झुमका झांझर चूड़ियाँ, करधन नथ गलहार |
बिंदी देकर मांग भर,.....कर साजन सिंगार ||
सूनी सेज न भाय रे, छलकें छल-छल नैन |
पी-पी कर रतिया कटे,....दिन करते बेचैन ||
उस आँगन की धूल भी, करती है तकरार |
अपनेपन से लीपकर , जहां बिछाया प्यार ||
हरियाली घटने लगी, कृषक हुए सब दीन |
राजनीति जब देश की, खाने लगी जमीन ||
टहनी के हों पात या, हों फुनगी के फूल |
दोनों तरु की शान हैं, तरु दोनों का मूल ||…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on October 8, 2015 at 7:00pm — 8 Comments
अब समाचार ब्यापार हो गए
किसकी बातें सच्ची जानें
अब समाचार ब्यापार हो गए
पैसा जब से हाथ से फिसला
दूर नाते रिश्ते दार हो गए
डिजिटल डिजिटल सुना है जबसे
अपने हाथ पैर बेकार हो गए
रुपया पैसा बैंक तिजोरी
आज जीने के आधार हो गए
प्रेम ,अहिंसा ,सत्य , अपरिग्रह
बापू क्यों लाचार हो गए
सीधा सच्चा मुश्किल में अब
कपटी रुतबेदार हो गए
मौलिक और अप्रकाशित
मदन मोहन सक्सेना
Added by Madan Mohan saxena on October 8, 2015 at 2:30pm — 2 Comments
गीतिका, आधार छंद- वाचिक महालक्ष्मी
(212 212 212)
शब्द अब गीत रचने लगे,
राज़ दिल के बिखरने लगे। /1/
दोस्त दुश्मन सभी दूर हैं
अब स्वयं को समझने लगे। /2/
नौकरी रिश्वतों से मिली,
आज अक्षम चमकने लगे। /3/
ठोकरें दीं सभी ने हमें,
पैर रखकर कुचलने लगे। /4/
प्रेम, दोस्ती रही आज तक,
शक हमें दूर रखने लगे। /5/
युग्म जुड़ कर करेंगे भला,
गीतिका-भाव भरने लगे। /6/
(मौलिक व अप्रकाशित)
_शेख़…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:07am — 9 Comments
“बेटे सुजित, कहाँ हो” शर्मा जी अपनी चाबी से मुख्य दरबाजा खोलते ही अंदर अँधेरा देख बोले Iआबाज लगाते लगाते ही घर की बत्तियाँ जलाने लगे Iज्यों ही बेटे वाले कमरे की बत्ती का बटन दबाया, कक्षा दो में पढ़ने बाले बेटे को मोबाइल पर अपने नन्हें दोस्तों से व्हाट्स एप पर चैटिंग करते देख डांटते हुए बोले, “हर समय बस चैटिंग-चैटिंग, कुच्छ होम वर्क कर लेते I उठो, जाओ अपना होम वर्क करो I”
“आइ एम सॉरी पापा --” रुआंसा हुआ सुजित बोला, “ पर पापा --आप सुवह मेरे स्कूल जाने से पहले आफिस निकल जाते हो और…
ContinueAdded by कंवर करतार on October 7, 2015 at 10:00pm — 6 Comments
"जल्दी करो भाई, देर हो हो रही मुझे , आज तुझे छोड़, तेरी माँ को अस्पताल भी दिखा कर फिर ड्यूटी जाऊँगा ” महिंद्र ने नवीन की तरफ देखते हुए कहा । मुश्किल से दो घंटे की छुट्टी मिली थी ,जल्दी चलें, तीनों बाहर आए और मोटर साईकल पर सवार हो घर से निकल पड़े, अभी चोंक पर आ के रुके तो ट्रैफिक पुलिस के मुलाज़िम ने रोक कर एक तरफ मोटर साईकल खड़ा करके कागज़ दिखाने के लिए कहा, तब महिंद्र ने धीमी आवाज़ से कहा “मुलाज़िम हूँ । बीवी ठीक नहीं है इसे अस्पताल दिखाने जा रहें हैं ।” मगर ट्रैफिक पुलिस के मुलाज़िम…
ContinueAdded by मोहन बेगोवाल on October 7, 2015 at 9:30pm — 2 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 8:23pm — 6 Comments
क्रिकेट मैच जीतने के बाद मोहल्ले के लड़के जश्न मनाते हुए एक टीले पर बैठे हुए थे। मोटू सोनू ने अपनी टाइट शर्ट के बटन सही करते हुए कहा- "अब मैं करता हूँ आमिर खान की नकल ! टी.वी. पे वो नया विज्ञापन देखा है न....
