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ग़ज़ल सीमा शर्मा

पहेली दिल की सुलझाऊँ तो कैसे

मैं इससे हार भी जाऊं तो कैसे।



लिपट जातें हैं पावों से बगूले

मैं बाहर दश्त से आऊँ तो कैसे।



पुकारे आसमां बाहें पसारे

परों बिन पास मैं जाऊं तो कैसे ।



धड़कता है वो दिल में दर्द बनकर

मैं उसको भूल भी जाऊं तो कैसे ।



गुलो पर बूँद मैं शबनम की बनके

हवा में फिर से घुल जाऊं तो कैसे।



उमड़ती ज़ह्ण में ख़्वाबों की नदियां

समन्दर मुट्ठी में लाऊँ तो कैसे



बदन पर पैरहन यादों का तेरा

नज़र…

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Added by सीमा शर्मा मेरठी on December 29, 2015 at 10:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कसीदे काम के पिछले सुना है वो पढ़ेगा कल (नव वर्ष पर ग़ज़ल 'राज )

नई हसरत नई हिम्मत नई परवाज़ देगा कल

मिटाने  तीरगी सबकी  नया सूरज उगेगा कल

 

नये सपने उगाये खेत में देखो सियासत ने

फ़लक तक कीमतें पाकर बशर बेबस हँसेगा कल

नये इस दौर में आकर हुआ नेता कलम मेरा

अधूरा छोड़ कर कल का नया वादा लिखेगा कल 

 

किसी भी रोज दफ्तर में किया कुछ भी नहीं जिसने

कसीदे काम के पिछले  सुना है वो पढ़ेगा कल

 

जो पिछले साल सोचे थे हुए पूरे कहाँ उसके  

भुलाकर वो पुराने अब नये संकल्प लेगा…

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Added by rajesh kumari on December 29, 2015 at 8:30pm — 10 Comments

दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको

२१२  २१२  २१२  २१२ 

दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको 

तय ही है प्यार करना नहीं आपको 

चाँद अम्बर पे भी चाँद छत पे भी है 

कुछ भी हो है बहकना नहीं आपको 

रात दिन हुस्न क्यूँ यूं संवरता फिरे 

आँखों से कुछ समझना नहीं आपको 

बात गुल बुलबुलों तोता मैना कि क्या 

है कभी जब चहकना नहीं आपको 

सूखती जूड़े में नित नयी गुल कली 

खूब समझे बदलना नहीं आपको 

कितना भी यूं घटाओं सा उमड़ो मगर 

अब्र जैसे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on December 29, 2015 at 6:30pm — 8 Comments

अन्ना , मेरे भरोसे मत रहना / प्रदीप नील

लगे रहो तुम मेरे प्यारे, पीछे मत हटना अन्ना हज़ारे

सोलह से अनशन ज़रूर करना, अब किसी से ज़रा न डरना

क्योंकि पूरा देश तुम्हारे साथ है

पर ये और बात है,

कि मैं नहीॅं आ पाऊंगा ।

क्योंकि बिजली चोरी करते पकड़ा गया था

ज़ुर्माना भरने अदालत जाऊंगा

मज़बूरी है वर्ना ज़़रूर आता , साथ तुम्हारे नारे लगाता

गली-गली में शोर है, हर एक नेता चोर है ।।

अन्ना, मैं सत्रह को भी नहीं आ पाऊंगा

नया मकान खरीदा है, रजि़स्ट्री कराने जाऊंगा

मैं वहां मौज़ूद रहा तो दो…

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Added by प्रदीप नील वसिष्ठ on December 29, 2015 at 12:49pm — 2 Comments

देसी औरत (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (48)

कड़ाके की सर्दी में सर्दी-बुख़ार से पीड़ित गर्भवती औरत कम्बल ओढ़े हुए ज़ोर-ज़ोर से कराह रही थी। रेलवे स्टेशन की टिकट खिड़की के पास ही एक कोने में अपने पति के साथ वह देर रात से बैठी हुई थी ।



"क्यों रे , अपनी लुगाई को सरकारी अस्पताल क्यों नहीं ले जा रहा, रात भर से कराह रही है। अब तो ऑटो- रिक्शा भी मिल जायेगा !"- एक कैन्टीन वाला दूर से ही चिल्लाकर बोला । पति खड़े होकर इधर उधर देखने लगा, फिर ठिठुरते हुए वापस अपनी जगह पर बैठ गया । औरत लगातार कराह रही थी। उसने इशारों से पति को परेशान न… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 29, 2015 at 9:43am — 10 Comments

