Added by मनोज अहसास on October 21, 2015 at 8:21pm — 10 Comments
Added by kalpna mishra bajpai on October 21, 2015 at 6:00pm — 12 Comments
दृग
शृंगार करते रहे
आंसुओं से
तृषित मन
आस की मरीचिका में
भटकता रहा
व्यथा
दूर तक फ़ैली नदी में
वायु वेग को सहती
बिन पाल की नाव सी
किसी किनारे की तलाश में
व्यथित रही
दृष्टि स्पर्श
प्रणय अस्तित्व को
नागपाश सा
स्वयंम में लपेटे रहा
अंतर्कथा के मौन पृष्ठों में
जीवन के इक मोड़ की त्रासदी
स्मृति सीप में
कराहती रही
कदम
धूप की तपन को
मन के अंतर्नाद में डूबे
एक क्षितिज की तलाश में…
Added by Sushil Sarna on October 21, 2015 at 5:43pm — 12 Comments
" ये क्या सुना मैने , तुम शादी तोड़ रही हो ? "
" सही सुना तुमने । मैने सोचा था कि ये शादी मुझे खुशी देगी । "
" हाँ ,देनी ही चाहिए थी ,तुमने घरवालों के मर्ज़ी के खिलाफ़ , अपने पसंद से जो की थी ! "
" उन दिनों हम एक दुसरे के लिए खास थे , लेकिन आज ....! "
" उन दिनों से ... ! , क्या मतलब है तुम्हारा , और आज क्या है ? "
" उनका सॉफ्स्टिकेटिड न होना , अर्थिनेस और सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी बहुत खलता है। आज हम दोनों एक दुसरे के लिये बेहद आम है । "
" ऐसा क्यों ? "…
ContinueAdded by kanta roy on October 21, 2015 at 4:00pm — 9 Comments
2122---2122---2122---212 |
धूप की तकसीम में कुछ तो हुआ है देखना |
आज फिर सूरज सवालों में घिरा है देखना |
|
नीम के ये जर्द पत्ते आंसुओं-से झर गए |
इस फिज़ा की आँख में कंकड़… |
Added by मिथिलेश वामनकर on October 21, 2015 at 3:03pm — 9 Comments
लघुकथा- अनाथ
पत्नी की रोजरोज की चिकचिक से परेशान हो कर महेश पिताजी को अनाथालय में छोड़ दरवाजे से बाहर तो आ गया, मगर मन नहीं माना. कहीं पिताजी का मन यहाँ लगेगा कि नहीं. यह जानने के लिए वह वापस अनाथालय में गया तो देखा कि पिताजी प्रबंधक से घुलमिल कर बातें कर रहे थे. जैसे वे बरसों से एकदूसरे को जानते हैं.
पिताजी के कमरे में जाते ही महेश ने पूछा, “ आप इन्हें जानते हैं ?” तो प्रबंधक ने कहा, “ जी मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ. वे पिछले ३५ साल से अनाथालय को दान दे रहे हैं . दूसरा बात…
ContinueAdded by Omprakash Kshatriya on October 21, 2015 at 3:00pm — 19 Comments
तुम्हारें श्री मुख से
दो शब्द
निकले कि
मैंने कैद कर लिया
अपने हृदय उपवन में !!
अब हर रोज
दिल से निकाल
दिमाग तक लाऊँगी
फिर कंठ तक
फिर मुस्कराऊँगी
चेहरे पर
एक अलग सी
चमक बिखर जाएँगी
बार बार यही
दुहराती रहूंगी
क्योकि
अच्छी यादों को
बार-बार खाद-पानी
चाहिए ही होता है!!
और तब जाके
एक दिन
तैर जायेंगी
सरसराहट …
Added by savitamishra on October 21, 2015 at 12:06pm — 6 Comments
चलते रहना रुकना मत।
पथ चाहे हो पथरीला ,
पर्वत हो चाहे टीला ,
सघन समूचा जंगल हो ,
गूढ़ समुंदर हो नीला ,
वीरों सा बढ़ते रहना।
झुकना मत।
चपला चमके आँधी आये,
घनघोर घटा नभ छा जाये,
हो काली रात अंधेरी भी,
सागर में धरा समा जाये,
दीपक सा जलते रहना ,
बुझना मत ।
बन सजग देश के प्रहरी तुम,
रख लक्ष्य साधना गहरी तुम,
नील गगन में चमक उठो,
बनकर चमक सुनहरी तुम,
निज सपनों को…
ContinueAdded by Ajay Kumar Sharma on October 21, 2015 at 11:22am — 4 Comments
कुंडलिया
आश्विन मासे प्रतिपदा, शुक्ल पक्ष संज्ञान.
