Added by Samar kabeer on December 7, 2015 at 10:48pm — 8 Comments
अधूरे हर्फ़ :..........
हंसी आती है
अपने ख्यालों पर
मेरे तसव्वुर में
तुम जब भी आती हो
इक अधूरी ग़ज़ल की तरह आती हो
नज़र से नज़र मिलती ही
एक अजीब सी सिहरन होती है
तुम किताब के रूठे हर्फों की तरह
किसी कोने में सिमटी रहती हो
मैं अपने अधूरे हर्फों को
इक मुकम्मल शक्ल देने की कोशिश में
तमाम शब चरागों में झिलमिलाते
तुम्हारे अक्स के साथ
गुज़ार देता हूँ
सहर होने के साथ
हम अधूरे लफ़्ज़ों के तरह
मुकम्मल होने के लिए…
Added by Sushil Sarna on December 7, 2015 at 8:04pm — 2 Comments
2122 2122 212
लाएगी इक दिन क़यामत,देखना..
जानलेवा है सियासत, देखना..
काम मुश्किल है बहुत संसार में,
दुसरे इंसाँ की बरकत देखना..
देख लेना खूँ-पसीना भी, अगर
आलिशाँ कोई इमारत देखना..
झाँक कर मेरी निगाहों में कभी,
आपसे कितनी है चाहत, देखना..
देखना हो गर खुदा का अक्स,तो
छोटे बच्चे की शरारत देखना..
'जय' न सिखला दे मुहब्बत,फिर कहो
दो घड़ी करके तो सुहबत देखना..
______________________________…
Added by जयनित कुमार मेहता on December 7, 2015 at 2:30pm — 12 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 7, 2015 at 1:18pm — 6 Comments
4/
2122 2122 2122 212
खुद के होने का जरा भी वो पता देता नहीं
अब किसी को भी गुनाहों की सजा देता नहीं /1
देवता तो थे बहुत पर ढल गए बुत में सभी
क्यों कहूँ तुझसे की उनको क्यों सदा देता नहीं /2
मर रही इंसानियत है और रिश्ते तार तार
क्यों कयामत का भरोसा अब खुदा देता नहीं /3
हर तरफ विष देखता हूँ सुर असुर सब हैं लिए
क्या समंदर मथ भी लें तो अब सुधा देता नहीं /4
वक्त का साया रहे जब मत निठल्ले बैठना
वक्त…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 7, 2015 at 11:41am — 8 Comments
ख़बर सबकी है ख़ुद से बेख़बर हैं
ख़ुदा जाने के हम कैसे बशर हैं।
असर कलयुग का कुछ ऐसा हुआ है
फकीरों की दुआएं बेअसर हैं।
परिंदे ढूंढते हैं आशियाना
के शहरों में बचे कुछ ही शजर हैं।
हैं आलीशान ज़ाहिर में सभी कुछ
मगर टूटे हुए अंदर से घर हैं।
मिटी इंसानियत आदम बचा है
हज़ारों हो गये ऐसे नगर हैं।
जो दें किरदार की खुशबू सभी को
बहुत कम रह गये ऐसे,मगर हैं।
अंधेरों ने किये दर बंद सारे
उजाले फिर रहे अब दर…
Added by rajinder toki on December 7, 2015 at 11:30am — 3 Comments
कैच जिसके उछाला गया है , उसे लेने दो भाई
*****************************************
बाल , नो बाल थी
इसलिये पूरे दम से मारा था शाट
मेरे बल्ले का शाट
थर्ड मैन सीमा रेखा के पार जाने के लिये था
अगर बाल लपक न ली जाती तो
अफसोस इस बात का नहीं है बाल लपक ली गई
दुख इस बात का है, कि
मेरे बहुत करीब खड़े , स्लिप और गली के फिल्डर दौड़ पड़े
ये जानते हुये भी , ये कैच उनका नही है
आपस मे टकराये , गिरे पड़े , घायल…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on December 7, 2015 at 7:30am — 8 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 6, 2015 at 11:32pm — No Comments
Added by Manan Kumar singh on December 6, 2015 at 9:02pm — 1 Comment
वो अकेली बैठी रो रही थी, जंगली जानवरों से उसका रोना बर्दाश्त नहीं हुआ, वो उसके पास जाकर उसका दुःख पूछने लगे|
उसने कहा, "मैं उससे बहुत प्रेम करती हूँ, लेकिन उसे केवल मेरी खूबसूरती से ही प्रेम है, और वो ही मेरी सुन्दरता नष्ट कर रहा है, पता नहीं कैसे-कैसे रासायनिक द्रव और विष समान कचरा युक्त जल मुझे पीना होता है, उसके फैलाये धुंए से मैं क्षीण और कुरूप होती जा रही हूँ| उसके मचाये शोर से बहुत घबरा जाती हूँ, क्या करूँ?"
