Added by Manan Kumar singh on December 24, 2015 at 11:30am — 6 Comments
2122 1212 22 /112
क्या नहीं ये अजीब हसरत है ?
ग़म किसी का किसी की राहत है
ख़ाक में हम मिलाना चाहें जिसे
उनको ही सारी बादशाहत है
रोटी कपड़ा मकान में फँसकर
बुजदिली, हो चुकी शराफत है
हर्फ करते हैं प्यार की बातें
आँखें कहतीं हैं, तुमसे नफरत है
मुज़रिमों को मिले कई इनआम
आज मजलूम की ये क़िस्मत है
बेरहम क़ातिलों को मौत मिली
सेक्युलर कह रहे , शहादत है
हाँ,…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on December 24, 2015 at 10:30am — 30 Comments
Added by Janki wahie on December 23, 2015 at 11:11pm — 2 Comments
दोहा छंद आधारित गीत
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मन सहिष्णु भटके नहीं,
लेकर भाव अमर्ष
राह हमें उत्कर्ष की, नित दिखला नववर्ष.....
झाँक रही दीवार से,
खूंटी ओढ़े गर्द
साल मुबारक हो नया,
कहता मौसम सर्द
जंत्री नूतन साल की, करती ध्यानाकर्ष
लौटें लेकर सुदिन सब,
उत्सव औ त्यौहार
मिलना जुलना हो सहज,
सरल भाव व्यवहार
जाति धर्म के नाम पर, हो न कभी संघर्ष
गीत छंद कविता गजल,
ललित कलेवर…
ContinueAdded by Satyanarayan Singh on December 23, 2015 at 9:00pm — 12 Comments
बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’
अरकान – 1222 1222 1222 1222
लबों पर रख हँसी हरदम अगर को भुलाना है|
दिखा मत दर्दे-दिल अपना बहुत ज़ालिम ज़माना है|
तेरा गम तेरा अपना है न जग समझा न समझेगा,
तू अपने पास रख इसको कि ये तेरा ख़जाना है|
नजूमी हाथ की रेखाएं पढ़कर मुझसे यूँ बोला,
पुजारी है तू किस्मत का कि दिल तेरा दिवाना है|
कभी मायूस मत होना भले कुटिया में रहना हो,
बचाती धूप से तुझको वो तेरा आशियाना…
ContinueAdded by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 23, 2015 at 6:29pm — 4 Comments
Added by Janki wahie on December 23, 2015 at 5:05pm — 1 Comment
बह्र : २२११ २२११ २२११ २२
ये झूठ है अल्लाह ने इंसान बनाया
सच ये है कि आदम ने ही भगवान बनाया
करनी है परश्तिश तो करो उनकी जिन्होंने
जीना यहाँ धरती पे है आसान बनाया
जैसे वो चुनावों में हैं जनता को बनाते
पंडे ने तुम्हें वैसे ही जजमान बनाया
मज़लूम कहीं घोंट न दें रब की ही गर्दन
मुल्ला ने यही सोच के शैतान बनाया
सब आपके हाथों में है ये भ्रम नहीं टूटे
यह सोच के हुक्काम ने मतदान…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 23, 2015 at 10:00am — 32 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 22, 2015 at 11:37pm — 12 Comments
मुहब्बत की डगर में फिर किसी का हो के देखूँ
किसी की झील सी आँखों में फिर से खो के देखूँ
अब इन आँखों से उसके प्यार का चश्मा उतारूँ
जहां में हैं बहुत से रंग आँखें धो के देखूँ
जिसे मैं प्यार करता था वो मेरा हो न पाया
जो मुझसे प्यार करता है मैं उसका हो के देखूँ
बहुत दिन हो गए आँखों को कोई ख़्वाब देखे
चलो शानो पे सर रख कर किसी के सो के देखूँ
कोई तो बढ़ के 'सूरज' आँसुओ को पोछ लेगा
मुहब्बत में चलो इक…
ContinueAdded by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 22, 2015 at 11:00pm — 8 Comments
२१२ २१२ २१२ २१२
इक सवाल आँखों में ही बसा रह गया
यूँ लगे जैसे इक ख़त खुला रह गया
रेल से वो चली शहर ये छोड़कर
और टेशन पे मैं बस खड़ा रह गया
दाग गिनवा रहा था जमाने के मैं
सामने मेरे बस आइना रह गया
वक़्त सा वैध भी कर ना पाया इलाज
देखिये ज़ख्म तो ये हरा रह गया
शख्स हर जानता जिंदगी है सफ़र
मंजिलें हर कोई ढूंढता रहा गया
दम निकलते समय भूला मैं रब को भी
इन लबों पर तेरा नाम सा…
ContinueAdded by gumnaam pithoragarhi on December 22, 2015 at 8:27pm — 10 Comments
"ओह, श्रीमती रोहन आप वाकई बहुत भाग्यशाली हैं । कि आप को रोहन जैसा हंसमुख ,जिंदादिल,स्वतंत्र विचारधारा का धनी पति मिला ।ऑफिस की तो जान है,मजाल जो किसी के चेहरे पर उसके रहते उदासी छा जाये।" रात के खाने पर आमंत्रित उनकी महिला मित्र काफ़ी देर से उनकी शान में कसीदे पढ़े जा रही थी ।
