सब उसे पागल कहते थे, लेकिन एक बुद्धिजीवी का दिमाग उसे पागल नहीं मानता था|
आज उस बुद्धिजीवी ने देखा कि वो एक मंदिर में गया, वहां नमाज़ पढ़ी|
फिर एक गुरूद्वारे में गया और वहां कैरोल गाया|
और एक गिरजे में गया और आरती की|
फिर एक मस्जिद में गया और वहाँ अरदास की|
आखिर में अपनी जगह पर जाकर बहुत रोया,
बुद्धिजीवी ने कारण पूछा तो उसके उत्तर में भी एक प्रश्न था, "हर धार्मिक-स्थल पर दान दिया था| वो बिकता तो है, लेकिन मिलता कहाँ है?"
बुद्धिजीवी समझ गया वो पागल ही…
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 12, 2015 at 11:04am — 3 Comments
सूने आंगन में जाल बिछा चांदनी रात सोयी रोकर
मेरी अभिलाषा जाग रही रागायित हो पागल होकर
मैं समय काटता रहा विकल
दायें-बायें करवटें बदल
घिर आये मानस-अम्बर पर
स्वर्णिम सपनीले बादल-दल
बौराया घूम रहा मारुत अपनी सब शीतलता खोकर
सपनो में चल घुटनों के बल
सरिता तट पर आया था जब
कह डाला कुछ मन की मैंने
वह बज्र प्रहार हुआ था तब
सायक सा टूटा था अंतस निर्दयता की खाकर ठोकर
यह नाग आँख में है अविरल
छोड़ता निरंतर…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 10, 2015 at 8:30pm — 5 Comments
मानों कयामत बरपा हो गई। पूरा शहर लबालब भरा है।चारों ओर त्राही-त्राही मची हुई है। शिवानी प्रसव वेदना से तड़प रही है। शरद पैदल ही उसे अस्पताल ले जा रहा है
"अब बचना मुश्किल है।"कराहते हुए शिवानी बोली।
पानी गले-गले तक पहुँच गया।जीवन की आशा क्षीण हो चली है। एक अज़नबी तैरता हुआ करीब आया।
"मैं आप लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने आया हूँ।"
उसकी मदद से शरद समय पर शिवानी को अस्पताल पहुंचाने में सफ़ल हो गया।
"शुक्रिया ! आज़ तुम न होते तो जाने क्या होता? "शरद ने कहा।
"ये तो…
Added by Janki wahie on December 10, 2015 at 5:30pm — 10 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 10, 2015 at 11:11am — 3 Comments
पुलिस चौकी को कार्यक्रम स्थल मे बदल दिया गया है , सामने लोगो का मजमा लगा हुआ है | उसे देखने के लिये सब बडे आतुर है । आज वो आत्मसमर्पण करने वाली है प्रदेश के सी.एम के सामने । तभी पीली बत्ती की गाड़ी भांय-भांय कर कार्यक्रम स्थल मे प्रविष्ट होती है । तथाकथित सारे उच्चाधिकारी उन्हे घेरे खड़े है ।
कडे सुरक्षा कवच के बीच अंतत वह अपनी बंदूक उनके चरणों मे रख आत्मसमर्पण कर देती है । अन्य औपचारिकता के बाद कार्यक्रम समाप्ती की घोषणा हो जाती है ।
सभी समाचार पत्रों के कुछ तथाकथित …
ContinueAdded by नयना(आरती)कानिटकर on December 10, 2015 at 9:26am — 3 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 10, 2015 at 6:36am — 6 Comments
मुझको तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया
तन्हाइयों की भीड़ में खोने नहीं दिया
चाहा तो बार बार के हो जाऊँ बेवफ़ा
लेकिन तुम्हारे प्यार ने होने नहीं दिया
अब तो धुंवाँ धुंवाँ सी हुई मेरी ज़िंदगी
जलने दिया न, राख़ भी होने नहीं दिया
लब पे सजा लिए हैं तवस्सुम की झालरें
एहसास ग़म का दुनिया को होने नहीं दिया
आँखों में अश्क आप की आ जाएँ ना कहीं
इस डर से अपने आप को रोने नहीं दिया
अपना सका मुझे न…
