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पता घाट पर अब लिखाने चले हम- ग़ज़ल (पंकज मिश्र)

122 122 122 122

कि जश्ने मोहब्बत मनाने चले हम।

जी धड़कन को अपनी सुलाने चले हम।।



कि साँसों ने मेरी मना कर दिया है।

ये तन ख़ाक में अब मिलाने चले हम।।



सफ़र ज़िन्दगी का बहुत हो चूका अब।

लो प्रियतम के दिल में समाने चले हम।।



कि अब तक भ्रमित ही किया बादलों नें।

हाँ भ्रम सारे अब तो मिटाने चले हम।।



कि जिनके लिए नैन प्यासे रहे हैं।

नयन उनके झरनें बनाने चले हम।।



कि अब देखना है हुश्ने हुनर भी।

विरह वेदना क्या बताने चले… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 6, 2016 at 12:27am — 12 Comments

गजल(मनन)

#गजल#

2212 2212 2212

कटते सिपाही ढ़ह रही कब भीत है?

बस फातिहा पढ़ना यहाँ की रीत है।1



शर्मोहया रख ताक पर ,तूने कहा-

कटते सिपाही,बात तेरी नीत है।2



बगुला बना चलता चकाचक तू हुआ

गाता रहा रे बस पुराना गीत है।3



तू मछलियाँ लपका किया बस बेधड़क

जीता किसीने कह रहा निज जीत है।4



बँटता रहा घर -बार है तेरी दुआ

रे दुखहरण! तुझसे समां भयभीत है।5



हमने जहाँ परसे दही काँटा चुभा,

रे भाल तेरा हो गया अब पीत है।6



है… Continue

Added by Manan Kumar singh on January 5, 2016 at 10:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल

जब हकीक़त सामने है क्यों फ़साने पर लिखूँ

ये है बेहतर, दर्द में डूबे ज़माने पर लिखूँ



खेत पर, खलिहान पर, मैं भूख-रोटी पर लिखूँ

बंद होते जा रहे हर कारखाने पर लिखूँ



फूल, भँवरे और तितली की कहानी छोड़कर

आदमी के हर उजड़ते आशियाने पर लिखूँ



ख़त्म होते जा रहे रिश्तों के आँसू पर लिखूँ

आदमी को रौंदकर पैसे कमाने पर लिखूँ



याद तुमको क्यों करूँ मैं, और क्यों करता रहूँ

इक कहानी अब मैं तुमको भूल जाने पर लिखूँ



जिसकी सूरत रात-दिन अब है… Continue

Added by Dr. Rakesh Joshi on January 5, 2016 at 9:26pm — 12 Comments

स्टिअरिंग पर ज़िन्दगी (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

ज़िन्दगी कार के स्टिअरिंग से बोली - "भाई, तुम भी ग़ज़ब करते हो ! पल भर में इंसान के सफ़र को नया रुख़ दे देते हो , इस लोक से उस लोक पहुंचा देते हो !"

यह सुनकर मौत बोली - "इसमें उसका क्या क्या कसूर? इंसान की बुद्धि को 'स्टिअर' तो मैं करती हूँ! मनचाही दिशा में मोड़ देती हूँ इंसानी बुद्धि को अपनी 'स्टिअरिंग' से! जब अपने पर आती हूँ न, इंसान के सारे ज्ञान और अनुभव का घमंड चूर करके पल भर में इंसान पर 'बुद्धि' या 'मति' वाले सारे मुहावरे और लोकोक्तियां लागू कर देती हूँ! चाहे वह शादी में शामिल…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 5, 2016 at 7:00pm — 7 Comments

वजूद बनाम सरहदें (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"सुनो, मैं वक़्त पर ही और भी ज़्यादा पैसे भेज दिया करूँगा, तुम्हें नौकरी करने की कोई ज़रूरत नहीं है अब, अम्मी और अब्बूजान को ख़ुश रखने में ही हमारी और तुम्हारी ख़ुशी है , वरना....!"



