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April 2016 Blog Posts

ग़ज़ल (जख्म फिर से हरा हो गया)

जख्म फिर से हरा हो गया

दर्द -ए -दिल आइना हो गया

.

याद ऐसा किया देख कर

सोच के बाबरा हो गया

.

काम के नाम ने चोट की

दिल बचा दिल जला हो गया

.

नींद का आँख से रूठना

रोज़ का सिलसिला हो गया

.

फीस में छूट थी जो मिली

लाडला फिर बड़ा हो गया

.

दाद दो तुम जरा इसलिए

गिर के वो खड़ा हो गया

.

खेल की पोल थी जब खुली

फिर मज़ा किरकिरा हो गया

.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

मुनीष…

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Added by munish tanha on April 21, 2016 at 3:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल (एक प्रयास) // रवि प्रकाश

बहर-SISS SISS SISS SISS



पंथ का आलोक हो गंतव्य का आधार हो तुम।

श्वास का संगीत मधुमय चेतना का द्वार हो तुम।।

प्राण भरते हो हृदय की मौनधर्मी धड़कनों में,

मोहता जो मन अहर्निश स्वप्न वो साकार हो तुम।

भोर की मृदु लालिमा की ओसकण से भेंट जैसे,

कुमुदिनी पे रीझते भ्रमरों का मंत्रोच्चार हो तुम।

मत्त पावस की झड़ी में हो शिखी के नृत्य निश्छल,

कोकिला की रागिनी के उल्लसित उद्गार हो तुम।

सांध्य वेला में हठीली दीपमाला से प्रकाशित,

घन तमस में कौमुदी का विश्व… Continue

Added by Ravi Prakash on April 21, 2016 at 3:23pm — 2 Comments

बंद कोठरी की ज़िन्दगी (कविता)

वो बंद घरों की खुली आशाएं
अपनी उम्र से कहीं आगे जाती हुई
अपने देह पर सभ्य समाज की कतरन ओढ़े
देखती हैं खिड़की से बदनाम दुनियां
इशारों में पास बुलाने की मज़बूरी
देह पर निशाँ छुडवाने की…
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Added by kumar gaurav mishra on April 21, 2016 at 1:27pm — No Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मौत ही रास्ता नहीं होता (ग़ज़ल 'राज ')

२१२२ १२१२ २२

हुस्न गर  बावफ़ा नहीं होता,

दिल कभी आशना नहीं होता

 

खेलना दिल से तोड़ देना फिर

ये कोई  कायदा नहीं होता

 

दिल्लगी से हुए तमाशे का

हर कहीं तज़करा नहीं होता

 

जान पाता कभी नहीं उसको

,मैं अगर आइना नहीं होता 

 

मार देती ये तिश्नगी मुझको,

काश ये मयकदा नहीं होता

 

मुश्किलों से निजात पाने को,

मौत ही रास्ता नहीं होता

 

छेड़ता वो न बारबार इसको,

जख्म मेरा…

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Added by rajesh kumari on April 21, 2016 at 11:18am — 8 Comments

कविता-प्रियतम की याद में

प्रियवर! अब तुम आन मिलो ।

सच में अब तुम आन मिलो ।।



तुम बिन भटकूँ मै बन पगली ।

हुई जिन्दगी जल बिन मछली ।।

रात चाँदनी आये जब-जब ।

मन की अगन बढ़ाये तब-तब ।।

दिन का दूजा नाम उदासी ।

हुई तिहाई तन से दासी ।।

नैना हर पल बाट तके हैं ।

विरह वेदना सह न सके हैं ।।

पर यादों में आते जब तुम ।

मन को बड़ा रिझाते तब तुम ।।

किन्तु चेतना लौटे ज्योंही ।

बिलख हृदय रो बैठे त्योंही ।।

नैन धैर्य खो देते हैं तब ।

अश्रु कपोल धो देते हैं तब… Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 21, 2016 at 10:37am — 2 Comments

