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माँ की सीख (लघुकथा)

"माँ, तुम्हें एक खुशखबरी देनी थी। तुम नानी बनने वाली हो।"- बेटी ने अपनी माँ को बताया जिसकी पिछले महीने ही शादी हुई थी।

"बेटा, तुमने यह बात किसी को बताई तो नहीं है।"

"नहीं माँ, क्या हुआ?"

"बेटा, एक बार अल्ट्रासाउंड करवा लेती तो ठीक रहता। पता लग जाता घर का चिराग है या लड़की।"

"लेकिन माँ, यह तो पहला बच्चा है। ऐसी बातें क्यों सोच रही हो?"

"तुम्हारी भाभी भी यूँ ही माॅर्डन बातें किया करती थी। अब उसको दो लड़कियाँ हैं। बेटा, घर को चिराग देने वाली औरत का मान-सम्मान अपने आप ही…

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Added by विनोद खनगवाल on November 24, 2014 at 6:01pm — 12 Comments

ग़ज़ल बदला बदला सा घर नज़र आया।

2122 12 12 22

बदला बदला सा घर नज़र आया।
जब कभी मैं कही से घर आया।

बस तुझे देखती रही आँखें।
हर तरफ तू ही तू नज़र आया।

छोड़ कर कश्तियाँ किनारे पर।
बीच दरिया में डूब कर आया।

यूँ हज़ारो हैं ऐब तुझमे भी।
याद मुझको तेरा हुनर आया।

नींद गहरी हुई फिर आज "कमाल"।
ख्वाब उसका ही रात भर आया।

मौलिक एवम अप्रकाशित
केतन "कमाल"

Added by Ketan Kamaal on November 24, 2014 at 5:15pm — 21 Comments

ग़ज़ल - रात गहरी पहले तो आती ही है

2122 2122. 212

बात आ ना जाए अपने होठ पर
देखिए पीछे पड़ा सारा शहर

मत कहो तुम हाले दिल चुप ही रहो
क्यों कहें हम खुद कहेगी ये नजर

देखो कलियाँ खुद ही खिलती जाएँगी
गीत अब खुद गुनगुनाएँगे भ्रमर

हाथ थामें जब चलेंगे साथ हम
वक्त थम जाएगा हमको देखकर

रात गहरी पहले तो आती ही है
पर पलट करती है ऐलाने- सहर

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on November 24, 2014 at 2:00pm — 17 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आ चल बुने राष्ट्रीय स्वेटर (नवगीत )

आ चल बुने राष्ट्रीय स्वेटर

 

सहिष्णुता की ऊन का गोला

सलाइयाँ सद्व्यवहार  की   

 रंग रंग के  डालें बूटे

मनुसाई  कतारें  प्यार की

करें बुनाई सब मिलजुल कर

आ चल बुने राष्ट्रीय स्वेटर

 

अब सर्दी का लगा महीना

देश मेरा ये थर-थर काँपे

एक-एक मिल भरें उष्णता

शाल बना  कांधों पर ढापें

धूप-धूप गूँथे प्रभाकर      

आ चल बुने राष्ट्रीय स्वेटर

 

हिंदू मुस्लिम सिक्ख…

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Added by rajesh kumari on November 24, 2014 at 11:07am — 25 Comments

आँख का आँसू हॅसेगा - (ग़ज़ल ) -लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    212

******************************

चाँद  देता  है  दिलासा  कह  पुरानी  उक्तियाँ

पतझड़ों  में  गीत  उम्मीदों के गाती पत्तियाँ /1/



कह रही हैं एक दिन जब गुल खिलेंगे बाग में

फिर उदासी से  निकल बाहर हॅसेंगी बस्तियाँ /2/



स्वप्न बैठेंगे यहीं फिर गुनगुनी सी धूप में

बीच रिश्तों  के  रहेंगी  तब न ऐसी सर्दियाँ /3/



सिर  रखेगा  फिर  से  यारो सूने दामन में कोई  

आँख का आँसू हॅसेगा छोड़ कर फिर सिसकियाँ /4/



डस  रहा  है …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 24, 2014 at 11:05am — 18 Comments

नये युग का प्रेम

स्त्री को चाह होने लगी स्त्री की

पुरुष कर रहा पुरुष से प्यार

कैसे तो ये संभव है

और कैसे हो जाता इकरार||

 

स्वभाविक सी अभिव्यक्ति है ?

