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चाक है हमारी पृथ्वी

कुम्हार हैं हम
सपनों को दीयों
हंडियों
और गुल्लकों की
शक्ल देते हुए
समय और बाज़ार से बेख़बर
चाक के साथ
घुमाते हैं अपनी ज़रूरतें
नही जानते
कि चाक है हमारी पृथ्वी
और बदलने के लिए
समय और मौसम
पृथ्वी का अपने अक्ष पर
घूमना आवश्यक है......

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Jayprakash Mishra on October 5, 2015 at 4:27pm — 5 Comments

ब्लैकमेल(लघुकथा)

'ब्लैकमेल'

"अब तो बस करो। पहले ही लाखों रूपए दे चुका हूँ तुम्हें इस मामले को निपटाने के।"

"हा हा....बस दस लाख और।...... उन लोगों को भी तो देने हैं..........जिन्होंने......पूरी योजना बनाई....और उसे..... सफल बनाने में हमारा साथ दिया।"

"देखो इतना ब्लैकमेल करना ठीक नहीं है।किसी शरीफ़ आदमी को झूठे छेड़-छाड़ के मामले में फंसाना और उससे लाखों ऐंठ कर भी उसे चैन से न जीने देना बहुत गलत और बुरा है।और तुम ख़ुद को समाजसेवक कहते हो।"

"ऎसे ही तो समाज सेवा करती है हमारी संस्था 'प्रयास-एक… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 9:26am — 8 Comments

उलटी गंगा (लघुकथा )

  

उलटी गंगा

बात जब तक  घर में  थी, सभी परिवार के मैंबर  उसे समझा रहे थे । ये तुम  गलत कर रहें हो ,रौशनी का ख्याल हमें पहले रखना चाहिए था, न कि अब हमसाया के  घर की तरफ खिड़की रख कर । मगर वह अपनी फौजियों सी  ज़िद छोड़ नहीं  रहा था ।

पड़ोसी तो इस कि बारे पहले ही विरोध दर्ज करवा चुके थे, “क्योंकि कि बिल्डिंग के पीछे कोई अधिकारित रास्ता न होने की वजह से अपना हक भी नहीं बनता है” उसकी घर वाली ने कहा।  पड़ोसी  के  पास अब क़ानूनी करवाई कि सिवाए कोई चारा नहीं रहा था ।  पर फिर…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on October 4, 2015 at 7:30pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ ( गिरिराज भंडारी )

1222    1222    122 

बहुत बेकार सा चर्चा रहा हूँ

मैं सच हूँ, आँख का कचरा रहा हूँ

 

बहा हूँ मै सड़क पर बेवजह भी

लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ

 

जो समझा वो सदा नम ही रहा फिर

मै आँसू ! आँखों से बहता रहा हूँ

 

महज़ इक बूँद समझा तिश्नगी ने

भँवर के वास्ते तिनका रहा हूँ

 

जलादूँ एक तो बाती किसी की   

इसी उम्मीद में दहका रहा हूँ   

 

मुझे मानी न पूछें ज़िन्दगी का

अभी…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on October 4, 2015 at 10:43am — 28 Comments

दुनियाँ क्या से क्या हो गई-- डॉo विजय शंकर।

दुनियाँ,क्या से क्या
हो गई,
रफ़्तार, हवा से तेज
हो गई ,
जिंदगी, बस एक रेस
हो गई ,
मेहबूब की बातें,
मेहबूब से बातें ,
ग़ज़ल न जाने कहाँ ग़ुम
हो गई,
इश्क न जाने कहाँ खो गया
अफेयर का ज़माना हो गया ,
चलते हैं ,
बदलते हैं ,
कितने फेयर होते हैं ,
जफ़ा को अब कोई रोता नहीं ,
जिक्रे वफ़ा अब कहीं होता नहीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on October 4, 2015 at 10:31am — 20 Comments

पाठ गीता का सुनाने के लिए आया नहीं

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

==================================

मैं समस्यायें गिनानें के लिए आया नहीं।

धर्म नैतिकता सिखानें के लिए आया नहीं।।



सो रहे हैं आत्मा को बेचकर इंसान जो।

मत डरें उनको जगानें के लिए आया नहीं।।



जानता हूँ कल्कि युग की मान मर्यादा भी है।

नीतिगत बातें बतानें के लिए आया नहीं।।



तुम मगन अपनी लगन में ही रहो ओ साथियों।

राह में कंटक बिछाने के लिए आया नहीं।।



आचरण की सीख दूं, मुझको… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 4, 2015 at 12:38am — 16 Comments

