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जाने क्यों

जाने क्यों

क्या ढूँढ़ने उतरते हो

रात के अंधेरे में ओ कोहरे,

चुपचाप, इस धरती की छाती पर

फिर अक्सर थक कर सो जाते हो

पत्तियों के ठिठुरते गात पर

और सहमी, पीली पड़ गयी

तिनके की नोक पर –

गाड़ी के शीशे से

न जाने कहाँ झाँकने की कोशिश में

चिपक जाते हो तुम,

अक्सर.

सुबह की थाप तुम्हें सुनायी नहीं देती

उद्दण्ड बालक की तरह

धरती का बिस्तर पकड़कर,

मुँह फेरकर सोये रहते हो

जब तक कि फुटपाथ पर

रात भर करवटें…

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Added by sharadindu mukerji on December 16, 2015 at 2:30am — 6 Comments

धुंध [लघु कथा ]

" नानी ,आप दोनों की शादी को पचास साल के ऊपर हो गए i वाऊ "I

"और फिर भी हम दोनों खुश दिख रहे हैं ,ये ही पूछना चाह रही हो ना ?"नाना जी पीछे खड़े मुस्करा रहे थे I

"तब  ऑप्शंस  कम थे न बेटा , मोबाइल इन्टरनेट कुछ भी नहीं था ,जो माँ बाप ने ढूँढ दिया बस उसी को झेल रहे हैं I"नानी की आँखों में शैतानी थीI

"ऑप्शंस  होते तो मैडम इतनी अच्छी खिचड़ी खिलाने  वाला मिलता तुम्हे "? नानी के हाथ में गरम खिचड़ी की प्लेट थमाते नाना पास आके बैठ गएI

छःमहीने पहले जब से इस शहर में नौकरी लगी है…

Continue

Added by pratibha pande on December 15, 2015 at 11:00pm — No Comments

एक तरही गजल

2122 2122 2122 22/112



शाम लिख ले सुबह लिख ले ज़िंदगानी लिख ले

नाम अपने हुस्न के मेरी जवानी लिख ले।

कब्ल तोहमत बेवफ़ाई की लगाने से सुन

नाम मेरा है वफा की तर्जुमानी लिख ले ।

जो बनाना चाहता है खुशनुमा संसार को

अपने होंठो पे मसर्रत की कहानी लिख ले।

मंहगाई बढ़ रही है रात औ दिन चौगुनी

वादे अच्छे दिन के निकले लंतरानी लिख ले।

लाल होगी यह जमी गर इन्सानो के खूँ से

रह न जाएगा अंबर भी आसमानी लिख ले…

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Added by Neeraj Neer on December 15, 2015 at 10:46pm — 16 Comments

नस्री नज़्म :- आओ सबका ग़म बाँटें

आओ सबका ग़म बाँटें,

गीतों से,कविताओं से,

ग़ज़लों से,नज़्मों से,

हल्का होगा मन का बोझ

अपने ऐसा करने से,

शायद कुछ परिवर्तन आए,

दिल की कली फिर मुस्काए,

गंगा जमुना का संगम हो,

कुछ तो रब्त-ए-बाहम हो,

सुनते हैं,ताक़त से क़लम की,

इन्क़िलाब आ जाता है

क्यूँ न फिर इस इन्क़िलाब की,

तैयारी में जुट जाऐं,

ये सब मिल जुल कर ही होगा,

आओ इस मक़सद को लेकर,

कोई ऐसा गीत रचें,

ऐसी नज़्म जो दिल को छू ले,

ऐसी कविता,जो रस घोले,

सब को अपनी… Continue

Added by Samar kabeer on December 15, 2015 at 10:24pm — 7 Comments

भौंक रहे कुत्ते (नवगीत)

हर आने जाने वाले पर

भौंक रहे कुत्ते

 

निर्बल को दौड़ा लेने में

मज़ा मिले, जब तो

क्यों ये भौंक रहे हैं, इससे

क्या मतलब इनको

 

अब हल्की सी आहट पर भी

चौंक रहे कुत्ते

 

हर गाड़ी का पीछा करते

सदा बिना मतलब

कई मिसालें बनीं, न जाने

ये सुधरेंगे कब

 

