Added by जयनित कुमार मेहता on October 18, 2015 at 5:00pm — 10 Comments
1222 1222 1222 1222
बहलने की जिन्हें आदत, बहलना छोड़ देंगे क्या
तेरे वादों की गलियों में, टहलना छोड़ देंगे क्या
तू आँखें लाल कर सूरज, ये हक़ तेरा अगर है तो
तेरी गर्मी से डर, बाहर निकलना छोड़ देंगे क्या
कहो आकाश से जा कर, ज़रा सा और ऊपर हो
हमारा कद है ऊँचा तो , उछलना छोड़ देंगे क्या
दिया जज़्बा ख़ुदा ने जब कभी तो ज़ोर मारेगा
तेरी सुहबत में ऐ पत्थर, पिघलना छोड़ देंगे क्या
ये सूरज चाँद…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on October 18, 2015 at 10:44am — 16 Comments
अभी अभी जन्मे हो
फिर भी इतना रोना धोना
बात क्या है
क्यों रो रहे हो बच्चे ?
मैंने पूछ लिया
एक प्रश्न बेवजह ।।
बच्चा चमत्कारी था
बोल पडा झट से
क्यों नहीं रोऊँ मैं
इस दुनिया में आके
जबकि इस दुनिया में
गरीब रो रहा है
अमीर रो रहा है
बेऔलाद रो रहा है
औलाद वाला रो रहा है
इस दुनिया में सब लोग
मेरी तरह नंगे हाल आये
फिर भी सब के सब रो रहे हैं
जो हँस रहा है
वो भी रो रहा है
जो रो रहा है वो भी रहा है
जब पूरी…
Added by umesh katara on October 18, 2015 at 9:49am — 4 Comments
Added by kanta roy on October 17, 2015 at 2:33pm — 9 Comments
दिव्य स्वरूपी संस्थिता ,इष्ट अलौकिक शक्ति|
शारदीय नवरात्र में ,शैल सुता की भक्ति||
ब्रह्मलोक संचालिका ,ब्रह्मचारिणी मात्र|
ध्यान ज्ञान आराधना ,शुभ दूजा नवरात्र ||
नाम चन्द्र घंटा सजा ,माँ दुर्गा का रूप|
देता अद्भुत ज्ञान है ,त्रय नवरात्र अनूप||
नाम अन्नपूर्णा धरे ,शाक भरी का पात्र|
माँ कूष्मांडा आ गई ,ले चौथा नवरात्र ||
शुभ पञ्चम नवरात्र है ,माता स्कन्द चरित्र|
खत्म तारकासुर किया…
ContinueAdded by rajesh kumari on October 17, 2015 at 12:35pm — 13 Comments
हल्की 'टप्प' की आवाज़ के साथ स्मार्ट फोन की स्क्रीन पर दो बूँदें गिरीं । एक लम्बी साँस लेकर पश्चाताप और आक्रोश की ज्वाला फिर भड़क उठी। यह वही तस्वीर है न, जो शालिनी के बेहद क़रीबी 'दोस्त' ने ली थी, उस दिन मोबाइल पर।फोटो लेते समय ही उसकी आँखें फटी की फटी सी रह गयीं थीं। उस छिछोरे के हाव-भाव ही संदेहास्पद थे। शालिनी ने तो उसे जीन्स या शोर्ट्स पहनकर चलने को कहा था , लेकिन वह सलवार सूट पहन कर ही उस 'आत्म-रक्षा प्रशिक्षण कैम्प' में गई थी। शालिनी का कुशल व्यवहार उसे पसंद था, लेकिन वह समझ न सकी कि…
ContinueAdded by Sheikh Shahzad Usmani on October 17, 2015 at 11:34am — 3 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 17, 2015 at 11:28am — 4 Comments
1222 1222 1222 1222
निशानी हार फूलो पे मुहर तुम सब लगा देना
खड़ा परधानी मेें देखो भऊजी को जिता देना
सुबह अब चार से पहले भऊजी रोज जागेगी
गली में हाथ जोडे़ मुस्कुरा कर वोट माँगेगी
बहुत खुश हैं न दॉंतो से जो पाते तोड़ अब रहिला
पता जब से चला उनको हुआ ये गॉंव है महिला
कहे बूढे़ सभी मुझसे, जरा उनसे मिला देना
निशानी हार फूलो पे मुहर तुम सब लगा देना
खड़ा परधानी मेें देखो भऊजी को जिता देना
रसोई में न काटे अब सुनो…
Added by Akhand Gahmari on October 17, 2015 at 10:00am — No Comments
Added by Samar kabeer on October 16, 2015 at 11:25pm — 12 Comments
"मधु ! पिता जी का खाना भेज दिया ?"
