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ग़ज़ल नूर की -वो कहता है मेरे दिल का कोना कोना देख लिया

वो कहता है मेरे दिल का कोना कोना देख लिया

तो क्या उस ने तेरी यादों वाला कमरा देख लिया?

.

वैसे उस इक पल में भी हम अपनों ही की भीड़ में थे

जिस पल दिल के आईने में ख़ुद को तन्हा देख लिया.

.

उस के जैसा दिल तो फिर से मिलता हम को और कहाँ

सो हमने इक राह निकाली, मिलता जुलता देख लिया.

.

मैख़ाने में एक शराबी अश्क मिलाकर पीता है

यादों की आँधी ने शायद उसे अकेला देख लिया.

.

महशर पर हम उठ आए उस की महफ़िल से ये कहकर

तेरी दुनिया तुझे मुबारक़!…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 14, 2020 at 5:30pm — 15 Comments

हिन्दी दिवस पर कुछ दोहे :

हिन्दी दिवस पर कुछ दोहे :
हिन्दी हिन्दुस्तान के,माथे का सरताज।
जन-जन की ये आत्मा,हर मन की आवाज।।१
अपने मन की कीजिये, निज भाषा में बात।
सहज सरल प्यारी लगे,…
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Added by Sushil Sarna on September 14, 2020 at 2:00pm — 8 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हिंदी-दिवस : चार दोहे // सौरभ


दिन भर का उत्साह है, पन्द्रह दिन का प्यार
हिंदी हित कुछ झूठ-सच, कुछ भावुक उद्गार ..

 

सरकारी है घोषणा, सजे-धजे हैं मंच
'हिंदी भाषा राष्ट्र की', दिन भर यही प्रपंच

 

'हिंदी-हिंदी' कर सभी, बजा रहे निज गाल
हम भकुआए देखते.. 'हिंदी-दिवस' उबाल

 

माँ-बोली को जानिए ज्यों माता का प्यार
फिर हिंदी की बाँह धर.. सीखें जग-व्यवहार !
***
(मौलिक और अप्रकाशित) 

Added by Saurabh Pandey on September 14, 2020 at 10:11am — 6 Comments

बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कहने को जिसमें यार हैं अच्छाइयाँ बहुत

पर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत।१।

**

सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफ

सुनते हैं उस  को  भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत।२।

**

कैसे कहें कि गाँव को दीपक है मिल गया

उससे ही लम्बी  रात  की परछाइयाँ बहुत।३।

**

पाँवों तले समाज को करके बहुत यहाँ 

चढ़ता गया है आदमी ऊँचाइयाँ बहुत।४।

**

बैठी हैं  घर  किये  वहाँ  अब  तो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 14, 2020 at 7:30am — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत : अमावस की कविता (गणेश बाग़ी)

सुबह-सुबह

सूरज को देखा

बहुत ही सुंदर

फूलों को देखा

बहुत ही प्यारे

रंग बिरंगी तितलियों को देखा

हृदय हुआ प्रफुल्लित…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 13, 2020 at 1:30pm — 7 Comments

मातृभाषा हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा, हिंदी जीवन का आधार ।

हिंदी की महिमा को गाते,करते हम इसका प्रचार ।।

हिंदी के बिना जीवन सूना,हिंदी देती सबको ज्ञान ।

मन के भाव प्रकट हों सारे, पूरे करती ये अरमान ।

मातृभाषा की महिमा देखो, सुनकर होता है अभिमान ।

कोर्ट कचहरी दफ्तर सारे, बाबू कलेक्टर चौकीदार ।

हिंदी की महिमा........................................... ।

माँस से नाखून दूर ना जाएँ, कौए चलें ना हंस की चाल ।

हिंदी के सब रंग में रंग लो, अपनी…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 13, 2020 at 11:30am — 3 Comments

वो बीता हुआ बचपन

  • वो बीता हुआ बचपन , कहां से लाऊं? ना आज की चिन्ता , ना कल की फिकर, हरदम हरपल बस खुल के मुस्कुराऊं।। खेलूं कूदूं और जी भर के खाऊं। बीमारी के डर को, मैं भूल जाऊं।। स्कूल से घर और घर से स्कूल। के रास्ते भर दोस्तों से, जी भर बतियाऊं।। कभी रूठूं ,कभी मटकूं , नाज नखरे दिखाऊं। मम्मी से हर जिद, अपनी मनवाऊं।। वो ममता के आंचल में, जाकर छुप जाऊं। जिम्मेदारियों से कुछ पल, निजात मैं पाऊं।। नीता तायल मौलिक और अप्रकाशित