राजनीति, गौ की चरबी में

छौंक रहे कुत्ते

 

गर्मी इनसे सहन न होती

फिर भी ये हरदम

करते हरे भरे पेड़ों…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 15, 2015 at 9:49pm — 4 Comments

टुकड़खोर सेवादार

अइसई नहीं मिलता 

सेवादारी का ओहदा 

बड़ी कठिन परीक्षा है 

निभा ले जाना ड्यूटी सेवादारी की

हाकिम-हुक्काम तो 

कोई भी बन सकता है 

सेवादार बनना बहुत कठिन है 

सेवादार को होना चाहिए 

भाव-निरपेक्ष...संवेदनहीन 

अपने ड्यूटी-काल में 

और उसके अलावा भी 

जाने कौन सा राज़ 

कब किस हालत में फूट जाए 

और लेने के देने पड़ जाएँ 

हाकिम बना रहे 

हाकिम बचा रहे 

हुकुम सलामत रहे 

तो रोज़ी-रोटी की है गारंटी 

इतनी…

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Added by anwar suhail on December 15, 2015 at 5:53pm — 2 Comments

अधजली (लघुकथा)

क्या कसूर था उसका ? मन बेबस हो ,बार - बार डायरी के पन्ने पर लिखे उसके नाम पर जाकर ठहर जाती थी। एकटक देखती जाती ,मानो नाम में उसके अक्स दिखते हों , इबारत कर रही थी वह ....! अंगुलियों को फिराते हुए सहला रही थी उन जख्मों को भी , जो वह दे गया था ।

"उमाsss ! कहाँ भावमग्न हो रही है तु ?"

"कहीं नहीं रे ? "- उसने चौंक कर डायरी बंद कर ली , शायद फिर से चोरी पकड़ी गई थी । जिगरी थी और बरसों से रूम पार्टनर भी।

"तुमने सीधी माँग काढ़ ली ? फिर से…

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Added by kanta roy on December 15, 2015 at 1:00pm — 7 Comments

नई पसंद का जमाना ... (110 वीं रचना )

नई पसंद का जमाना ... (110 वीं रचना )

राम राम भाई

आज दुकान खोलने में बड़ी देर लगाई

हमने भी पड़ोसी को राम राम कहा

और अपनी नासाज़ तबियत का हवाला देते हुए

अपनी दुकान का शटर उठाया

धूप अगरबत्ति जलाकर

उसके धुऐं को दुकान और गल्ले में घुमाया

प्रभु को शीश नवाकर

अच्छी बोहनी के लिए प्रार्थना करके

धूपदानी प्रभु के आगे रखी ही थी कि

एक ग्राहक ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई

हमने चौंक कर

अपनी सुराहीदार गर्दन को

भगवान बने ग्राहक की तरफ घुमाया…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 15, 2015 at 12:45pm — 4 Comments

गजल

गजल
*****
चैन आना मुश्किल-सा लगा है
आज रिश्ता बोझिल-सा लगा है।
पैठ करतीं बातें तीर बनकर
अंग हर अपना दिल-सा लगा है।
दर्द अपना रख लो गाँठ कर अब
तंग दिल उसका सिल-सा लगा है।
तंज कसता वह तेरी वफ़ा पे
अब रहम उसका खिल-सा लगा है।
माँगते हो तुम खैरात उससे
वह तो' मुझको बेदिल-सा लगा है।
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन
खिल=घाव के मवाद कीअंतिम किश्त
सिल=पत्थर

Added by Manan Kumar singh on December 15, 2015 at 8:38am — 6 Comments

अपराधी - लघु कथा ( जानकी बिष्ट वाही)

सांझी गली में सीढ़ियों के नीचे उसने अपनी गृहस्थी ज़मा ली। फ़टे- पुराने कपड़े,पुराना कम्बलऔर टूटे दो बर्तन।

धूप में बाल सुखाती, एक कॉपी में जाने क्या लिख रही थी। पूरा मोहल्ला आते-जाते कौतुहल से उसे देख रहा है।

चिथड़ों में लिपटी पगली बस स्टेशन के पास भीख मांगती थी।किसी ने उसे बोलते नहीं सुना था।छेड़ने पर पत्थर मारती थी।



