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सदस्य टीम प्रबंधन
मूक अंतर्वेदना............... (डॉ० प्राची सिंह)

मूक अंतर्वेदना स्वर को तरसती रह गयी

आँख सागर आँसुओं का सोख पीड़ा सह गयी

 

मानकर जीवन तपस्या अनवरत की साधना

यज्ञ की वेदी समझ आहूत की हर चाहना

मन हिमालय सा अडिग दावा निरा ये झूठ था 

उफ़! प्रलय में ज़िंदगी तिनके सरीखी बह गयी

मूक अंतर्वेदना....

 

खोज कस्तूरी निकाली रेडियम की गंध में

स्वप्न का आकाश भी ढूँढा कँटीले बंध में

दिख रही थी ठोस अपने पाँव के नीचे ज़मीं

राख की ढेरी मगर थी भरभरा कर ढह गयी

मूक…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 26, 2015 at 9:30am — 11 Comments

"ममता, दोस्ती और मुहब्बत" - गीतिका -[ 3] / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

[आधार छंद : 'विधाता']

1222 1222 1222 1222





कभी अपने मुसीबत में, ज़रा भी काम आये हैं,

जिन्हें समझा नहीं था दोस्त वे नज़दीक लाये हैं।



जिसे माना, जिसे पूजा, उसे घर से भगा कर के,

बुढ़ापे में, जताकर स्वार्थ, ममता को भुलाये हैं।

तुम्हारे पास दिल रख तो दिया गिरवी भरोसे पर,

पता मुझको चला तुमने, हज़ारों दिल दुखाये हैं।



कभी वे फोन पर बातें करेंगी, स्वर बदलकर के,

कभी वे नेट पर चेटिंग, झिलाकर के बुलाये हैं।



न जाने…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 26, 2015 at 8:30am — 10 Comments

बैरी पिया

"हैलो..शोभा!कैसी हो।"

"मैं ठीक हूं । आप कैसे हैं?"

"बढ़िया,अरे सुनो मैं फिर नहीं आ पा रहा हूं।यहां सीमा पर माहौल लगातार खराब चल रहा है।छुट्टियों की अर्जियां निरस्त हो गयी।"

"दोबारा..भला ये क्या बात हुई"उसके स्वर में उदासी छा गई ।

"यूं उदास ना हो, फौजी की बीबी को हर हाल में सब्र रखना चाहिए।अच्छा ये बताओ..अगर आज स्वयं भगवान तुम्हें कोई वरदान मांगने को कहते तो क्या मांगती? "

"यही मांगती कि बस तुम इसी वक्त मेरे पास आ जाओ"

"ओह..प्रिय,कुछ और मांगना था । ये ख्वाइश तो… Continue

Added by Rahila on October 26, 2015 at 7:12am — 24 Comments

ग़ज़ल :- ज़माना जान चुका था,हर इक ख़बर में था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ज़माना जान चुका था,हर इक ख़बर में था

वो इक जुनून जो उस वक़्त मेरे सर में था



हर एक शख़्स खिंचा जा रहा था तेरी तरफ़

न जाने कौन सा जादू तिरी नज़र में था



कभी कभी मुझे उसकी भी याद आती है

सफ़ेद बिल्ली का बच्चा जो अपने घर में था



इसी सबब से परेशान थे मेरे दुश्मन

क़बीला सारा मेरी बात के असर में था



सुनाई देतीं भी कैसे ग़रीब की चीख़ें

तुम्हारा ध्यान तो उस वक़्त माल-ओ-ज़र में था



उड़ान भरते रहे… Continue

Added by Samar kabeer on October 25, 2015 at 10:53pm — 17 Comments

हमें एक बार

हमें एक बार फिर से मुस्कुराना चाहिए----

1222-1222-1222-12



हमें एक बार फिर से मुस्कुराना चाहिए

उसी टूटे ह्रदय से गीत गाना चाहिए



लगी ठोकर मुहब्बत की गिरे जो राह में

हमें तो दिल से दिल को फिर मिलाना चाहिए



जमीं से चाँद तारों तक सजाया प्यार है

सजा में मौत भी हो तो निभाना चाहिए



सफर अपना भले ही साहिले गर्दिश में हो

दिया हो पास में तो फिर जलाना चाहिए



यूँ हिम्मत हार कर ना बैठ मेरे हम सफर

बहरों को हमें फिर से बुलाना… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on October 25, 2015 at 9:42pm — 8 Comments