कुछ छन्नपकैया सारछन्द

छन्न पकैया छन्न पकैया, खाकर रोटी चटनी

अब तो हम छन्दों में यारो,कहते विपदा अपनी



छन्न पकैया छन्न पकैया,सोवत काहे भैया

तेरी इस निंदिया के कारण डूब न जाये नैया



छन्न पकैया छन्न पकैया ,जीवन बीता रोते

क्यूँकि अपने साथ साथ औरों का दुःख भी ढोते



छन्न पकैया छन्न पकैया ,मुझ पर छींटा कँसती

जब भी मैं सच कहता हूँ ये ज़ालिम दुनिया हँसती



छन्न पकैया छन्न पकैया,भटके दर दर जोगी

कि भिक्षा देता वही उसे जो होता मन का रोगी



छन्न पकैया छन्न… Continue

Added by Samar kabeer on December 28, 2015 at 11:02pm — 8 Comments

आईने की दुनिया

उसे कुछ दिखाई नहीं देता

सिवा

अपने आप के

अपनी आँखों के सामने

उसने रखा है

आईना

वह रहता है आत्ममुग्ध

समझता है स्वयं को ही

सबसे सुंदर

सर्वश्रेष्ठ

उसने देखा नहीं है

कोई और चेहरा

उसे कुछ सुनाई भी नहीं देता

बंद कर रखे हैं

उसने अपने कान

वह सुनता है

सिर्फ अपने आप को ही

गूँजती है उसके कान में

अपनी ही आवाज

मानता है अपनी बात को ही

एक मात्र सत्य

चाहता है समूची दुनियाँ को

बनाना अपने जैसा

आँखों…

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Added by Neeraj Neer on December 28, 2015 at 8:34pm — 3 Comments

तुलना (लघुकथा)

आज 'उनका' फ़ोन आया था।फोन तो रोज ही आता था पर आज कुछ ख़ास बात कही आता उन्होंने। उन्होंने कहा,"अब शादी का दिन करीब आ रहा है थोड़ी 'डाइटिंग' कर लो। माँ कह रही थी कि स्टेज पर बैठेगी तो पतली ही अच्छी लगेगी। अभी दो महीने हैं। मैं तुम्हे 'डाइट प्लान' और योग की सीडी भेज दूँगा,प्लीज मेरे लिए करोगी न।"

शब्द घर कर गए दिल में,अब घबराहट होने लगी थी कि पतली न हुई तो 'उनकी' माँ और 'वो' क्या सोचेंगे मेरे बारे में....

अब रह रह कर माँ और भाई की बाते याद आ रही थी...कितना टोकते थे मुझे....मीठा खाने…

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Added by निधि जैन on December 28, 2015 at 7:00pm — 2 Comments

गजल

गजल

2122 212 2122 2122

था फलक निज का कभी हो गया अब हाशिया हूँ

रोशनी तब थी मिली खो गयी बस मैं जिया हूँ।1

ढूँढता तब से रहा मैं अरे मिल भी सकी कब?

वह पहेली हो रही अब इधर मैं मुँह सिया हूँ।2

आ गये कितने खिलाड़ी खला मैं उन भलों को

खाल घर की बेचते बोलते खुद काफ़िया हूँ।3

तब लड़ी मैंने लड़ाई थके बिन जय कही भी

दुश्मनों पर छक चढ़ा फिर छका कर जय किया हूँ।4

जल सपन अपने गये बस रही है आरजू यह

हर कली खिल सज चले अब नये मग क्या लिया हूँ?5

लूटते हो लाज तुम… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 27, 2015 at 10:00pm — 2 Comments

गाँधी जी का तीसरा बंदर (लघुकथा)

"क्या बात है?" घर पहुँचते ही उसकी माँ ने उसकी आँखों में आँसू और पिता की आँखों में चिंता को देखकर घबरा कर पूछा|

उसके पिता ने बताया, "सेठ जी के बेटे और सामने वाले भाईसाहब की बेटी के बीच कुछ चल रहा था, इसे सब बात पता थी| अब कल किसी बात पर उस लड़की ने आत्महत्या कर ली, तो आज ये पुलिस को सब बातें बताने लगी| वो तो ऐन वक्त पर मैनें भीड़ का फायदा उठा कर इसका मुंह बंद कर दिया नहीं तो....."

