिजूल ही खुद को चूना लगाया,
जोश हुए ठंड़े, चालान भरकर,
सारी बदमाशी हुई…
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Added by Arpana Sharma on November 4, 2016 at 4:07pm —
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2122 2122 2122 2
हैं उभरते आजकल यूँ रहनुमा घर-घर
अब सियासत का उतारा हो गया घर-घर।1
अब न पढ़ना है, न कुछ करना जरूरी ही,
बस वजीरों का मुहल्ला बन चला घर-घर।2
गलतियों से आपकी लाला मिनिस्टर हैं
कुर्सियों पर आजकल चिपटा पड़ा घर-घर।3
अँगुलियों पर नाचकर रहबर बना है वो
बढ़ गया कुनबा बड़ा इतरा रहा घर-घर।4
रोशनी की खोज में लड़ कर मरे पुरखे
बस अँधेरा ही यहाँ छितरा रहा घर-घर।5
जोड़ने की बात के थे मुंतजिर सारे
तोड़ने का…
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Added by Manan Kumar singh on November 4, 2016 at 4:00pm —
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घुला हुआ है
वायु में,
मीठा-सा विष गंध
जहां रात-दिन धू-धू जलते,
राजनीति के चूल्हे
बाराती को ढूंढ रहे हैं,
घूम-घूम कर दूल्हे
बाँह पसारे
स्वार्थ के
करने को अनुबंध
भेड़-बकरे करते जिनके,
माथ झुका कर पहुँनाई
बोटी-बोटी करने वह तो
सुना रहा शहनाई
मिथ्या-मिथ्या
प्रेम से
बांध रखे इक बंध
हिम सम उनके सारे वादे
हाथ रखे सब पानी
चेरी, चेरी ही रह जाती
गढ़कर राजा-रानी
हाथ…
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Added by रमेश कुमार चौहान on November 4, 2016 at 2:57pm —
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बस , यूँ ही ....
मुस्कुराई थी
उस रात
क्या तुम
बस
यूँ ही
गुनगुनाई थी
उस रात
क्या तुम
बस
यूँ ही
शरमाई थी
उस रात
क्या तुम
बस
यूँ ही
बहार बन के
आई थी
उस रात
क्या तुम
बस
यूँ ही
मुझ में समाई थी
उस रात
क्या तुम
बस
यूँ ही
मेरे लिए
रोयी थी
उस रात
क्या तुम
बस …
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Added by Sushil Sarna on November 3, 2016 at 4:30pm —
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"निकल जा मेरे घर से...बड़ा कमाने वाली हो गयी।तू क्या समझती है तेरे वगैर काम नहीं चलेगा मेरा!बड़ी आई उपदेश देने वाली।" शराब के नशे में धुत भावसिंग,रोज की तरह कुसमा के साथ मारपीट कर, बके जा रहा था।
"अरे शर्म कर नासमिटे..!भगवान से डर ।जो दिनभर घर ,घर काम करके तेरी औलाद और मुझ अपाहिज़ का पेट पाल रही है, उसे,जानवर की तरह मारते हुए तुझे जरा भी लाज नहीं आती।"अपाहिज़ लाचार माँ ने अपनी ही नाकारा औलाद को कोसा।
"तू चुप कर,ज्यादा वकील मत बन इसकी!वरना इसके साथ तुझे भी बाहर का रास्ता दिखा…
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Added by Rahila on November 3, 2016 at 3:16pm —
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ओ मेरी जान!
तुम्हें जान से कम कुछ कहूँ
तो कितना कम लगता है
वैसे तो हर संबोधन में तुम केवल
अंजुरी भर ही आते हो,
फिर भी जब कहती हूँ अपनी जान तुम्हें
मैं ख़ुद को ज़िंदा पाती हूँ,
मुझको यूँ लगता है
जैसे दूर कहीं क्षितिज पर
दो अलग अलग उड़ते बादल
अपना-अपना रंग-रूप,आकार भूल कर
एक दूजे में घुलमिल जाएँ
और अलग कर पाना अब उनको
नामुमकिन बात लगे प्यारे!
(देखो मैं भी कविता करने लगी हूँ...वाह! वाह!)
और बताऊँ?
क्यों बताऊँ?
