For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - मन को छूती नहीं हवायें अब ( गिरिराज भंडारी )

2122       1212    22

ज़िन्दगी यूँ लगी भली, फिर भी  

बात खुशियों की है चली, फिर भी 

 

देखिये सच कहाँ पहुँचता है

यूँ है चरचा गली गली, फिर भी 

 

क्या करूँ हक़ में कुछ नहीं मेरे

रूह तक तो मेरी जली, फिर भी 

 

क्यों अँधेरा घिरा सा लगता है  

साँझ अब तक नहीं ढली फिर भी 

 

आप दहशत को और कुछ कह लें

डर गई हर कली कली फिर भी 

 

अश्क रुक तो गये हैं आखों के

दिल में बाक़ी है बेकली फिर…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 26, 2014 at 12:00pm — 20 Comments

नवगीत : कब सीखा पीपल ने भेदभाव करना

धर्म-कर्म दुनिया में

प्राणवायु भरना

कब सीखा पीपल ने

भेदभाव करना?

फल हों रसदार या

सुगंधित हों फूल

आम साथ…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 26, 2014 at 11:00am — 20 Comments

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम …..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो...

केशुओं से झांकते तेरे नैन दोनों

प्याले मदिरा के उफनते लग रहे

काया-कंचन ज्यों कमलदल फिसलन भरे

नैन-अमृत-मद ये तेरा छक पियें

बदहवाशी मूक दर्शक मै खड़ा

तुम इशारों से ठिठोली कर रही हो

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम ..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

इस सरोवर में कमल से खेलती

चूमती चिकने दलों ज्यों…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 25, 2014 at 4:00pm — 12 Comments

ज़हनो-दिल ख़ामोश है औ’ हर नज़र दीवार पर

दोस्तों चुनाव के दौरान की ग़ज़ल है, विलम्ब से पोस्ट कर रहा हूँ

ज़हनो-दिल ख़ामोश है  औ’ हर नज़र दीवार पर 

क्या इलेक्शन चीज़ है उतरा नगर दीवार पर

या कोई हो आला लीडर या गली का शेर खां 

हर किसी  दिख रही अपनी लहर दीवार पर

इस  इलेक्शन में खड़ा है ऐसा भी उम्मीदवार

जिसने लटकाया कई सर काटकर दीवार पर

भोंकने लगता है 'शेरू' क्या पता किस बात पर

देखते ही मोहतरम का पोस्टर दीवार पर

बस चुनावी रंग में रंगे हैं ये…

Continue

Added by Sushil Thakur on May 24, 2014 at 10:00pm — 6 Comments

उम्मीदों का जन आदेश

उम्मीदों का जन आदेश

 

उम्मीदों का जन आदेश, करे उजागर मन आवेश।

 मतदाता के मन की राज, बूझ रहे हैं पंडित आज।१।

 

घोषित होते ही परिणाम, दिग्गज आज हुए गुमनाम।…

Continue

Added by Satyanarayan Singh on May 24, 2014 at 10:00pm — 12 Comments

नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

2122  2122   2122

नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

जैसे  चिलमन झील पे कोई  हो पसरा

 

दिल तेरा बेचैन है मुझको भी मालुम

बाँध लूं कैसे मैं लेकिन सर पे सहरा

 

झीने बस्त्रों में तेरा मादक सा ये तन  

जैसे बैठा चाँद कोई ओढ़े कुहरा  

 

सुध में उसकी होश मेरे जब भी उड़ते

जग को लगता जैसे मैं कोई हूँ बहरा

 

उसकी बातें ज्यों हो कोयल कूके कोई

उतरे बन अहसास कोई दिल पे गहरा 

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Dr Ashutosh Mishra on May 23, 2014 at 4:25pm — 15 Comments

कुंडलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

गांधी जी की कल्पना, हो सकती साकार, 

राम राज्य इस देश में, ले सकता आकार |

ले सकता आकार, करे सब मिल तैयारी

मन में हो संकल्प,नहीं फिर मुश्किल भारी

लक्ष्मण कर विश्वास,चले अब ऐसी आंधी

भ्रष्ट तंत्र हो नष्ट, तभी खुश होंगे गांधी ||…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 23, 2014 at 10:00am — 15 Comments

बहेलिया और जंगल में आग .. :नीरज

जब जब जागी उम्मीदें ,

अरमानों ने पसारे पंख.

देखा बहेलियों का झुंड, 

आसपास ही मंडराते हुए,

समेट  लिया खुद को

झुरमुटों के पीछे.

अँधेरा ही भाग्य बना रहा.

हमारे ही लोग,

हमारे जैसे शक्लों वाले,

हमारे ही जैसे विश्वास वाले,

करते रहे बहेलियों का गुण गान.

उन्हें बताते रहे हमारी कमजोरियों के बारे में

बहेलिये भी हराए जा सकते हैं.

कभी सोचा ही नहीं .

