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ग़ज़ल -- कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती

जो दिल कहे वो ज़रूरत नहीं हुआ करती

कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती



तुम्हें गुरेज़ नहीं है यही सबब तो नहीं

बिना फरेब सियासत नहीं हुआ करती



ज़बान दे के पलटना उन्हें मुबारक हो

मैं ख़ुश हूँ, मुझसे तिज़ारत नहीं हुआ करती



मैं कैसे झूठ को सच और सच को झूठ कहूँ

कि एक दिन में ये आदत नहीं हुआ करती



जो चंद पैसों में ईमान बेच देते हैं

उन्हें किसी से रिफ़ाक़त नहीं हुआ करती



वो नामचीन हुए कल जो तिफ्ले-मकतब थे

कभी फ़ुज़ूल मशक़्क़त नहीं हुआ… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 28, 2015 at 7:30pm — 15 Comments

मानव का मान करो ….

मानव का मान करो ….

सिर से नख तक

मैं कांप गया

ऐसा लगा जैसे

अश्रु जल से

मेरे दृग ही गीले नहीं हैं

बल्कि शरीर का रोआं रोआं

मेरे अंतर के कांपते अहसासों,

मेरी अनुभूतियों के दर पे

अपनी फरियाद से

दस्तक दे रहे थे

दस्तक एक अनहोनी की

एक नृशंस कृत्य की

एक रिश्ते की हत्या की

दस्तक उन चीखों की

जिन्हें अंधेरों ने

अपनी गहराई में

ममत्व देकर छुपा लिया

मैं असमर्थ था

अखबार का हर अक्षर

मेरी आँखों की नमी से

कांप रहा…

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Added by Sushil Sarna on January 28, 2015 at 3:03pm — 22 Comments

चारसू उठता धुंआ ही अब नजारों में

२१२२  २१२२   २१२२२

 

रहनुमा वो कह गया है क्या इशारों में

चारसू उठता धुंआ ही अब नजारों में

 

धुंध कुछ छाई है ऐसी अब फलक पे यूं

रोशनी मद्दिम सी लगती चाँद तारों में

 

साजिशों की आ रही है हर तरफ से बू

छुप के बैठी हैं खिजाएँ अब बहारों में

 

खेलते जो लोग थे तूफाँ में लहरों से

वक़्त ने उनको धकेला है किनारों में

 

है नहीं महफूज दुल्हन डोलियों में अब

क्या पता अहबाब ही हों इन…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on January 28, 2015 at 2:11pm — 17 Comments

एक व्यथा

रातों के बेच कर ,दिन की रोशनी मैं इज्जत से जिन मज़बूरी हैं मेरी

आत्मा को बेच कर ,चहरे पर ये रौशनी झूठी है मेरी

जिनके आगे रातें लूटी हैं लुटाया है मैंने ,

उन्हें दिन में इज्जत देने वालों की पहली कतार में पाया हैं मैने

रातों ......

वैसे कहने को तो सभ कुछ पाया है मैने ,

पर हकीकत ये है ,सब कुछ लुटाया  हैं मैंने

मेरे आंशुओं की नीलामी लगाई हैं उन्होंने

मेरे मजबूरियों की पूरी कीमत पाई है उन्होंने

रातों....

मुझे चीर…

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Added by Shyam Mathpal on January 28, 2015 at 12:00pm — 14 Comments

जिंदगी

हाथ से यूँ सरसराती सी निकाली जिंदगी
खूब कोशिश की मगर कैसे संभाली जिंदगी


लाख पटके पांव फिर भी जो लिखा था वो हुआ
हर तजुर्बे कर के देखे और खंगाली जिंदगी


जिंदगी की राह में चलते हुए ऐसा लगा
है मरासिम कुछ पुराना देखी भाली जिंदगी


है बड़ी बेबाक सी उज्जड गवारों सी लगी
अब मुझे कितना कचोटे एक गाली जिंदगी

.
मौलिक एवं अप्रकाशित
विजय कुमार मनु

Added by vijay on January 28, 2015 at 9:30am — 11 Comments

घिर आई है शाम

घिर आई है शाम

 

