2122 2122 2122 22/112
शाम लिख ले सुबह लिख ले ज़िंदगानी लिख ले
नाम अपने हुस्न के मेरी जवानी लिख ले।
कब्ल तोहमत बेवफ़ाई की लगाने से सुन
नाम मेरा है वफा की तर्जुमानी लिख ले ।
जो बनाना चाहता है खुशनुमा संसार को
अपने होंठो पे मसर्रत की कहानी लिख ले।
मंहगाई बढ़ रही है रात औ दिन चौगुनी
वादे अच्छे दिन के निकले लंतरानी लिख ले।
लाल होगी यह जमी गर इन्सानो के खूँ से
रह न जाएगा अंबर भी आसमानी लिख ले…
Added by Neeraj Neer on December 15, 2015 at 10:46pm — 16 Comments
Added by Samar kabeer on December 15, 2015 at 10:24pm — 7 Comments
हर आने जाने वाले पर
भौंक रहे कुत्ते
निर्बल को दौड़ा लेने में
मज़ा मिले, जब तो
क्यों ये भौंक रहे हैं, इससे
क्या मतलब इनको
अब हल्की सी आहट पर भी
चौंक रहे कुत्ते
हर गाड़ी का पीछा करते
सदा बिना मतलब
कई मिसालें बनीं, न जाने
ये सुधरेंगे कब
राजनीति, गौ की चरबी में
छौंक रहे कुत्ते
गर्मी इनसे सहन न होती
फिर भी ये हरदम
करते हरे भरे पेड़ों…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 15, 2015 at 9:49pm — 4 Comments
अइसई नहीं मिलता
सेवादारी का ओहदा
बड़ी कठिन परीक्षा है
निभा ले जाना ड्यूटी सेवादारी की
हाकिम-हुक्काम तो
कोई भी बन सकता है
सेवादार बनना बहुत कठिन है
सेवादार को होना चाहिए
भाव-निरपेक्ष...संवेदनहीन
अपने ड्यूटी-काल में
और उसके अलावा भी
जाने कौन सा राज़
कब किस हालत में फूट जाए
और लेने के देने पड़ जाएँ
हाकिम बना रहे
हाकिम बचा रहे
हुकुम सलामत रहे
तो रोज़ी-रोटी की है गारंटी
इतनी…
Added by anwar suhail on December 15, 2015 at 5:53pm — 2 Comments
क्या कसूर था उसका ? मन बेबस हो ,बार - बार डायरी के पन्ने पर लिखे उसके नाम पर जाकर ठहर जाती थी। एकटक देखती जाती ,मानो नाम में उसके अक्स दिखते हों , इबारत कर रही थी वह ....! अंगुलियों को फिराते हुए सहला रही थी उन जख्मों को भी , जो वह दे गया था ।
"उमाsss ! कहाँ भावमग्न हो रही है तु ?"