फिर उसने तितली से कहा, "तुम जिन फूलों पर जाती…
ContinueAdded by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 6, 2015 at 8:30pm — 8 Comments
नीम तले ही खेलें
*****************
कहाँ छाया खोजते हो तुम भी
बबूलों के जंगलों में
केवल कांटे ही बिछे होंगे ,
नुकीले , धारदार
सारी ज़मीन में
काट डालें
जला ड़ालें उसे
उनके पास है भी क्या देने के लिये
सिवाय कांटों के
चुभन और दर्द के
कुछ अनचाही परेशानियों के
होंगी कुछ खासियतें ,
बबूलों में भी
पर इतनी भी नहीं कि लगायें जायें
बबूलों के जंगल
नीम में उससे भी…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on December 6, 2015 at 8:00pm — 3 Comments
Added by मनोज अहसास on December 6, 2015 at 2:30pm — 2 Comments
राम कृष्ण की जन्मभूमि,
है कर्म-स्थली वीरों की,
भारत की पावन माटी सी,
होगी कहीं जमीन कहाँ ।
यूँ तो रंग अनेकों होंगे,
दुनिया में सब देशों के,
मगर तिरंगे के रंग जैसा,
होगा भी रंग तीन कहाँ।
शिरोधार्य कर माँ की…
Added by Ajay Kumar Sharma on December 6, 2015 at 1:36pm — 3 Comments
2122 2122 2122 212
********************************
बेसदा बस्ती की रस्मों को निभाना था हमें
इसलिए अपनी जबानों को कटाना था हमें /1
या तो कातिल उस नगर में या बचे सब गैर थे
बोझ अर्थी का स्वयं की खुद उठाना था हमें /2
आग का दरिया मुहब्बत ताप आए हम भी यूँ
जो दिलों में जम गया वो हिम गलाना था हमें /3
भर गए सुनते थे वो ही चल दिए जो रीत कर
प्रीत घट में से भला फिर क्या बचाना था हमें /4
रास्ता यूँ तो सफर का जानते …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 6, 2015 at 5:30am — 8 Comments
ऐसे तो उसे इस घर में आये एक हफ्ता होने को आ रहा था किन्तु अभी भी वह एक अवांछित ही थी घर वालों के लिए I कसूर बस इतना था कि उसने इस घर के इकलौते बेटे के साथ प्रेम विवाह किया था I सिर्फ विवाह ही नहीं अलग रहने के बजाय वक़्त के साथ सब कुछ ठीक हो जाने की आस लिए वह इस घर में भी आ गयी थी I नतीजा !! अवांछित ......I पर वह भी थी एकदम जीवट किस्म की !ठान लिया था कि जब तक सब ठीक न हो जाएगा हार नहीं मानेगी I
उस दिन वह पानी पीने के लिए किचन की ओर जा रही थी कि माँजी के कमरे से आते स्वर को सुन…
Added by meena pandey on December 6, 2015 at 1:30am — 10 Comments
"बादल !! देखो कितनी सुन्दर हरियाली , चलो हम कुछ देर यही टहलते है।"
वो देखो मानव और प्रकृति भी है .संग नृत्य करेगे।.
"बादल ने हवा का हाथ पकडते हुए गुस्से मे कहा-- चलो!! यहाँ से धरती माँ की गोद मे जहाँ सिर्फ़ प्रकृति बहन ही हो. हम वहा नृत्य करेगे".मानव तो कब का उसे छोड चुका है,बेचारी मेरी प्रकृति बहना…
Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 5, 2015 at 3:30pm — 2 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on December 5, 2015 at 10:42am — 11 Comments
Added by Manan Kumar singh on December 5, 2015 at 9:07am — 10 Comments
122 122 122 122
**************************
डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा
लड़ो जुगनुओं का सहारा मिलेगा /1
हमेशा नहीं यूँ अँधेरा मिलेगा
भले ही रहे कम उजाला मिलेगा /2
कहावत है तम की जहाँ बस्तियाँ हों
वहीं दीपकों का बसेरा मिलेगा /3
चलो ढूँढते हैं उसे रात भर अब
कहीं तो तिमिर का किनारा मिलेगा /4
भटक जाओ गर तुम गगन को निहारो
बताता दिशा इक वो तारा मिलेगा /5
फकत जागने…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2015 at 6:00am — 14 Comments
Added by आर्यपुत्र सनी जाट स्वदेशी on December 4, 2015 at 9:50pm — No Comments
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