ग़ज़ल :- अब तो माँ भी नहीं दुआ के लिये

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन/फ़ेलान



तोड़ क्या लाऊँ इस बला के लिये

अब तो माँ भी नहीं दुआ के लिये



रह्म शैताँ के पास मिलता नहीं

ये सिफ़त है फ़क़त ख़ुदा के लिये



जान से हाथ धोना पड़ते हैं

बस ये इनआम है वफ़ा के लिये



हक़ अदा कर दिया मुहब्बत का

क्या सज़ा देंगे इस ख़ता के लिये



सब उसे तोता चश्म कहते हैं

है वो मशहूर इस अदा के लिये



मुश्किलें मेरी दूर कर देना

कोई मुश्किल नहीं ख़ुदा के लिये



क़त्ल का मेरे फ़ैसला ये… Continue

Added by Samar kabeer on October 3, 2015 at 11:41pm — 13 Comments

ख़ौफ़ खाता हूँ …

ख़ौफ़ खाता हूँ …

ख़ौफ़ खाता हूँ 

तन्हाईयों के फर्श पर रक्स करती हुई

यादों की बेआवाज़ पायल से

ख़ौफ़ खाता हूँ

मेरे जज़्बों को अपाहिज़ कर

अश्कों की बैसाखी पर

ज़िंदा रहने को मज़बूर करती

बेवफा साँसों से

ख़ौफ़ खाता हूँ

हयात को अज़ल के पैराहन से ढकने वाली

उस अज़ीम मुहब्बत से

जो आज भी इक साया बन

मेरे जिस्म से लिपट

मेरे बेजान जिस्म में जान ढूंढती है

और ढूंढती है

ज़मीं से अर्श तक

साथ निभाने की कसमों के…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 3, 2015 at 8:30pm — 12 Comments

अंतहीन अवकाश ( लघुकथा )//शशि बंसल

अंतहीन अवकाश ( लघुकथा )//शशि बंसल

=============================



मुसलाधार बारिश होने के कारण आज अस्पताल से अवकाश ले घर पर ही थी ।काम से फ़ारिग़ हुई तो खिड़की पर आ बैठी ।नीचे झाँका , गली में ज्यादा रौनक नहीं दिखाई दी ।दो-तीन स्कूली बच्चे थे , जो सड़क पर भरे हुए पानी में उछल-कूद करते हुए हँस रहे थे । सामने की दुकानों ने भी ग्राहकी न होते देख आधे शटर गिरा दिए थे । कुछ रिक्शेवाले रिक्शे खाली छोड़ सामने गुमटी पर गरम - गरम चाय की सुड़कियाँ लगा रहे थे । तभी एक रिक्शा गाड़ी आते हुए दिखाई दी, '… Continue

Added by shashi bansal goyal on October 3, 2015 at 5:56pm — 6 Comments

सोच

तीन दिन से जितनी तेज़ी से मूसलाधार बारिश हो रही है , उतनी ही तेज़ी से रामचरण के घर में भूख की भट्टी ज़ल रही है।



" अदालत तक चलोगे भाई ?"

"ज़रूर साहब जी"

"तेरा लाख-लाख धन्यवाद भगवान " कह रामचरण रिक्शा हाँकने लगा ।

"अरे भाई ! आज़ कोई चलने को तैयार ही नहीं हो रहा, तुम कैसे हो गए ?"

"साहब जी,ये पेट क्या न कराये ।"

"हाँ...ठीक कह रहे हो भाई ,कितना कमा लेते हो दिन भर में ?"