सेल फोन पर सरहद से सरहदें फिर तय की जा रही थीं, तो ग़ुस्से में शबाना ने फोन बिस्तर पर फैंक दिया ! फिर वही बातें, मैं ज़ल्दी ही छुट्टी पर आऊँगा , ये मत करना, वो मत करना , यहाँ मत जाना, वहां मत जाना !! शबाना ने कभी सोचा न था कि पढ़ा लिखा सैनिक भी मज़हब के मामले में इतना कठोर व कट्टर हो सकता है ! काश वह भी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 5, 2016 at 2:32am — 13 Comments

दुष्यंत कुमार को समर्पित मेरी एक ग़ज़ल

आपकी तालीम का हर अर्थ कुछ दोहरा तो है

आकाश पर बादल नहीं पर हर तरफ कोहरा तो है

 

बादशाहों की हमेशा ज़िन्दगी महफूज़ है

लड़ने-मरने के लिए शतरंज में मोहरा तो है

 

इस महल में अब खज़ाना तो नहीं बाकी रहा

द्वार पर दरबान है, संगीन का पहरा तो है

 

शोर करना हर नदी की चाहे हो आदत सही

ये समंदर हर नदी से आज भी गहरा तो है

 

तुम क़सीदे खूब पढ़ लो पर यहाँ हर आदमी

हो न गूंगा आज लेकिन, आज भी बहरा तो…

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Added by Dr. Rakesh Joshi on January 4, 2016 at 10:30pm — 15 Comments

कितना अच्छा हो .....

कितना अच्छा हो  ....

अभी-अभी

हवाओं के थपेड़ों से बजते

वातायन के पटों ने

तिमिर में सुप्त चुप्पी से

चुपके से कुछ कहा //

अभी-अभी

रिमझिम फुहारों ने

चंचल स्मृति की

असीम गहराईयों संग

अंगड़ाई ली //

अभी-अभी

एक रूठा पल

घोर निस्तब्धता को

अपनी निःशब्द श्वासों से

जीवित कर गया //



अभी-अभी

एक तारा टूट कर

किसी की झोली

सपनों से भर गया //

अभी-अभी से लिपट

कभी पलक…

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Added by Sushil Sarna on January 4, 2016 at 7:48pm — 12 Comments

एक रुकनी ग़ज़ल ... गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२ 

ज़िन्दगी भर

मौत का डर 

प्यार तो है

ढाई आँखर

तोड़ पिंजरा

आजमा पर

ये सियासत

एक अजगर

होश जख्मी

हुस्न खंजर

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on January 4, 2016 at 7:30pm — 7 Comments

सबसे बडा दुख (लघुकथा)

सत्तर वर्षीय राजेश जी के इकलौते बेटे किशोर की मृत्यु पिछले साल एक कार दुर्घटना में हो गयी थी!पत्नी की मृत्यु किशोर की शादी से पहले ही हो चुकी थी! अब परिवार के नाम पर राजेश जी और उनकी जवान पुत्र बधु सीमा थी!वह भी बैंक में कार्यरत थी! जवान किशोर की मौत के सदमे ने दौनों को लगभग मूक बना दिया था!दौनों में से कोई किसी से बात चीत  नहीं करते थे!वश यंत्र वत अपने अपने कार्य करते रहते थे! किशोर की बरसी की रस्म पूरी होते ही राजेश जी ने सीमा को समझाया,"सीमा तुम पढी लिखी, सुंदर, जवान और  कामकाजी महिला हो!…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 4, 2016 at 6:30pm — 16 Comments

वो सर पर हाथ रखकर सौ बलाएं टाल देती है..

- गजल के चार मिसरे - 
घर से जब भी निकलूं मां हमेशा मेरे थैले में
मैं जो कुछ भूल जाता हूं वो चीजें डाल देती है,
न जाने कौन सी जादूगरी है मां के हाथों में
वो सर पर हाथ रखकर सौ बलाएं टाल देती है।।

-----------

 - मुक्तक - 

सुहानी शाम हो जब खूबसूरत, याद रहती है

हर—इक इंसान को अपनी जरूरत याद रहती है
मोहब्बत में कसम—वादे—वफा हम भूल सकते हैं,
मगर ताउम्र हमको एक सूरत याद रहती है।।

.
 मौलिक व अप्रकाशित (अतुल कुशवाह)

Added by atul kushwah on January 4, 2016 at 5:30pm — 2 Comments

पिज़्ज़ा वाला [लघु कथा ]