या सामाजिक वर्जनाओं को तिरस्कृति है?

ईश्वर का तो नही रहा होगा ऐसा कोई अभिप्राय

प्यार के नये नये रूप देते दिल हिलाए||

 

स्त्री और पुरुष का अनमोल अनूठा जोड़

सृष्टि टिकी है इस रिश्ते पर कैसे कोई सकता तोड़

वासनाओं के दिख रहे नित नए ही रूप

इश्क हो रहा शर्मिंदा प्यार दिख रहा…

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Added by sarita panthi on November 24, 2014 at 9:53am — 7 Comments

परिमूढ़ प्रस्ताव

परिमूढ़ प्रस्ताव

अखबारों में विलुप्त तहों में दबी पड़ी

पुरानी अप्रभावी खबरों-सी बासी हुई

ज़िन्दगी

पन्ने नहीं पलटती

हाशियों के बीच

आशंकित, आतंकित, विरक्त

साँसें

जीने से कतराती

सो नहीं पातीं

हर दूसरी साँस में जाने कितने

निष्प्राण निर्विवेक प्रस्तावों को तोलते

तोड़ते-मोड़ते

मुरझाए फूल-सा मुँह लटकाए

ज़िन्दगी...

निरर्थक बेवक्त

उथल-पुथल में लटक…

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Added by vijay nikore on November 24, 2014 at 8:30am — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अच्छे दिन – अरुण कुमार निगम

पापा पापा बतलाओ ना , अच्छे दिन कैसे होते हैं

क्या होते हैं चाँद सरीखे, या तारों जैसे होते हैं.

 

बेटा ! दिन तो दिन होते हैं ,गिनती के पल-छिन होते हैं

अच्छे बीतें तो सुखमय हैं, वरना ये दुर्दिन होते हैं.

 

पापा पापा बतलाओ ना , अच्छे दिन कैसे होते हैं

क्या होते हैं दूध-मलाई , या माखन जैसे होते हैं.

 

बरसों से मैं सुनते आया, स्वप्न सजीले बुनते आया

लेकिन देखे नहीं आज तक, अच्छे दिन कैसे होते हैं

 

पापा पापा बतलाओ…

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Added by अरुण कुमार निगम on November 23, 2014 at 11:00pm — 10 Comments

काला पत्थर

डोभाल जी का मकान बन रहा था, बड़े ही धार्मिक व्यक्ति थे और प्रकृति प्रेमी भी,एक माली भी रख लिया था ,उसका कार्य एक सुन्दर बगीचे का निर्माण करना था ,वह भी धुन का पक्का था , उसने तरह-तरह के फूल ,घास ,पेड़ लगा दिए और कभी –कभी वह  सजावट के लिए रंग बिरंगे पत्थर भी उठा कर ले आता और बड़े अच्छे शिल्पी की तरह उन्हें पौधों के इर्द-गिर्द सजाता ,उस बगीचे में अब तरह तरह के  फूल खिलने लगे थे ,वही नीचे एक बड़ा काला सा पत्थर भी था जिस पर माली अपना खुरपा रगड़ता और पौधों के नीचे से खरपतवार…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 23, 2014 at 10:00pm — 17 Comments

