पहेली दिल की सुलझाऊँ तो कैसे
मैं इससे हार भी जाऊं तो कैसे।
लिपट जातें हैं पावों से बगूले
मैं बाहर दश्त से आऊँ तो कैसे।
पुकारे आसमां बाहें पसारे
परों बिन पास मैं जाऊं तो कैसे ।
धड़कता है वो दिल में दर्द बनकर
मैं उसको भूल भी जाऊं तो कैसे ।
गुलो पर बूँद मैं शबनम की बनके
हवा में फिर से घुल जाऊं तो कैसे।
उमड़ती ज़ह्ण में ख़्वाबों की नदियां
समन्दर मुट्ठी में लाऊँ तो कैसे
बदन पर पैरहन यादों का तेरा
नज़र…
Added by सीमा शर्मा मेरठी on December 29, 2015 at 10:00pm — 13 Comments
नई हसरत नई हिम्मत नई परवाज़ देगा कल
मिटाने तीरगी सबकी नया सूरज उगेगा कल
नये सपने उगाये खेत में देखो सियासत ने
फ़लक तक कीमतें पाकर बशर बेबस हँसेगा कल
नये इस दौर में आकर हुआ नेता कलम मेरा
अधूरा छोड़ कर कल का नया वादा लिखेगा कल
किसी भी रोज दफ्तर में किया कुछ भी नहीं जिसने
कसीदे काम के पिछले सुना है वो पढ़ेगा कल
जो पिछले साल सोचे थे हुए पूरे कहाँ उसके
भुलाकर वो पुराने अब नये संकल्प लेगा…
ContinueAdded by rajesh kumari on December 29, 2015 at 8:30pm — 10 Comments
२१२ २१२ २१२ २१२
दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको
तय ही है प्यार करना नहीं आपको
चाँद अम्बर पे भी चाँद छत पे भी है
कुछ भी हो है बहकना नहीं आपको
रात दिन हुस्न क्यूँ यूं संवरता फिरे
आँखों से कुछ समझना नहीं आपको
बात गुल बुलबुलों तोता मैना कि क्या
है कभी जब चहकना नहीं आपको
सूखती जूड़े में नित नयी गुल कली
खूब समझे बदलना नहीं आपको
कितना भी यूं घटाओं सा उमड़ो मगर
अब्र जैसे…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on December 29, 2015 at 6:30pm — 8 Comments
लगे रहो तुम मेरे प्यारे, पीछे मत हटना अन्ना हज़ारे
सोलह से अनशन ज़रूर करना, अब किसी से ज़रा न डरना
क्योंकि पूरा देश तुम्हारे साथ है
पर ये और बात है,
कि मैं नहीॅं आ पाऊंगा ।
क्योंकि बिजली चोरी करते पकड़ा गया था
ज़ुर्माना भरने अदालत जाऊंगा
मज़बूरी है वर्ना ज़़रूर आता , साथ तुम्हारे नारे लगाता
गली-गली में शोर है, हर एक नेता चोर है ।।
अन्ना, मैं सत्रह को भी नहीं आ पाऊंगा
नया मकान खरीदा है, रजि़स्ट्री कराने जाऊंगा
मैं वहां मौज़ूद रहा तो दो…
Added by प्रदीप नील वसिष्ठ on December 29, 2015 at 12:49pm — 2 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 29, 2015 at 9:43am — 10 Comments
Added by Samar kabeer on December 28, 2015 at 11:02pm — 8 Comments
उसे कुछ दिखाई नहीं देता
सिवा
अपने आप के
अपनी आँखों के सामने
उसने रखा है
आईना
वह रहता है आत्ममुग्ध
समझता है स्वयं को ही
सबसे सुंदर
सर्वश्रेष्ठ
उसने देखा नहीं है
कोई और चेहरा
उसे कुछ सुनाई भी नहीं देता
बंद कर रखे हैं
उसने अपने कान
वह सुनता है
सिर्फ अपने आप को ही
गूँजती है उसके कान में
अपनी ही आवाज
मानता है अपनी बात को ही
एक मात्र सत्य
चाहता है समूची दुनियाँ को
बनाना अपने जैसा
आँखों…
Added by Neeraj Neer on December 28, 2015 at 8:34pm — 3 Comments
आज 'उनका' फ़ोन आया था।फोन तो रोज ही आता था पर आज कुछ ख़ास बात कही आता उन्होंने। उन्होंने कहा,"अब शादी का दिन करीब आ रहा है थोड़ी 'डाइटिंग' कर लो। माँ कह रही थी कि स्टेज पर बैठेगी तो पतली ही अच्छी लगेगी। अभी दो महीने हैं। मैं तुम्हे 'डाइट प्लान' और योग की सीडी भेज दूँगा,प्लीज मेरे लिए करोगी न।"
शब्द घर कर गए दिल में,अब घबराहट होने लगी थी कि पतली न हुई तो 'उनकी' माँ और 'वो' क्या सोचेंगे मेरे बारे में....
