For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

नया मुर्गा (लघुकथा)

"क्या बात, आज क्लास अटेंड नहीं कर रही हो?"
"नहीं यार, एक नया मुर्गा फसा है आज तो बस रेस्टोरेंट और थियेटर।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 20, 2014 at 6:20pm — 13 Comments

मेरे पास, थोडे से बीज हैं

मेरे पास,

थोडे से बीज हैं

जिन्हे मै छींट आता हूं,

कई कई जगहों पे



जैसे,



इन पत्थरों पे,

जहां जानता हूं

कोई बीज न अंकुआयेगा

फिर भी छींट देता हूं कुछ बीज

इस उम्मीद से, शायद

इन पत्थरों की दरारों से

नमी और मिटटी लेकर

कभी तो कोई बीज अंकुआएगा

और बनजायेगा बटबृक्ष

इन पत्थरों के बीच



कुछ बीज छींट आया हूं

उस धरती पे,

जहां काई किसान हल नही चलाता

और अंकुआए पौधों को

बिजूका गाड़ कर

परिंदो से…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on November 20, 2014 at 3:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

22  22  22  22  2

टूटने लगे हैं घर शब्दों से

अब तो लगता है डर  शब्दों से



दैर हरम इक हो जाते लेकिन

पड़े दिलों पे पत्थर  शब्दों से



हैं मेरे हमराह ज़रा देखो

ग़ालिब ओ मीर ,ज़फ़र  शब्दों से



बनती बात बिगड़ने लगती है

ऐसे उठे बवण्डर  शब्दों से



फूल अमन के खिलते कैसे अब

दिल आज हुए बन्जर  शब्दों से



मेरी हस्ती गुमनाम -रहे पर 

छाऊँ सबके मन पर  शब्दों से



गुमनाम पिथौरागढ़ी



मौलिक व…

Continue

Added by gumnaam pithoragarhi on November 19, 2014 at 8:00pm — 9 Comments

क्षणिकाएँ - 3 - डा० विजय शंकर

भला आदमी है वो ,
भला करता है ,
सौदागरों की तरह ।

रहमदिल है वह
दुआ करता है
भिखारियों की तरफ ।

आशीर्वाद देता है वह
चढ़ावा चढ़ जाने के बाद
पुजारी है वह ।

सब कर देगा वह
सब पा लेने के बाद
वादा है उसका ,
नेता है वह ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on November 19, 2014 at 5:46pm — 26 Comments

चिंता (लघुकथा)

"सुनो माँ, रवि का फोन आया था। कल मुझे लेने आ रहा है और इस बार कुछ ढंग के कपड़े ला देना। वहाँ मेरी बहुत इंसेल्ट होती है।"
'पिछली बार जिससे पैसे उधार लिए थे वो कई बार वापस माँगने आ चुकी थी। अब किससे उधार माँगेगी?'- सोचकर माँ चिंता में डूब गई।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 19, 2014 at 4:10pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है ( गिरिराज भंडारी )

मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है

**************************************

1222    1222    1222     122 

न आये होश अब यारों नशा छाया हुआ है  

सँभल ऐ बज़्म दिल अब वज़्द में आया हुआ है

 

ज़रा राहत की कुछ सांसें तो लेलूँ मैं ,कि सदियों

बबूलों को मनाया हूँ तो अब साया हुआ है 

 

हथौड़ा एक तुम भी मार दो लोहा गरम पर

यहाँ मज़हब को ले के खून गरमाया हुआ है…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on November 19, 2014 at 10:10am — 18 Comments

जीवन में उत्कर्ष (दोहे)- लक्ष्मण रामानुज

धरती माँ की गोद में, फिर आया नववर्ष,     

प्यार मिला माँ बाप से, जीवन में उत्कर्ष |

 

भाई सब देते रहे, मुझको प्यार असीम,

मित्र मिले संसार में, रहिमन और रहीम |

 

आई बेला साँझ की, समय गया यूँ बीत,

इतने वर्षों से यही,  समय चक्र की रीत |

 

बचपन बीता चोट खा,  माँ बापू बेचैन,

पूर्व जन्म के कर्म थे, भोगूँ मै दिन रेन |

 

मिला मुझे संयोग से,सात जन्म का प्यार,

मेरे घर परिवार से,  दूर  हुआ अँधियार…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 19, 2014 at 6:00am — 18 Comments

चिंतन

देखो उसे, दार्शनिक बनकर

फिर बैठेगा, नाक में ऊँगली डालेगा

कुछ निकलेगा, गोल –गोल गोलियायेगा

बिस्तर में पोछेंगा, पर कुछ सोचेगा

आँखे बंद करेगा, चिंतन करेगा

इस पर चिंतन, उस पर चिंतन

कर्म पर चिंतन, भाग्य पर चिंतन

शून्य पर चिंतन, अनंत पर चिंतन

चिंतन से निकले हल पर, चिंतन

चिंतन करते –करते, थककर सो जाएगा

इस दर्शन को, कौन समझ पाया है ?