यादें भटके जंगल-जंगल

नींद गई वनवास

अच्छे दिन परदेशी ठहरे

फ़ाग मिलन की आस |

बचपन यादें गहरी रंगी

खेले-कूदे   संग

यौवन की लाल चुनरिया

डूबी पीया के रंग |

नंदे-देवर निकले हरजाई

करें ठिठोली छेड़ |

माघ कली झुलस चली

आन करो ना देर |

कीरत अर्जित करते जाते

तीर्थ है किस धाम

छोड़ो-अपनाओं  दिल से

जब जोड़ा है नाम |

मीरा जैसा जीवन काटा

रुक्मणी बस…

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Added by somesh kumar on January 28, 2015 at 8:50am — 10 Comments

तान्या :फिर मिलना कभी

मैं सोचता था

कि वह खो गया है कहीं

मगर

गुनगुनी धूप से धुली

उस सुबह

एक मोड़ पर

वह अचानक मिला

मैं जानता था

कि वह रुकेगा

वह रुक गया

मैं

यह भी जानता था

कि वह

मुझसे बातेँ करेगा

और वह

मुझ से बातेँ करने लगा

और तभी मैंने चाहा कि

मैं

उन अचानक मिले

कुछ पलों में

वे सारे स्वप्न साकार कर लूं

जो मैंने संजोये थे

मगर

उसके लिए ये पल तो

सिर्फ

कुछ पल थे ,

और वह…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on January 27, 2015 at 11:00pm — 8 Comments

वेंटिलेटर (लघुकथा)

“सुनिए , जरा प्याज काट दीजिये । ”

“देख नहीं रही हो , अभी-अभी थक हार के घर लौटा हूँ ।”

अरे….मैं भी तो आज 5 बजे दफ्तर से आयीं हूँ ।

“हाँ तो कौन सा पहाड़ खोद कर आई हो ।”

“तो तुम ही कौन सा लोहा पिघला रहे थे ?”

“इतना सुनते ही पति ने चप्पल उठा के पत्नी के मुहँ पर दे मारी, पत्नी तमतमा कर आई और पास ही पड़ा जूता उठा कर पति के मुहँ पर जड़ दिया ।”

इधर खबर आ रही थी.. “अभी –अभी , वेंटिलेटर पर पड़ी भारतीय संस्कृति ने दम तोड़ दिया ।”  

© हरि प्रकाश…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 27, 2015 at 10:00pm — 25 Comments

दांव पेंच--

" क्या हुआ सलीम साहब , चेहरा इतना उतरा हुआ क्यूँ है ? कहीं फिर इस बार टिकट का मसला तो नहीं फंस गया "|

" नहीं , कुछ नहीं , बस यूँ ही तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है "| टाल तो दिया उन्होंने लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खाए जा रहा था | पिछली बार भी यही हुआ था , आखिरी समय तक आश्वासन मिलता रहा था कि सीट आपकी पक्की है , इस बार भी उम्मीद नहीं दिख रही |

अगले दिन उन्होंने अख़बारों में खबर छपवा दी " सलीम साहब ने अपनी पार्टी का टिकट ठुकराया "| शाम तक उनको दूसरी पार्टी ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया |…

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Added by विनय कुमार on January 27, 2015 at 8:56pm — 19 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : गैरत (गणेश जी बागी)

शेखर वेश्यावृति पर केन्द्रित एक किताब लिख रहा था, किन्तु उसे पत्रकार समझ इस धंधे से जुड़ी कोई भी लड़की कुछ बताना नहीं चाहती थी, आखिर उसने ग्राहक बन वहाँ जाने का निर्णय लिया.

“आओ साहब आओ, पाँच सौ लगेंगे, उससे एक पैसा कम नहीं”

शेखर ने हाँ में सर हिलाया और उसके साथ कमरे में चला गया.

“सुनो, मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ”

“बाssत ?”