ग़ज़ल ( आसरा ढूंढने किधर जाए )

2122 1212 22

उनकी नज़रों से जो उतर जाए |

आसरा ढूंढ़ने  किधर  जाए |

कर लिया है यक़ीन उनपे मगर

डर  है यह भी न वो मुकर जाए |

जो ज़ुबां कर न  पाए उल्फ़त में

आँख चुप चाप उसको कर जाए |

भीड़ आए नज़र क़ियामत सी

शोख़ उनकी नज़र जिधर जाए |

मिल गया जब खिताबे दीवाना

उनके कूचे से कौन घर जाए |

जिसके घर का पता नहीं कोई

कैसे उस तक कोई ख़बर जाए |

दिन में तस्दीक़ आए रात…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 20, 2016 at 9:00pm — 14 Comments

आहट

क्या कहा जो सुना नहीं

आँखों ने पढ़ लिया होगा

कह न सके वो जो बातें

आँखो ने पढ़ लिया होगा।



दूर दराज से आया कोई

अपनों ने जान लिया होगा

खो गया था जो उस जहाँ में

अपनों ने पा लिया होगा।



स्वप्न सा अँधेरे को वो

चीर कर वहाँ से जब आया

निशाँ अपने छोड़ कर वो

फिर अपनी दुनिया में गया होगा।



यादें है या है आहट उनकी

किसी ने तो यह जाना होगा

दिल से पूछा जब यह उसने

उसका दिल भी क्या वहाँ धड़का होगा।



(मौलिक एवं…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 20, 2016 at 9:00pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
चाहत की रस्म हमने निभाई कुछ इस तरह...ग़ज़ल// प्राची

2212,121,122,1212

पल में हुई मैं खुद से पराई कुछ इस तरह

थामी उन्होंने हाय! कलाई कुछ इस तरह



नस-नस में सिहरने हैं, निगाहों में है सुरूर

साँसों में उनकी याद समाई कुछ इस तरह…

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Added by Dr.Prachi Singh on April 20, 2016 at 3:47pm — 5 Comments

अच्छे दिन

अच्छे दिन की यही तो शुरुआत है

सब बिज़ी ही रहें,खुशनुमा बात है

बात तन्हाइयों की चलाना नही

सब अंधेरे हो रुखसत, तो क्या बात है!!

झटका बिजली का अबतक तो खाया नही

रोशनी है मुसलसल,बड़ी बात है

जिन्दगी के सबब, वे सिखाने चले

जो जिये ही नही,क्या अज़ब बात है

मुफलिसी जिन्द़गी की अमानत सही

नूर झांका कमश्कम शुरुआत है

फालतू जिन्दगी यूँ ही ढोते रहे

एक मिशन अब मिला, खुशनुमा बात है

संगदिल बिन हुये सब चलें संग संग

आज सूरज से अपनी मुलाकात है

रोशनी हाथ…

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Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on April 20, 2016 at 10:39am — No Comments

ग़ज़ल : पुल की रचना वो करते जो खाई के भीतर जाते हैं

बह्र : 22 22 22 22 22 22 22 22

 

वो तो बस पुल पर चलते जो गहराई से घबराते हैं

पुल की रचना वो करते जो खाई के भीतर जाते हैं

 

जिनसे है उम्मीद समय को वो पूँजी के सम्मोहन में

काम गधों सा करते फिर सुअरों सा खाकर सो जाते हैं

 

धूप, हवा, जल, मिट्टी इनमें से कुछ भी यदि कम पड़ जाए

नागफनी बढ़ते जंगल में नाज़ुक पौधे मुरझाते हैं

 

जिनके हाथों की कोमलता पर दुनिया वारी जाती है

नाम वही अपना पत्थर के वक्षस्थल पर खुदवाते…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 10:05pm — 4 Comments

ज़िंदगी डूब जाती है ....

