2122 2122 2122
फिर हुई जीने की इच्छा आज मन में
फिर बुलाया आज कोई है सपन में
फड़फड़ाने फिर लगा कोई परों को
फिर उड़ेगा वो किसी नीले गगन में
फिर से पीड़ा मीठी सी कुछ हो रही है…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on January 20, 2014 at 9:30pm — 31 Comments
दिलों को जो सुहाते हैं /
दिलों पे जाँ लुटाते हैं /
निगाहों से क़त्ल करके
मुझे कातिल बनाते हैं /
दिलों के हैं अजब रिश्ते
सदा अपने निभाते हैं /
यूँ पल पल मर रही हूँ मैं
मुझे जिन्दा बताते हैं /
सभी अपने तुम्हारे बिन
मुझे जीना सिखाते हैं /
सुना है ऐसे में अपने
भी दामन छोड़ जाते हैं /
.....................................
..मौलिक व् अप्रकाशित....
Added by Sarita Bhatia on January 20, 2014 at 5:30pm — 20 Comments
मुहब्बतों के पैगाम .....
ये मुहब्बत भी
अजब शै है ज़माने में
उम्र गुज़र जाती है
समझने और समझाने में
कब हो जाती हैं सांसें चोरी
खबर ही नहीं होती
बरसों नहीं आती नींद
उनके इक बार मुस्कुराने में
डूबे रहते हैं पहरों
इक दूसरे के ख्यालों में
जाने गुज़र जाती शब् कैसे
इक दूसरे से बतियाने में
शब् जाती है तो
सहर आ जाती है
सहर क्या आती है…
Added by Sushil Sarna on January 20, 2014 at 1:00pm — 17 Comments
आज
तुम्हारा प्यार
बना रहा साथ मेरे
साये की तरह
चलता रहा साथ
जहां-जहां मैं गई ।
देता रहा दिलासा
अकेले उदास मन को
जैसे तुम देते थे
मेरे कंधे पर प्यार से थपकी
उसी तरह का दुलार
आज फिर महसूस किया मैंने
जब सांझ की उतरती
गहरी उदासी ने
घेर लिया मन को मेरे ।
तुम ही नहीं
तुम्हारा प्यार भी जानता था
कि सांझ,
मुझे उदास कर देती है ?
शायद इसीलिए,
साये की…
ContinueAdded by mohinichordia on January 20, 2014 at 9:00am — 10 Comments
छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या
इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या
ख़ुद से कर देगा बदगुमान भी क्या
कोई ठहरेगा मेह्रबान भी क्या
है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या
मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है
काट ली जायेगी ज़बान भी क्या
धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को
लूट लेंगे ये सायबान भी क्या
इस क़दर जीतने की बेचैनी
दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या
अब के दावा जो है मुहब्बत का
झूठ ठहरेगा ये…
Added by वीनस केसरी on January 20, 2014 at 12:30am — 26 Comments
मन शाम के बहानों से उदास
सोच के सागर किनारें
गुज़रते लम्हों के
सफ्हें बदलता रहा
कब आँखे थक कर
बैठ गयी ख़बर नहीं
ज़ेहन में एक तस्वीर
उभर आयी
शांत चेहरे पर
झीनी सी मुस्कराहट
होठों की नमी उड़ी थी कहीं
पर आँखे शरारती