"हाँ ! बाबा हाँ ! रोज नियम से भेज देती हूँ।" रविवार रमेश स्वयं ही टिफिन लेकर चला जाता। उस दिन बाप -बेटे पुश्तैनी मकान में घण्टों बातें करते और शाम को घर लौटते समय पिता जी रमेश को हमेशा की तरह टोकते:
"बेटा ! बहु-बच्चों का ख्याल रखना।"
आज मधु की छोटी बहन-जीजा आये हुए, देखकर रमेश ने मधु को बिना कुछ बताये टिफिन सेंटर से खाना भर कर भिजवा दिया। मधु ने भी खाना भिजवा दिया। पिता जी की खुशियों का ठिकाना न था। आज रमेश प्रसन्नचित होकर घर पहुँचा तो मधु…
Added by Vijay Joshi on October 16, 2015 at 7:00pm — 5 Comments
तन्हाइयों के ढेर में ख्वाहिश दबी रही ,
जैसे कि रेगिस्तान में बाकी नमी रही
रोते रहे कुछ लोग और जलते रहे कुछ घर ,
पर निंदकों की बस्तियों में रोशनी रही
हमको बिठा के चल दिया ऑटो जब उसको छोड़ ,
मैं देखता रहा, वो मुझे देखती रही
सूखे के बावजूद भी उस दूब को देखो ,
जाने वो इस अकाल में कैसे बची रही
शायद वो समझती थी मुझे आईना, तभी ,
खुद रूप की गहराईयों को आंकती रही
हल है ये लोकतंत्र सियासत के हाथ का ,
जनता ही इस जुएं से मगर जूझती रही
बचपन…
Added by Jayprakash Mishra on October 16, 2015 at 1:00pm — 2 Comments
कर्तव्यनिष्ठ - ( लघुकथा ) -
"सुषमा जी,यह क्या देख रहा हूं! कन्या गुरुकुल की लडकियों को अस्त्र शस्त्र और मार्शल आर्ट्स सिखाया जा रहा है!
"जी सर"!
"सुषमा जी, आपने किसकी अनुमति से यह शुरु किया है"!
"सर, इसकी अनुमति ज़िलाधीश महोदय ने दी है, जो कन्या गुरुकुल के अध्यक्ष हैं"!
"और इसका खर्चा कौन देगा"!
"उसकी व्यवस्था भी ज़िलाधीश महोदय ने किसी समाज़ सेवी संस्था के द्वारा कराई है"!
"मगर सुषमा जी इसकी क्या आवश्यकता थी"!
"सर आपने देखा नहीं,…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on October 16, 2015 at 11:10am — 3 Comments
एक हाथ से कन्या पूजन दूजे हाथ से कन्या हनन
माँ को खुश करने का कैसा है ये आयोजन
धन वैभव की चाहत में सुख संपत्ति के आगत में
मनाते सभी त्यौहार लक्ष्मी जी के स्वागत में
पर ये कैसा अनर्थ जो गृहलक्ष्मी पर भारी
घर अस्पताल में चलती इस लक्ष्मी पर आरी
माँ की ममता बेबस और निष्ठुर पिता का साया
उस घर में बेटी का जन्म क्यूँ न किसी को भाया
कैसी स्वार्थी कैसी निर्दयी ये दुनिया की मंडी
जहाँ बेबस है शक्ति स्वरूपा दुर्गा काली और चंडी
जिन हाथों से डाली जाती है…
Added by DR. HIRDESH CHAUDHARY on October 15, 2015 at 10:00pm — 1 Comment
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2015 at 8:27pm — No Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2015 at 8:27pm — 1 Comment
बह्र : ११२१ २१२२ ११२१ २१२२
हो ख़ुशी या ग़म या मातम, जो भी है यहीं अभी है
न कहीं है कोई जन्नत, न कहीं ख़ुदा कोई है
जिसे ढो रहे हैं मुफ़लिस है वो पाप उस जनम का
जो किताब कह रही हो वो किताब-ए-गंदगी है
जो है लूटता सभी को वो ख़ुदा को देता हिस्सा
ये कलम नहीं है पागल जो ख़ुदा से लड़ रही है
जहाँ रब को बेचने का, हो बस एक जाति को हक
वो है घर ख़ुदा का या फिर, वो दुकान-ए-बंदगी है
वो सुबूत माँगते हैं, वो…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 15, 2015 at 6:13pm — 10 Comments
2122 – 2122 – 2122 – 212 |
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चाँदनी जब रात, गुमसुम क्यों नदी का तीर है? |
मौन है जल किसलिए, पूछो कि क्यों गंभीर है? |
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प्यार के झुरमुट अंधेरों से लिपट सोते… |
Added by मिथिलेश वामनकर on October 15, 2015 at 2:44pm — 12 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 15, 2015 at 12:49am — 3 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2015 at 10:15pm — 5 Comments
212—-212---212---212 |
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पूछते रह गए आप क्या कर चले? |
वो मेरी जिंदगी हादसा कर चले. |
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गुमटियाँ शह्र से जो हटा कर चले… |
Added by मिथिलेश वामनकर on October 14, 2015 at 4:30pm — 23 Comments
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