कौन समझ पायेगा ?,पर मैं जानता हूँ,

जब वह चिंतन से जागेगा ,समय से तेज…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on November 19, 2014 at 1:00am — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शजर की हाय ही काफ़ी अगर बोला तो क्या होगा (ग़ज़ल 'राज')

1222  1222   1222  1222

नहीं होता तो क्या होता अगर होगा तो क्या होगा

कभी तुमने बचाया क्या अभी खोया तो क्या होगा

 

जमाने को सिखाया है हुनर तुमने यही अब तक

वफ़ा करके कभी खुद को मिले धोखा तो क्या होगा 

 

किसी की जिन्दगी में तुम उजाला कर नहीं सकते

अगर खुर्शीद भी दिन में न अब जागा तो क्या होगा 

 

चले हो आबशारों को जलाने आग से अपनी

समंदर ने तुम्हारा रास्ता रोका तो क्या होगा 

 

लिए वो हाथ में पत्थर कभी फेंका…

Continue

Added by rajesh kumari on November 18, 2014 at 10:43pm — 25 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दायरा- अतुकांत

एक गमले में रोपा गया पौधा

उसका दायरा क्या है

बस वो गमला

जब तक वो गमले में है

कभी वृक्ष नहीं बन सकता

उस पौधे की जड़ों को

गमले से बाहर आना होगा

 

परिन्दों को उड़ना हो

तो उनकी सीमा क्या है

कोई नहीं

असीम आकाश फैला हुआ है

उन्हें अपने पर खोलने होंगे

 

हमें जीना हो तो

पूरी कायनात पड़ी है

हमें

ख़्वाहिशों को परवाज़ देना होगा

सपनो को

उम्मीदों का आकाश देना…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on November 18, 2014 at 9:44pm — 11 Comments

कौलटेय मैं !

पाकर आभास

अपनी ही कुक्षि में

अयाचित  अप्रत्याशित

मेरी खल उपस्थिति का

सह्म गयी माँ !

*        *        *

 

हतप्रभ ! स्तब्ध ! मौन !

आया यह पातक कौन ?

जार-जार माँ रोई

पछताई ,सोयी, खोयी

‘पातकी तू डर

इसी कुक्षि में ही मर

मैं भी मरूं साथ

तेरे सर्वांग समेत

धिक् ! हाय उर्वर खेत’

*        *       …

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 18, 2014 at 6:00pm — 19 Comments

लम्हा महकता …

लम्हा महकता … एक रचना

सोया करते थे कभी जो रख के सर मेरे शानों पर

गिरा दिया क्यों आज पर्दा  घर के रोशनदानों पर

तपती राहों पर चले थे जो बन के हमसाया कभी

जाने कहाँ वो खो गए ढलती साँझ के दालानों पर

होती न थी रुखसत कभी जिस नज़र से ये नज़र

लगा के मेहंदी सज गए वो   गैरों के गुलदानों पर

कैसा मैख़ाना था यारो हम रिन्द जिसके बन गए

छोड़ आये हम निशाँ जिस मैखाने के पैमानों पर

देख कर दीवानगी हमारी  कायनात  भी  हैरान है

किसको तकते हैं भला हम  तन्हा…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 18, 2014 at 2:37pm — 14 Comments

सिगरेट

देख रहा था

थकी हुई  बस में

थके हुए चेहरे

गाल पिचके हुए

हड्डियाँ उभरी हुई

अवसादित परिणति में

एक सिगरेट सुलगाली

बढते विकारों पर

मैंने किया प्रदान

अपना उल्लेखनीय योगदान

देख रहा था,

लोगों को चढ़ते-उतरते

सीटों पर लड़ते- झगड़ते

शोरगुल के साथ- साथ

पसीने की दुर्गन्ध भरी है

बस अब भी वहीँ खड़ी है

लोग बस को धकिया रहे हैं

ड्राइवर साहब गियर लगा रहे हैं

धीरे धीरे बस चल रही है…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on November 18, 2014 at 12:30am — 13 Comments

अस्तित्व (लघु कथा )

रूढ़ीवादी परिवार का विनय अपनी पत्नी को बेहद प्यार करता था और आज तक उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी का ख्याल रखता आया था लेकिन आज जब घर लौटा तो नीति ने नौकरी की बात छेड़ दी।



-"अच्छी कम्पनी है और सैलरी भी । टाइमिँग्स भी ऐसी हैँ कि घर की देखरेख मेँ भी कोई प्रॉब्लम नही होगी, फिर क्या प्रॉब्लम है?"



-"नीति जब मेरी सैलरी से घर अच्छे से चल रहा है तो तुम्हे नौकरी करने की क्या ज़रूरत है?

क्या तुम्हे कोई कमी है मेरे साथ ?"



-"नही विनय बल्की आपके साथ तो मैँ बहुत खुश… Continue

Added by pooja yadav on November 17, 2014 at 9:52pm — 18 Comments

स्नेह रस से भर देना …..

स्नेह रस से भर देना …..