जैसे कह रही थी मुझे
''अच्छा तो तुम अब ऐसे याद करोगी''
आँखे खुल गयी चौंक कर
कुछ नहीं था, कोई नहीं था
बस वो ख्याल था और
बहुत देर तक साथ रहा
आज…
ContinueAdded by Priyanka singh on January 19, 2014 at 4:36pm — 19 Comments
Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on January 19, 2014 at 12:00pm — 22 Comments
Added by Ketan "SAAHIL" on January 19, 2014 at 10:54am — 10 Comments
आत्मकथन
जब जब बनाना चाहा
शब्दों को मिसरी
कुछ पूर्वाग्रह
घोल गये कड़ुवाहट
नहीं बना पाया मैं
खुद को मधुमक्खी
तब कैसे होते मधु
मेरे कहे गये शब्द
मैंने चाहा दिखना
बगुले सा धवल
तब कहां से आती
कोयल सी मधुरता
काक होकर भी
कहां निभा पाया
काक का धर्म
बस जमाये रखी
गिद्ध दृष्टि
हर जीवित-मृत पर
समझ सकते हैं आप
कितना तुच्छ जीव
बनकर रह गया हूं मैं…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2014 at 6:00am — 18 Comments
क्या कहूँ साथ अपने वो क्या ले गई
आँधी थी सायबाँ ही उड़ा ले गई
मैंने बस एक ही गाम उठाया मुझे
रहनुमा बन के तेरी दुआ ले गई
काम आये सितारे अँधेरो में रात
जब चिरागों की लौ को हवा ले गई
मुझको लहरों से क्यूँ हो शिकायत भला
गल्तियों को मेरी वो बहा ले गई
जीने की कोशिशें उसकी बेजा नहीं
क्या हुआ गर खुशी वो चुरा ले गई
रात के ख़्वाब बाकी थे आँखों में कुछ
सुब्ह की बेरहम धूप उठा ले…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 18, 2014 at 7:35pm — 21 Comments
बिस्तर-करवट-नींद तक
रिस आया बाज़ार
हर कश से छल्ले लिए
बातें हुई बवण्डरी
मुदी-मुदी सी आँख में
उम्मीदें कैलेण्डरी
गलबहियों के ढंग पर
करता कौन विचार..…
Added by Saurabh Pandey on January 18, 2014 at 3:30am — 26 Comments
आँखों देखी 10 जमे समुद्र के ऊपर पैदल
मैं पहले ही कह चुका हूँ कि दो महीने तक अँधेरे में रहने के बाद जुलाई 1986 के अंतिम सप्ताह में हमने पहला सूर्योदय देखा. जैसे-जैसे आसमान में सूर्य की अवस्थिति बढ़ती गयी मौसम खुशनुमा होता गया. अच्छे मौसम का स्वागत करके हम अधिक से अधिक समय स्टेशन के बाहर बिताने लगे थे. मैंने इस बदलते समय के साथ अपने साथियों के अच्छे होते हुए मूड का सदुपयोग करने का निश्चय किया. ‘हिमवात’ की तैयारी में पूरी…
ContinueAdded by sharadindu mukerji on January 18, 2014 at 2:00am — 5 Comments
यात्रा वर्णन - लोकग्राम से आनंदवन
देशाटन का जीवन में अनन्य महत्व है. इससे नई ऊर्जा, नए प्रदेशों की जानकरी, आत्मिक शांति प्राप्त होती है और लोक जीवन का परिचय होता है. कई ऐसे स्थान हैं जहां जाने से अदभूत सुख की प्राप्ति होती है. यात्रा के साथ यदि कुछ काम जुड़ जाए तो सोने पे सुहागा होता है. जिसकी अक्सर मुझे तलाश होती है.
