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ग़ज़ल : इश्क जबसे वो करने लगे

बह्र : २१२ २१२ २१२

------------

इश्क जबसे वो करने लगे

रोज़ घंटों सँवरने लगे

 

गाल पे लाल बत्ती हुई

और लम्हे ठहरने लगे

 

दिल की सड़कों पे बारिश हुई

जख़्म फिर से उभरने लगे

 

प्यार आखिर हमें भी हुआ

और हम भी सुधरने लगे

 

इश्क रब है ये जाना तो हम

प्यार हर शै से करने लगे

 

कर्म अच्छे किये हैं तो क्यूँ

भूत से आप डरने लगे

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 27, 2013 at 11:39pm — 13 Comments

उलझे प्रश्नों में हँसता मन

क्यूँ

हाँ क्यूँ

मेरा मन

मेरा कहा नहीं मानता

क्यूँ मेरा तन

मेरे बस में नहीं

न जाने इस पंथ का अंत क्या हो

किस इच्छा के वशीभूत हो

मेरे पाँव

अनजान उजाले की ओर आकर्षित हो

निरंतर धुल धूसरित राह पे

बढ़ते ही जा रहे हैं

ये तन

उस मन के वशीभूत है

जो स्थूल रूप में है ही नहीं

न जाने मैं इस राह पे

क्या ढूढने निकला हूँ

क्या वो

जो मैं पीछे छोड़ आया

या वो

जो मेरे मन की

गहरी कंदराओं में…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 27, 2013 at 8:00pm — 24 Comments

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........

कहते हैं की इन्सान दुनिया से मुँह चुरा सकता है पर स्वयं से नहीं। जब भी हम कुछ करते हैं अच्छा या बुरा हम स्वयं ही उसके गवाह और न्यायाधीश होते हैं, अगर अच्छा करते हैं तो खुद को शाबासी देते हैं और बुरा करते हैं तो स्वयं को कटघरे में खड़ा कर देते हैं,क्योंकि हम खुद के प्रति उत्तरदायी होते हैं पर ये सारी क्रिया हम दुनिया के सामने करने का साहस  कर सकते हैं … ??? नहीं … ना …!! क्योंकि हम दुनिया से मुँह चुरा रहे होते हैं। हमारे  कार्य जीवन के प्रति हमारे नजरिये से जुड़े होते हैं। हम क्या अच्छा करते…

Continue

Added by Veena Sethi on December 27, 2013 at 5:30pm — 4 Comments

नयी धूप मै ले आऊँगा !