उनकी शक्ति प्रतीत होती थी अमोघ.

जंगल में लगी आग में…

Continue

Added by Neeraj Neer on May 23, 2014 at 9:36am — 23 Comments

हे मन कर कल्पना....

हे मन कर कल्पना

बना फिर अल्पना

खोल कर द्वार

सोच के कर पुनः संरचना

हे मन कर कल्पना

 

क्यूँ मौन तू हो गया

किस भय से तू डर गया

खड़ा हो चल कदम बढ़ा

करनी है तुझे कर्म अर्चना   

हे मन कर कल्पना

 

छोड़ उसे जो बीत गया

भूल उसे जो रीत गया

निश्चय कर दम भर ज़रा

सुना समय को अपनी गर्जना

हे मन कर कल्पना

 

पथ है खुला तू देख तो

नैनो को मीच खोल तो 

ऊंचाई पर ही फल मीठा…

Continue

Added by Priyanka singh on May 22, 2014 at 6:18pm — 16 Comments

सूरतों के साथ सीरत भी बदलनी चाहिए - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

बाद  इसके  भी  बहस  कुछ  और  चलनी चाहिए

सूरतों   के  साथ  सीरत  भी   बदलनी    चाहिए

**

चल  पड़े  माना  सफर  में  बात  इससे कब बनी

लौटने  को   घर   हमेशा   साँझ   ढलनी  चाहिए

**

आ  ही  जायेगा  भगीरथ  फिर  यहाँ  बदलाव को

आस की  गंगा  तुम्हीं  से फिर निकलनी चाहिए

**

है   जरूरी   देश   को   विश्वास   की   संजीवनी

मन हिमालय  में सभी के वो भी फलनी चाहिए

**

ब्याह की बातें  कहो या  फिर कहो तुम देश की

हाथ से  जादा …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 22, 2014 at 10:30am — 19 Comments

मन

मन मेरे तू क्या होता?

जो मुझको तू भा जाता

कर लेता मुझको दीवाना

तो मैं तुझको अपनाता

मन मेरे तुलसी दल होता

मोहन के मस्तक पर सोहता

पा जाता जीवन निर्वाण

तो मैं तुझको अपनाता

मन मेरे जमुना जल होता

कृष्णा के तन को छू जाता

पा जाता तू सम्मान

तो मैं तुझको अपनाता

मन मेरे तू हरिपथ होता

प्यारे के चरणों को छूता

पा जाता सुजीवन सोपान

तो मैं तुझको अपनाता

मन मेरे तू दर्पण होता …

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on May 21, 2014 at 11:00pm — 12 Comments

गालों पर बोसा दे देकर मुझको रोज़ जगाती है

गालों पर बोसा दे देकर मुझको रोज़ जगाती है

छप्पर के टूटे कोने से याद की रौशनी आती है

दालानों पर आकर, मेरे दिन निकले तक सोने पर

कोयल, मैना,  मुर्ग़ी, बिल्ली मिलकर शोर मचाती है

सबका अपना काम बंटा है आँगन से दालानों तक

गेंहूँ पर बैठी चिड़ियों को दादी मार बगाती है

यूं तो है नादान अभी, पर है पहचान महब्बत की

जितना प्यार करो बछिया को उतनी पूँछ उठती है

लाख छिड़कता हूँ दाने और उनपर जाल बिछाता हूँ

लेकिन घर कोई…

Continue

Added by Sushil Thakur on May 21, 2014 at 6:00pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे

तोड़ धैर्य के बाँध को, उफन गया सैलाब।

कुछ से उम्मीदें बढ़ीं, कुछ के टूटे ख़्वाब।।

 

लाँघी सीमा क्रोध की, ऐसा क्या आक्रोश।

भला बुरा सोचा नहीं, अंधा सारा जोश।।

 

श्रम भी काम न आ सका, काम न आया अर्थ।

बुरे कर्म की कालिमा, यत्न हुआ सब व्यर्थ।।

 

राग द्वेष का हो मुखर, जिनके मुख से राग।

शक्ति उन्हें मिल ही गई, जो-जो उगलें आग।।

 

ज्यों बिल्ली के भाग से, छींका फूटा आज।

दण्ड एक को यों मिला, दूजा पाये…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 11:40pm — 30 Comments

जेठ की तपती दुपहरी!

जेठ की तपती दुपहरी!