Added by Neeta Tayal on September 12, 2020 at 11:02pm — 5 Comments

यार जब लौट के दर पे मेरे आया होगा

2122 1122 1122 22

***

यार जब लौट के दर पे मेरे आया होगा,

आख़िरी ज़ोर मुहब्बत ने लगाया होगा ।

याद कर कर के वो तोड़ी हुई क़समें अपनी,

आज अश्कों के समंदर में नहाया होगा ।

ज़िक्र जब मेरी ज़फ़ाओं का किया होगा कहीं,

ख़ुद को उस भीड़ में तन्हा ही तो पाया होगा ।

दर्द अपनी ही अना का भी सहा होगा बहुत,

फिर से जब दिल में नया बीज लगाया होगा ।



जब दिया आस का बुझने लगा होगा उसने,

फिर…

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Added by Harash Mahajan on September 12, 2020 at 6:00pm — 12 Comments

कब धरती का दुख समझे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

जिनके धन्धे  दोहन  वाले  कब  धरती का दुख समझे

सुन्दर तन औ' मन के काले कब धरती का दुख समझे।१।

**

जिसने समझा थाती धरा को वो घावों को भरता नित

केवल शोर  मचाने  वाले  कब  धरती का दुख समझे।२।

**

ताल, तलैया, झरने, नदिया इस के दुख में सूखे नित

और नदी सा बनते नाले  कब धरती का दुख समझे।३।

**

पेड़ कटे तो बादल  रूठा  और  हवाएँ  सब झपटीं

ये सड़कों के बढ़ते जाले कब धरती का दुख समझे।४।

**

नित्य सितारों से गलबहियाँ उनकी तो हो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 12, 2020 at 5:58am — 6 Comments

जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

122 122 122 12

जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं
समझते हैं हम वो भी इंसान हैं

न हिंदू न यारो मुसलमान हैं
यहाँ सबसे पहले हम इंसान हैं

खु़दा कितने हैं ,कितने भगवान हैं
यही सोचकर लोग हैरान हैं

नहीं उनको हमसे महब्बत अगर
हमारे लिये क्योंं परेशान हैं

रिहा कर मुझे या तू क़ैदी बना

तेरे हैं क़फ़स तेरे ज़िंदान हैं

*मौलिक एवं अप्रकाशित.

Added by सालिक गणवीर on September 11, 2020 at 5:30pm — 11 Comments

आजकल खुद से हमारी पट रही है - गजल

मापनी २१२२ २१२२ २१२२ 

ज़िंदगी अच्छी तरह अब कट रही है, 

आजकल खुद से हमारी पट रही है. 

 

लूट कर वो ले गई  है दिल हमारा, 

झूलती रुखसार पर जो लट रही है. 

 

हाल पूछा जो हमारा आज उसने, …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 11, 2020 at 5:00pm — 9 Comments

सितारे लौंग से कमतर नयन मृग से भी अच्छे हैं -गजल

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



अकेलेपन को भी हमने किया चौपाल के जैसा

बचा लेगा दुखों में  ये  हमें  फिर ढाल के जैसा।१।

**

भले ही दुश्मनी कितनी मगर आशीष हम देते

कभी दुश्मन न देखे बीसवें इस साल के जैसा।२।

**

इसी से है जगतभर में हरापन जो भी दिखता है

हमारे मन का सागर  ये  न  सूखे ताल के जैसा।३।

**

सितारे अपने भी जगमग न कमतर चाँद से होते

अगर ये भाग्य भी  होता  चमकते भाल के…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2020 at 7:42pm — 2 Comments

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन

2122 1122 1122 22(112)

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन,

पास दौलत है तो उसकी है ये दौलत दुश्मन ।

दोस्त इस दौर के दुश्मन से भी बदतर क्यूँ हैं,

देख होती है मुहब्बत की हकीकत दुश्मन ।

माँग लो जितनी ख़ुदा से भी ये ख़ुशियाँ लेकिन,

हँसते-हँसते भी हो जाती है ये जन्नत दुश्मन ।

मैं बदल सकता था हाथों की लकीरों को मगर,

यूँ न होती वो अगर मेरी मसर्रत दुश्मन ।

ऐसे इंसानों की बस्ती से रहो दूर जहॉं,

'हर्ष' हो…

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Added by Harash Mahajan on September 8, 2020 at 11:00pm — 11 Comments

श्राद्ध

"सुनो !! आज दो लीटर दूध और लेकर आना , बाबूजी का श्राद्ध करना है," ममता ने अपने पति रोहन से कहा ।

"ठीक है, ले आऊंगा," ये कहकर रोहन दूध लेने चला गया। 

"चलो सोनू बेटा जल्दी करो! आज पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराना है ;फटाफट नहा कर आओ! क्योंकि श्राद्ध तुम्हारे हाथ से होगा,"ये कहते हुए वो रसोई में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने में व्यस्त हो गई। 

"मम्मा ये श्राद्ध हम क्यों कर रहे हैं ?" सोनू ने पूँछा। 

"ये करने से तुम्हारे दादू हमें आशीर्वाद देंगे," हमारे घर में सम्पन्नता…

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Added by Madhu Passi 'महक' on September 8, 2020 at 12:00pm — 5 Comments