ContinueAdded by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 9, 2015 at 11:30pm — 9 Comments
बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’
अरकान - 212 212 212 212
हो के मुझसे तू ऐसे खफ़ा ज़िन्दगी |
जा बसी है कहाँ तू बता ज़िन्दगी|
जग को ठुकरा दिया मैंने तेरे लिए,
कर न पायी तू मुझसे वफ़ा ज़िन्दगी|
तेरी सूरत ही थी मेरा दर्पण सदा,
तू मिले फिर सजूँ इक दफा ज़िन्दगी|
तू हंसाती भी है और रुलाती भी है,
तू दिखाती है क्या क्या अदा ज़िन्दगी|
पहले इतना बता क्या है मेरी ख़ता,
फिर जो चाहे तू देना सज़ा…
ContinueAdded by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 9, 2015 at 10:33pm — 2 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 9, 2015 at 4:00pm — 4 Comments
विद्यालय में मध्यान्ह भोजन की दाल में असंख्य इल्ली, तिलूले ,देखकर मैं आपे से बाहर हो गई । तुरंत बच्चों की पंगत उठा कर मैं मध्यान्ह भोजन के ठेकेदार से जम कर उलझ पड़ी । लेकिन वो भी कम ना था, हर बात को "इत्तेफाक "कह के टालने लगा । मुझे दुःख इस बात से ज्यादा हो रहा था कि पता नही कितने दिनों से ये मासूम ऐसा खाना खा रहे है । इत्तेफाक तो मेरे साथ हुआ कि मैं आज प्रभार में थी और ये कृत मेरी जानकारी में आ गया । मैंने तुरंत लिखित कार्रवाई शुरू की । अपने खिलाफ कार्रवाई होते देख उसने गिरगिट की तरह रंग…
ContinueAdded by Rahila on December 9, 2015 at 12:00pm — 20 Comments
भावनाएँ साफ पानी से बनती हैं
तर्क पौष्टिक भोजन से
भूखे प्यासे इंसान के पास
न भावनाएँ होती हैं न तर्क
कहते हैं जल ही जीवन है
क्योंकि जीवन भावनाओं से बनता है
तर्क से किताबें बनती हैं
पत्थर भी पानी पीता है
लेकिन पत्थर रोता बहुत कम है
किन्तु जब पत्थर रोता है तो मीठे पानी के सोते फूट पड़ते हैं
प्लास्टिक पानी नहीं पीता
इसलिए प्लास्टिक रो नहीं पाता
हाँ वो ठहाका मारकर हँसता जरूर…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2015 at 10:07pm — 12 Comments
मर्यादा ....
चक्षु को चक्षु से देखा
करते हमने द्वंद
उलझे करों को
देख इक दूजे में
हम तो रह गये दंग
आँख बचा कर
कब बाला ने
बदला कपोल का रंग
वर्तमान में बेहयाई का
हुआ ये आम प्रसंग
संस्कारों को त्याग जोड़े ने
अधर मिलाये संग
समझ न आये
क्यूँ इस युग में
कपडे हो गये तंग
मृग नयनी का
नशा देख के
फीकी पड़ गयी भंग
बैठ बाईक पर
दौड़ चले फिर
इक दूजे के संग
शर्मो-हया की चिंता किसे अब
सतरंगी है मन…
Added by Sushil Sarna on December 8, 2015 at 7:15pm — 2 Comments
इलेक्शन के ऐलान के बाद राजनीती का बाज़ार गर्म होने लगा,गाँव में हर पार्टी अपने अपने पर तोलने लगी ।
सभी तरफ वोटर को लुभाने व उनका धर्म ज़ात व कीमत लगाने की तैयारी चल रही थी।
उस दिन मास्टर बजार में खड़ा कह रहा था “अब तो पहले जैसी राजनीती नहीं रही” ।
“अब तो साये की तरह साथ रहने वाले पार्टी वर्करों पर भी कोई यकीन नहीं रहा”
पास खड़े आदमी ने कहा “ऐसा क्यूँ”, तुम देखते नहीं रेलियों में भीड़ जितनी होती है, भीड़ को वोट में तब्दील करना एक टेढ़ी खीर बन गया है” । महिंद्र…
ContinueAdded by मोहन बेगोवाल on December 8, 2015 at 6:30pm — 5 Comments
कुछ ही दिन पहले हुई पिता की मृत्यु से वह अभी उबर भी न पाया था कि अचानक शोक संतप्त माँ को दिल का भयंकर दौरा पड़ गयाI डॉक्टरों ने साफ़-साफ़ बता दिया था कि उसकी माँ अब ज़्यादा देर की मेहमान नहींI
