उलटी गंगा
बात जब तक घर में थी, सभी परिवार के मैंबर उसे समझा रहे थे । ये तुम गलत कर रहें हो ,रौशनी का ख्याल हमें पहले रखना चाहिए था, न कि अब हमसाया के घर की तरफ खिड़की रख कर । मगर वह अपनी फौजियों सी ज़िद छोड़ नहीं रहा था ।
पड़ोसी तो इस कि बारे पहले ही विरोध दर्ज करवा चुके थे, “क्योंकि कि बिल्डिंग के पीछे कोई अधिकारित रास्ता न होने की वजह से अपना हक भी नहीं बनता है” उसकी घर वाली ने कहा। पड़ोसी के पास अब क़ानूनी करवाई कि सिवाए कोई चारा नहीं रहा था । पर फिर…
ContinueAdded by मोहन बेगोवाल on October 4, 2015 at 7:30pm — 3 Comments
1222 1222 122
बहुत बेकार सा चर्चा रहा हूँ
मैं सच हूँ, आँख का कचरा रहा हूँ
बहा हूँ मै सड़क पर बेवजह भी
लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ
जो समझा वो सदा नम ही रहा फिर
मै आँसू ! आँखों से बहता रहा हूँ
महज़ इक बूँद समझा तिश्नगी ने
भँवर के वास्ते तिनका रहा हूँ
जलादूँ एक तो बाती किसी की
इसी उम्मीद में दहका रहा हूँ
मुझे मानी न पूछें ज़िन्दगी का
अभी…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on October 4, 2015 at 10:43am — 28 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on October 4, 2015 at 10:31am — 20 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 4, 2015 at 12:38am — 16 Comments
Added by Samar kabeer on October 3, 2015 at 11:41pm — 13 Comments
ख़ौफ़ खाता हूँ …
ख़ौफ़ खाता हूँ
तन्हाईयों के फर्श पर रक्स करती हुई
यादों की बेआवाज़ पायल से
ख़ौफ़ खाता हूँ
मेरे जज़्बों को अपाहिज़ कर
अश्कों की बैसाखी पर
ज़िंदा रहने को मज़बूर करती
बेवफा साँसों से
ख़ौफ़ खाता हूँ
हयात को अज़ल के पैराहन से ढकने वाली
उस अज़ीम मुहब्बत से
जो आज भी इक साया बन
मेरे जिस्म से लिपट
मेरे बेजान जिस्म में जान ढूंढती है
और ढूंढती है
ज़मीं से अर्श तक
साथ निभाने की कसमों के…
Added by Sushil Sarna on October 3, 2015 at 8:30pm — 12 Comments
Added by shashi bansal goyal on October 3, 2015 at 5:56pm — 6 Comments
Added by Janki wahie on October 3, 2015 at 5:53pm — 4 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 2, 2015 at 9:44pm — 14 Comments
Added by जयनित कुमार मेहता on October 2, 2015 at 9:00pm — 6 Comments
हुआ है प्यार में पागल सुनो अंन्जाम इस दिल का
न तेरी बात माना मैं लगा इल्जाम इस दिल का
.
अँधेरा दूर हो करना जला, लो दिल सनम मेरा
न है जब जिन्दगी में तू न है क्या काम इस दिल का
.
रही जब पास तुम मेरे बडा अनमोल था ये दिल
न अब कोई मुझे पूछे न है कुछ दाम इस दिल का
.
तुम्हारा प्यार था जब तो बुलाते थे सभी दिलवर
सुना मैने पड़ा अब दिलजला हैै नाम इस दिल का
.