ज़िंदगी डूब जाती है ....

ऐ बशर !

इतना ग़रूर अच्छा नहीं

ये दौलत का सुरूर अच्छा नहीं

साया तेरे करमों का

हर कदम तेरे साथ है

कुछ दूर तक दिन है

फिर लम्बी अंधेरी रात है

रातों में साये भी रूठ जाते हैं

दिन के करम

तमाम शब सताते हैं

शब की तारीकियों में

अहम के पैराहन

जिस्म से उतर जाते हैं

ज़न्नत और दोज़ख

सब सामने आ जाते हैं

बशर ख़ाके सुपुर्द हो जाता है

लाख चाहता है

फिर लौट नहीं पाता है

फिर न कोई रहबर होता…

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Added by Sushil Sarna on April 19, 2016 at 9:48pm — 4 Comments

चेहरा तेरा चाँद का टुकड़ा

चेहरा तेरा चाँद का  टुकड़ा

भौहें तनी कमान हैं क्या

इन आँखों में मैं मर जाऊँ

होंठों का तिल शान है क्या..2

तेरे तन की ख़ुशबू लेकर

फूल चमन में खिलते हैं

शायर तेरे हुशनो जवाँ की

दिल में किताबें लिखते हैं

उठी नज़र फिर झुक जाए तो

ढल जाती ये शाम है क्या

इन आँखों पे ...

तेरे लबों की बात करूँ तो

खिले कमल शर्माते हैं

तेरे क़दम जो पड़े जमी पे

शहंशाह झुक जाते हैं

तेरा खनकता स्वर गूंजा या

वीना की कोई तार है…

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Added by Amit Tripathi Azaad on April 19, 2016 at 6:14pm — No Comments

घूरे के दिन भी संवरते ...एक दिन

घूरे के दिन भी संवरते ....

 

ज़िंदगी जो आज है

वह कल थी

किसी घूरे पर पड़ी मल

गंध से कराहती.

कोई पूंछने को न आता

सितारे दूर से निकल…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 19, 2016 at 5:30pm — No Comments

मेरे सपनों का गाँव

मेरे सपनों में अक्सर ही

आकर मुझे जागता है

गाँव मेरा मुझको फिर यारों

वापस मुझे बुलाता है

वो खलिहानों की पगडंडी

सड़क बन गई काली है

दीपक भी अब नहीं रह गए

लाइट चमक निराली है

जिनके ख़ातिर दूर गया तू

वो सब मुझे दिखाता है

गाँव मेरा ....

मिट्टी के घर नहीं रहे अब

ईंटों के माकान बने

निर्मल निश्चल दिल वाले

अब पत्थर के इंसान बने

दिन प्रति दिन उन पत्थर में

इंसान नज़र ना आता है

गाँव...

हरे भरे तालाब सूखकर खेलों के…

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Added by Amit Tripathi Azaad on April 19, 2016 at 1:09pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वो जो तेरे काम का होता नहीं- ग़ज़ल

2122 2122 212

वो जो तेरे काम का होता नहीं

उससे तेरा वास्ता होता नहीं



राह कोई गर मिली होती मुझे

अपने अंदर गुम हुआ होता नहीं



अपने लोगों में रहा होता जो मै

तो सरे महफ़िल लुटा होता नहीं



लग रहा है हादसों को देखकर

यूँ ही कोई हादसा होता नहीं



खुद पे काबू रखना मुझको आ गया

रात भर अब ‘जागना’ होता नहीं



चन्द शर्तों से बँधा है आदमी

अब कोई दिल से जुड़ा होता नहीं



वो सफ़र है ज़िन्दगी जिसमें ‘शकूर’

वापसी का… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on April 19, 2016 at 9:36am — 5 Comments

ग़ज़ल -- "मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ" बशीर साहब की ज़मीन में एक कोशिश। ( दिनेश कुमार )