हमे भी इन सितारों में एक जगह बनानी है

जिसने दिया हमें आदर्श शिष्य की पहचान 

गुरु को दे अंगूठा जब एकलव्य बने महान 

हो लगन कुछ सीखने की इनसे सीखे हम

जग को हिला सकते नहीं किसी से पीछे हम

गुरु-शिष्य की फिर वही परम्परा जगानी है   

हमे भी इन सितारों  में एक जगह बनानी है |

अपने प्राणों  की आहुति देकर जो चले गये 

इन्कलाब का नारा दे ,गोली खाकर जो चले गये 

स्वतंत्रता -गणतन्त्र दिवस पाठशाला तक सिमट गये 

जिनके हाथों में बागडोर वो मधुशाला तक सिमट गये 

जो भूल गये…

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Added by maharshi tripathi on November 23, 2014 at 6:55pm — 7 Comments

राजकुमार (लघुकथा)

"पापा, पढ़ने के बाद मुझे जाॅब तो मिल जाएगी ना?"
"किस मूर्ख ने कहा है तुमको नौकरी करनी है! तुमको तो राज करना है राज, मेरे राजकुमार बेटे।"- नेता जी ने अपने 12 साल के लड़के को सीने से लगा लिया।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 23, 2014 at 4:12pm — 6 Comments

शहर की रात

बंद खिडकियों से

झांकता

प्रकाश

चारो ओर स्याह-स्याह

मुट्ठी भर

उजास

 

टूटी हुयी

गर्दन लिए

बल्ब रहे झाँक

ट्यूब लाईट

अपना महत्त्व

रहे आंक

 

सर्र से

गुजर जाते

चौपहिया वाहन

सन्नाटा

विस्तार में

करता अवगाहन

 

तारकोली

सड़क सूनी

रिक्त चौराहे

सर्पीली…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 23, 2014 at 12:00pm — 8 Comments

यार बैरी बना आशिकी के लिये |

शोर होता रहा रोशनी के लिये |

लोग लड़ते रहे चाशनी के लिये |

बेबसी का नज़ारा न देखा कोई ,

मार होती रही चाँदनी  के लिये |

लूट मचती रही चीख होता रहा , 

अश्क गिरते रहे ज़िंदगी के लिये |

हाथ बाँधे खड़े देखते रह गये ,   

घर जला आग में दोस्ती के लिये |

नाव डूबी वहीँ आब ना था जहाँ ,

यार बैरी बना…

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Added by Shyam Narain Verma on November 22, 2014 at 5:00pm — 7 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : दौर (गणेश जी बागी)

         वर्ष का पहला दिन, दीवार पर टंगा नया कैलेण्डर और जनवरी का पृष्ठ अपने भाग्य पर इतरा रहा था, बाकी महीनों के पृष्ठ दबे जो पड़े थे, सभी को प्रणाम करते देख वह अहंकार और आत्ममुग्धता से भर गया उसे क्या पता कि लोग उसे नहीं बल्कि उस पृष्ठ पर लगी माँ लक्ष्मी की तस्वीर को प्रणाम करते हैं ।

                    दिन-महीने बीतते गये, संघर्ष सफल हुआ और सबसे नीचे दबा दिसंबर माह का पृष्ठ आज सबसे ऊपर था । उसके ऊपर लगी माँ सरस्वती की तस्वीर बहुत ही सुन्दर लग रही थी…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 22, 2014 at 1:00pm — 22 Comments

ऐसी कोई वजह बनों

झगड़ा ना हो सुलह बनों।
ऐसी कोई वजह बनों।।

चर्चा हो सारे जग में।
ऐसी भी इक जगह बनों।।

तारीफ भी करना खूब।
पहले उसकी तरह बनों।

बेगुनाह को सजा न हो।
ऐसी कोई ज़िरह बनों।।

वाह वाह होगी तेरी।
पहले ऐसी गिरह बनों।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on November 22, 2014 at 11:00am — 8 Comments

बलात्कार (लघुकथा)