जेठ की तपती दुपहरी, लगे नीरव शांत।

धूप झुलसा रही काया, स्वेद से मन क्लांत।।

शाख पर पक्षी विकल है, गेह में मनु जात।

सूर्य अम्बर आग उगले, जीव व्याकुल गात।१।

जल भरी ठंडी सुराही, पान कर मन तुष्ट।

दूध माखन और मठठा, तन करे है पुष्ट।।

पना अमरस संग चटनी, भा रहे पकवान।

कर्ण को मधुरिम लगे फिर, आज कोयल गान।२।

गूँजता अमराइयों में, बिरह पपिहा राग।

गाँठकर छाया दुपहरी, पढ़ रही निज भाग।।

कृष हुई सरिता निराली, सूख मंथर…

Continue

Added by Satyanarayan Singh on May 20, 2014 at 6:00pm — 33 Comments

ग़ज़ल : पेड़ ऊँचा है, न इसकी छाँव ढूँढो

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२

कामयाबी चाहिए तो पाँव ढूँढो,…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 20, 2014 at 5:18pm — 28 Comments

हर पतझड़ को ……

हर पतझड़ को ……

ज़िंदगी को ..हर मौसम की जरूरत होती है

उजालों को भी ...अंधेरों की जरूरत होती है

क्यों सिमटे नहीं सिमटते वो बेदर्द से लम्हे

चश्मे अश्क को .खल्वत की ज़रुरत होती है

रात के वाद-ऐ-फ़र्दा पे ..यकीं भला करूँ कैसे

यकीं को भी इक समर्पण की जरूरत होती है

मिट गयी सहर होते ही वो रूदाद-ऐ-मुहब्बत

रूहे- मुहब्बत को आगोश की जरूरत होती है

हिज़्र की सिसकियों से है नम रात का दामन

सोहबते -लब को…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 20, 2014 at 1:00pm — 20 Comments

क्या भूलूँ क्या याद करूँ ?

क्या भूलूँ क्या याद करूँ ?

सब परछाईं सा लगता है



कब पूछा किसने हाल मेरा

किसने मुझ को दुलराया था

हर काम यहाँ मेरा नसीब

सब कुछ हमको ही करना था



क्या बोलूँ क्या न बोलूँ ?

बस मौन साध के रहना है



घर छोड़ के आई बाबुल का

सोचा ये आँगन मेरा है

पर कोई नहीं जिसे अपना कहूँ

है देश यहाँ बेगानों का



क्या सोचूँ क्या ना सोचूँ ?

बस चंद दिनों का मेला है



सब जन करते निंदा मेरी

करना था वो करती आई

गर फिर भी…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on May 19, 2014 at 10:30pm — 22 Comments

ज़रूरी क्या कि ये राहे-सफ़र हमवार हो जाये

ज़रूरी क्या कि ये राहे-सफ़र हमवार हो जाये

न हों दुश्वारियाँ तो ज़िन्दगी बेकार हो जाये

 

आना का सर कुचलने में कभी तू देर मत करना

कहीं ऐसा न हो, दुश्मन ये भी होशियार हो जाये

 

फरेबो-मक्र, ख़ुदग़रज़ी न ज़ाहिर हो किसी रुख़ से

वगरना आदमी भी शहर का अख़बार हो जाये

 

कभी भी एक पल मैं ख़्वाब को सोने नहीं देता

न जाने किस घड़ी महबूब का दीदार हो जाये

 

मैं दावा-ए-महब्बत को भी अपने तर्क कर दूँगा

जो ख़्वाबों में नहीं आने को वो…

Continue

Added by Sushil Thakur on May 19, 2014 at 7:00pm — 9 Comments

किसी की अधखिली अल्हड़ जवानी याद आती है

किसी की अधखिली अल्हड़ जवानी याद आती है

मुझे उस दौर की इक-इक कहानी याद आती है

 

जिसे मैं टुकड़ा-टुकड़ा करके दरिया में बहा आया   

लहू से लिक्खी वो चिठ्ठी पुरानी याद आती है

 

मैं जिससे हार जाता था लगाकर रोज़ ही बाज़ी

वही कमअक्ल, पगली, इक दीवानी याद आती है

 

जो गुल बूटे बने रूमाल पे उस दस्ते नाज़ुक से

कशीदाकारी की वो इक निशानी याद आती है

 

जो गेसू से फ़िसलकर मेरे पहलू में चली आई 

वो ख़ुशबू से मोअत्तर रातरानी याद…

Continue

Added by Sushil Thakur on May 19, 2014 at 7:00pm — 10 Comments

मजदूर [कुण्डलिया]

मजदूरी कर पालता अपना वो परिवार

रोज दिहाड़ी वो करे देखे ना दिन वार |

देखे ना दिन वार नहीं देखे बीमारी

कैसे पाले पेट वार है इक इक भारी

मंहगाई अपार ,यही उसकी मज़बूरी

गेंहू चावल दाल मिले जो हो मजदूरी ||

उसका जीवन है बना दर्द भूख औ प्यास

मजदूरी किस्मत बनी जब तक तन में श्वास |

जब तक तन में श्वास पड़ेगा उसको सहना

तसला धूल कुदाल पसीना उसका गहना

सरिता पूछे आज कहो कसूर है किसका

भूखा है मजदूर पेट भरे कौन उसका…

Continue

Added by Sarita Bhatia on May 19, 2014 at 6:38pm — 17 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service