शारदीय नवरात्रि यह, नव दुर्गा की शान.
नव दुर्गा की शान, ध्यान नौ दिन तक चलते.
भक्ति सहित उपवास, शक्ति संयम यश फलते.
कन्या पूजन दान, पाप को क्ष्ररते निशदिन.
करे सत्य उत्थान, योग का स्वामी आश्विन.
के0पी0 सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 21, 2015 at 9:00am — 6 Comments
ज़मीर – ( लघुकथा ) -
गोपाल ने जैसे ही मेट्रो से बाहर निकलकर मोबाइल के लिये जेब में हाथ डाला!मोबाइल गायब था!उसके हाथ पैर फ़ूल गये!उसका सब कुछ ही मोबाइल में था!उसने क्या करना है ,कहां जाना है , उसके सारे कागज़ात की प्रतियां सब मोबाइल में ही थी!उसे कुछ नहीं सूझ रहा था!
तभी सामने उसे पी.सी.ओ. दिखा!उसने तुरंत अपना मोबाइल नंबर मिलाया!दूसरी ओर से आवाज़ आयी,हैलो, "आप कौन"!
"आप कौन हो भाई "!
"कमाल है भाई, फ़ोन आपने मिलाया है तो आप बताओ ना कि आप कौन हो"!
"देखो भाई, आप…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on October 20, 2015 at 1:22pm — 8 Comments
2122-- 1122 --1122 –112 |
|
बंदगी जिनका सफीना था, वही पार गए |
नाखुदाओं पे भरोसा जो किया, हार गए |
|
अम्न के वास्ते इस पार से उस पार गए… |
Added by मिथिलेश वामनकर on October 20, 2015 at 1:32am — 13 Comments
Added by Nita Kasar on October 19, 2015 at 5:04pm — 25 Comments
सच्चा आनंद – (लघुकथा ) -
"शुक्ला जी,सुना है आप पूरे नव रात्र छुट्टी पर हो"!
"सही सुना है आपने गौतम जी"!
"ऐसा क्या कठोर व्रत पूजा पाठ कर रहे हो कि पूरे नौ दिन की छुट्टी ले ली, व्रत उपवास तो हम भी करते हैं,पर छुट्टी खराब करके नहीं"!
"कुछ ऐसा ही व्रत कर रहा हूं इस बार "!
"कुछ विस्तार से बताओगे"!
"गौतम जी अपने कार्यालय के पीछे जो कुष्ठ रुग्णालय है, उसमें दस कुष्ठ रोगी हैं!मैं पूरे नव रात्र उस रुग्णालय में अपनी सेवायें दे रहा हूं!प्रातः सात बजे से…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on October 19, 2015 at 3:45pm — 10 Comments
(1)
छंद रच ले
छंद का समारोह
काव्य आरोह।
(2)
मन पसंद
लिख ले कुछ छंद
बिना पैबंद।
(3)
छंद में बंद
भावनायें पसंद
विधान द्वंद।
(4)
छन-छन के
निकलते ये छंद
उत्कृष्ट चंद।
(5)
छंद सुनाओ
सत्य हमें बताओ
चेतना लाओ।
(मौलिक व अप्रकाशित)
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2015 at 10:30am — 4 Comments
1222---1222---122 |
|
जरा सा पास आकर देख तो लो |
कभी पलकें उठाकर देख तो लो |
|
अगरचे तिश्नकामी गम बहुत है |
उसे आँसू… |
Added by मिथिलेश वामनकर on October 19, 2015 at 2:08am — 18 Comments
1222 1222 1222 1222
तेरे नैनों के पर्दे को उठा लेती तो बेहतर था।
निगाहों को मेरे मुख पर टिका देती तो बेहतर था।।
हाँ बेहतर तो यही होता कि तुझमें खो ही जाता मैं।
औ तुम भी मेरी आँखों में समा जाती तो बेहतर था।।
न खाली हो सके तुम भी बहुत मशरूफ थे हम भी।