"कहीं नहीं रे ? "- उसने चौंक कर डायरी बंद कर ली , शायद फिर से चोरी पकड़ी गई थी । जिगरी थी और बरसों से रूम पार्टनर भी।
"तुमने सीधी माँग काढ़ ली ? फिर से…
ContinueAdded by kanta roy on December 15, 2015 at 1:00pm — 7 Comments
नई पसंद का जमाना ... (110 वीं रचना )
राम राम भाई
आज दुकान खोलने में बड़ी देर लगाई
हमने भी पड़ोसी को राम राम कहा
और अपनी नासाज़ तबियत का हवाला देते हुए
अपनी दुकान का शटर उठाया
धूप अगरबत्ति जलाकर
उसके धुऐं को दुकान और गल्ले में घुमाया
प्रभु को शीश नवाकर
अच्छी बोहनी के लिए प्रार्थना करके
धूपदानी प्रभु के आगे रखी ही थी कि
एक ग्राहक ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई
हमने चौंक कर
अपनी सुराहीदार गर्दन को
भगवान बने ग्राहक की तरफ घुमाया…
Added by Sushil Sarna on December 15, 2015 at 12:45pm — 4 Comments
Added by Manan Kumar singh on December 15, 2015 at 8:38am — 6 Comments
Added by Janki wahie on December 14, 2015 at 4:01pm — 3 Comments
दोस्त कोई न मेह्रबाँ कोई
काश मिल जाए राज़दाँ कोई /१
दिल की हालत कुछ आज ऐसी है
जैसे लूट जाए कारवाँ कोई /२
एक ही बार इश्क़ होता है
रोज होता नहीं जवाँ कोई /३
तुम को वो सल्तनत मुबारक हो
जिसकी धरती न आसमाँ कोई /४
सारथी कह सके जिसे अपना
सारथी के सिवा कहाँ कोई /५
...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित
अरकान: २१२२ १२१२ २२
Added by Saarthi Baidyanath on December 14, 2015 at 3:14pm — 9 Comments
तलाशी ले रहीं आँखें हमारी
न आँखें रोक दें साँसें हमारी /१
गुजर तो जाता है दिन जैसे तैसे
मगर कटती नहीं रातें हमारी /२
न जाने लग रहा है बारहा क्यूँ
उन्हें मालूम हैं बातें हमारी /३
जो कहना है सो कह दो कौन जाने
दुबारा हों मुलाकातें हमारी /४
अगर तुम जा रहे हो याद रखना
कि पल पल तरसेंगी बाँहें हमारी /५
...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित
अरकान: १२२२ १२२२ १२२
Added by Saarthi Baidyanath on December 14, 2015 at 3:00pm — 5 Comments
हकीकत.....
उस दिन
जब तुमने मेरे काँधे पे
अपना हाथ रखा था
कितने ख़ुशनुमा अहसास
मेरे ज़हन में
उत्तर आये थे
लगा भटकी कश्ती को
जैसे साहिलों ने
अपनी आगोश में ले लिया हो
मगर मैं उन सुकून देते लम्हों को
कहाँ पहचान पायी थी
क्या खबर थी कि तुम
इज़हारे मुहब्बत के बहाने
मेरे कमजोर कांधों की
ताकत नाप रहे थे
मैंने तुम्हें अपना सागर मान
अपने वज़ूद को
तुम्हें सौंप दिया
आज तक
तुम्हारी उँगलियों की वो छुअन…
Added by Sushil Sarna on December 14, 2015 at 1:00pm — 4 Comments
नेताई गजल
*************
1222 1222 1222 1222
********************
सदन में आप गर आओ वतन की बात मत करना
सहोदर जैसे आपस में गबन की बात मत करना /1
उड़ाए हमने चुपके से लँगोटों के लिए सच है
शहीदों के हों नंगे तन कफन की बात मत करना /2
कभी तुम बोल देते हो कभी हम बोल देते हैं
चुनावी बात सबकी ही वचन की बात मत करना /3
दिखा करते हैं फूलों सा मगर फितरत है शूलों सी
गले आपस में मिलने पर चुभन की बात मत करना…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2015 at 11:36am — 13 Comments
१२२ १२२ १२२ १२२
किसी मायने में भी कमतर नही हूँ
मगर पूजा जाऊं वो पत्थर नहीं हूँ
इसी को तो कहते है किस्मत भी शायद
तेरा हो के तेरा मुकद्दर नहीं हूँ
मेरी साइतों में ‘‘ठहरना’’ नही है..
मैं दरिया हूँ प्यासा ; समन्दर नहीं हूँ
पलटकर जरा देख इक़ बार फिर से
यही सोच लूँ गुजरा मंजर नहीं हूँ.