पूरी रफ़्तार से गाड़ी चला रहा था वो ,फिर भी काइनेटिक में सवार पिज़्ज़ा वाले लड़के से आगे नहीं निकल पा रहा  था Iपिज़्ज़ा वाला पीछे  मुड़ मुड़ कर उसे देखता हुआ हंस रहा था Iतभी उसने देखा कि पिज़्ज़ा वाले के पीछे निशा भी बैठी है I" रुक जा , आज मै तुझसे पहले टाइम पर पहुँच जाऊँगा, और निशा तुम कहाँ जा रही हो ?सुनो तो ,निशा ..निशा " वो जोर से चीखा I

"क्या चिल्ला रहे हो नींद में  अरुण ?"पत्नी निशा उसे झंकझोर रही थी Iपसीने से लथ पथ वो उठ बैठा I

"निशा " पत्नी का हाथ पकड़ लिया उसनेI  "सॉरी  ,कल रात भी…

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Added by pratibha pande on January 4, 2016 at 4:00pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ये पेट्रोल डीजल बढ़े या किराया मुझे क्या ( व्यंग ग़ज़ल 'राज')

उड़ाया किसी ने किसी ने कमाया मुझे क्या

कहाँ अब्र बरसा कहाँ धूप छाया मुझे क्या  

 

जहाँ पे खड़ा था वहीँ पे खड़ा हूँ कसम से  

पुराना गया है नया साल आया मुझे क्या

 

सदा ये सलामत रहें पाँव मेरे सफ़र में     

ये पेट्रोल डीजल बढ़े या  किराया मुझे क्या

 

नया साल आया मची हाय तौबा, बला से

कहाँ कुछ करिश्मा खुदा ने दिखाया मुझे क्या?

 

न मेरा मुकद्दर हुआ टस से मस तो फिर क्यूँ

वही गीत गाऊँ उन्होंने जो गाया मुझे…

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Added by rajesh kumari on January 4, 2016 at 12:30pm — 18 Comments

साक्षात्कार ( लघुकथा )

भव्य आॅफिस। उसका पहला साक्षात्कार ...... , घबराहट लाजमी था । इसके बाद दो साक्षात्कार और । पिता नहीं रहे। घर की तंगहाली ,बडी़ होने का फ़र्ज़ ,नौकरी पाना उसकी जरूरत , आगे की पढाई को तिरोहित कर आज निकल आई थी ।

" पहले कभी कोई काम किया है ? "

"जी नहीं , यह मेरी पहली नौकरी होगी । " गरीबी ढीठ बना देती है उसने स्वंय में महसूस किया ।

" हम्म्म ! इस नौकरी को आप क्यों पाना चाहती है ?"

" कुछ करके दिखाना चाहती हूँ , यहाँ मेरे लिए पर्याप्त अवसर है…

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Added by kanta roy on January 4, 2016 at 10:02am — 6 Comments

कभी इनकार लिख देना कभी इकरार लिख देना- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

1222  1222   1222  1222

कभी इनकार लिख देना कभी इकरार लिख देना|

अगर मुझसे मुहब्बत है तो बस तुम प्यार लिख देना|

 कि दिल की बात को दिल में दबाना छोड़कर दिल से,

 वफ़ा-उल्फत-मुहब्बत पर भी कुछ अशआर लिख देना। 

हमारे राजनेता पर भी थोड़ी बात हो जाए,

डुबाते हैं ये कश्ती को इन्हें बेकार लिख देना| 

मेरा महबूब गर तुमसे मेरा जो हाल पूछे तो, 

बड़ी संजीदगी से तुम दिले बीमार लिख देना| 

तिरंगे में…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on January 3, 2016 at 8:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल

122    122    122    12

हमें मत भुलाना नये साल में

मुहब्बत निभाना नये साल में 

ख़ुदा  से दुआ आप मांगें यही

बढ़े दोस्ताना नये  साल में 

सुख़नवर फ़क़त तू हि  बेहतरनहीं

न यह भूल जाना नये साल में 

तुम्हारी ख़ुशी में ख़ुशी है मेरी

न आंसू बहाना  नए साल में 

खफ़ा हैं कई साल से यार जो

उन्हें है मनाना  नए साल में 

गये साल पूरी न हसरत हुई

गले से लगाना नये साल…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 3, 2016 at 6:00pm — 7 Comments

दर्द का रिश्ता - (लघुकथा) –

"निर्मला, कुछ सुना तूने,दौनों देशों में समझौता हुआ है! छब्बीस जनवरी को सारे कैदियों की अदला बदली होगी!तेरा भाई छुट्टन भी वापस आ जायेगा"!