"बस चूल्हा ज़ल जाता है साहब जी।"

"सुनो,एक बात कहूँ ,मज़बूरी न होती तो मैं तुम्हारे रिक्शे… Continue

Added by Janki wahie on October 3, 2015 at 5:53pm — 4 Comments

"नन्दू रिक्शे वाला" - [लघु कथा]

"नन्दू रिक्शे वाला" - (लघु कथा)



"कक्का तुम काहे को परेशान हो रहे हो, रोज़ की तरह मैं तो पैदल ही चला जाता।"- हत्थू- रिक्शे पर बैठे ज़ाहिद ने एक बार फिर गुज़ारिश की ।



"न बेटा न, मैं तेरे बुलन्द हौसले को तो जानता हूँ, लेकिन सड़क के गड्ढों और गाड़ियाँ दौड़ाने वालों पर भरोसा नहीं है मुझे। विधाता ने वैसे ही तेरी आँखों को लाइलाज़ बीमारी दे दी, कुछ दिखाई देता नहीं तुझे, कोई और चोट न लगे, बस यही चाहता हूँ।" यह कहते हुए बूढ़ा नन्दू रिक्शे वाला जैसे अतीत में खो गया। ज़ाहिद को वह बचपन… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 2, 2015 at 9:44pm — 14 Comments

श्याम से तो श्वेत सबका तन हुआ है (ग़ज़ल)

2122 2122 2122



श्याम से तो श्वेत सबका तन हुआ है..

लोभ से संत्रास लेकिन मन हुआ है..



अब कली भौरों से शर्माती नहीं है,

बेशरम अब सारा ही उपवन हुआ है..



खटने में ही बीतती है उम्र सारी,

कोल्हू के इक बैल सा जीवन हुआ है..



दिल के ग़म चहरे तलक आते नहीं क्यूँ,

सोच कर हैरान ये दर्पण हुआ है..



सूखी धरती की दरारें पूछती हैं,

तू भी धोखेबाज़ क्यूँ सावन हुआ है..



आजकल की फिल्मों में तो कुछ नहीं..बस,

'काम' का विस्तार से… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on October 2, 2015 at 9:00pm — 6 Comments

इस दिल का

हुआ है प्‍यार में पागल सुनो अंन्‍जाम इस दिल का

न तेरी बात माना मैं लगा इल्‍जाम इस दिल का

.

अँधेरा दूर हो करना जला, लो दिल सनम मेरा

न है जब जिन्‍दगी में तू न है क्‍या काम इस दिल का

.

रही जब पास तुम मेरे बडा अनमोल था ये दिल

न अब कोई मुझे पूछे न है कुछ दाम इस दिल का

.

तुम्‍हारा प्‍यार था जब तो बुलाते थे सभी दिलवर

सुना मैने पड़ा अब दिलजला हैै नाम इस दिल का

.

खता कोई न है इसकी, मगर बदनाम तो है ये

न करता है वफा…

Continue

Added by Akhand Gahmari on October 2, 2015 at 8:00pm — 3 Comments

हल चलाना जानता हूँ (गीत)

है कला,मिट्टी से मैं,

सोना उगाना जानता हूँ।

पुत्र हूँ किसान का,

मैं हल चलाना जानता हूँ।।



ताप से दिनकर के मैं

तपकर कभी पिघला नहीं

रोक सकती हैं नहीं

मुझको मचलती भी बयारें



प्रात हो या रात,रहता

मैं सदा ही मस्तमौला

बरखा मूसलाधार चाहे

हलकी-फुल्की हों फुहारें



काल के भी गाल से,

मैं लौट आना जानता हूँ..!



लहलहाती है फसल जब

मैं ख़ुशी से झूमता हूँ

संग मेरे झूमते हैं

प्रकृति के सब नज़ारे



ये… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on October 2, 2015 at 7:40pm — 9 Comments

गजल

गजल

2122 2122 2122 212

आपका ऐसे यहाँ आना ठिकाना हो कभी

खिल उठे बगिया मिलन का तो बहाना हो कभी।

धूप का धोया पथिक मैं जल रहा हूँ कामिनी

रूप के जी नेह जल से अब नहाना हो कभी।

लय भरे थे दिन कभी फिर लय भरी थी यामिनी

लौट आयें दिन वही फिर से तराना हो कभी।

भाव मन का भाँप लेतेे बिन कहे बातें हुईं

आ चलें फिर आजमा लें क्यूँ बताना हो कभी?

वक्त ने कितना सताया याद रखना लाजिमी

छक चुके अबतक बहुत अब क्यूँ छकाना हो कभी?

