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पच्चईयाँ ( नाग पंचमी )

तीन दिन पहले से ही 

सच कहूँ तो एक हफ्ते पहले से ही 

पच्चईयाँ (नाग पंचमी) का 

इंतजार रहता था .... 

एक एक दिन किसी तरह 

से काटते हुये 

आखिर, पच्चईयाँ आ ही जाती थी 

पच्चईयाँ वाले दिन 

सुबह ही सुबह 

अम्मा पूरा घर 

धोती थी, हम सब को कपड़े 

पहनाती थी 

सुबह सुबह ही 

गली मे 

छोटे गुरु का बड़े गुरु का नाग लो भाई नाग लो 

कहते हुये बच्चे नाग बाबा 

की फोटो बेचते थे 

हम वो…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 27, 2015 at 7:00am — 6 Comments

अनुभव(लघु कथा, मनन कुमार सिंह)

अनुभव(लघुकथा)
-नहीं।
-क्यों?
-डरती हूँ,कुछ इधर-उधर न हो जाए।
-अब डर कैसा?बहुत सारी दवाएँ आ गयी हैं,वैसे भी हम शादी करनेवाले हैं न।
-कब तक?
-अगले छः माह में।
-लगता है जल्दी में हो।
-क्यों?
-क्योंकि बाकि सब तो साल-सालभर कहते रहे अबतक।
लड़के की पकड़ ढीली पड़ गयी।दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।फिर लड़की ने टोका
-क्यों,क्या हुआ?तेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ है क्या?
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on June 27, 2015 at 12:01am — 4 Comments

बाँसुरी [दोहावली]

बन कान्हा की बाँसुरी, अधरों को लूँ चूम 

रस पी  कान्हा प्यार का ,नशे संग लूँ झूम ।।

 

ऐसा तेरी प्रीत का ,नशा चढ़ा चितचोर

अधर चूम के बाँसुरी ,करे ख़ुशी से शोर ।।

 

बन कान्हा की बाँसुरी, खुद पर कर लूँ नाज 

जन्म सफल होगा तभी ,छू लूँ उसकोआज ।।…

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Added by Sarita Bhatia on June 26, 2015 at 10:36pm — 1 Comment

गजल--मेरी किस्मत के पन्नों में कोई हरकत नहीं दिखती।

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

बहुत दिन हो गये अब भी कहीं राहत नहीं दिखती।

मे'री किस्मत के' पन्नों में को'ई हरकत नहीं दिखती।।

***

सभी मन्दिर में' मस्जिद,चर्च में दिल ले के' भटका हूँ।

किसी मजहब में' दुनिया के मुझे कुदरत नहीं दिखती।।

***

ते'री फुरकत के' तीरों ने किया हैं आश तक घायल।

मुझे अफसोस है तुझको मे'री हालत नहीं दिखती।।

***

सनम इक जख़्म रो रो कर बडी जिद करता' है मुझसे।

कहाँ से ला के' दूँ तुझको इसे गुरबत नहीं दिखती।।

***

हमारी जे़ब में… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on June 26, 2015 at 9:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल : सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

हर एक शक्ल पे देखो नकाब कितने हैं

सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

 

जले गर आग तो उसको सही दिशा भी मिले

गदर कई हैं मगर इंकिलाब कितने हैं

 

जो मेर्री रात को रोशन करे वही मेरा

जमीं पे यूँ तो रुचे माहताब कितने हैं

 

कुछ एक जुल्फ़ के पीछे कुछ एक आँखों के

तुम्हारे हुस्न से खाना ख़राब कितने हैं

 

किसी के प्यार की कीमत किसी की यारी की

न जाने आज भी बाकी हिसाब कितने…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 26, 2015 at 9:16pm — 22 Comments

अखंडित ( लघुकथा )

" आज कैसे याद किया , कोई काम था क्या ?

" नहीं यार , बस यूँ ही तुम्हारी याद आई और चला आया "|

कुछ देर बात चीत चलती रही और फिर वो उठ कर चल दिया | घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा " बात की उनसे , क्या कहा उन्होंने !

" हाँ , कहा तो हैं , देखो क्या होता हैं "|

" जब झूठ बोल नहीं सकते तो क्यों कोशिश करते हो | उनका फोन आया था , कह रहे थे जरूर कोई बात थी लेकिन मुझे बताया नहीं | अभी भी अपने उसूलों का पक्का हैं "|

" देखो तुम्हारे इतना कहने पर मैं चला तो गया था लेकिन कहते नहीं बना | खैर…

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Added by विनय कुमार on June 26, 2015 at 12:44am — 18 Comments

ग़ज़ल - ज़िन्दगी में तुम्हारी लहर मैं पिया

212 212 212 212

 

छोड़ दूँ अब कुंवारा नगर मैं पिया

काट लूँ सँग तुम्हारे सफर मैं पिया

 

मन न माने मगर क्या बताऊँ तुम्हें

साथ दोगे चलूंगी सहर मैं पिया

 

पंखुड़ी खिल गयी राग पाकर कहीं

बेज़ुबां अब न खोलूं अधर मैं पिया

 