जीवन की आपाधापी में,

जीवन की आपाधापी में,                     

दिन बचपन के भूल गये,                    

परिवर्तित हो गयी हवायें,                       

मौसम भी प्रतिकूल भये।

वो शाम सुहानी,मित्रों के दल,                   

और किनारा नदियों का,                       

कूद, कबड्डी,गुल्ली डंडा,                          

झर झर झरना सदियों का,                     

खेत और खलिहान की रंगत,                      

लदी डाल  में अमियों का,            

मानचित्र…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 25, 2015 at 3:00pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अतुकांत - समय को भी तो एक दिन बूढ़ा होना है -- गिरिराज भंडारी

वो ममता मयी छुवन हो

जो माँ की कोख से निकलते ही मिली

या हो उसी गोद की जीवन दायनी हरारत

या

तुम्हारी उंगलियों को थामे ,

चलना सिखाते 

पिता की मज़बूत, ज़िम्मेदार हथेली हो

या हो

जमाने की भाग दौड़ से दूर , निश्चिंत

कलुषहीन  हृदय से

धमा चौकड़ी मचाते , गिरते गिराते , खेलते कूदते

बच्चे

या फिर स्कूलों कालेजों की किशोरा वस्था की निर्दोष मौज मस्तियाँ

 

या हो वो जवानी में पारिवारिक , सामाजिक ज़िम्मेदारियों…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 25, 2015 at 1:48pm — 14 Comments

इतने सारे फंदे- डा 0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव

बहुत से फंदे है

उनके पास

छोटे-बड़े नागपाश

इन फंदों में

नहीं फंसती उनकी गर्दन

जो इसे हाथ में लेकर

मौज में घुमाते है

लहराते है

किसी गरीब को देखकर

फुंकारता है यह

काढता है फन 

किसी प्रतिशोध भरे सर्प सा

लिपटता है यह फंदा

अक्सर किसी निरीह के  

गले में कसता है

किसी विषधर के मानिंद

और चटका देता है

गले की हड्डियाँ

किसी जल्लाद की भांति …

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 25, 2015 at 12:26pm — 14 Comments

गुरु दक्षिणा – (लघुकथा ) -

  

  गुरु दक्षिणा – (लघुकथा ) -

 विश्व विद्यालय के प्राचार्य  डॉ टीकम सिंह शिक्षा और साहित्य जगत की जानी मानी हस्ती थे!सुगंधा का सपना था कि वह डॉ सिंह को अपनी पी. एच. डी.  का गाइड बनाये!डॉ सिंह एक सनकी और सिरफ़िरे किस्म के इंसान थे!वह अविवाहित थे!वह महिलाओं को अपने अधीन लेना पसंद नहीं करते थे!

लेकिन सुगंधा भी ज़िद्दी स्वभाव की थी!एक दिन पहुंच गयी डॉ सिंह के बंगले पर!

"सर मुझे आपके अधीन पी. एच ड़ी. करनी है"!

"मैं महिलाओं को अपना शिष्य नहीं…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 25, 2015 at 11:43am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अश्कों का मैं गरीब के सागर समेट लूँ (तरही ग़ज़ल 'राज ')

२२१  २१२१  १२२१   २१२

बलवाइयों के होंसले जाकर समेट लूँ

मासूम गर्दनों पे हैं  खंजर समेट लूँ

 

आये न बददुआ कभी मेरी जुबान  पे

गलती से आ गई तो भी अन्दर समेट लूँ

 

उम्मीद से बनाया हैं बच्चे ने रेत का   

लहरों वहीँ रुको मैं जरा घर समेट लूँ

 

परवाज आज भर रहा पाखी नई नई 

आँखों की चिलमनों में ये मंजर समेट लूँ

 

जिन्दा रहे यकीन मुहब्बत के नाम पर  

फेंके हैं दोस्तों ने जो पत्थर समेट…

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Added by rajesh kumari on October 25, 2015 at 10:30am — 18 Comments

व्यंग्य कविता -"एक बूंद पानी की कीमत "