नयी धूप मै ले आऊँगा !
नए साल मे ,
नया सवेरा -
नयी धूप मै ले आऊँगा ।
सपनों के डोले से ,
हर पल –
खुशियाँ सब पर बरसाऊंगा ।
मांगूंगा मै ,
ढेरों खुशियाँ -
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे मे I
सुख, शांति की बारिश होगी
भारत के हर घर बारे मे ।
शांति प्रेम का संदेशा ले ,
मै तो अब –
घर घर जाऊंगा ।
नए साल मे ,
नया सबेरा -
नयी धूप मै ले आऊँगा ।
~~~ मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by S. C. Brahmachari on December 27, 2013 at 5:00pm — 21 Comments

प्रेम (अतुकांत)

(1)

प्रिये !

अपने मन की व्यथा को

मैं आज किसे सुनाऊँ

इस संसार में

तुम्हारे अलावा इस मन की व्यथा को

दूसरा कौन समझ सकता है

अपमान गरल को

कंठ से लगाकर तुम मीरा तो बन गयी

पर मैं चाहकर भी अब तक

नहीं बन पाया हूँ श्याम

यही मेरे मन की व्यथा है प्रिये !

जिसे तुम्हारे अलावा

और कोई नहीं समझ सकता

इस संसार में

(2)

प्रिये !

तुम्हारा मौन

बहुत कुछ कह जाता है

और बहुत बतियाती है

तुम्हारी आँखे

तुम्हारी मधुर… Continue

Added by Satyanarayan Singh on December 27, 2013 at 5:00pm — 17 Comments

जिन्दगी पर से भरोसा ही उठा है

2122 1122 1122

प्यार में हमने तो यूँ दर्द सहा है
प्यार के नाम से मन डरने लगा है /

मौत को देखा है कुछ पास से इतना
जिन्दगी पर से भरोसा ही उठा है /

लम्हा हर एक जिओ आखिरी ज्यों हो
मौत पर अपना कहाँ बस ही चला है /

है जमाने का ये दस्तूर अनोखा
अपनों ने आग हवाले यूँ किया है /

बाँट सरिता जो सको प्यार ही बांटो
नफरतों से तो सदा घर ही जला है /

..........................
मौलिक व् अप्रकाशित

Added by Sarita Bhatia on December 27, 2013 at 4:21pm — 9 Comments

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

ग़ज़ल

बहर-।ऽऽऽ ।ऽऽऽ

.

कभी ख़ुद से रफ़ाक़त हो।

ज़रा शिकवा-शिकायत हो॥

.

ख़ुशी के साज़ खो जाएँ,

बड़ी बोझिल तबीयत हो।

.

अदाओं में हो बेअदबी,

निगाहों में हिक़ारत हो।

.

कसकती हों कहीं टीसें,

कहीं बेजा हरारत हो।

.

सरे-बाज़ार लुट जाएँ,

ज़रा ऐसी तिजारत हो।

.

दुआ के चार बोलों में,

अनुष्टुप हो न आयत हो।

.

डगर लंबी,सफ़र तन्हा,

यही अपनी विरासत हो।

.

ग़ज़ल में ढल सकें आँसू,

फ़क़त इतनी इनायत… Continue

Added by Ravi Prakash on December 27, 2013 at 2:19pm — 14 Comments

शब्द

शब्द भावों के गले मिलने लगें |

ह्रदय हर किसी के.. मथने लगें |

गुदगुदाते ...लताड़ते से...कभी...

सहलाते से जीवन संवारने लगें ||



राह अभिव्यक्ति की चलने लगें |

शब्द घेरे में जब ..सिमटने लगें |

शब्द मात्रा..रस..छंद..अलंकार में ..

स्मृतियाँ महाकाव्य सी रचने लगें ||



प्रताड़ना से घिरे शब्द भर्त्सना पाने लगें |…

Continue

Added by Alka Gupta on December 27, 2013 at 10:00am — 10 Comments

नवगीत/ नए साल की आहट पाकर

इन गुलाब की पंखुड़ियों पर

जमी

ओस की बुँदकी चमकी   

नए साल की आहट पाकर

उम्मीदों की बगिया महकी

 

रही ठिठुरती

सांकल गुपचुप

सर्द हवाओं के मौसम में

द्वार बँधी 

बछिया निरीह सी

रही काँपती घनी धुँध में

 

छुअन किरण की मिली सबेरे

तब मुँडेर पर चिड़िया चहकी

 

दर-दर भटक रही

पगडंडी

रेत-कणों में

राह ढूँढती

बरगद की

हर झुकी डाल भी

जाने किसकी

बाँट…

Continue

Added by बृजेश नीरज on December 27, 2013 at 9:30am — 24 Comments

क्या हो अगर शख़्स वो भगवान हो जाए

वो भी इक , अगर बे-ईमान हो जाए 

ये बस्ती उम्मीद की , वीरान हो जाए



इबादतगाह बन जाए , ये दुनिया सारी 

हर इक आदमी अगर इंसान हो जाए



झुग्गियों की क़िस्मत भी जगमगा उठे 

इक खिड़की भी अगर , रोशनदान हो जाए 



फ़िज़ायों में इबादतपसंद है , कोई ज़रूर 

वरना ऐसे ही नहीं , कोई अज़ान हो जाए



साल-ये-नौ पर , दुआ है मेरी , ये…

Continue

Added by ajay sharma on December 26, 2013 at 11:30pm — 7 Comments

डर.... एक सोच

अपनी आँखों को जब मैं

बंद करने कि कोशिश करता हूँ

सोने के लिए

तभी तरह-तरह के विचार आते हैं

मानो जैसे अब

मेरे रास्ते बंद हो गए हैं

मैं कायर सा

डरपोक सा

बैठ गया हूँ



तभी कुछ सुनायी पड़ता है

आवाज

किसी की 

कहीं से आ रही है

कुछ कहने कि

समझने कि

कोशिश



इतना डरपोक न बन

हिम्मत कर

तू फिर से

मेहनत करके

एक नया नाम, इज़ज़त, शोहरत

कमा सकता है

इतना सोचते-सोचते

पता नहीं…

Continue

Added by SAURABH SRIVASTAVA on December 26, 2013 at 9:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल - आप नाटक में नया किरदार लेकर आ गये !!

पीड़ितों के बीच से तलवार लेकर आ गये 

आप नाटक में नया किरदार लेकर आ गये |

मैं समझता था हर इक शै है बहुत सस्ती यहाँ

एक दिन बाबा मुझे बाज़ार लेकर आ गये |

माँ के हाथों की बनी स्वेटर थमाई हाथ में

आप बच्चे के लिए संसार लेकर आ गये |

