Added by Manan Kumar singh on December 21, 2015 at 10:24am — 4 Comments
दूर क्षितिज में देखा तारा ,सबका मन हर्षाया
पाप बंध से हमें छुड़ाने,मरियम सुत था आया
दया प्रेम भाईचारे का ,था सन्देश सुनाता
दीन दुखी की सेवा से ही ,जुड़े प्रभु से नाता
आडम्बर में लिप्त जनों को .उसका सत्य न भाया
पाप बंध से हमें छुड़ाने ,मरियम सुत था आया
मानवता के हत्यारे तो ,हर युग में हैं आते
इनका कोई धर्म न होता ,पर दुःख में सुख पाते
उन लोगों ने फिर ईसा को ,था सलीब चढ़वाया
पाप बंध से हमें छुड़ाने ,मरियम…
ContinueAdded by pratibha pande on December 21, 2015 at 10:00am — 9 Comments
पिघली हुई आँच
कुछ ऐसी ही
पीली उदासीन संध्याएँ
पहले भी आई तो थीं
पर वह जलती हुई भाफ लिए
इतनी कष्टमयी तो न थीं
दिल से जुड़े, चंगुल में फंसे हुए
द्व्न्द्व्शील असंगत फ़ैसलों पर तब
"हाँ" या "न" की कोई पाबंदी न थी
"जीने" या "न जीने" का
साँसों में हर दम कोई सवाल न था
अनवस्थ अनन्त अकेलापन
तब भी चला आता था
पर वह दिल के किसी कोने में दानव-सा
प्रतिपल बसा नहीं रहता…
ContinueAdded by vijay nikore on December 21, 2015 at 3:58am — 8 Comments
ग़ज़ल
२१२२/१२१२/२२ (११२)
.
अपने अहसास दर-ब-दर रखते,
उन से उम्मीद हम अगर रखते.
.
कौन आता यहाँ, जो पूछता ‘वो’,
चाँद तारों में हम भी घर रखते.
.
नींद आती जो रात भर के लिए,
उन को ख़्वाबों में रात भर रखते.
.
जंग से क़ब्ल हार जाते हम,
दिल में ज़ालिम का हम जो डर रखते
.
वो ख़ुदा ही मिला नहीं हम को,
जिस के क़दमों पे अपना सर रखते.
.
मुख़बिरी करते थे ज़माने की,
काश ख़ुद की भी कुछ ख़बर रखते.
.
छोड़ देते…
Added by Nilesh Shevgaonkar on December 20, 2015 at 10:20pm — 24 Comments
।।नियाग्रा फाल।।
" मम्मी बधाई हो ,आप दादी बनने वाली है ।तीन माह हो गये।"
खुशी से सराबोर, जल्दी से स्पीकर आन कर ।"बधाई हो,बधाई
हो, बेटा ख्याल रखना बहू का ,पहले क्यों नहीं बताया, बहू
ठीक तो है ना , कोई परेशानी तो नहीं ?"
"सब ठीक है मम्मी । मम्मी, पापा से कहो पासपोर्ट बनवा लें दोनों का।अभी टाइम है तब तक में बन ही जायेगा ।"
"पासपोर्ट का क्या करना है बेटा ?"
"क्यों ,यहाँ अमेरिका घूमने नहीं आओगे ?"
"तेरे पापा को छुट्टियां कहां मिलती है ?"