बिन पानी के अभी से मच रहा,सब ओर हाहाकार।

मई-जून में आयेगा मजा,जब मुंह सूखे लार ।।

नदी,कुंये,ताल का,हो जायगा बुरा हाल ।

पानी के लिये मारामारी,होगी अब की साल ।।

खूब धो रहे घर आंगन, और कर रहे बरबाद पानी।

आटा सानने नहीं मिलेगा,खूब कर लो मनमानी ।।

नहाओ-नहाओ सांझ सबेरे,पर कभी आगे का सोचा ।

गमछा गीला करके बदन पर,लगाना पड़ेगा पोंछा ।।

जो नहा ना पायें बहुत दिनों तक,तो आयेगी ऐसी बास।

कहीं मर गया चूहा या, कहीं सड़ गयी लाश ।।

पटक -पटक के कसेंड़ी बर्तन, होगी… Continue

Added by Rahila on October 24, 2015 at 9:49pm — 14 Comments

नीच कौन – ( लघुकथा )

"चाचू, अपने पास तो ट्रैक्टर है फ़िर अपने खेत में ये बुधिया,उसकी घरवाली और छोकरी, बिना बैल के इस तरह हल क्यों चला रहे हैं"!

"मुन्ना बाबू,इनको बडे दादू ने सज़ा दी है"!

"सज़ा किस बात की"!

"इन लोगों ने हमारे ट्यूबवैल के पानी की नाली में हाथ मुंह धोया और पानी पिया, तो पानी अशुद्ध हो गया"!

"वह पानी तो खेत में जा रहा था ना"!

"ये नीच जाति के लोग हैं, यह सब मना है इनके लिये, ये हमारी कोई चीज़ को नहीं छू  सकते"!

“पर चाचू ये दौनों औरतें तो पहले हमारे घर के सारे काम…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 24, 2015 at 5:30pm — 8 Comments

गज़ल...प्रेम दीवानी होती है.....

प्रेम दीवानी होती है.....

सबको अपनी उम्र निभानी होती है.

खुद अपनी पहचान बनानी होती है.

मत उलझो आडम्बर में यदि हो इंसा,

इंसा की खुद आत्म कहानी होती है.

धर्म कर्म आहार भुनाने में उसको,

सपनों की दीवार गिरानी होती है.

मत उगलो तुम जह्र आग तूफान यहां,

जीवन पानीदार सयानी होती है.

बाल न बांका तुम मेरा कर पाओगे,

सत्य-खुदा से आंख मिलानी होती है.

मत रोना संसार रुलाता है…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 24, 2015 at 3:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल

महकती ज़िन्दगी हो फिर शिकायत कौन करता है

बिना कारण ही मरने की हिमाकत कौन करता है

 

तुम्हारी  आँखों में सूखे हुए कुछ फूल देखे थे

तड़पकर माज़ी से इतनी मुहब्बत कौन करता है

 

बड़े काबिल हो तुम लेकिन तुम्हारी जेब है खाली,

भला ऐसों से भी यारा मुहब्बत कौन करता है|

 

कड़कती धूप भी सहते कभी बरसात ठंडी भी,

खुदा ऐसों पे तेरे बिन इनायत कौन करता है|

 

न पूजेगा कोई तुमको खुदा गर सामने आया ,

बिना डर और लालच के इवादत कौन…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 24, 2015 at 1:30pm — 6 Comments

"औरत सी ज़मीन और जमीर" - [लघु कथा] 21 / _शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"जिठानी तो बस फसल कटने पे अपना हिस्सा माँगने लगती हैं, खुद शहर की हो गई, हमें बाप-दादाओं की खेती के काम तो चलाना ही है!"- खेत पर हल जोतते हुए माथे का पसीना पोंछ कर सावित्री ने देवरानी मंगला से कहा।



"मर्दों में वो कुव्वत रही नहीं, तो बेटों का मन कैसे लगे ऐसी खेती में !"- मंगला ने एक हाथ से पल्लू ठीक करते हुए अपने घर के मर्दों और ज़मीन के हालात पर कटाक्ष किया।



"लेकिन एक बात तो मानना पड़ेगी, गाँव छोड़के शहर में भले वो अभी झुग्गी झोपड़ी में रह रही है, लेकिन वो अपने बेटों की…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 24, 2015 at 9:00am — 6 Comments