मौत का गम नहीं साथ तुम हो मेरे   

मुस्करा के पियुंगी जहर मैं पिया

 

अब तुम्हारे सिवा कुछ न चाहूंगी मैं

दिल मिलाओ मिलाऊं नज़र मैं पिया

 

दूर से देखकर आज रुकना…

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Added by Nidhi Agrawal on June 25, 2015 at 12:01pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुछ कहमुकरियाँ

(१ )

क्रोध बड़ा उसका जहरीला

 मुखड़ा होता नीला पीला

छेड़ूँ तो दिखलाता दर्प

क्या सखि  साजन

ना सखि सर्प    

(२ )

झूम झूम कर मुझे रिझाता  

अपनी ताकत सदा दिखाता  

प्यार करूँ तो बनता साथी

क्या सखि साजन

ना सखि हाथी  

(३ )

हाय मूढ़ की अजब  कहानी  

काटे तो माँगू ना पानी  

क्रोघ करे तो भागे पिच्छू 

क्या सखि साजन

ना सखि बिच्छू   

(४ )

हर दम पानी पीता रहता

एक जगह पर…

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Added by rajesh kumari on June 25, 2015 at 11:15am — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- ये मेरा असर है ( गिरिराज भंडारी )

122    122 

ले, कदमों पे सर है

लो, अब भी कसर है

 

जो मर ही चुके हो

तो अब किसका डर है

 

नहीं ख़त्म होगा

ये मेरा असर है

 

नहीं कोई मंज़िल

महज़ रह ग़ुज़र है

 

तो घर में ही बैठो

अगर तुमको डर है

 

लिखे शह्र जिसको

हमें वो शहर है

 

नहीं है जो कड़वा

वो मीठा ज़हर है

 

लो, अन्धों से  सुन लो 

कहाँ रह गुज़र है

****************

मौलिक एवँ…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 8:58am — 29 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - फिल बदीह -- खार सीने से लगाता कौन है ( गिरिराज भंडारी )

2122      2122    212 

छोड़िये , हमको बुलाता कौन है

खार सीने से लगाता कौन है

आप हैं गमगीन , खुद रोते रहें

अब यहाँ कन्धा बढाता  कौन है

 

हाथ अंगारों में रख कहते हैं वो

हमसा खुद को आजमाता कौन है

 

सोई खोई बस्ती की तनहाई में

ग़ज़ले-ग़ालिब गुनगुनाता कौन है

  …

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Added by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 8:30am — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - फिल बदीह -- हमारा यक़ीं चाँद से उठ गया ( गिरिराज भंडारी )

122   122   122  12

 

अँधेरों के मित्रो,  हवा दीजिये

मै जलता दिया हूँ बुझा दीजिये

 

लिये आइना सब से मिलता रहा

सभी अब मुझे बद्दुआ दीजिये

 

हमारा यक़ीं चाँद से उठ गया

हमे जुगनुओं का पता दीजिये

 …

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Added by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 8:00am — 25 Comments

गर्मी बहुत है

सुनो, 

गर्मी बहुत है 

अपने अहसासों की हवा 

को जरा और बहने दो 

यादों के पसीनों को 

और सूखने दो 

सुनो, 

गर्मी बहुत है 

गुलमोहर के फूलों 

से सड़कें पटी पड़ी हैं 

ये लाल रंग 

फूल का 

सूरज का 

अच्छा लगता है 

अपने प्यार की बरसात को 

बरसने दो 

बहुत प्यासी है धरती 

बहुत प्यासा है मन 

भीग जाने दो 

डूब जाने दो 

सुनो,

गर्मी बहुत है .... 

Added by Amod Kumar Srivastava on June 25, 2015 at 7:20am — 5 Comments

शक -- एक कश्मकश (लघुकथा )

तैयार होकर रीता आॅफिस के लिए निकलने ही वाली थी कि नील कह उठे कि आज वो ही उसे आॅफिस छोड़ आयेंगे ।

उसे समझते देर ना लगी कि , आज फिर नील पर शक का दौरा पड़ चुका है ।

थे तो वे आधुनिक व्यक्तित्व के धनी ही । पत्नी का कामकाजी होना , उनकी उदारता का परिचय है समाज में । इसी कारण वे स्त्री विमर्श के प्रति बेहद उदार मान पूजे जाते है समाज में ।

"मै चली जाऊँगी , आप नाहक क्यों परेशान होते हो ! आपके आॅफिस का भी तो यही वक्त है । " - उसके आँखों में दुख से आँसू छलछला आये ।

"क्यों , तुम मुझे…

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Added by kanta roy on June 25, 2015 at 7:00am — 16 Comments

खार रचता आदमी.....

गज़ल....खार रचता आदमी....

बह्र... 2122   2122   212

खुद को खुद से कब समझता आदमी.

जीत  कर  जब  हार  कहता  आदमी

मौन  में  संजीवनी  तो  है  मगर

मैं हुआ कब चुप अकडता आदमी.

