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मृगतृष्णा - कहानी

 

सरकारी नौकरी लगते ही रिश्तेवालों की सूची लम्बी हो गई थी. हर दिन एक नए रिश्ते लेकर कोई न कोई उसका घर चला आता था. अपनी मां से जब भी उसकी बातें होती वह लड़की के दादा परदादा से लेकर उसकी जनम कुण्डली तक बखान कर ही दम लेती. हर दिन रिश्ते के नए चेप्टर खुलते, उसके मन में इस बात को लेकर कुतूहल बना रहता था. उसे स्कूल के दिन याद हो आए थे. वहां भी हर रोज नए चेप्टर खुलते और नई-नई जानकारी मिलती थी. बात कुछ वैसी ही यहां पर भी उसके साथ हो रही थी. यहां भी हर रोज…

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Added by Govind pandit 'swapnadarshi' on September 26, 2015 at 10:23pm — 4 Comments

विसर्जन - लघुकथा

"गणपति भप्पा मौर्या... अगले बरस तू जल्दी आ....।" हर प्रतिमा विसर्जन के साथ कई आवाजें उठती और इन्ही आवाजों के साथ उसके चेहरे पर कभी बच्चो जैसी खुशी झलकने लगती तो कभी चेहरा गंभीरता का आवरण ओढ़ न जाने क्या सोचने लगता?

धुंधली शाम अब रात में ढलने लगी थी लेकिन उसे अभी तक वहीं टहलते देख 'नाव वाले' से रहा नही गया। "विसर्जन तो कब का हो गया बाबा! रात हो गयी है, अब घर जाओ।"

"घर!.....कौन से घर?" बुजुर्ग ने एक गहरी सांस ली और ग॔गाजी को लहरो को देख बुदबुदाने लगा। "विसर्जन तो मेरा भी हो गया है, बस… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on September 26, 2015 at 4:59pm — 2 Comments

'लक्ष्मी का तकनीकी सफ़र'--(लघु कथा)

"वाह, भाभी इस बार तो ग़ज़ब की जीन्स-टोप लायी हो आगरा से ....लेकिन कुछ ज़्यादा ही महंगा है.....भाई साहब को मना ही लिया आपने !"- शालू ने चहकते हुये लक्ष्मी से कहा ।

"देखो, अभी यहाँ किसी को बताना मत, वरना ख़ानदानी सड़ल्ले रीति-रिवाज़ों के भाषण अभी शुरू हो जायेंगे। जहाँ तक महंगे होने की बात है, तो सुन मैं लक्ष्मी हूँ लक्ष्मी ! मुझे 'लक्ष्मी' को टेकल करने और हैण्डल करने की टेकनीक अच्छी तरह आती है। मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ये मुझे बीमार ननंद जी को देेखने जबरन आगरा ले तो गये, लेकिन मैं धन-दौलत…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2015 at 2:00pm — 3 Comments

एकात्म बोध /कविता : नीरज

तेजी से घूम रहे चक्र पर
हम ठेल दिये गए हैं
किनारों की ओर
जहां
महसूस होती है सर्वाधिक
इसकी गति
ऊंची उठती है उर्मियाँ
जैसे जैसे हम बढ़ते हैं
केंद्र की ओर
सायास
स्थिरता बढ़ती जाती है
प्रशांत हो जाती है तरंगे
सत्य का बोध
अनावृत होने लगता है
अनुभव होता है एकात्म का ....
.............. नीरज कुमार नीर

Added by Neeraj Neer on September 26, 2015 at 12:37pm — 5 Comments

ग़ज़ल : मैं पागल था मगर इतना नहीं था

बह्र : १२२२ १२२२ १२२

 

सनम जब तक तुम्हें देखा नहीं था

मैं पागल था मगर इतना नहीं था

 

बियर, रम, वोदका, व्हिस्की थे कड़वे

तुम्हारे हुस्न का सोडा नहीं था

 

हुआ दिल यूँ तुम्हारा क्या बताऊँ

मुआँ जैसे कभी मेरा नहीं था

 

यकीनन तुम हो मंजिल जिंदगी की

ये दिल यूँ आज तक दौड़ा नहीं था

 