"तुम ! यहाँ रहोगी ?" सुषमा ने पास जाकर पूछा।

उसने डरी -डरी आँखों से देखा कि कहीं मैं उसे दुत्कार न दूँ।फिर आश्वस्त होकर बोली -

" हाँ "

" कहाँ… Continue

Added by Janki wahie on December 14, 2015 at 4:01pm — 3 Comments

ग़ज़ल- सारथी || दोस्त कोई न मेह्रबाँ कोई ||

दोस्त कोई न मेह्रबाँ  कोई 

काश मिल जाए राज़दाँ कोई  /१

दिल की हालत कुछ आज ऐसी है 

जैसे लूट जाए कारवाँ कोई  /२ 

एक ही बार इश्क़ होता है 

रोज होता नहीं जवाँ कोई  /३  

तुम को वो सल्तनत मुबारक हो 

जिसकी धरती न आसमाँ कोई   /४ 

सारथी कह सके जिसे अपना 

सारथी के सिवा कहाँ कोई /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: २१२२ १२१२ २२ 

Added by Saarthi Baidyanath on December 14, 2015 at 3:14pm — 9 Comments

ग़ज़ल- सारथी || तलाशी ले रहीं आँखें हमारी ||

तलाशी ले रहीं आँखें हमारी 

न आँखें रोक दें साँसें हमारी  /१

गुजर तो जाता है दिन जैसे तैसे 

मगर कटती नहीं रातें हमारी /२ 

न जाने लग रहा है बारहा क्यूँ 

उन्हें मालूम हैं बातें हमारी  /३  

जो कहना है सो कह दो कौन जाने 

दुबारा हों मुलाकातें हमारी  /४ 

अगर तुम जा रहे हो याद रखना 

कि पल पल तरसेंगी बाँहें हमारी  /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: १२२२ १२२२ १२२ 

Added by Saarthi Baidyanath on December 14, 2015 at 3:00pm — 5 Comments

हकीकत.....

हकीकत.....

उस दिन

जब तुमने मेरे काँधे पे

अपना हाथ रखा था

कितने ख़ुशनुमा अहसास

मेरे ज़हन में

उत्तर आये थे

लगा भटकी कश्ती को

जैसे साहिलों ने

अपनी आगोश में ले लिया हो

मगर मैं उन सुकून देते लम्हों को

कहाँ पहचान पायी थी

क्या खबर थी कि तुम

इज़हारे मुहब्बत के बहाने

मेरे कमजोर कांधों की

ताकत नाप रहे थे

मैंने तुम्हें अपना सागर मान

अपने वज़ूद को

तुम्हें सौंप दिया

आज तक

तुम्हारी उँगलियों की वो छुअन…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 14, 2015 at 1:00pm — 4 Comments

है जनता की समस्या का -( गजल )- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

नेताई गजल

*************

1222 1222 1222 1222

********************

सदन में आप गर आओ वतन की बात मत करना

सहोदर  जैसे आपस में  गबन  की बात मत करना /1



उड़ाए  हमने  चुपके   से  लँगोटों  के  लिए सच है

शहीदों के हों नंगे तन कफन की बात मत करना /2



कभी  तुम  बोल  देते  हो  कभी  हम  बोल  देते हैं

चुनावी बात सबकी ही वचन की बात मत करना /3



दिखा  करते  हैं  फूलों सा मगर फितरत  है शूलों सी

गले आपस में मिलने पर चुभन की बात मत करना…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2015 at 11:36am — 13 Comments

ग़ज़ल

१२२  १२२ १२२  १२२

किसी मायने में भी कमतर नही हूँ                         

मगर पूजा जाऊं वो पत्थर नहीं हूँ

 

इसी को तो कहते है किस्मत भी शायद

तेरा हो के तेरा मुकद्दर नहीं हूँ

 

मेरी साइतों में ‘‘ठहरना’’ नही है..

मैं दरिया हूँ प्यासा ; समन्दर नहीं हूँ

 

पलटकर जरा देख इक़ बार फिर से

यही सोच लूँ गुजरा मंजर नहीं हूँ.