"ताई सुना तो है,पर जब तक छोटू को सामने नहीं देख लेती, मुझे किसी पर भरोसा नहीं "!

"निम्मो,मुझे सब पता है! तुझे  क्या क्या पापड बेलने पडे ! छुट्टू तो बेचारा सात साल की उम्र में इनके चुंगुल में फ़ंस गयाथा ! दोस्तों के उकसावे में अपनी गैंद लाने सरहद पार चला गया था "!

"ताई, छुट्टू के साथ साथ फ़ंसा तो हमारा पूरा परिवार ही था, इन ज़ालिमों की…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 3, 2016 at 4:00pm — 13 Comments

मेरे वश में है ही नहीं-ग़ज़ल (पंकज के मानसरोवर से)

22122-22122-2222-2212

उनसे ख़फ़ा हो करके रहूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।

उनकी नज़र में आँसूं भरूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।।



उनकी ख़ुशी का मालिक हूँ मैं, उनकी चाहत मेरी ख़ुशी।

कोई शिकन उस माथे पढूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।।



नादान हैं वो मुझको पता है, मौसम का उन पर भी असर।

इल्ज़ाम उनके सर पे धरूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।।



कैसे शिकायत उनसे करूँ मैं, वो कुछ ऐसे मिलते ही हैं।

उनकी अदा से कैसे बचूँ मैं, मेरे वश में है ही… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 3, 2016 at 11:55am — 3 Comments

एक और आकांक्षा (लघुकथा)

दिन में क्षण क्षण परेशान करते मीडिया तथा समाज के कटाक्ष और रात में एकाकी जीवन की भयावह राते। विलासिता की आदी हो चुकी कामना के लिए जब ये सब असहनीय हो गया तो विवश हो उसे एक ही रास्ता नज़र आया और वो उसकी ओर चल पड़ी। नशे की अत्यधिक मात्रा से अर्धचेतना में जाती कामना अतीत में खोती चली गयी।...........

"वर्षो पहले मिस मनाली का ताज पहनाते युवा विवाहित नेता मणिधर की पहचान से शुरू हुआ अनन्त इच्छाओ का आकाश कब 'लिव इन रिलेशनशिप' में बदला और कब उसने मातृत्व के सुख को पा लिया पता ही नहीं चला, लेकिन…

Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on January 3, 2016 at 9:30am — 2 Comments

कांपती हूँ निरंतर शिखा जो हूँ

मैं हूँ शिखा

उस टिमटिमाते दीप की

कि जिसको है

हवा का शाश्वत भय 

चुप क्यों खडा है तब

आ मार निर्दय !

मार खाने को बनी हैं

नारियां सुकुमारियाँ

मैं कांपती हूँ निरंतर

शिखा जो हूँ

प्रज्वलित उस दीप की  

(मौलिक अप्रकाशित )

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 2, 2016 at 6:09pm — No Comments

नाम लिख मेरा हथेली पर, हुई गुमनाम तू (ग़ज़ल)

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २१२

 

जो मुझे अच्छा लगे करने दे बस वो काम तू

ज़िन्दगी सुन, ज़िन्दगी भर रख मुझे गुमनाम तू

 

जीन मेरे खोजते थे सिर्फ़ तेरे जीन को

सुन हज़ारों वर्ष की भटकन का है विश्राम तू

 

तुझसे पहले कुछ नहीं था कुछ न होगा तेरे बाद

सृष्टि का आगाज़ तू है और है अंजाम तू

 

डूबता मैं रोज़ तुझमें रोज़ पाता कुछ नया

मैं ख़यालों का शराबी और मेरा जाम तू

 

क्या करूँ, कैसे उतारूँ, जान तेरा कर्ज़ मैं

नाम…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 2, 2016 at 12:00pm — 10 Comments

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