तुम्हारे हुस्न की जादूगरी थी

कोई मीलों तलक बूढ़ा नहीं था

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 26, 2015 at 10:33am — 20 Comments

तभी हुई है ग़ज़ल ( इस्लाह के लिये)

म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन

1212 1122 1212 112



सजल नयन से नदी उतरी तो हुई है ग़ज़ल।

जो पीर वाली फसल निखरी तो हुई है ग़ज़ल।।



न पूछो मिलती किधर हमको जी प्रेरणा ये कहाँ ।

हंसी प्रियम के अधर बिखरी तो हुई है ग़ज़ल।।



कभी कहीं जो सुवासित हवायें बहनें लगी।

जो रूपसी कहीं सव्री तो हुई है ग़ज़ल।।



कोई पथिक जो चला जीवन की इस कठिन सी डगर।।

किसी के सिर पे पड़ी गठरी तो हुई है ग़ज़ल।।



कहीं पे रिश्ता जो नाता है भंग होता कभी।

जो… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 26, 2015 at 12:00am — 14 Comments

आत्मिक प्रेमतत्व

आत्मिक प्रेमतत्व …

जलतरंग से

मन के गहन भावों को

अभिव्यक्त करना

कितना कठिन है

हम किसको प्रेम करते हैं ?

उसको !

जिसके संग हमने

पवन अग्नि कुण्ड के चोरों ओर

सात फेरे लिए

या उसको

जिसके प्रेम में

स्वयं को आत्मसात कर हम

जीवन के समस्त क्षण

उसके नाम कर दिए

एक प्रेम

जीवन के अंत को जीवन देता है

और दूसरा अंतहीन जीवन को अंत देता है

जिस प्रेम को बार बार

शाब्दिक अभिव्यक्ति की आसक्ति हो …

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Added by Sushil Sarna on September 25, 2015 at 8:30pm — 10 Comments

हो ग़म तो शख़्स वो हँसता बहुत है (ग़ज़ल)

1222  1222  122

मेरा दिल प्यार का भूखा बहुत है

ये दरिया है,मगर प्यासा बहुत है

-

मुकद्दर ने हमें मारा बहुत है

ज़माने से मिला धोखा बहुत है

-

उठाएँ हम भला हथियार कैसे

वो दुश्मन है,मगर प्यारा बहुत है

-

छुपाने का हुनर क्या खूब ढूँढा

हो ग़म तो शख़्स वो हँसता बहुत है

-

डराओ मत उसे क़ानून से तुम

कि उसके जेब में पैसा बहुत है

-

यूँ कहने को सितारे साथ हैं "जय"

मगर वो चाँद भी…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 24, 2015 at 12:32pm — 11 Comments

"आतंकी सोच"-- (लघु कथा)

"आतंकी सोच"- (लघु कथा)



"अजी सुनते हो, संगीत सोम है न जो उसको धमकी भरा ख़त मिला है .....और..."



"और क्या ? तुम तो समाचारों की सुर्खियां सुनाती भर जाओ"- सुबह सुबह बिस्तर पर पड़े हुए खन्ना साहब ने अपनी पत्नी से कहा।



"और फ़िल्म कलाकारों के घर में लाखा !!!"



"लाखा ?"



"हां 'लाखा'....होंगे किसी गुट के आतंकी !

जूही चावला, जितेन्द्र और अनिल कपूर के घर में 'लाखा' !"



"अरे ! वो 'लाखा' नहीं ' लार..वा' है 'ला..र..वा' डेंगू का लारवा ! मतलब… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 24, 2015 at 10:25am — 5 Comments

''मन महकाये जब बौंराई अमिया''

22/22/22/22/22

तुमौर मै हमारी छोटी सी दुनिया

सागर से बारिश बारिश से नदिया

.

मीठी होती है मेहनत की रोटी

मैंने देखी है माँ दरते चकिया

.

ए.सी कूलर ने छीनी आबो-हवा

याद आती है नीम-छांव की खटिया

.

पक्की छत में जगह उसी को न मिली

सदियों रहा जो बन छप्पर की थुनिया

.