तेरे कू पे बैठा अगरचे हूँ लेकिन
जो कुछ मांगे मैं वो कलंदर नहीं…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on December 14, 2015 at 11:04am — 6 Comments
छोड़ शहर की रौनक,जिसके
गाँव में बसते प्राण।
जिसकी पावन धरती ने है
जने वीर संतान।
जिसकी गौरव-गाथा का
करे विश्व गुणगान।
है देशों में वो देश महान।
अपना प्यारा हिन्दुस्तान।।
सूरत से भी ज़्यादा उनकी
होती सीरत प्यारी।
हृदय में जिनके बहती है
करुणा जग की सारी।
वक़्त पड़े तो रणभूमि में
जौहर दिखलाती नारी।
अत्याचार को देख के जिनके
दिल में उठता है तूफ़ान।।
राजतंत्र को मिटा जिन्होंने
गणतंत्र हमें…
Added by जयनित कुमार मेहता on December 13, 2015 at 9:30pm — 6 Comments
बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २
देख तेरे संसार की हालत सब्र छूटने लगता है
जिसको ताकत मिल जाती है वही लूटने लगता है
सरकारी खाते से फ़ौरन बड़े घड़े आ जाते हैं
मंत्री जी के पापों का जब घड़ा फूटने लगता है
मार्क्सवाद की बातें कर के जो हथियाता है सत्ता
कुर्सी मिलते ही वो फौरन माल कूटने लगता है
जिसे लूटना हो कानूनन मज़लूमों को वो झटपट
ऋण लेकर कंपनी खोलता और लूटने लगता है
बेघर होते जाते मुफ़लिस, तेरे…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2015 at 2:49pm — 10 Comments
कहने को दोस्त हैं बहुत
लेकिन दोस्त,
सच में
तुम ही "एक" दोस्त थी मेरी
अपरिभाषित दिशाओं के पट खोल
सुविकसित कल्पनाओं को बहती हवाओं में घोल
मुझको अँधियाले ताल के तल से
प्रसन्नता की नभचुम्बी चोटी पर ले गई थी
वह तुम ही तो थी
हर हाल में मुझको
लगती थी अपनी
इतनी
कि मैं पैरों के घिसे हुए तलवों को
मन की फटी हुई चादर की सलवटों को
दिखाने में संकोच नहीं करता था...
सवाल ही नहीं उठता…
ContinueAdded by vijay nikore on December 13, 2015 at 9:17am — 12 Comments
पवन व अशोक बहुत अच्छे दोस्त, मगर जब भी कभी पवन, अशोक से समाज की किसी समस्या के बारे में बात होती तो उस का बना बनाया एक ही जवाब होता ।
“कि मेरे साथ राजनीती की बात न करो, सायद उस ने सोच रखा है कि जिन बातों का उस के घर, बच्चों व नौकरी से संबध नहीं, वो सभी बातें फजूल है ।“
अशोक को घर में भी ऐसी बहस फजूल सी लगती ।
पवन को बात शुरू करते ही अशोक कह देता और कोई बात करो , राजनीती नहीं , वरना वह शुरू होते ही विराम लगा देता,और कई बार वहाँ से उठ कर चला जाता ।
मगर पवन ने…
ContinueAdded by मोहन बेगोवाल on December 12, 2015 at 10:30pm — 2 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 12, 2015 at 10:18pm — 8 Comments
Added by शिज्जु "शकूर" on December 12, 2015 at 8:19pm — 10 Comments
लावनी छंद |
नारी की असीम ताक़त है , मिट्टी को करती सोना |
जंगल में मंगल कर देती , सारे रश्मों को ढोना |
बनती बेटी ससुराल बहू , माँ को छोड पड़े रोना |
अजनवी घर अपना बनाती , हर सुख दुःख पड़े ढोना |
नारी जीवन की धारा है , साथ साथ साथ निभाती |
खुशी खुशी बच्चों को पाले , सबके संग घर चलाती |
घरनी बिन घर सूना लागे , जब छोड़ मायके जाती |
आये जब घर आँगन खिलता , जीवन में खुशियाँ लाती |
पति जाये जब गलत राह पर , विनय कर उसे समझाती |
पर अपने को अबला समझे…
Added by Shyam Narain Verma on December 12, 2015 at 6:00pm — 2 Comments
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