11212--11212--11212--11212



लो गुनाह और सवाब की, मैं ये रहगुज़ार बुहार लूँ

या तो खुद को कर लूँ तबाह मैं , या हयात अपनी सँवार लूँ



तू हर एक शै में समाया है...के वो ज़र्रा हो या हो आफ़ताब

मेरी बन्दगी है यही ख़ुदा, के मैं खुद में तुझ को निहार लूँ



मुझे माँगने में हिचक नहीं, न वो नाम का ही रहीम है

जो लिखा न मेरे नसीब में.. उसे मैं ख़ुदा से उधार लूँ



मेरी साँस साँस तड़फ रही, तेरी इक नज़र को मिरे ख़ुदा

मुझे अपने पास बुला या फिर,मैं तुझे… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 17, 2016 at 8:52am — 6 Comments

कन्या दान

कन्या दान के बाद से बिदाई तक लगातार रोती रही । रोते रोते सोफे पर बेसुध सी पडी़ रही।सभी बिदाई में व्यस्त जो थे।

दादा जी ने गोदी में उठाया,"उठ बिट्टो खाना खा ले, बुआ तो गई।"

तुनक कर गुस्से से बोली "नहीं कुछ नहीं खाउंगी आपने मेरी कल्लो बुआ और लाली बछिया दोनों को दान में दे दिया।बुआ को दूल्हा अपने साथ ले गया।"

"बुआ की शादी हुई है बिट्टो,बे तुम्हारे फूफा जी है।"

"कोई फूफा जी नहीं, मैं और बुआ दोनों रोते रहे फिर भी बुआ को साथ ले गए।"

"अगले हफ्ते ले आयेगे बुआ को।"

"अब…

Continue

Added by Pawan Jain on April 17, 2016 at 7:30am — 5 Comments

ग़ज़ल

22 22 22 22

मुझसे रोज़ कहा करता है।
दिल में इक दरिया रहता है।।

बे मौसम बारिस भी होगी।
आँखों का काज़ल कहता है।।

सूरज शायद गुस्से में है।
गर्मी में ज्यादा तपता है।।

उसकी भी मज़बूरी होगी।
अंदर ही अंदर घुटता है।

मुझको पूछ रहा था वो।
आँखों से ये क्या बहता है।।

राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 16, 2016 at 2:25pm — 2 Comments

पुल बने हैं कागजों पर कागजों पर ही नदी -ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

खोटा सिक्का हो गया है आज अय्यारों का फन

हर तरफ  छाया  हुआ है  आज बाजारों का फन

कर रही है अब समर्थन पप्पुओं की भीड़ भी

क्या गजब ढाने लगा है आज गद्दारों का फन

हौसला  देते  जरा  तो  क्या  गजब  करती  सुई

आजमाने में लगे सब किन्तु तलवारों का फन

पुल  बने  हैं  कागजों  पर  कागजों पर ही नदी

क्या गजब यारो यहा आजाद सरकारों का फन

पास जाती नाव है जब साथ नाविक छोड़ता

आपने देखा न होगा यार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 16, 2016 at 11:21am — No Comments

ग़ज़ल -- ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की ( दिनेश कुमार )

1212--1122--1212--22





ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की

ग़मों ने राह दिखाई .........शराबख़ाने की



चराग़े--दिल ने की हसरत जो मुस्कुराने की

तो खिलखिला के हँसी आँधियाँ ज़माने की



मैं शायरी का हुनर जानता नहीं ....बेशक

अजीब धुन है मुझे क़ाफ़िया मिलाने की



वजूद अपना मिटाया किसी की चाहत में

बस इतनी राम कहानी है इस दिवाने की



वो घोसला भी बनाएगा बाद में ...अपना

अभी है फिक्र परिन्दे को आबो-दाने की



मैं अश्क बन… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 15, 2016 at 6:08pm — 4 Comments

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