"सर, एक काॅलेज की लड़की से बलात्कार हुआ है उसे हॉस्पिटल में लाया गया है।"-फोन पर किसी ने पत्रकार को सूचना दी।
"चलो यार, एक लड़की से बलात्कार करना है........"
"किसी टाइम तो अपनी जुबान को लगाम लगा लिया करो।"
"हाहाहाहाहा............"- ठहाकों से प्रेस रूम गूंज उठा और सभी पत्रकार उठकर हस्पताल की तरफ चल दिए।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 22, 2014 at 10:08am — 6 Comments

मुआवजा (लघु कथा)

"रमलू की घरवाली कौन हैं ? "

"साब मैं हूँ । "

"हम तेरे पति की मौत पर सरकार की तरफ से मुआवजा देने आये हैं, पढना जानती हैं ? "

"जी नही साब, अनपढ़ हूँ । "

"और कौन -कौन है घर में ? "

"साब मैं, 4 छोरिया 1 बेटो है। रमलू तो मर गयो । ये सारो बोझ मारे ऊपर छोड़ गयो । घर की हालत तो थे देख ही रया हो, खाने के लाले है। साब इतनी सर्दी में भी पहनने को कुछ नही ..." सिसकने लगती है ।

"चल ठीक है, रो मत ये......"

" इक मिनट " बात पूरी भी नही हुई थी की सहायक के कान मेँ वो…

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Added by किशन कुमार "आजाद" on November 22, 2014 at 8:30am — 8 Comments

बालपन की मस्तियाँ ....(.नवगीत) सीमा हरि शर्मा

* बालपन की मस्तियाँ *



इंद्रधनुषी रंग उतरे

हैं फलक पर से जमीं

बालपन की मस्तियों में

रंग सारे चुन रहे।



मन लुभाती हैं सदा ही

तोतली सी बोलियाँ

बात बेमतलब भले पर

शब्द मिसरी गोलियाँ

फूल झरते ओंठ से सब

तोल मोलों से परे

बस करें अपने दिलों की

ना किसी की सुन रहे।...बालपन की मस्तियों में



सर्द शामें पैर नंगे

फर्श पर जब दौड़ते

घुमती पीछे तभी माँ

चप्पलों को हाथ ले

चूमती है गाल ढककर

माँ कभी आँचल… Continue

Added by seemahari sharma on November 22, 2014 at 12:30am — 16 Comments

पुण्य (लघुकथा)

"चाची, तुम्हारी बहू को जापे में खिलाने के लिए घी का इंतजाम नहीं हो पाया है अगर थोड़ी सी मदद कर देती तो...."
"देखो बेटा, इस महीने थोड़ा हाथ तंग है।"- चाची ने बात पूरी होने से पहले ही बहाना बना दिया।
शाम को एक थाली को ढके चाची कहीं जा रही थी। उसने पूछा-"चाची, कहाँ जा रही हो?"
"बेटा, वो अपनी गली की कुतिया ने बच्चों को जन्म दिया है। जापे वाली के लिए देसी घी का हलवा बहुत फायदेमंद होता है इसलिए उसके लिए ले जा रही हूँ। बड़ा पुण्य मिलेगा।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 21, 2014 at 2:37pm — 10 Comments

मेरे ख्वाबों कि कोई बात अगर हो जाये

२१२     २११    २२१    १२२   २२ 

 

चांदनी रात में बरसात अगर हो जाये

मेरे ख्वाबों कि कोई बात अगर हो जाये

 

यार मेरे तू ज़माने से सदा ही बचना

इक  हसीं  गुल से मुलाकात अगर हो जाये

 

काश! सहरा हो नजर जब भी बने दिल दुल्हा

यूं भी अरमानो कि बारात अगर हो जाये

 

आये हर सिम्त से बस यार महक जूही की  

काश धरती पे ये हालात अगर हो जाये

 

तन ये साँसों से तपे हौले से शब् भर मेरा

काश ऐसी भी कभी रात अगर हो…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on November 21, 2014 at 12:02pm — 18 Comments

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