“हां, कुछ सवाल पूछना चाहता हूँ”

“ऐ... साहेब, काहे को अपना और मेरा समय खोटी कर रहे हो, आप अपना…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 27, 2015 at 11:10am — 41 Comments

ग़ज़ल--१२२२--१२२२--१२२२........डराओ मत

१२२२—१२२२—१२२२

उमंगों के चरागों को बुझाओ मत

उजाले को अँधेरों से डराओ मत

 

न फेंको तुम इधर कंकर तगाफ़ुल का            तगाफ़ुल= उपेक्षा

परिंदे हसरतों के यूं उड़ाओ मत

 

उठाकर एड़ियाँ ऊँचे दिखो लेकिन

तुम इस कोशिश में कद मेरा घटाओ मत

 

चले आओ हर इक धड़कन दुआ देगी

सताओ मत सताओ मत सताओ मत

 

सजाओ आइने दीवार में लेकिन

हक़ीक़त से निगाहें तुम चुराओ मत

 

बजाओ तालियाँ पोशाक पर उनकी

मगर उर्यां…

Continue

Added by khursheed khairadi on January 27, 2015 at 10:38am — 26 Comments

ग़ज़ल--ज़हर आकर पिला दे तू

मुहब्बत को निभा दे तू
ज़हर आकर पिला दे तू
....
नज़र से उठ नहीं पाऊँ
मुझे ऐसा गिरा दे तू
....
व़फायें जानता हूँ मैं
नया कुछ तो सिख़ा दे तू
....
मुझे मँझाधार मैं लाकर
मेरी कश्ती हिला दे तू
....
कभी सोचा न हो मैंने
मुझे ऐसा सिला दे तू
....
क़यी मुद्दत से तन्हा हूँ
मुझे मुझसे मिला दे तू
..
..
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित

Added by umesh katara on January 27, 2015 at 10:00am — 29 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रिक्शा वाला -- अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

रिक्शा वाला

************

आपको याद तो होगा

वो रिक्शा वाला

 

गली गली घूमता ,

माइक में चिल्लाता , बताता

आज फलाने टाकीज़ में , फलानी पिक्चर लगी है

पर्चियाँ हवा में उड़ाता

पर्चियों के लिये रिक्शे के पीछे भागते बच्चे

बच्चों को पर्चियाँ छीनते झपटते देख खुश होता

किसी निराश हुये बच्चे को पर्ची कभी अपने हाथों से दे देता

बिना किसी अपेक्षा के , आग्रह के ,

एक जानकारी सब से साझा करता

 

न कोई आग्रह , न…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 27, 2015 at 7:51am — 24 Comments

एक ग़ज़ल

जिंदगी रेत की मानिंद सरक जाती है

ये मेरी जीस्त हरेक गाम लरज जाती है

तू खफा है तो हुआ कर या रब

सामने मेरे फकत माँ ही काम आती है

ये हुस्न ये शबाब ये नामो शौकत

तूँ बता बाद में मरने के किधर जाती है

मेरी किस्मत है जैसे आंधियो में रेत के घर

जब चमकती है सरे राह बिखर जाती है

यूँ हुआ बेवफा मुझी से जहाँ

याद करता हूँ वफ़ा आँख बरस जाती है

अब मेरा दिल है मेरी जां है और बस मैं हूँ

उसको देखूं कभी ये रूह तरस जाती है

अब तो घर चल बहुत ही रात हुई अब तो… Continue

Added by vijay on January 26, 2015 at 10:53pm — 12 Comments

ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२ २१२ २१२

वो वफ़ा जानता ही नहीं
इस खता की सजा ही नहीं


फिर वही रोज जीने की जिद
जीस्त का पर पता ही नहीं


शहर है पागलों से भरा
इक दिवाना दिखा ही नहीं


पूजता हूँ तुझे इस तरह
गो जहां में खुदा ही नहीं


खा गए थे सड़क हादसे
सारे घर को पता ही नहीं


मौलिक व अप्रकाशित


गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on January 26, 2015 at 8:30pm — 20 Comments

अराजक

अराजक(लघुकथा )

“ अरे !भाई ये रिजर्व कैबिन है ,टिकट वालों का कैबिन पीछे है,वहीं जाओ |”-परेड देखने आए युवक को पुलिस वाले ने समझाते हुए कहा

“ यहाँ की टिकट कैसे मिलेगी ?क्या ज़्यादा पैसे लगते हैं ?”