"नहीं तो क्या बाबूजी?" उसने पूछा

"किसी के फटे में हम टांग क्यों डालें? तू चुप नहीं रह सकती?"…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 27, 2015 at 4:00pm — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हौंसलों के पंख (गीत).......डॉ0 प्राची



हौसलों के पंख ओढ़े

स्वप्न फिर थिरके सभी,

चूम कर अपना धरातल

उड़ चले विस्तार को...

क्या हुआ गत वक्त की यदि बेड़ियाँ थीं क्रूरतम

क्या हुआ जख्मी हृदय यदि दर्द से होते थे नम

स्वप्न में कण भर धड़कते प्राण जब तक शेष हैं

जीतती है आस तब तक, हारते विद्वेष हैं

हर विगत की आँच पर रख

नर्म भावों की छुअन,

बढ़ चले हैं स्वप्न फिर

युग के नवल शृंगार को...

हो निशा चाहे घनेरी ये चलेंगे पार तक

राह नित गढ़ते बढ़ेंगे रौशनी केे द्वार तक…

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Added by Dr.Prachi Singh on December 27, 2015 at 1:00am — 13 Comments

फेरे लघुकथा

फेरे '



घर के काम से फ़ुरसत हो थोड़ा आराम करने जा ही रही थी , वक़्त बेवक्त घंटी के बजते ही मन में आया इस समय कौन होगा, अभी सूरज के आने का समय तो हुआ नहीं है, दरवाज़े पर पति को देख मैं चकित रह गई।

"अरे आप !!!!" पति को अचानक सामने ,पसीने से तरबतर देख ,अपने आप को बोलने से रोक ना पाई।

पानी लेने जा रही थी, सूरज ने हाथ पकड़ कर रोक लिया।

"तुमसे कुछ कहना है मुझे सुमन, मैं फिसल गया, रोशनी से संबंध बना बैठा , मुझे माफ़ करोगी ना मुझे हर सज़ा मंज़ूर है।

तुम्हारे,बच्चों के बिना… Continue

Added by Nita Kasar on December 26, 2015 at 6:20pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
टूटे हुए मकान का सामान बन गये (तरही ग़ज़ल 'राज ')

221  2121   1221   212

अपने लहू से आज वो अन्जान बन गये

टूटे हुए मकान का सामान बन गये

 

ज़ज्बात से किसी को यहाँ वास्ता नहीं

ड्राइंग रूम में रखा दीवान बन गये 

 

बेगानों की तरह रहे अपने ही देश में

बस चार पाँच दिन के ही मेह्मान बन गये

 

अपने ही घर में किश्तियाँ महफूज़ हैं कहाँ

साहिल के आस पास ही तूफ़ान बन गये

 

छोड़ी कसर न देखिये कुदरत को लूटकर

आफ़ात आ पड़ी तो अब इंसान बन गये

 

करतूत वो करें…

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Added by rajesh kumari on December 26, 2015 at 12:28pm — 20 Comments

निन्यानबे के फेर में

निन्यानबे के फेर में

हूँ मैं  

लोग देखते है मुझे

ईर्ष्या से या हिकारत से

क्योंकि वे जानते हैं

केवल और केवल एक मुहावरा 

मानव की कमजोर वृत्ति का

धन संचय की उत्कट प्रवृत्ति का

उन्हें यह  पता ही नहीं कि

मुहावरे के पीछे होता है

कोई चिरंतन सत्य या एक इतिहास  

और बहुत सारे मायने

वे सोचते भी नहीं

कि निन्यानबे वे वैशिष्ट्य भी हैं  

जिनके आधार पर  उस ऊपर वाले के है

निन्यानबे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 26, 2015 at 12:00pm — 8 Comments

पेट की जुगाड़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (47)

चौंक गयी थी कुन्ती पहली बार इतनी बड़ी मशीनों को देखकर। तो अम्मा और कम्मो इसी लिए बुरी तरह थक जाती थीं । वह चीख कर कम्मो को रोकना चाह रही थी कि कारखाने के श्रमिक उसके पिता ने अपनी कठोर हथेलियां उसके मुँह पर रख दीं। फ़िर धीरे से उसके कान में उसने कहा - " पगली यहाँ पीछे से चिल्लायेगी , तो उसका हाथ मशीन में फंस न जायेगा !"



"बापू तुम इतनी कम उमर में कम्मो दीदी से ये काम करवाते हो !"