अवसर था नागपुर जाने का. वहां लोक कलाओं ( खड़ी गम्मत) का…
ContinueAdded by RAMESH YADAV on January 18, 2014 at 1:47am — 5 Comments
मुलाकात - हिंदी को रोजगार परख बनाने की जरूरत
( डॉ. वेद प्रकाश दुबे, संयुक्त निदेशक ( राजभाषा ) भारत सरकार, वित्त मंत्रालय से बातचीत )
मोबाइल की घंटी बजी, देखा, तो मेरे मित्र और आई.डी.बी.आई. बैंक के सहायक महाप्रबंधक डॉ. आर. पी.सिंह “ नाहर” जी फोन पर थे. आवाज आई , “ रमेश जी हिंदी और राजभाषा को लेकर आप काम रहे हैं, इस समय डॉ. वेद प्रकाश दुबे जी नीरिक्षण कार्य हेतु मुंबई में आए हैं जो भारत सरकार वित्त मंत्रालय के संयुक्त निदेशक ( राजभाषा…
ContinueAdded by RAMESH YADAV on January 18, 2014 at 1:30am — 2 Comments
पहले मौत दे, फिर जिंदगानी कौन देता है
मुकम्मल हो सके ऐसी कहानी कौन देता है,
यहां तालाब और नदियां कई बरसों से सूखी हैं
खुदा जाने कि पीने को ये पानी कौन देता है,
हमें तो जिंदगी ठहरी हुई इक झील लगती है
मगर हर वक्त दरिया को रवानी कौन देता है,
जमीं से आसमां तक का सफर हम कर चुके लेकिन
नहीं मालूम मंजिल की निशानी कौन देता है,
परिंदे जानते हैं ये कि पर कटने का खतरा है
इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता…
Added by atul kushwah on January 17, 2014 at 9:30pm — 15 Comments
नियति
किसी वी आई पी के
निधन पर -
लोक सभा एवं विधान सभा ने
शोक प्रकट किया है।
शोक अक्सर प्रकट किया जाता है
कोई वी आई पी जब दिवंगत होता है।
तुम क्यूँ रोते हो ?
शायद तुम्हारे घर मे, पड़ोस मे, मुहल्ले मे –
तुम्हारा कोई अज़ीज़ दिवंगत हो गया है।
कलुआ कह रहा था
साहब, नथुवा ने
तीन दिन से खाना नहीं खाया था
बीमार था, ठंड से ठिठुर कर - दम तोड़ दिया बेचारे ने ।
उसकी घरवाली ने लाला से –
अपनी पगार मांगी थी, पर –
लाला…
Added by S. C. Brahmachari on January 17, 2014 at 3:28pm — 4 Comments
खोटा सिक्का
चले थे खुद को भुनवाने
दुनिया के इस बाजार में.
पर खोटा सिक्का मान
ठुकरा दिया ज़माने ने
सोचा ! मुझमें ही कमी थी
या, फिर वक्त का साथ न था
समझ न पाये ,और चुप रह गए
पर चैन न आया
और चल पडे दुनिया को
जानने और पहचानने
देखा ! तो जाना ,
दुनिया कितनी अजीब है
झूठ,मक्कारी और खुदगर्ज़ी
के पलड़े में हर रोज
इंसान तुल रहा
पलड़ा जितना भारी
इंसान उतना ही…
ContinueAdded by Maheshwari Kaneri on January 17, 2014 at 1:00pm — 9 Comments
Added by AVINASH S BAGDE on January 17, 2014 at 11:00am — 26 Comments
क्षितिज
दूर छोर पर
एकाकार होते
सिन्दूरी आसमान
और हरी धरती
उस रेखा का कोई रंग नहीं
एक स्थिति
खाली बाल्टी
और उसमें
नल से
बूँद-बूँद टपकता पानी
मैं देख रहा हूँ
किंकर्तव्यविमूढ़
संघर्ष
तपते दिनों के बाद
सर्द हवाओं का मौसम
कब से बारिश नहीं हुई
बहुत से सपने सूख…
ContinueAdded by बृजेश नीरज on January 17, 2014 at 7:29am — 22 Comments
हाथों से पता चल जायेगा होठों से खबर लग जायेगी
आँखों से नज़र आ जायेगा ,
सावन का मौसम आया है ऄ
कुछ बातें ऐसी वैसी होंगी , होंगीं जिनकी कुछ वज़ह नहीं
कुछ फूल खिलेंगे ऐसे जिनकी , होगी बागों में जगह नहीं
ख़ुश्बू , सबको बतलायेगी
सावन का मौसम आया है
झूलों पे बैठे हम और तुम , धरती से नभ तक हो आयेंगे
मिलन के बरसेंगे घन घोर , विरह के ताप हवन हो जायेंगे
दुनिया सारी जल जायेगी
सावन का मौसम आया…
Added by ajay sharma on January 16, 2014 at 11:30pm — 8 Comments
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