"मम्मी मैं कुछ…
Added by Pawan Jain on December 20, 2015 at 5:25pm — 2 Comments
परीक्षाएं सिर पर होने से उसका अधिक से अधिक समय कमरे में ही बीतता था I आज फिर भीतर से ही आवाज़ आई थी I ' मॉम आज मटर की दाल बनाओ न !! '
' अच्छा ' कह मैं मुस्कुराई थी I संभवतः उसने सुन लिया था की मैंने आज सब्जी वाले से मटर ख़रीदे हैं I सोचा ,जा कर पूछ लूँ ! ' और कुछ भी चाहिए !!' भीतर गयी तो कमरे में जो नजारा दिखा ,जेहन में एक ही बात आई ' उफ़ ! ये लड़की भी न !! '…
Added by meena pandey on December 20, 2015 at 1:30am — 6 Comments
एक दिन सच और झूठ एक दूसरे से मिले, दोनों ने सोचा हमें एक जैसा दिखना चाहिये, ताकि लोग खुद ही अपने विवेक से सच और झूठ को पहचान सकें|
और उन्होंने एक जैसे कपड़े पहने और एक जैसे मुखौटे चेहरे पर लगा दिये फिर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर वादा किया कि किसी को अपना चेहरा उजागर नहीं करेंगे|
उसके बाद आज तक झूठ की मधुर आवाज़ के कारण कई लोग झूठ को ही सच समझते हैं और सच अपने वादे के कारण खुद…
ContinueAdded by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 19, 2015 at 7:05pm — 4 Comments
‘बेशक हमारे भाई साहिब को देश छोड़े एक अर्सा हो गया यू.एस.ए. में उन्होनें अपना बिजनेस एम्पायर खड़ा कर लिया है पर उन्हें अपने देश और अपनी संस्कृति से अब भी बहुत प्यार है। इसलिए वो अपने बेटे के लिए मेम नहीं बल्कि एक सुसंस्कृत भारतीय बहू चाहते है।’ शहर के नामचीन बिल्डर अपनी डाॅक्टर पत्नी सहित मेयर साहिब के घर उनकी इकलौती बेटी के लिए अपने भतीजे के रिश्ते के सिलसिले के लिए बतिया रहे थे।
‘यह तो बहुत अच्छी बात है। मेरी बहन व बहनोई भी यू.एस.ए. सिटीज़न हैं । वो आपके भाई साहिब को बहुत…
ContinueAdded by Ravi Prabhakar on December 19, 2015 at 1:46pm — 9 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 19, 2015 at 9:15am — 7 Comments
Added by Janki wahie on December 19, 2015 at 7:16am — 6 Comments
बैजनाथ शर्मा 'मिंट'
अरकान - 122 122 122 122
गमख्वार समझा था मक्कार निकला|
जो दिखता था सज्जन गुनहगार निकला|
जिसे…
ContinueAdded by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 17, 2015 at 11:41pm — 9 Comments
गंगा जमुनी परंपरा को
मानव मन में झंकृत कर दो
वेद रिचाएँ महक उठे सब
मंत्रों को उच्चारित कर दो
हे! भारत जागो
गुंफित हो वन उपवन सारे
अवनी को शुभ अवसर दे दो
रुके पलायन गाँव गली का
हृदय में समरसता भर दो
हे! भारत जागो
बलिदानों के प्रतिबिम्बन में
रिश्ते फूलें खुले गगन में
छुपी हुई मंथर ज्वाला को
मानवता में मुखरित कर दो
हे! भारत जागो
रूप तरुण तेरा मन…
ContinueAdded by kalpna mishra bajpai on December 17, 2015 at 8:44pm — 6 Comments
Added by Janki wahie on December 17, 2015 at 10:50am — 11 Comments
आदम फितरत है
भई
राम ने आसन्न -प्रसूता
को छोड़ दिया वन में
जीने, भटकने या मरने
भला हो वाल्मीकि का --- I
और कुछ ऐसा ही किया
कृष्ण ने राधा के साथ
छोड़ दिया निराश्रित
जीने, भटकने या मरने I
सीता का अंत तो जानते है सभी
इसी माटी में दफ़न हुयी थी कभी
पर राधा ------?
कब तक तकती रही राह ?
भेजती रही पाती और सन्देश
फिर कहाँ गयी वह ?
कैसे हुआ उसका अंत ?