 

तेरे कू पे बैठा अगरचे हूँ लेकिन

जो कुछ मांगे मैं वो कलंदर नहीं…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on December 14, 2015 at 11:04am — 6 Comments

है देशों में वो देश महान,अपना प्यारा हिंदुस्तान (देशभक्ति गीत)

छोड़ शहर की रौनक,जिसके

गाँव में बसते प्राण।

जिसकी पावन धरती ने है

जने वीर संतान।

जिसकी गौरव-गाथा का

करे विश्व गुणगान।



है देशों में वो देश महान।

अपना प्यारा हिन्दुस्तान।।



सूरत से भी ज़्यादा उनकी

होती सीरत प्यारी।

हृदय में जिनके बहती है

करुणा जग की सारी।

वक़्त पड़े तो रणभूमि में

जौहर दिखलाती नारी।



अत्याचार को देख के जिनके

दिल में उठता है तूफ़ान।।



राजतंत्र को मिटा जिन्होंने

गणतंत्र हमें…

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Added by जयनित कुमार मेहता on December 13, 2015 at 9:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल : जिसको ताकत मिल जाती है वही लूटने लगता है

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

देख तेरे संसार की हालत सब्र छूटने लगता है

जिसको ताकत मिल जाती है वही लूटने लगता है

 

सरकारी खाते से फ़ौरन बड़े घड़े आ जाते हैं

मंत्री जी के पापों का जब घड़ा फूटने लगता है

 

मार्क्सवाद की बातें कर के जो हथियाता है सत्ता

कुर्सी मिलते ही वो फौरन माल कूटने लगता है

 

जिसे लूटना हो कानूनन मज़लूमों को वो झटपट

ऋण लेकर कंपनी खोलता और लूटने लगता है

 

बेघर होते जाते मुफ़लिस, तेरे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2015 at 2:49pm — 10 Comments

सलवटें

कहने को दोस्त हैं बहुत

लेकिन दोस्त,

सच में 

तुम ही  "एक"  दोस्त थी मेरी

अपरिभाषित दिशाओं के पट खोल

सुविकसित कल्पनाओं को बहती हवाओं में घोल

मुझको अँधियाले ताल के तल से

प्रसन्नता की नभचुम्बी चोटी पर ले गई थी

वह तुम ही तो थी

हर हाल में मुझको

लगती थी अपनी

इतनी

कि मैं पैरों के घिसे हुए तलवों को

मन की फटी हुई चादर की सलवटों को

दिखाने में संकोच नहीं करता था...

सवाल ही नहीं उठता…

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Added by vijay nikore on December 13, 2015 at 9:17am — 12 Comments

पहल (लघुकथा)

पवन व अशोक बहुत अच्छे दोस्त, मगर जब भी कभी पवन, अशोक से समाज की किसी समस्या के बारे में बात होती तो उस का बना बनाया एक ही जवाब होता ।

“कि मेरे साथ  राजनीती की बात न करो, सायद उस ने सोच रखा है कि जिन बातों का उस के घर, बच्चों व नौकरी से संबध नहीं, वो सभी बातें फजूल है ।“  

अशोक को घर में भी ऐसी बहस फजूल सी लगती ।

पवन को बात शुरू करते ही अशोक कह देता और कोई  बात करो , राजनीती नहीं , वरना वह शुरू होते ही विराम लगा देता,और कई बार  वहाँ से उठ कर चला जाता ।  

मगर पवन ने…

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Added by मोहन बेगोवाल on December 12, 2015 at 10:30pm — 2 Comments

व्यावहारिकता (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (43)

"सुनते हो जी, मुझे तो ये वही लग रहा है जिसने...."

"हे भगवान ! ये तो वही है ! लेकिन इस वक़्त बहू उसके साथ कहां और क्यों जा रही है?

"तो इस क़ीमत पर सुदीप का प्रमोशन और उसकी बेटी की सरकारी नौकरी ?"

"हमारी दिल से सेवा करने वाली बहू हमारी पीठ पीछे....! तो ये है 'बी प्रेक्टिकल' कहने वाली 'एक्टिव' शिक्षिका !"

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 12, 2015 at 10:18pm — 8 Comments

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