कुछ ही समय पहले उसके पिता की गोलियों से छलनी लाश एक सुनसान क्षेत्र में पाई गई थीI पुलिस का कहना था कि यह आतंकवादियों का काम है, जबकि स्थानीय कट्टरपंथी इसे सेना द्वारा की गई फर्जी मुठभेड़ कह कर लगातार विष वमन कर रहे थेI शवयात्रा के दौरान पूरे रास्ते में देश और सेना विरोधी नारे…
Added by योगराज प्रभाकर on December 8, 2015 at 4:30pm — 12 Comments
' सब तैयारी हो गयी बेटा ? ' पिता ने कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा I पीछे पीछे माँ भी थी ,छोटी -छोटी पोटलियों से लदी-फदी I बहू ये सब ठीक से रख लो ! कोने में खड़ी बहू के हाथ में पोटलियों को थमाते हुए बोली I
' जी अम्मा I '
' सब अच्छे से सहेज लेना ,कुछ छूट न जाए I नयी जगह है परेशानी होगी I '
' जी बाबूजी ! ' इतना ही बोल पाया वह I हालाँकि कहना तो ये चाहता था I ' सब कुछ तो छूट ही रहा है ,आप माँ संगी साथी .......I पर आवाज़ जैसे हलक में ही कही गुम होती लग रही थी I
कुछ पल…
Added by meena pandey on December 8, 2015 at 3:30pm — 10 Comments
कैलेंडर का पन्ना पलटते ही उसकी नजर तारीख़ पर थम गई। विवाह का दिन उसके आँखो के आगे चलचित्र सा घूम रहा था।.सुशिक्षित खुबसुरत नेहा और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक नीरज की जोडी को देख सब सिर्फ़ वाह-वाह करते रह गये थे.वक्त तेजी से गुज़र रहा था।.
जल्द ही नेहा की झोली मे प्यारे से दो जुडवा बच्चे बेटा नीरव और बेटी निशीता के रुप मे आ गये।.तभी --
वक्त ने अचानक करवट बदली बच्चों के पालन-पोषण मे व्यस्त नेहा खुद पर व रिश्ते पर इतना ध्यान ना दे पाई । उसके के हाथ से नीरज मुट्ठी से रेत की तरह फ़िसलता…
Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 8, 2015 at 1:00pm — No Comments
1222 1222 1222 1222
भला सच यार कब वैसे चुनावी आस को होना
चुराकर आम के सपने सदा गुम खास को होना /1
हकीकत लोकराजों की जो नौकर है तो नौकर है
भले कागज की बातों में है मालिक दास को होना /2
लड़ाई आज सत्ता की बदलती रंग गिरगिट ज्यों
बहाना फिर फसादों का वही इतिहास को होना /3
कहाँ तक हम करें बातें बना सौहार्द्र जीने की
खपा इतिहास में माथा खतम विश्वास को होना /4
सुना कल शीत की बरखा बहाकर ले गई सबकुछ
मगर …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2015 at 10:51am — 2 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 8, 2015 at 9:52am — 6 Comments
Added by shree suneel on December 8, 2015 at 1:40am — 6 Comments
2122—1122—1122—22
मैं तमन्ना नहीं करता हूँ कभी पोखर की
मेरी गंगा भी हमेशा से रही सागर की
रूठने के लिए आतुर है दिवारें घर की
सिलवटें देखिये कितनी है ख़फा बिस्तर की
एक पौधा भी लगाया न कहीं पर जिसने
बात करता है जमाने से वही नेचर की
अम्न के वासिते मंदिर तो गया श्रद्धा से
बात होंठों पे मगर सिर्फ़ वही बाबर की
आसमां का भी कहीं अंत भला होता है
ज़िंदगी कितनी है मत पूछ मुझे शायर की
ये सहर क्या है, सबा क्या है,…
Added by मिथिलेश वामनकर on December 8, 2015 at 1:30am — 30 Comments
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