"पेट की जुगाड़ के लिए अगले बरस से तुझे भी आना पड़ेगा, तेरी अम्मा से अब नहीं होता । साहब कह रहे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 26, 2015 at 10:11am — 9 Comments

अंतरात्मा - लघुकथा

अंतरात्मा - लघुकथा

देवरानी को जलाने के अमानवीय कृत्य की एकमात्र साक्षी वही थी और ससुराल पक्ष के साथ पति भी उस पर सच न बोलने के लिए हर तरह से दबाब दे रहा था।

"देख उर्मि, तेरी एक गवाही आज ससुराल की मान मर्यादा को समाज की नज़रो में गिरा देगी और यदि ऐसा हुआ तो फिर मुझसे बुरा ....।" पति के कहे शब्द उसकी चुप्पी बन रहे थे तो अंतरात्मा उसे बेचैन कर रही थी। "नहीं उर्मि नहीं इस बार तूझे चुप नहीं......।"

"देखिये! आप जो कुछ कहे, सोच समझकर निडर हो कर कहे।" गवाही के लिए खड़ी उर्मिला को कुछ सहमे… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on December 26, 2015 at 8:32am — 5 Comments

फिर से कहा जैती पुर क कथा

फिर से कहा (जैतीपुर क कथा )

“नारायण बाबा “ “हे नरायण बाबा” पल्टू ने दुआरे से आवाज़ लगाते हुए पुकारा

“कौन है रे !सुबह –सुबह इतनी ज़ोर से बाग दे रहा है |”

“हम है बाबा |”पतलून और बुशर्ट पहिने और काला चश्मा लगाए साँवला मरियल सा लड़का बोला

“माफ करना बच्चा,पर तुम - - -“नारायण मिश्र ने पेशानी पर ज़ोर डालते हुए कहा

“हम है बाबा ,जोखू यादव का लौंडा पल्टू |याद तो होगा आपको |”

“अच्छा तो तू वही लौंडा है जिसका नेटा हमेशा बहता रहता था और जो दू के आगे कभी गिनबे नहीं किया |”

“जी… Continue

Added by somesh kumar on December 25, 2015 at 7:54pm — 7 Comments

अहसास

अहसास क्रिसमस की छुट्टियों में आये पोता पोती ,दादी जी के लाड प्यार में पूरे घर में धमा चौकडी मचाये रखते हैं ।इस बार दादी को फेसबुक और इंटरनेट का पाठ याद करा दिया । आज न जाने क्या सूझी दादी को दोनों को लेकर रसोई में पहुंच गई ।सभी दालें दिखाई पर सिर्फ चना और राजमा पहचान पाये ,दादी ने सभी अनाजों की पहचान कराई ,नया पाठ था बच्चों को , जल्दी सीख गए । "बेटा सचिन कुकर उठाओ ,इसका ढक्कन लगाओ ।" "दादी यह तो लग ही नहीं रहा ।" "देखो बेटा यह गास्केट है ,यह सेफ्टी वाल्व है ,तुम्हें यह तो मालूम है कि कुकर…

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Added by Pawan Jain on December 25, 2015 at 5:30pm — 4 Comments

तराशते पत्थर (कविता) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

चित्र या चलचित्र

से

चर्चित विचित्र

पथभ्रष्ट कट्टर

बस

तराशते पत्थर ।

किस निमित्त

बनती, टूटती

ईंट-पत्थर की इमारत

आस्थाओं की इबारत

किसकी, कैसी

प्रार्थना या इबादत

कुछ

हटकर

साम्प्रदायिकता से

सटकर डटकर

अमन-चैन को देकर

कठोर टक्कर

भावुक जन-गण से

चंदा जुटाकर

नमूने दिखाकर

अपने ही मुल्क के

क़ानून को

बस

ठेंगा दिखाकर

कौन, कैसे

कलाकारों के हाथों

उकेरते पत्थर

चर्चित… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 24, 2015 at 2:57pm — 1 Comment

चुटकियाँ- ….. …



चुटकियाँ- ….. …



नेता   क्या   और भाषण क्या

भाषण   पे   अनुशासन  क्या

मूक    बधिर   इस जनता को

व्यर्थ   में     आश्वासन    क्या !!1!!



देश   क्या     विकास      क्या

बिन    कुर्सी  मधुमास    क्या

छल करते जो नित् निर्बल  से

उस आवरण का विश्वास   क्या !!2!!



नीति   क्या    अनीति      क्या

भ्रष्ट की  सोच   से  प्रीति   क्या

जनता के जो खून  से   जिन्दा

उस   नेता   की  परिणति क्या !!3!!



फ़र्ज़    क्या  …

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Added by Sushil Sarna on December 24, 2015 at 1:27pm — 6 Comments

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