मात्र इक भाषा नहीं है।

मात्र इक भाषा नहीं है,

राष्ट्र की पहचान -हिन्दी।

सभ्यता की नींव है,

साहित्य की धनवान -हिन्दी।

सर्वव्यापक सरल सुन्दर,

सर्वगुण सम्पन्न है,

ज्ञान का विस्तीर्ण साधन,

सद्गुणों की खान -हिन्दी ।

व्यक्ति का व्यक्तित्व है,

प्रतिबिंब है अभिव्यक्ति का,

उपयोग,सूचक शक्ति का,

मान और सम्मान -हिन्दी।

गुरुमुखी श्रीग्रंथ साहिब ,

नित्य शाश्वत वेद है,

काव्य की निर्मल विधा,

"अज्ञात"…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 23, 2015 at 7:26pm — 2 Comments

राम जी रावणी मन हुआ है (दशहरा विशेष)

2122 122 122 2122 122 122



किस तरह से दशहरा मनायें; राम जी रावणी मन हुआ है।

राम नामी वसन पर न जायें, राम जी रावणी मन हुआ है।।



वासना से भरा है कलश ये, हो गया कामनाओं के वश में।

भेष साधू का झूठा, भुलायें राम जी रावणी मन हुआ है।।



स्वर्ण का ये महल चाहता है, मन्त्र बस धन का ये बांचता है।

किस तरह से "स्वयं" को जगायें, राम जी रावणी मन हुआ है।।



स्वार्थ का आचरण हर घड़ी है, नेक नीयत दफ़न हो गयी है।

आज खुद को विभीषण बनायें, राम जी रावणी मन…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 22, 2015 at 7:00pm — 6 Comments

मन में हो विश्वास अगर।

मन में हो विश्वास अगर,दीप आस के जलते हैं,

कीचड़,मटमैले जल में भी,फूल कमल के खिलते हैं।

घोर घने अंधियारे में ही, तारे झिलमिल करते हैं।

पत्थर तो बस पत्थर है, पत्थर का कोई मोल नहीं,

दुख सहकर मूरत बनता है,होता है अनमोल वही,

धूप,दीप,नैवेद्य चढ़ा,लाखों सिर सजदे करते हैं।

मन में हो विश्वास अगर,दीप आस के जलते हैं।

अपना अस्तित्व बचाने को,खाक में दाना मिलता है,

सर्दी,बारिश की बूंदें,गर्मी की चुभन को सहता है,

हृदय…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 22, 2015 at 1:11pm — 3 Comments

मिसेज़ वर्मा [लघु कथा ]

"क्या बात है वर्मा जी i सत्तर की उम्र में भी आप युवाओं से ज्यादा चुस्त हैं " पार्क से निकलते हुए मैंने वर्मा जी  से कहा I

"पूरे नियम से रहता हूँ Iघूमना ,योग , स्वस्थ भोजन, पंद्रह सालों से टस से मस नहीं हुआ है नियम I "गर्व से दमक रहा था उनका चेहरा I

"बिल्कुल, वो तो दिखता है I"

"सुबह निम्बू शहद पानी से लेकर रात को सोने से पहले हल्दी के दूध तक ,एक भी दिन चूक नहीं होती है I"

"किससे?" 

"मिसेज़ से और किससे ,वो ही तो ध्यान रखती है रूटीन का Iऔर हाँ , घर में नौकर…

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Added by pratibha pande on October 22, 2015 at 9:19am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कभी अपने फ़लक़ से तुम ज़रा नीचे उतरकर- शिज्जु शकूर

1222 1222 1222 122

कभी अपने फ़लक़ से तुम ज़रा नीचे उतरकर

चले आओ हक़ीक़त की ज़मीनों से गुज़रकर



ग़लत के मुख़्तलिफ़ चलना! अनोखी बात है क्या?

मुझे क्यों ऐ खुदा सब देखते हैं? यों ठहरकर!



अज़ाबो-कर्ब के मारों की नाउम्मीद आँखें

छलकती जा रही थीं एक के बाद एक भरकर



मेरे हाथ आई थी़ं कुछ कतरनें यादों की कल रात

गुज़रते वक्त ने जैसे रखा हो यूँ कुतरकर



नुमायाँ हो रही है मेरी हालत क्या सरेआम?

बताओ क्यों शफ़क़ का रंग दिखता है… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on October 21, 2015 at 10:46pm — 5 Comments

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