"हम अब भी वहीं के वहीं खड़े हैं, न हम बदले, न हम मोटे हो रहे हैं।
ये तो कमबख़्त कपड़ों की है शरारत, जो अपने आप छोटे हो रहे हैं! "
"वाह, क्या बात है, इसी पे पैरोडी हो जाये। बोल संजू अब तू बोल "- उनमें से एक ने कहा।
संजू शुरू हो गया- "हम अब भी वहीं खड़े हैं, न हम बदले,…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 7, 2015 at 11:00am — 6 Comments
१२२ /१२२ /१२२ /१२२
उजाले बहाये धधक करके रोये
फ़लक पे सितारे चमक करके रोये।
कोई चाँदनी बेवफ़ा तो थी वर्ना
क्यूँ सीना जलाये दहक करके रोये।
नमक इश्क का पी बहुत थीं ये आँखें
अदा अब ये सारे नमक करके रोये।
जो गम हम मिटाने चले जाम उठाने
तो पैमाँ भराये छलक करके रोये।
तेरी खुश्बुओं से घर आँगन भराया
शजर फूल सारे महक करके रोये।
सलामत रहे तू दुआ है हमारी
ये सुन गम…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 9:24am — 11 Comments
Added by Manan Kumar singh on October 6, 2015 at 11:09pm — 3 Comments
तुम न समझ पाओगे .....
तुम न समझ पाओगे
मुहब्बत की ज़मीन पर
कतरा कतरा बिखरते
रूमानी अहसासों के सायों का दर्द
तुम तो बुत हो
सिर्फ बुत
जिसपर कोई रुत असर नहीं करती
तुम से टकराकर
हर अहसास संग -रेज़ों में तक़सीम जाता है
और साथ चलते साये का वज़ूद
सिफर में तब्दील हो जाता है
रह जाते हैं बस शानों पर
स्याह शब में गुजरे चंद लम्हे
जो आज मुझे किसी माहताब में
लगे दाग़ की तरह लगते हैं
तुम्हारी याद का हर अब्र
मेरी चश्म…
Added by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 9:42pm — 10 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 6, 2015 at 6:13pm — 9 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 6, 2015 at 6:02pm — 2 Comments
औपचारिकता – ( लघुकथा )
शहर के मशहूर,युवा व्यवसायी और समाजसेवी राहुल जी का सडक हादसे में निधन हो गया!पार्थिव शरीर घर आ गया था!सारा शहर उमड पडा था!कोठी में पैर रखने को जगह नहीं थी!मातम का माहौल था!औरतों के रोने के अलावा अन्य कोई आवाज़ नहीं आरही थी! करीबी लोग दाह संस्कार की व्यवस्था में लगे थे!
राहुल जी के बहनोई विनोद जी भी मौजूद थे!मगर वे जब से आये थे , तभी से अपने मोबाइल को कान से लगाये हुए थे!अन्य सभी उपस्थिति लोगों ने माहौल की नज़ाकत को देखते हुए अपने मोबाइल बंद कर दिये…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on October 6, 2015 at 5:25pm — 6 Comments
Added by kanta roy on October 6, 2015 at 4:00pm — 12 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 12:07pm — 4 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 8:29am — 3 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 7:31am — 6 Comments
Added by shashi bansal goyal on October 5, 2015 at 8:44pm — 7 Comments
कुम्हार हैं हम
सपनों को दीयों
हंडियों
और गुल्लकों की
शक्ल देते हुए
समय और बाज़ार से बेख़बर
चाक के साथ
घुमाते हैं अपनी ज़रूरतें
नही जानते
कि चाक है हमारी पृथ्वी
और बदलने के लिए
समय और मौसम
पृथ्वी का अपने अक्ष पर
घूमना आवश्यक है......
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Jayprakash Mishra on October 5, 2015 at 4:27pm — 5 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 9:26am — 8 Comments
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