खता कोई न है इसकी, मगर बदनाम तो है ये
न करता है वफा…
Added by Akhand Gahmari on October 2, 2015 at 8:00pm — 3 Comments
Added by जयनित कुमार मेहता on October 2, 2015 at 7:40pm — 9 Comments
Added by Manan Kumar singh on October 2, 2015 at 6:00pm — 4 Comments
Added by somesh kumar on October 2, 2015 at 5:30pm — 4 Comments
चहुँ ओर फैली हरियाली
देती जो हमको खुशहाली
पर यह कब तक बनी रहेगी
जब न मोटर - कार रहेगी
इसे चलाकर हमने दूषित वायु किया
जानबूझकर हमने छोटा आयु किया
कर वायु प्रदूषित हमने महाप्रलय बुलाया है
प्राकृतिक सौन्दर्य पर हमने दाग लगाया है |
भारतवासी पवन गंगा जिससे बुलाते हैं
पापतारने हेतु इसी गंगा में डुबकी लगाते हैं
भूल गए पावन गंगा ,हम भूल गये कहानी को
अपवित्र करडाला गंगा लाकर गंदे पानी को
खुद की…
ContinueAdded by maharshi tripathi on October 2, 2015 at 2:52pm — No Comments
ग़ज़ल
(वहर : 2212 2212 2212 2212 )
वो दुश्मनी की सब हदों को पार करता ही रहा I
मैं माफ़ उसको जान कर हर बार करता ही रहा II
जो आह भर भर हर समय थे देखते राहें सदा ,
उनके दिलों से वो सदा व्यापार करता ही रहा I
दिल से न शाया था हटा, कुछ तो नजर ढूंढे तभी ,
पहचानता है क्या उसे, इनकार करता ही रहा I
राजा दिलों का वो बनें, है मर नहीं…
ContinueAdded by कंवर करतार on October 2, 2015 at 2:23pm — 10 Comments
कभी अतीत फंद में ,कभी भविष्य द्वन्द में
खुद को ढूँढती फिरूँ कूप कोई अंध में
शब्द ठिठके से खड़े ,भाव बहने पे अड़े
अश्रु भी लो अब यहाँ ,बन गए जिद्दी बड़े
अब रुकेंगे ये कहाँ छन्द के किसी बंद में
खुद को ढूँढती फिरूँ कूप कोई अंध में
प्रेम में रहस्य क्या ,जो छिपा वो प्रेम क्या
प्रेम हो कुछ इस तरह ,उदय रवि लगे नया
खुल जाय हर इक गिरह, मुस्कान एक मंद में
खुद को ढूँढती फिरूँ कूप कोई अंध में
ह्रदय धरा…
ContinueAdded by pratibha pande on October 2, 2015 at 11:12am — 14 Comments
२१२२ १२२२ २१२२ १२१२
शहर में आ गया पर भूला नहीं गाँव दोस्तों
भूल सकता नहीं पीपल की मैं वो छाँव दोस्तों
खेल के नाम पे होती है सियासत ही बस यहाँ
चल नहीं सकता मेरा कोई यहाँ दाँव दोस्तों
सजदा करने में भी आती है शरम सबको आजकल
कोई बूढों के झुक के छूता नहीं पाँव दोस्तों
माँ ने जिस बाँध के सहरा है बसाया मेरा जहाँ
मैं उसी माँ की भी बैठा ही नहीं ठाँव दोस्तों
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Dr Ashutosh Mishra on October 2, 2015 at 10:42am — 12 Comments
११२१२ / ११२१२ / ११२१२ / ११२१२
आ के फ़िर से खूने जिगर तू कर, दिलो-जान तुझपे फ़िदा करूँ
कोई कैनवास नया दे, रंगे-वफ़ा मैं फ़िर से भरा करूँ
.
तेरी आँख को कभी झील तो कभी आसमां कहूँ और शाम
उसी खिडकी पर मै पलक बिछा, अपलक क़ुरान पढ़ा करूँ
.
नहीं चाँदनी है नसीब मेरा तो ख़्वाब रख के सिराहने
तेरी स्याह गेसुओं में छुपे हुए, जुगनुओं को गिना करूँ
.
तेरी बज्म के हैं जो क़ायदे, न कभी कुबूल रहे मुझे
मुझे तिश्नगी…
Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 2, 2015 at 10:31am — 12 Comments
गंगा‘, ‘यमुना‘ के तीर पर बैठे,
टूटती जुड़ती लहरों के व्यतिकरण में,
तुझे देखा है कई लोगों ने।
और मैं ने, ‘बेबस‘ और ‘धसान‘ में गोता लगाते
बार बार इस पार से उस पार जाते, आते, हृदयंगम किया है।
जबकि अन्यों को तू गिरिराज की
तमपूर्ण खोहों में छिपा मिला।
मेरे निताॅंत एकान्तिक क्षणों में क्या
तू मेरे चारों ओर प्रभामंडल की तरह नहीं छाया रहा?
आज तुझे उनमें भी लयबद्ध पाया
जिन्हें लोग कहते हैं कुत्सित , घ्रणित और अस्पृश्य ।
तेरी विराटता…
ContinueAdded by Dr T R Sukul on October 2, 2015 at 10:30am — 8 Comments
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