आस्मां के पार भी खुशियां  दुखी,

हर कदम पर शूल सहता आदमी.

फूल-कलियां मुस्कराती हर समय,

देवता  को    भेंट   करता   आदमी.

आदमी  ही  आदमी  को  पूजता,

आचरण पशुता अखरता आदमी.

प्यार  में   सम्वेदना  …

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 24, 2015 at 8:17pm — 14 Comments

मत्तगयन्द सवैया...

मत्तगयन्द सवैया // सात भगण + दो गुरू

बालक बुद्धि यही समझे, अखबार सुधार किया करते हैं।
जूठन खीर न दूध गिरे, इस हेतु बिछा भुइ को ढकते है।।
आखर-आखर कालिख ही, मन सोच-विचार भली कहते हैं।
मानव नित्य प्रलाप करे, अखबार प्रशासन ही छलते हैं।।

के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 24, 2015 at 7:08pm — 4 Comments

पुष्प अधखिले : हरि प्रकाश दुबे

पुष्प अधखिले : हरि प्रकाश दुबे

 

ओस की बूंदों में भीग कर

श्रृंगार नया मन रूप का कर

सूरज की रोशनी में चमकते हुए

खूब इठलाते हैं, पुष्प अधखिले !

 

मंदिर- मज़ार में चढाए जाते है

प्रभु चरणों मै अर्पित हो कर

मन में एक विश्वाश जगा

फूले नहीं समाते हैं, पुष्प अधखिले ! 

 

प्रिय को समर्पण की चाह में

किताबों में रख दिए जाते है

प्रेम के इज़हार और इंतज़ार में

सूख कर भी मुस्कराते हैं, पुष्प अधखिले…

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Added by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 4:50pm — 8 Comments

संशोधित दोहे :...........

संशोधित दोहे :



कर्म बिना मेवा नहीं, बिन मान नहीं शान

विधवा सी लगती सदा,सुर बिन जैसे तान

पैसा  काम न  आयेगा, जब आएगा काल

रह  जाएगा  सब यहीं , काहे  करे  मलाल

काया माया का  भला , काहे  करे   गुमान

नश्वर ये संसार है , क्षण भर का अभिमान

ममता को बिसरा दिया ,भूल गया हर फ़र्ज़

चुका  न  पाया  दूध का , जीवन में वो क़र्ज़

मानव  दानव  बन  गया, किया खूब संहार

पाप  कर्म से  कर  लिया,  पापी  ने…

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Added by Sushil Sarna on June 24, 2015 at 4:30pm — 18 Comments

हरा देगा

दवा है दर्द की कह कर पिला देगा मुझे कोई

गिरा कर अश्क फिर अपने बहा देगा मुझे कोई

सिख़ाओ मत मुझे जीना न है अब जिन्‍दगी प्‍यारी

दिखा कर प्‍यार के सपने जला देगा मुझे कोई

गमो की राह अच्‍छी है न आता पास दुश्‍मन भी

डगर सुख की चले तो बददुआ देगा मुझे कोई

निराले खेल दुनिया के कभी खेला अगर मैने

न दोगे साथ मेरा तो हरा देगा मुझे कोई

न है हर फूल में काँटे हमेशा सोचता हूँ मै

न बदला सोच अपना तो मिटा देगा मुझे…

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Added by Akhand Gahmari on June 24, 2015 at 3:57pm — 10 Comments

गुरू वंदन अभिनंदन

तुम महान

अद्भुत स्वप्नद्रष्टा

स्वप्न कैसा

साकार किया है

व्यास प्रकाश

पुंज से अपने

जीवन का

महाकाव्य दिया है

तमस तम को

काट ज्ञान से

शुभ्र अमर

संदेश दिया है

तुम दूर दृष्टा हो

मै अज्ञानी

जन्म साकार

यह मूर्त दिया है

मस्तक पर तुम

चंदन हो स्वामी

यह हमने

स्वीकार किया है

तुम मेरे गुरू

गोविंद ब्रह्मज्ञानी

तुममें ईश्वर का

साक्षात्कार किया है







कान्ता राॅय…

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Added by kanta roy on June 24, 2015 at 10:30am — 7 Comments

लघुकथा- तकनीक

लघुकथा – तकनीक

बिना मांगे ही उस ने गुरु मन्त्र दिया, “ आप को किस ने कहा था, भारी-भारी दरवाजे लगाओं. तय मापदंड के हिसाब से सीमेंट-रेत  मिला कर अच्छे माल में शौचालय बनावाओं. यदि मेरे अनुसार काम करते तो आप का भी फायदा होता ?” परेशान शिक्षक को और परेशान करते हुए पंचायत सचिव ने कहा , “ बिना दक्षिणा दिए तो आप का शौचालय पास नहीं होगा. चाहे आप को १०,००० का घाटा हुआ हो.”

“ नहीं दूं तो ?”

“ शौचालय पास नहीं होगा और आप का घाटा ३५,००० हजार हो जाएगा. इसलिए यह आप को…

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Added by Omprakash Kshatriya on June 24, 2015 at 8:30am — 13 Comments

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