“ क्या तेरा कोई जान-पहचान वाला मिनिस्टर है या मिनिस्ट्री का कोई अफसर |”पुलिस वाला व्यंग्य में मुस्कुराया

“नहीं!”वो मायूस हो गया

“ तो भाई पीछे  जा या घर जाकर टीवी पर देख |”-पुलिस वाला खिसियाते हुए बोला  

“ पर !”उसने उसकी बात काटते हुए कहा

“…

Continue

Added by somesh kumar on January 26, 2015 at 6:30pm — 9 Comments

बन जाए मेरा भाई सूरज, सज जाए मेरी भी डोली

किरणें चित्र उकेरें अँगना, है प्रीत तेरी हमें बांधन निकली 

धरती का मैं लहंगा सिला लूँ, हरियाली की पहनूं चोली

अम्बर की बन जाए ओढ़नी, देखूं फिर नववर्ष रंगोली

तारों की मैं माला गूंथुं, चाँद बने बिंदिया की रोली

बने चांदनी मेरी मेहँदी, सज जाए मेरी भी हथेली

नेह झड़ी की आस लगाए, सुलगी जाए मरी दूब हठीली

सूरज को मैं बांधू राखी, फिर घोलूं किरणों की शोखी

बन जाए मेरा भाई सूरज, सज जाए मेरी भी डोली..... 

केसर रंग में मांग सजाऊं, देख घटा की अलक…

Continue

Added by sunita dohare on January 26, 2015 at 2:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल १२२२--१२२ \ १२२२--१२२ ..तो सो गये हम

थकन से चूर होकर , गिरे तो सो गये हम

जो चलते चलते गाफ़िल , हुये तो सो गये हम

 

हमारी भूख का क्या , हमारी प्यास का क्या

ये अहसासात दिल में , जगे तो सो गये हम

 

शनासा भी न कोई , तो अपना भी न कोई

अकेले थे अकेले , रहे तो सो गये हम

 

हमारी नींद सपने , सजाती ही नहीं है

हक़ीक़त से जहाँ की , डरे तो सो गये हम

 

मनाओ शुक्र तुम हो , गमों से दूर साथी

हमें तुम मुस्कुराते , मिले तो सो गये हम

 

हमारा दर्द…

Continue

Added by khursheed khairadi on January 26, 2015 at 2:00pm — 22 Comments

“भारतीय कुत्ता” (लघुकथा)

“अरे यार ओबामा साहब के रास्ते में कुत्ता आ गया, सुरक्षा व्यवस्था में भयंकर चूक हो गयी, अगर उसमें बम लगा होता तो?”

“कुछ नहीं यार “भारतीय कुत्ता” था, जान दे देता पर ओबामा साहब को कुछ नहीं होने देता, यार देश की इज्ज़त का सवाल था आखिर ।" जय हिन्द !

 

हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

Added by Hari Prakash Dubey on January 26, 2015 at 1:00pm — 29 Comments

जनतंत्र पूर्ण हो जाएगा --- डॉ o विजय शंकर

ये हुकूमतें , ये शान,

ये ऐशो -आराम ,

किस से हैं , किस की बदौलत हैं ,

जिस दिन ये यह अहसास हो जाएगा ,

उस दिन जनतंत्र भी पूर्ण हो जाएगा ॥



बत्तीस रूपये प्रतिदिन में

जिंदगी गुजारने वाले,

किसके बनाये हुए हैं ,

इनकी सोच , इन्होंने ही

एक एक वोट जोड़कर ,

तुझ जैसों को राजा बनाया है ||



महल की ऊपरी आखिरी ईंट तक

बुनियाद की शुक्रगुजार होती है ,

ख्याल कर ,

ये कब से तुझको

इतना ऊंचा उठाये हैं अपने सिर पर ,

इनका तो ख्याल… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 26, 2015 at 11:10am — 19 Comments

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