घड़ी कोई हमें तुमसे मिला देती तो बेहतर था।।
पता है, मेरे इस दिल में कई सपने सुहाने थे।
तू अपने ख़्वाब सारे जो बता देती तो बेहतर था।।
यहाँ खोने का डर था तो वहाँ संकोच का…
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 18, 2015 at 11:00pm — 12 Comments
जनवरी की हड्डी कंपा देने वाली ठंड..मैं ऊपर से नीचे तक गर्म कपड़ों के बावजूद कांप रही थी ।कक्षा में पहुंच कर एक नजर, मेरे सम्मान में खड़े सभी बच्चों पर डाली और बैठने का इशारा किया । तभी मेरी नजर उन बच्चों पर पड़ी जिनके बदन पर कपड़ों के नाम पर बस कपड़ों का नाम था।मैंने उन सभी बच्चों को खड़ा कर दिया ।
"क्यों!स्वेटर कहां है तुम्हारे?स्कूल से स्वेटर के लिये पैसा मिला ना तुम लोगों को फिर..?"लहजा सख्त था । बच्चे सहम गये ।फिर सामने जो कहानी आई बेशक अलग-अलग थी लेकिन नतीजा एक,कि उनके अभिभावक सारा…
Added by Rahila on October 18, 2015 at 9:30pm — 39 Comments
"चच्चा, लो पियो जे कड़क चाय, लेकिन मेरी कविता ज़रूर पढ़कर जाना" - गुम्मन ने बड़े उत्साह से कहा।
थोड़ी देर बाद वहीद चच्चा बोले- "ओय गुम्मन, तू तो बड़ी अच्छी कविता लिख लेता है, आज पता चली तेरी काबीलियत और तेरा 'असली' नाम।"
"हाँ चच्चा, छुटपन में एक बार ठण्ड के साथ तेज़ बुख़ार होने पे बिना किसी को बताये टेबल पे रखी रजाई की तह में छिपकर सो गया था। घरवाले घण्टों ढूंढते रहे। जब मिला तो "गुम" कहके चिढ़ाने, बुलाने लगे। इस चाय की दुकान पे सब "गुम्मन" कहने लगे। स्कूल छूटा तो असली नाम भी गुम…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 18, 2015 at 8:30pm — 7 Comments
आज भी कभी
जब उधर से गुजरता हूँ
उतर जाता हूँ
उस खास स्टेशन पर
टहलता हूँ देर तक
लम्बे प्लेटफार्म पर
बेसुध आत्मलीन
फिर चढ़ जाता हूँ रेलवे पुल पर
तलाशता हूँ वह् रेलिंग
वह ख़ास जगह
टटोलकर देखता हूँ
शायद वही जगह है
स्तब्ध हो जाता हूँ
लगता है कोई
सोंधी महक
सहसा उठी और
सिर से गुजर गई
नीचे आता हूँ
फिर पुल के नीचे
पुल के आधार…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 18, 2015 at 7:56pm — 5 Comments
“और भाईजान कैसे है...सब खैरियत तो हैं न?” चिकन शॉप में काम करने वाले प्रकाश के मित्र जावेद ने शिष्टाचार के तहत पूँछा ।
“बस, रहम हैं ऊपर वाले का..और तुम्हारी कैसी गुजर रहीं है, बड़े दिन बाद आना हुआ ईधर ।” प्रकाश ने कहा ।
“बस, काम के सिलसिले में दिल्ली गया था कल ही तो लौटा हूँ...सोचा प्रकाश भाई कि शॉप से चिकन लेता आऊँ वैसे भी बड़े दिन हो गये तुम्हारे दुकान का चिकन खाए हुए ।” जावेद ने जवाब देते हुए कहा ।
“हाँ...हाँ, क्यों नहीं ।” प्रकाश ने कहा ।
“अरे! यार प्रकाश तुम…
ContinueAdded by DIGVIJAY on October 18, 2015 at 7:13pm — 6 Comments
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