कुछ भी तो नहीं बदला

सब कुछ वैसा ही है

जैसा तुम छोड़ गए थे

हाँ, सच कहती हूँ

देखो

वही मेघ हैं

वही अम्बर है

वही हरित धरा है

बस

उस मूक शिला के अवगुण्ठन में

कुछ मधु-क्षण उदास हैं

शायद एक अंतराल के बाद

वो प्रणय पल

शिला में खो जायेंगे

तुम्हें न पाकर

अधरों पर प्रेमाभिव्यक्ति के स्वर भी

अवकुंचित होकर शिला हो जायेंगे

लेकिन पाषाण हृदय पर

कहाँ इन बातों का असर होता है

घाव कहीं भी हो…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 17, 2014 at 6:49pm — 8 Comments

गिल्लू (कहानी)

कुछ दो-चार मरीजोँ, नर्स एक बड़ी-सी खिड़की और क्रीम कलर के बड़े-बड़े पर्दोँ के अलावा उस अस्पताल मेँ मेरे लिए देखने

लायक कुछ भी नही था। ऑपरेशन के तुरन्त बाद मैँ अपने बिस्तर पर पड़ी कराह रही थी। कुछ ग्लूकोज़ की बूँदेँ जो नलियोँ के सहारे रिस-रिस कर मेरे हाथ से होती हुई मेरे शरीर मेँ शामिल हो जाती थी, ने मेरे हाथ को किसी पत्थर की तरह भारी और ठण्डा कर दिया था और मैँ कम्बल से ढ़ककर इसे गरम रखने का नाकाम प्रयास करती। पैर अभी भी सुन्न थे पर कमर का दर्द मुझे अन्दर तक तोड़ देता था मानो मेरी जीजिविषा को…

Continue

Added by pooja yadav on November 17, 2014 at 3:30pm — 9 Comments

फर्क (लघुकथा)

"रमा, सेठ रामलाल की बेटी पिछले महीने किसी के साथ भाग गई थी। कई दिन अखबारों की न्यूज भी बनी। आज उस बात को सब भूल गए हैं। रामलाल भी आराम से अपना धंधा कर रहा है और एक मेरी बेटी ने 5 साल पहले भागकर शादी की थी। आज भी लोग मेरी बेटी और मेरे परिवार को गिरी हुई नजरों से देखते हैं।"- सावित्री ने दुखी मन से कहा।

"सावित्री बहन, गरीब की बेटी और अमीर की बेटी में बहुत फर्क होता है।"- रमा ने सांत्वना देते हुए कहा।

"मौलिक और अप्रकाशित"

Added by विनोद खनगवाल on November 17, 2014 at 3:30pm — 7 Comments

आईना तो सच दिखा रहा था

आईना तो

सच दिखा रहा था

जाला,

हमारी ही आखों में था



दुनिया जिसे

बेदाग़ समझती रही

धब्बा,

उसी केे दामन में था



वो बहुत पहले की बात है

जब लोग

दो रोटी और दो लंगोटी में

खुश रहा करते थे



तुम

ये जो राजपथ देखते हो

कभी वहां पगडंडी

हुआ करती थी

और एक

छांवदार पेड भी हुआ करता था



ये तब की बात है

जब लोग

धन में नही धर्म में

आस्था रखा करते थे



खैर छोडो मुकेश बाबू

इन बातों…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on November 17, 2014 at 11:00am — 10 Comments

खुला इश्तिहार

आज ‘नियति’ व ‘आदित्य ‘ आमने-सामने बैठे थे | सेमिनार के बाद यह उनकी पहली मुलाकात थी |और शायद .....

सेमिनार की उस आखिरी शाम से उनके बीच की बर्फ पिघलने लगी थी| शुरुवात एक चिट्ठे से हुई थी जब उसने बिल्कुल खामोश रहने वाली नियति की डायरी में अपना नम्बर लिखा और लिखा-“शायद हम दोनों का एक दर्द हो| तुम्हारी ये ख़ामोशी खलती है ,तुमसे बात करना चाहता हूँ |”

 “ क्यों ?”

“ लगता है तुम्हारा मेरा कोई रिश्ता है शायद दर्द का - - “

पूरे सेमिनार वो चुप्प रही और वो उसे रिझाने अपनी और…

Continue

Added by somesh kumar on November 16, 2014 at 1:30pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
औपचारिकता “क्षणिकाएँ’

तुमने बुलाया और मैं चली आई 

मगर तुम भी जानते हो  

न तुमने दिल से बुलाया

 न मैं दिल से आई  

 

अच्छा हुआ जो तुम

मेरी महफ़िल में नहीं आये

क्यूंकि तुम अदब से आ नहीं सकते थे

और मैं औपचारिकतानिभा नहीं सकती थी

 

आयोजन में कस के गले मिले और बोले  

अरे बहुत दिनों बाद मिले हो

अच्छा लगा आप से मिलकर

सुनकर हम दोनों के घरों के पड़ोसी गेट हँस पड़े   

 

 

 सुबह से भोलू गांधी जी की प्रतिमा…

Continue

Added by rajesh kumari on November 16, 2014 at 1:00pm — 14 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service