क़त्ल, चोरी, घूसखोरी, खुदखुशी बस, और क्या

फिर वही मनहूस सा अख़बार लेकर आ गये |

दोस्तों से अब नहीं होती हैं बातें राज़ की

चन्द लम्हे बीच में दीवार लेकर आ गये |

--…

Continue

Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on December 26, 2013 at 8:31pm — 14 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दोहे : शुभ-नूतन की बाट // -सौरभ

प्रतिपल नव की कल्पना, पल-व्यतीत आधार  

सामासिक दृढ़ भाव ले,  आह्लादित संसार  



सिद्धि प्रदायक वर्ष नव : धर्म-कर्म-शुभ-अर्थ

मंशा कुत्सित दानवी, लब्धसिद्धि हित व्यर्थ



शाश्वत मनस स्वभाव…

Continue

Added by Saurabh Pandey on December 26, 2013 at 4:20pm — 42 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक तरही ग़ज़ल- शिज्जु

2122 1122 22/112

आँधी से उजड़ा शजर लगता है

वो बुलन्द अब भी मगर लगता है

 

सिर्फ किरदार नये हैं उसके

इक पुराना वो समर लगता है

 

बेकरानी में कहीं गुम शायद

इक बियाबान में घर लगता है

 

वो कहीं शिद्दते- तूफ़ाँ तो नही

रास्ता छोड़ अगर लगता है

 

पत्थरों को जो मुजस्सम करे वो

तेरे हाथों में हुनर लगता है

 

काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर

बच के जाऊँ मुझे डर लगता…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on December 26, 2013 at 12:00pm — 34 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दो तरही गज़लें: राणा प्रताप सिंह

फाइलातुन फइलातुन फइलुन/फैलुन

 

मुझ पे इलज़ाम अगर लगता है

आपके ज़ेरेअसर लगता है

 

तुझमे खूबी न जिसे आये नज़र

वो बड़ा तंगनज़र लगता है

 

इक दिया हमने जलाया था कभी

अब वही शम्सो क़मर लगता है

 

ढूंढ आये हैं ख़ुशी हम घर घर

ये हमें आखिरी घर लगता है

 

यूँ तो है बात बड़ी छोटी पर

बात करते हुए डर लगता है

 

एक तेरे ही नहीं होने से

ये ज़हां ज़ेरोज़बर लगता…

Continue

Added by Rana Pratap Singh on December 26, 2013 at 11:39am — 28 Comments

दर्द (तीन मुक्‍तक)

(1)

 

दर्द ए दिल से पहचान यारो मेरी बहुत पुरानी है

आँखो के अश्‍को की यारो देखो अलग कहानी है

थे पास जब वो मेरे जीवन की अलग रवानी थी

नहीं आयेगी जीवन में बीती शाम जो सुहानी है

 

(2)

मेरे भी दर्द ए दिल को काश कोई  जान लेता

आँखो में छुपे अश्‍को को भी काश जान लेता

कितना दर्द यारो हमें बिछुडने का अपनो से

मेरे दर्द भरे शब्‍दे से ही काश कोई जान लेता

 

(3)

किसने किसको दर्द दिया  ना जान पाया मैं

कैसे…

Continue

Added by Akhand Gahmari on December 25, 2013 at 11:00pm — 18 Comments

आज मौन उपवास रहा है ..........

अब तक  तेरे पास रहा है
नतीज़तन वो  ख़ास रहा है

हिचकी , हिचकी केवल हिचकी
वोआज मौन उपवास रहा है

छुयन का उसकी असर ये देखो
पतझड़ में मधुमास रहा है

मेरा ख्वाब है उसके दिल में
मुझको  ये  अहसास रहा है

कभी है गहना हया ये उसकी
कभी "अजय" लिबास रहा है

मौलिक व अप्रकाशित
अजय कुमार शर्मा

Added by ajay sharma on December 25, 2013 at 11:00pm — 11 Comments

चितवन

चितवन

1

सांझ की पड़ी चितवन कटारी

उतर आयी रात आंगन

बिन पिया कैसे मनाऊँ मधुमास

रात की रानी महके

हरसिंगार की झूमर लहके

तारों की बरात लिये

आया कोई पुच्छल तारा

देख सुहानी रात मतवाली

पैरों बाँध घुँघरू

बिरहनी संग यह कैसा परिहास

2

बहक रहा चाँद

लहरों पर थिरक रही चाँदनी

सागर तट पर नाच रहा पवन

बाँध के पैजन

चट्टानों के गृह सखी

चल रहा सम्मोहन

बिन पिया कैसे हो हिय उल्लास

3

दूर गगन से

कोई…

Continue

Added by coontee mukerji on December 25, 2013 at 9:44pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुंडलिया ( गिरिराज़ भंडारी )

कुंडलिया -

सबके अन्दर जी रहा , मेरा , मै का भाव

वही डिगाता है सदा , आपस  का सदभाव

आपस  का  सदभाव , मिटाये ऐसी  दूरी

रिश्ते का सम्मान , हटा दे  हर  मजबूरी

टूटे  रिश्ते जुड़ें , सामने  कहता  रब  के   …

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 25, 2013 at 9:00pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आँखों देखी 7 – बर्फ़ की गहरी खाई में

                                                      आँखों देखी 7 – बर्फ़ की गहरी खाई में 

         दक्षिण गंगोत्री स्टेशन के अंदर रहते हुए एक डरावना ख़्याल हम सबको अक़्सर परेशान करता था. हम सभी जानते थे कि पूरा स्टेशन लकड़ी (प्लाईवुड) से बना है और इनसुलेशन के लिये दीवारों के दो पर्तों के बीच पी.यू.फोम भरा हुआ है जो ज्वलनशील पदार्थ होता है. यदि किसी कारणवश स्टेशन के अंदर आग लगी तो चिमनीनुमा एकमात्र प्रवेश/निकास मार्ग से होकर बाहर निकलना शायद असम्भव हो जाए. यदि बाहर निकल भी…

Continue

Added by sharadindu mukerji on December 25, 2013 at 7:00pm — 21 Comments

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