हिन्दी बोलने में ना सकुचेंगे

"हिन्दी बोलने में ना सकुचेंगे"

हिन्दी मातृभाषा है मेरी,

फिर क्यूं बोलने में शरमाऊं।

पट पट पट पट अंग्रेजी बोलना,

क्यूं ही मैं हरदम चाहूँ।।

हिन्दी बोलूं तो गंवार लगूं,

जो अंग्रेजी बोलूं तो शान।

क्यूं हम हिन्दी होकर भी,

नहीं करते हिन्दी का सम्मान।।

विदेशी भारत आकर भी,

इंग्लिश में ही बातें करता।

फिर भारतीय विदेश में जाकर ,

क्यूं हिन्दी बोलने में है कतराता ।।

गीता का उपदेश भी कृष्ण ने ,

हिन्दी में ही सुनाया है।…

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Added by Neeta Tayal on September 8, 2020 at 10:00am — 4 Comments

बिना दिल के ......

बिना दिल के ......

लहरों से टकराती

हवाओं से उलझती कश्ती को

आख़िरकार

किनारा मिल ही गया

मगर

अभी तो उसे जीना था

वो समंदर

ज़िंदा थीं जिसमें

उसकी बेशुमार ख्वाहिशें

उसके साथ जीने की

लगता था

उसके बिना

रेतीले किनारों पर

मेरा बदन मृत सा पड़ा जी रहा था

इस आस में

कि मेरा समंदर

मुझे नहीं छोड़ेगा

इन रेतीले किनारों में

दफन होने के लिए

वो जानता है

बिना दिल के भी

कहीं ज़िस्म…

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Added by Sushil Sarna on September 7, 2020 at 7:30pm — 8 Comments

अपना द्वार खुला अलबत्ता.- ग़ज़ल

मापनी २२ २२ २२ २२ 

है जिनके हाथों में सत्ता. 

उनका हर दिन बढ़ता भत्ता. 

छोड़ दिया जिसको डाली ने, 

इधर-उधर उड़ता वह पत्ता.

कीमत भारी होनी ही थी,

था पुस्तक पर…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 7, 2020 at 3:30pm — 12 Comments

क्या जाने किस जनम का सिला दे गया मुझे..( ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

क्या जाने किस जनम का सिला दे गया मुझे

था बेगुनाह फिर भी सज़ा दे गया मुझे

कैसे यक़ीन कीजिए ग़ैरों की बात का

समझा था जिसको अपना दगा दे गया मुझे

लम्बी हो उम्र मेरी दुआ मांँगता रहा

मरने की मुफ़्त में जो दवा दे गया मुझे

उसके इशारों को मैं समझ ही नहीं सका

गूंँगा था आदमी जो सदा दे गया मुझे

ग़ज़लें पुरानी ले गया आया था ख़्वाब में

इनके इवज में घाव नया दे गया मुझे

भीगा था जिस्म…

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Added by सालिक गणवीर on September 6, 2020 at 10:00pm — 18 Comments

बोलो मैं कैसे बिकता

एक गजल तेरे होठों पर लिख सकता था

इसकी टपक रही लाली पर बिक सकता था

किंतु सामने जब शहीद की पीर पुकारे

जान वतन पर देने वाला वीर पुकारे

जिसने भाई, लाल, कंत कुर्बान किये हों

सूख चुकी उनकी आँखों का नीर पुकारे

कैसे उन क़ातिल मुस्कानों पर बिकता

कैसे कोमल नाजुक होठों पर लिखता



एक गजल तेरी आँखों पर लिख सकता था

चंचल चितवन सी कमान पर बिक सकता था

पर कौरव-पांडव दल आँखें मींच रहा हो

चीर दुःशासन द्रुपद-सुता की…

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Added by आशीष यादव on September 6, 2020 at 8:30pm — 8 Comments

मेरे ख़त

221 2122 221 2122

ये मामला है दिल का फैला ले पर मेरे ख़त/1

जाना पड़ेगा तुझको उड़कर शहर मेरे ख़त

इस बार लिखना तय था वरना तो जाने कब से/2

आ जा रहे थे ख़्वाबों में उनके घर मेरे ख़त

अनपढ़ गंवार पागल थी इश्क़ क्या ही करती/3

चूल्हा जला रही थी वो फाड़ कर मेरे ख़त

सर्दी की रात थी जब उनको क़मर कहा था/4

उड़ कर के खुद गए थे उनके शहर मेरे ख़त

होठों की लाली होती थी जिन ख़तों पे पहले/5

अब रद्दी बन रहे थे बस उनके घर मेरे ख़त

इनकार लिखना…

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Added by Dimple Sharma on September 6, 2020 at 3:07pm — 10 Comments

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