किसी ने भी याद नही रखा
लानत…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2015 at 7:19pm — 2 Comments
जोश-ए-वस्ल में हुजूर को, उम्र का तकाजा याद नहीं
तड़पता जिस्म, भरी आँखे, कैसे हुआ कलेजा याद नहीं
भूल गया था वहशी, थी फकत शरारत की इक रात
हया और ज़िल्लत-ए-ज़माना, कब उठा जनाजा याद नहीं
होठों पे हंसी थी उनके और आँखों में चमक झलकी थी
दफ़न ही था दर्दे-दिल फिर, कैसे हुआ अंदाजा याद नहीं
राह बजी जब सीटियाँ, कान बंद और नज़र झुकी रहीं
जुनूने इश्क में जालिम ने, कब कसा शिकंजा याद नहीं
ज़माना क्यों नहीं देखता, मन की…
ContinueAdded by Nidhi Agrawal on December 16, 2015 at 2:44pm — 5 Comments
स्वच्छता की शपथ लेकर,घर- घर अलख जगाना है
भारत स्वच्छ बनाना है, आदर्श देश बनाना है-----------
नागरिक की भागीदारी, जन-सेवा की अब तैयारी
स्वच्छता की जिम्मेदारी , जन-जन की हो भागीदारी
जन-आँदोलन स्वच्छता के , नाम पर चलाना है
भारत स्वच्छ बनाना है ,आदर्श देश बनाना है ------------------
स्वच्छता ही सम्पदा है ,बात यह तुम जान लो
सड़कों ,गलियों की सफाई ,अभियान यह ठान लो
सुव्यवस्थित शौचालय ,कचरा ठिकाने लगाना है
भारत स्वच्छ बनाना है ,आदर्श देश…
Added by kanta roy on December 16, 2015 at 1:45pm — 1 Comment
Added by jyotsna Kapil on December 16, 2015 at 12:32pm — 4 Comments
ग़ज़ल
*******
2222 2222 2222 222
********************************
आग लगाई क्या अपनों ने अरमानों के मेले में
बैठ गया जो आँसू लेकर मुस्कानों के मेले में /1
कर के बहाना सब मरहम का दुखती रग को छेड़ेंगे
घाव खोल कर बैठ न जाना पहचानों के मेले में /2
छोड़ गए हैं अपने अकेला एक अपाहिज बोझ समझ
अब्दुल्ला सा मन होता है अनजानों के मेले में /3
जब तक जेब भरी थी अपनी घर आगन सब अपना था
जेबें खाली तो बदला सब …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2015 at 11:43am — 20 Comments
जाने क्यों
क्या ढूँढ़ने उतरते हो
रात के अंधेरे में ओ कोहरे,
चुपचाप, इस धरती की छाती पर
फिर अक्सर थक कर सो जाते हो
पत्तियों के ठिठुरते गात पर
और सहमी, पीली पड़ गयी
तिनके की नोक पर –
गाड़ी के शीशे से
न जाने कहाँ झाँकने की कोशिश में
चिपक जाते हो तुम,
अक्सर.
सुबह की थाप तुम्हें सुनायी नहीं देती
उद्दण्ड बालक की तरह
धरती का बिस्तर पकड़कर,
मुँह फेरकर सोये रहते हो
जब तक कि फुटपाथ पर
रात भर करवटें…
Added by sharadindu mukerji on December 16, 2015 at 2:30am — 6 Comments
" नानी ,आप दोनों की शादी को पचास साल के ऊपर हो गए i वाऊ "I
"और फिर भी हम दोनों खुश दिख रहे हैं ,ये ही पूछना चाह रही हो ना ?"नाना जी पीछे खड़े मुस्करा रहे थे I
"तब ऑप्शंस कम थे न बेटा , मोबाइल इन्टरनेट कुछ भी नहीं था ,जो माँ बाप ने ढूँढ दिया बस उसी को झेल रहे हैं I"नानी की आँखों में शैतानी थीI
"ऑप्शंस होते तो मैडम इतनी अच्छी खिचड़ी खिलाने वाला मिलता तुम्हे "? नानी के हाथ में गरम खिचड़ी की प्लेट थमाते नाना पास आके बैठ गएI
छःमहीने पहले जब से इस शहर में नौकरी लगी है…
ContinueAdded by pratibha pande on December 15, 2015 at 11:00pm — No Comments
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