याद मुझे पुरनम बस तू है आती

मन महकाये जब बौंराई अमिया

.

दिल का सौदा क्या खाक वो करेगा?

नुकसान-नफ़ा सोचे तबीयते…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 24, 2015 at 8:50am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अपने अपने हिस्से की हम लोग किस्मत ले गये- ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

जब लिया इक दूसरे से हमने रुख़सत ले गये

अपने अपने हिस्से की हम लोग किस्मत ले गये



निस्बतों की अहमियत जो जानते थे लोग वो

याद अपनी दे गये हमसे मुहब्बत ले गये



ताक़ पर रिश्तों को रख जज़्बात बेच आये कहीं

आज तन्हा रह गये जो सिर्फ़ दौलत ले गये



अपनी वो मस्रूफ़ियत से एक लम्हा छोड़कर

पास बैठे दो घड़ी क्या मेरी फुरसत ले गये



वो हसद का एक शो’ला मेरे दिलमें डालकर

काम अपना कर दिया मेरी वजाहत ले गये



रोककर… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on September 24, 2015 at 6:36am — 16 Comments

बेटी अभिमान है / गीत

बेटी से हैं सृष्टि सारी

बेटी से संसार है न्यारी

बेटी घर देहरी फुलवारी

बेटी से मान और गान है ..............

बेटी अभिमान है

देश का सम्मान है



शिक्षा ,पोषक में रही अधूरी

सदियों मर कर जीती आई

बहुत हुआ ये भेदभाव

बहुत हुआ अब अपमान है ...........

बेटी अभिमान है

देश का सम्मान है



धोखा धोखा है जग आशा

बेटी पर ना किया भरोसा

बेटा ही बेटा करते आये

समझा क्या बेटी शान है ...........

बेटी अभिमान है

देश का सम्मान…

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Added by kanta roy on September 24, 2015 at 4:30am — 6 Comments

कविता - तो कुछ बात बने

तो कुछ बात बने

 

अंधेरों   की नहीं ,जीवन में उजाले की  कोई बात करो  तो कुछ बात बने

निकला हैं दिन अभी,सूरज की किरणों की कोई बात करो तो कुछ बात बने .

 

 क्यूँ बात  करते हों उन  पतझड़ों की,नव कोपलों की कोई बात करो तो कुछ बात बने

 न  बातें करो उदास रतजगों की ,प्यार  भरी बंसी की कोई बात करो तो कुछ बात बने

 

सूखी हुई धरा  पर बरसा हैं बरखा का जल अभी ,बरस जाए ये भरपूर तो कुछ बात बने

मेहरबां हुई  हैं तुम्हारी नजर एक मुद्द्त के बाद , ठहर…

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Added by सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा on September 23, 2015 at 11:00pm — 1 Comment

आप से इस हृदय का अनुबंध तोड़ा ना गया

2122 2122 2122 212

प्रीत या अनुराग का अनुबंध कब तोड़ा गया।

इस हृदय का आप से सम्बन्ध कब तोड़ा गया।।



तोड़ देता किस तरह से साँस अपनी ही स्वयं।

धड़कनों पर आपका प्रतिबन्ध कब तोड़ा गया।।



तोड़ देता किस तरह से साँस अपनी ही स्वयं।

धड़कनों पर आपका प्रतिबन्ध कब तोडा गया।।



गीत मैं सुर हो तुम्हीं हाँ शब्द मैं सरगम तुम्हीं।।

इस पुरुष का तुझ प्रकृति से बन्ध कब तोड़ा गया।।



राजपथ पर ख़्वाब के हो हमसफ़र बस एक तुम।

तुझसे अरमानों का सब गठबन्ध कब तोड़ा… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 23, 2015 at 8:00pm — 12 Comments

कब आओगे सरहद से ?

तुम और कॉफी दोनों का साथ

कब होगा मेरे साथ ?