"वैसे बुरा ना मानियेगा, अगर रोहन की शादी ना हुई होती तो उसे किसीभी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देती । आखिर ऐसे इंसान की पत्नी होना अपने आप में गर्व की बात है ।सच कह रही हूं ना! " वो अब मेरी राय जानने के लिये…
Added by Rahila on December 22, 2015 at 1:00pm — 18 Comments
2122 1122 1122 22
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प्यार कहते हैं कि हर चाव बदल देता है
एक मरहम की तरह घाव बदल देता है /1
अश्क लेकर भी किसी को न तू रोते दिखना
कहकहा आँख का बरताव बदल देता है /2
झील ठहरी है बहुत वक्त से कंकड़ मारो
एक कंकड़ ही तो ठहराव बदल देता है /3
अजनवी सोच के यूँ दूर न बैठो हमसे
मिलना जुलना ही मनोभाव बदल देता है /4
माँ की ममता से मिली सीख ये हमको…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 22, 2015 at 11:55am — 22 Comments
" आइये ,अपनी कुर्सी पर विराज लीजिए ।" इतना तंज ! ऐसे कह गये वे जैसे उसके सिर पर ही बैठने वाली हो ।
"जी , अब काम समझा दिजीए कि मेरा काम क्या होगा यहाँ ?" उनके लहजे से अपमानित सा महसूस कर रही थी । क्या इनके साथ ही काम करना होगा उसे ? कैसे झेलेगी ? हृदय रूआँसा हो रहा था ।
" अरे ,आप क्या काम करेंगी ? आप तो बस पगार उठा कर ऐश करेंगी , काम तो हमें करना होगा ।" वह चिढ़ कर बोला ।
"मतलब ?" सुनकर अनमना उठी । सतीश आप कैसे झेलते रहे होंगे ऐसे लोगों को , पति की याद में…
Added by kanta roy on December 22, 2015 at 11:30am — 4 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 22, 2015 at 1:06am — 9 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 22, 2015 at 12:15am — 8 Comments
Added by Samar kabeer on December 21, 2015 at 10:00pm — 16 Comments
ये सिलसिला .......
सच ! कितना स्वार्थी है इंसान
हर जीत पे मुस्कुराता है
हर हार से जी चुराता है
अपने स्वार्थ की पगडंडी पर अक्सर
वो हर रास्ते से नाता जोड़ लेता है
हर मोड़ पे इक दर्द को छोड़ देता है
हर कसम तोड़ देता है
मुहब्बत की पाक इबारत पे
वासना की कालिख पोत देता है
जिस्म के रोएँ रोएँ में
नफ़रत की फसल छोड़ देता
किसी ज़िंदगी को नरक कर
उसके अरमानों को रौंद देता है
किसी की पाकीज़गी को
चीत्कारों से ढक देता है
उफ़ !…
Added by Sushil Sarna on December 21, 2015 at 8:08pm — 4 Comments
दुविधा
सर्द साँझ थी जब शकीला अपने पति के साथ दफ्तर से घर लौट रही थी... वापसी में घर जाने की कोई जल्दी ना थी आराम से गंगा किनारे वाली शांत रोड पकड़, जहाँ अपेक्षाकृत कम ट्रैफ़िक रहता है, बीस-बाईस की गति से अहमद बाइक चला रहा था और शकीला उसकी पीठ से सर टिकाये अपनी थकान से मुक्ति पाने का प्रयास का रही थी. अभी आनंदेश्वर मंदिर पार भी ना हुआ था कि किसी बच्चे के रोने की आवाज़ से शकीला ने चौंक कर अहमद से पूछा, “आपने कुछ सुना?”
“हाँ मंदिर की घंटियों की आवाज़... क्यों क्या हुआ? मंदिर के पास वही…
Added by Seema Singh on December 21, 2015 at 2:35pm — 2 Comments
दीवार
====
बड़ा गहरा नाता है
तुम्हारा,
इन आॅसुओं से!
और इन आॅंसुओं का,
तुमसे!
मुझसे भी अधिक , तुम
इन्हें ही चाहते हो।
शायद इसीलिये....
जब तुम नहीं आते
ये,
अवश्य आ जाते हैं।
और जब
तुम आ जाते हो
ये,
तब भी निर्झर से
झरते हैं।
हमारे बीच. ..
अर्धपारदर्शी ,
दीवार बनते हैं!!
डॉ टी आर शुक्ल
7 नवंबर 2013
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Dr T R Sukul on December 21, 2015 at 11:37am — 4 Comments
2212 1211 2212 12
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पतझड़ में अब की बार जो गुलजार हम भी हैं
कुछ कुछ चमन के यूँ तो खतावार हम भी हैं /1
रखते हैं चाहे मुख को सदा खुशगवार हम
वैसे गमों से रोज ही दो चार हम भी हैं /2
माना कि धूप में भी तो साया नहीं बने
तू देख अपने ज़ह्न में,ऐ यार हम भी हैं /3
तू ही नहीं अकेला जो दरिया के घाट पर
नजरें उठा के देख कि इस पार हम भी हैं /4
जब से कहा है आपने बेताज हो…
ContinueAdded by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 21, 2015 at 11:30am — 20 Comments
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