अब रह रह कर माँ और भाई की बाते याद आ रही थी...कितना टोकते थे मुझे....मीठा खाने…
Added by निधि जैन on December 28, 2015 at 7:00pm — 2 Comments
Added by Manan Kumar singh on December 27, 2015 at 10:00pm — 2 Comments
"क्या बात है?" घर पहुँचते ही उसकी माँ ने उसकी आँखों में आँसू और पिता की आँखों में चिंता को देखकर घबरा कर पूछा|
उसके पिता ने बताया, "सेठ जी के बेटे और सामने वाले भाईसाहब की बेटी के बीच कुछ चल रहा था, इसे सब बात पता थी| अब कल किसी बात पर उस लड़की ने आत्महत्या कर ली, तो आज ये पुलिस को सब बातें बताने लगी| वो तो ऐन वक्त पर मैनें भीड़ का फायदा उठा कर इसका मुंह बंद कर दिया नहीं तो....."
"नहीं तो क्या बाबूजी?" उसने पूछा
"किसी के फटे में हम टांग क्यों डालें? तू चुप नहीं रह सकती?"…
ContinueAdded by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 27, 2015 at 4:00pm — 10 Comments
हौसलों के पंख ओढ़े
स्वप्न फिर थिरके सभी,
चूम कर अपना धरातल
उड़ चले विस्तार को...
क्या हुआ गत वक्त की यदि बेड़ियाँ थीं क्रूरतम
क्या हुआ जख्मी हृदय यदि दर्द से होते थे नम
स्वप्न में कण भर धड़कते प्राण जब तक शेष हैं
जीतती है आस तब तक, हारते विद्वेष हैं
हर विगत की आँच पर रख
नर्म भावों की छुअन,
बढ़ चले हैं स्वप्न फिर
युग के नवल शृंगार को...
हो निशा चाहे घनेरी ये चलेंगे पार तक
राह नित गढ़ते बढ़ेंगे रौशनी केे द्वार तक…
Added by Dr.Prachi Singh on December 27, 2015 at 1:00am — 13 Comments
Added by Nita Kasar on December 26, 2015 at 6:20pm — 8 Comments
221 2121 1221 212
अपने लहू से आज वो अन्जान बन गये
टूटे हुए मकान का सामान बन गये
ज़ज्बात से किसी को यहाँ वास्ता नहीं
ड्राइंग रूम में रखा दीवान बन गये
बेगानों की तरह रहे अपने ही देश में
बस चार पाँच दिन के ही मेह्मान बन गये
अपने ही घर में किश्तियाँ महफूज़ हैं कहाँ
साहिल के आस पास ही तूफ़ान बन गये
छोड़ी कसर न देखिये कुदरत को लूटकर
आफ़ात आ पड़ी तो अब इंसान बन गये
करतूत वो करें…
ContinueAdded by rajesh kumari on December 26, 2015 at 12:28pm — 20 Comments
निन्यानबे के फेर में
हूँ मैं
लोग देखते है मुझे
ईर्ष्या से या हिकारत से
क्योंकि वे जानते हैं
केवल और केवल एक मुहावरा
मानव की कमजोर वृत्ति का
धन संचय की उत्कट प्रवृत्ति का
उन्हें यह पता ही नहीं कि
मुहावरे के पीछे होता है
कोई चिरंतन सत्य या एक इतिहास
और बहुत सारे मायने
वे सोचते भी नहीं
कि निन्यानबे वे वैशिष्ट्य भी हैं
जिनके आधार पर उस ऊपर वाले के है
निन्यानबे…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 26, 2015 at 12:00pm — 8 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 26, 2015 at 10:11am — 9 Comments
Added by VIRENDER VEER MEHTA on December 26, 2015 at 8:32am — 5 Comments
Added by somesh kumar on December 25, 2015 at 7:54pm — 7 Comments
अहसास क्रिसमस की छुट्टियों में आये पोता पोती ,दादी जी के लाड प्यार में पूरे घर में धमा चौकडी मचाये रखते हैं ।इस बार दादी को फेसबुक और इंटरनेट का पाठ याद करा दिया । आज न जाने क्या सूझी दादी को दोनों को लेकर रसोई में पहुंच गई ।सभी दालें दिखाई पर सिर्फ चना और राजमा पहचान पाये ,दादी ने सभी अनाजों की पहचान कराई ,नया पाठ था बच्चों को , जल्दी सीख गए । "बेटा सचिन कुकर उठाओ ,इसका ढक्कन लगाओ ।" "दादी यह तो लग ही नहीं रहा ।" "देखो बेटा यह गास्केट है ,यह सेफ्टी वाल्व है ,तुम्हें यह तो मालूम है कि कुकर…
ContinueAdded by Pawan Jain on December 25, 2015 at 5:30pm — 4 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 24, 2015 at 2:57pm — 1 Comment
चुटकियाँ- ….. …
नेता क्या और भाषण क्या
भाषण पे अनुशासन क्या
मूक बधिर इस जनता को
व्यर्थ में आश्वासन क्या !!1!!
देश क्या विकास क्या
बिन कुर्सी मधुमास क्या
छल करते जो नित् निर्बल से
उस आवरण का विश्वास क्या !!2!!
नीति क्या अनीति क्या
भ्रष्ट की सोच से प्रीति क्या
जनता के जो खून से जिन्दा
उस नेता की परिणति क्या !!3!!
फ़र्ज़ क्या …
Added by Sushil Sarna on December 24, 2015 at 1:27pm — 6 Comments
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