छोड़ो,…
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Added by Ravi Prakash on November 3, 2016 at 12:52pm —
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बहर :- 2212 2212 2212 2212
(हरिगीतिका छंद)
अनमोल क्षण जीवन के जो मन में बसा हरदम रखें,
जो जिंदगी के खाश पल उर से लगा हरदम रखें।
जिन याद से मस्तक हमारा शान से ऊँचा उठे,
उन याद के ख्वाबों को सीने में जगा हरदम रखें।
सन्तोष जो हमको मिला जब स्वप्न पूरे थे हुए,
उन वक्त के रंगीन लमहों को बचा हरदम रखें।
जब कुछ अलग हमने किया सबने बिठाया आँख पे,
उन वाहवाही के पलों को हम सजा हरदम रखें।
जो आग दुश्मन ने लगाई देश में आतंक…
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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on November 3, 2016 at 10:30am —
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बह्र:2122 2122 2122 212
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बातें ही बातें रही हैं आज करने के लिए
हामी उसने अब भरी ना साथ चलने के लिए।
गिर रहे हर बार फिर भी अक्ल तो आई नहीं
एक ठोकर ही सही है बस सँभलने के लिए।
घुल फ़िजा में अब गया है जह्र चारों ही तरफ
ना जमीं ही है बची कोई टहलने के लिए।
चाहता है सीखना तो कर सही कौशिश सभी
फौरी पढ़ना कब सही है कुछ समझने के लिए।
ना रुकावट से डरे जो वो बढ़े राणा सही
हाँ ,मगर कुछ रास्ते भी हों तो चलने के…
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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 2, 2016 at 11:21pm —
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वागीश्वरी सवैया सूत्र : यगण X 7 + ल गा
(1)
कहीं भी कभी भी यहाँ भी वहाँ भी, किसी को किसी का भरोसा नहीं |
यही है ज़माना बताऊँ तुझे क्या, ज़रा भी सलीक़ा नहीं है कहीं |
इसी के लिये तो हमारी वफ़ा ने, जहां में कई यातनाएं सहीं |
बड़ों ने बताया जिसे ढूंढते हो, भरोसा यहीं है मिलेगा यहीं ||
(2)
भलाई हमें तो दिखी है इसी में, कभी भी दुखों में न आहें भरें |
हमारे लिये तो यही है ज़रूरी, यहाँ कर्म अच्छे हमेशा करें |
हमें ये सिखाया गया है कि भाई, हदों को न…
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Added by Samar kabeer on November 2, 2016 at 10:56pm —
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अंत के गर्भ में .....
मैं
व्यस्त रही
अपने बिम्बों में
तुम्हारे बिम्ब को
तलाशते हुए
तुम
व्यस्त रहे
अपने
स्वप्न बिम्बों को
तराशने में
हम
व्यस्त रहे
इक दूसरे में
इक दुसरे को
ढूंढने में
पर
वक्त ने
वक्त न दिया
हम
ढूंढते ही रह गए
आरम्भ को
अंत के गर्भ में
सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on November 2, 2016 at 10:11pm —
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1222 1222 122
तभी अंदर ही अंदर जल रहा हूँ
मैं अपनी तिश्नगी को पी गया हूँ
कहीं देखा है मेरे हमसफ़र को?
भटकते रास्तों से पूछता हूँ
मैं इक दरिया हूँ, तू मेरी रवानी
तेरे बिन देख ले, ठहरा हुआ हूँ
खुला आकाश मेरे सामने है
परिंदा हूँ, मगर मैं पर-कटा हूँ
मुझे मालूम है अंजाम अपना
ज़माना संग-दिल, मैं काँच का हूँ
कहीं मिलता नहीं हूँ ढूंढने पर
मैं अपने आप ही में खो गया हूँ
(मौलिक व अप्रकाशित)
Added by जयनित कुमार मेहता on November 2, 2016 at 4:19pm —
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अभी कल की ही तो बात रही
दो चार ही पल छीन पाए
इक उगती शाम की झोली से
फिर न चाँद ऊगा न सितारे ढल पाए
शर्मसार हो डूबा सूरज स्वंय को स्वंय से छिपाए
…
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Added by amita tiwari on November 1, 2016 at 10:00pm —
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नेताजी ने अभी हाल ही में नेशनल पार्क में फोटोग्राफ़ी की थी। उनके इस छायांकन के शौक़ पर सवाल दाग़ते हुए पत्रकार ने कहा- "पिंजड़े में बंद उस बाघ की तस्वीरें विभिन्न कोणों से लेते हुए आपको कैसा अनुभव हुआ?"
"अनुभव? मुझे तो लग रहा था जैसे कि वह मुझे पहले से ही भली-भाँति पहचनता हो...हा हा हा!"
"नहीं, हमारा मतलब यह है कि क्या आपको उसमें विपक्षी दल नज़र आ रहे थे या दिल्ली का आम आदमी का कोई नेता-वेता या आपके दल का कोई रिटायर्ड बुद्धिजीवी!"
"हा हा हा... देखने और गुर्राने…
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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 1, 2016 at 6:02pm —
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दिए कुछ आस के ......
आँखों से झांक रहे
सपने विश्वास के
देहरी पर जल रहे
दिए कुछ आस के
नेह के भरोसे ही
कुछ रिश्ते जोड़े हैं
तुमने न जाने क्यूँ
अनुबंध सारे तोड़े हैं
मौन की पीडाएं ही
मुझको तो छलती हैं
पास तुम आते हो
दूरी तब ढलतीं हैं
सम्बन्ध ले आये हैं
रिश्ते कुछ पास के
देहरी पर जल रहे
दिए कुछ आस के |
नश्तर से चुभते हैं
धूप के सुनहरे…
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Added by Abha saxena Doonwi on November 1, 2016 at 4:00pm —
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देश से अपने हमें तो प्यार है
देशद्रोही मत बनो, धिक्कार है।1
धूप-धरती सब मिले तुझको यहाँ
देश की तुझको सखे दरकार है।2
जड़ बिना पौधा कहीं पनपा नहीं
देश की माटी बड़ा आधार है।3
चल रहे हैं बेवजह के चुटकुले
भेदियों की हो गयी भरमार है।4
सनसनाते हैं यहाँ नारे बहुत
'भारती'माँ की कहो जयकार है।5
कैद तेरी बात अब क्यूँ हो गयी?
रे! जवानी को बड़ी ललकार है।6
रोशनी पूरब से' देखो हो रही
झाँक लो अंदर यही मनुहार…
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Added by Manan Kumar singh on November 1, 2016 at 8:30am —
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