तुम्हारे घर का बगीचा

पात-पात शांत

बर्फ की ओढनी ओढ़े

मुकुलित कालिका लजाती

सोखती स्वर्ण-आभा

चोटी पर तिरती सूर्य-किरणें 

खुशबू के गुंफन ने छुआ मुझे

लगा कि तुमने उढ़ाया हो,शॉल गुनगुना सा

आवृत्तियों ने मुझे घेरा

याद आने लगे वो दिन जब तुम

बैठे रहते थे बिल्कुल सामने मेरे

और तुम्हारी मूँगे जैसी आँखों में

छल्क पड़ती थी मैं बार-बार

और…

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Added by kalpna mishra bajpai on September 23, 2015 at 7:30pm — 8 Comments

भाव ( लघुकथा ) // शशि बंसल

" सुनिए , परसों से श्राद्ध शुरू हो रहे हैं । पड़ोस वाली चाची जी कह रही थीं , बहू घर में सुख शांति चाहिए हो तो , सोलह दिन पितरों की खूब सेवा कर । अब मुझे ये नहीं समझ आ रहा कि जो हैं ही नहीं , उनकी सेवा कैसी ?



" शरीर तो ईश्वर का भी नहीं है । फिर कौन सा तुम्हे हाथ पाँव दबाना है या दवा - दारू करनी है । परम्परा अनुसार कुछ स्वादिष्ट पकवान बनाना , हाथ जोड़ना और खाना - खिलाना ,बहुत हुआ तो चार रिश्तेदार भी बुला भेजना । इस बहाने थोड़ी जय - जयकार भी हो जायेगी तुम्हारी । बस हो गया श्राद्ध ।वो तो… Continue

Added by shashi bansal goyal on September 23, 2015 at 7:13pm — 5 Comments

हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है

जाने क्या सोच के उसने ये हिमाक़त की है

हो के दरिया जो समंदर से अदावत की है

खींच लायी हे तेरे दर पे ज़रुरत मुझको

हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है

हमने ख़ारों पे बिछाया हे बिछोना अपना

हमने तलवारों के साये में इबादत  की है

अच्छे हमसाये की तालीम मिली हे हमको

हमने जाँ दे के पडोसी की हिफाज़त की है

आज आमाल ही पस्ती का सबब हैं वरना

हमने हर दौर में दुनिया पे हुकूमत की है

दम मेरा कूच…

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Added by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 23, 2015 at 12:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल :: (बह्र-ए-शिकस्ता) -- कभी ये रहा है बेहद, कभी मुख़्तसर रहा है -- मिथिलेश वामनकर

फ़'इ'लात फ़ाइलातुन फ़'इ'लात फ़ाइलातुन 

1121 - 2122 - 1121 – 2122

 

कभी ये रहा है बेहद, कभी मुख़्तसर रहा है

मेरा दर्द तो हमेशा, दिलो-जां जिगर रहा है…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 23, 2015 at 10:00am — 18 Comments

क्षणिकायें - 7 --- डॉo विजय शंकर

1. फूल जानता है
कितनी है जिंदगी ,
फिर भी खिलता है ,
तो मुस्कुराता है ,
हँसता है ,
खुशियाँ बिखेरता है।

2. पेड़ कहीं जाते नहीं
फल पक जाएँ तो
रुक पाते नहीं ..........

3. क्या फितरत है
तुम्हारी
हमें छोड़ गए और
अपना
न जाने क्या क्या
हमारे पास छोड़ गए ……

4. सादगी भी
अजीब चीज़ है
कितने रंगीन
सपने दिखा देती है ………

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 23, 2015 at 9:55am — 10 Comments

पूजेंगे उन्हें हम फिर

कब हुयी थी बात जनता से

कब आए थे तुम हमारे गाँव

कब फांकी थी तुमने गलियारे की धूल

कब तुम्हारी खादी पर जमी थी गर्द की परतें

कब दिया था आख़री भाषण यहाँ पर डूब कर पसीने में

कब किया ब्यालू यहाँ के एक हरिजन संग

और पानी था पिया अकुआगार्ड का जो साथ थे लाये

गाँव को तो याद है वह दिन, भूल जाते हो मगर तुम

देश की संसद बड़ी है, डूब जाते हो वही तुम

देश का दुर्भाग्य है वह नहीं मिल पाता कभी भी

चाह कर तुमसे बड़े बंधन है अजब…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2015 at 9:30am — 4 Comments

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