कह रहा हर पल कथाएँ आज अपने प्यार… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 2, 2015 at 6:00pm — 4 Comments

पैमाना (कहानी)

पैमाना(सोमेश कुमार )

राम-राम अम्मा जी |(मुकेश बंसल के साथ सैर पर निकलते हुए सुरेश गुप्ता चौखट पर बैठी वृद्धा को देखकर )

राम-राम बेटा |ठीक हो !(वृद्धा ने उनको देखकर हाथ उठाते हुए पूछा )

बस आपका आशीष है |(कहते हुए आगे बढ़ जाते हैं )

कुछ दूर चलने के बाद |अरे सुरेश जी !ये आप क्या कर रहे थे ?

मैंने क्या किया ?

उस औरत को - - -!

क्यों ?कुछ गलत कर दिया |

और क्या ?

कैसे ?

कहाँ आप,कहाँ वो ?

मतलब !

आप जाति के बनिया पढ़े-लिखे शिक्षक फ्लैट में रहने… Continue

Added by somesh kumar on October 2, 2015 at 5:30pm — 4 Comments

प्राकृतिक सौन्दर्य पर हमने दाग लगाया है (कविता )

चहुँ ओर फैली हरियाली 

देती जो हमको खुशहाली 

पर यह कब तक बनी रहेगी 

जब न मोटर - कार रहेगी 

इसे चलाकर हमने दूषित वायु किया 

जानबूझकर हमने छोटा आयु किया 

कर वायु प्रदूषित हमने महाप्रलय बुलाया है 

प्राकृतिक सौन्दर्य पर हमने दाग लगाया है |

भारतवासी पवन गंगा जिससे बुलाते हैं 

पापतारने हेतु इसी गंगा में डुबकी लगाते हैं

भूल गए पावन गंगा ,हम भूल गये कहानी को

अपवित्र करडाला गंगा लाकर गंदे पानी को

खुद की…

Continue

Added by maharshi tripathi on October 2, 2015 at 2:52pm — No Comments

ग़ज़ल-वो दुश्मनी की सब हदों को--

                           ग़ज़ल

 

                  (वहर :  2212  2212  2212  2212 )

वो दुश्मनी की सब हदों को पार करता ही रहा I

मैं माफ़ उसको जान कर हर बार करता ही रहा II

 

जो आह भर भर हर समय थे देखते राहें सदा ,

उनके दिलों से वो सदा व्यापार करता ही रहा I

 

दिल से न शाया था हटा, कुछ तो नजर ढूंढे तभी ,

पहचानता है क्या उसे, इनकार करता ही रहा I

 

राजा दिलों का वो बनें, है मर नहीं…

Continue

Added by कंवर करतार on October 2, 2015 at 2:23pm — 10 Comments

खुद को ढूँढती फिरूँ,कूप कोई अंध में

कभी अतीत फंद में ,कभी भविष्य द्वन्द में 

खुद को ढूँढती फिरूँ कूप कोई अंध में 

शब्द ठिठके से खड़े ,भाव बहने पे अड़े  

अश्रु भी लो अब यहाँ ,बन गए जिद्दी बड़े

अब रुकेंगे ये कहाँ छन्द  के किसी बंद में

खुद को ढूँढती फिरूँ कूप कोई अंध में

प्रेम में रहस्य क्या ,जो छिपा वो प्रेम क्या

 प्रेम हो  कुछ इस तरह ,उदय  रवि लगे नया

खुल जाय हर इक गिरह, मुस्कान एक मंद में

खुद को ढूँढती फिरूँ कूप कोई अंध में 

ह्रदय धरा…

Continue

Added by pratibha pande on October 2, 2015 at 11:12am — 14 Comments

शहर में आ गया पर भूला नहीं गाँव दोस्तों

२१२२ १२२२ २१२२ १२१२

शहर में आ गया पर भूला नहीं गाँव दोस्तों 

भूल सकता नहीं पीपल की मैं वो छाँव दोस्तों 

खेल के नाम पे होती है सियासत ही बस यहाँ 

चल नहीं सकता मेरा कोई यहाँ दाँव दोस्तों 

सजदा करने में भी आती है शरम सबको आजकल 

कोई बूढों के झुक के छूता नहीं पाँव दोस्तों 

माँ ने जिस बाँध के सहरा है बसाया मेरा जहाँ 

मैं उसी माँ की भी बैठा ही नहीं ठाँव दोस्तों 

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Dr Ashutosh Mishra on October 2, 2015 at 10:42am — 12 Comments

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