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April 2017 Blog Posts (116)

हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)

2122 1122 1122 22



संग जितने सहें उतना ही सँवर जाते हैं

हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं



शाम ढलते ही निगाहों से गुज़र जाते हैं

सारे मंज़र जो कभी दिल में ठहर जाते हैं



देखता मैं भी उधर जा के, जिधर जाते हैं

रोज़-के-रोज़ कहाँ शम्स-ओ-क़मर जाते हैं



सहरा-ए-इश्क़ में हो जाता है दरिया का भरम

इसी ग़फ़लत में कई लोग उधर जाते हैं



हिज्र तो ज़रिया है जलने का चराग़-ए-उम्मीद

हम तो बस वस्ल का ही सोच के डर जाते हैं



जब पहुँचना ही… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on April 19, 2017 at 5:49pm — 8 Comments

"मल्हारी" गीत (कविता)

तू गीत कोई "मल्हार"सा गा दे

जो मुझको तेरा मीत बना दे,

मुखड़े पर स्वर-संगीत उठा कर

स्थाई पर जैसे सम आकर,

तू गीत कोई "मल्हार" सा गा दे

कुछ एक नयी सी रीत बना दे,

फिर एक नई बंदिश तू लिख दे

जो दिल आकर घर सा कर दे,

मुझको अपनी मीत बना दे

मुझको अपनी जीत बता दे,

तू कुछ ऐसा गीत बना दे

जो तेरी मेरी प्रीत बता दे,

तू गीत कोई "मल्हार"सा गा दे

जो मुझको तेरा मीत बना दे,

तू गीत कोई "मल्हार"सा गा दे

जो…

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Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on April 19, 2017 at 11:41am — 2 Comments

नख़्ल-ए-दिल रेगज़ार करना था-ग़ज़ल नूर की

नख़्ल-ए-दिल रेगज़ार करना था,

इक तसव्वुर ग़ुबार करना था.

.

तेरी मर्ज़ी!!! ये ज़ह’न दिल से कहे,

बस तुझे होशियार करना था.

.

वो क़यामत के बाद आये थे

हम को और इंतिज़ार करना था.

.

हाल-ए-दिल ख़ाक छुपता चेहरे से

जिस को सब इश्तेहार करना था.

.   

लुत्फ़ दिल को मिला न ख़ंजर को

कम से कम आर-पार करना था.

.

चंद यादें जो दफ़’न करनी थीं

अपने दिल को मज़ार करना था.

.

बारहा दुश्मनी!! अरे नादाँ .....

इश्क़ भी बार बार करना…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2017 at 8:40pm — 13 Comments

ग़ज़ल -- कभी जीत है कभी हार है ( दिनेश कुमार )

11212--11212



वो कलंदरों में शुमार है

ग़म-ए-ज़ीस्त से उसे प्यार है



तेरी हाँ नहीं पे ऐ जान-ए-जाँ

मेरी ज़िन्दगी का मदार है



मेरे बाग़-ए-दिल के नसीब में

फ़क़त इन्तज़ार-ए-बहार है



ग़म-ए-आशिक़ी से जो पूछिये

ये जहां भी उजड़ा दयार है



जिसे ताज कहता है ये जहां

वो हक़ीक़तन तो मज़ार है



ये अजब नहीं कि जुनूने-इश्क़

सर-ए-दार था सर-ए-दार है



मैं जो हक़-हलाल की रह पे हूँ

मुझे ख़्वाब में भी क़रार… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 18, 2017 at 8:17pm — 7 Comments

कुण्डलिया छंद

1-

पीने में आनंद है, मिथ्या है संसार।

पीने से बढ़ता सदा, आपस में है प्यार।।

आपस में है प्यार,भेद सारे मिट जाते।

टकराते जब जाम,स्वर्ग का सुख तब पाते।।

मदिरा के बिन यार,मजा क्या है जीने में।

जीवन है दिन चार, हर्ज फिर क्या पीने में।।

2-

किसने पाई आजतक, मद्यपान से शांति।

पीने वाला पालता, मन में फिर क्यों भ्रांति।।

मन में फिर क्यों भ्रांति'शांति देगी ये हाला।

खोकर अपना होश,बने फिर क्यों मतवाला।।

हुआ नशे से मुक्त, विचारा मन में जिसने।…

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Added by Hariom Shrivastava on April 18, 2017 at 6:00pm — 8 Comments

" अस्पृश्य" - लघुकथा :अर्पणा शर्मा

मालकिन ने रसोई के एक कोने में रखी थोड़ी पिचकी सी , घिसी थाली, कटोरी , ग्लास और चम्मच उठा,  उसमें खाना सजाया और खाना बनाने वाली को रसोई के बाहर एक कोने में जमीन पर बिठाकर उसके सामने थाली रख दी।



खाना बनाने वाली का आज उस घर में पहला ही दिन था। जल्दी से खाना खाकर जूठे बर्तन सिंक में रख दिये क्योंकि बर्तन मलने वाली भी आती थी।



मालकिन ने देखा तो उसे कड़क शब्दों में निर्देश मिले -

" खाना खाकर अपने बर्तन धोकर वहाँ उस कोने में रखना। दूसरे बर्तनों से छूना नहीं चाहिए… Continue

Added by Arpana Sharma on April 18, 2017 at 5:00pm — 14 Comments

दो कवितायें

दो कवितायें

 

दोस्त

जब मेरे पास दोस्त थे

तब दोस्तों के पास कद हद पद नहीं थे

और जब दोस्तों के पास पद हद कद थे

मेरे पास दोस्त नहीं

 

धन 

 जब मेरे पास धन नहीं था

तब समझते थे सब मुझे बदहाल

पर मैं खुश था , बहुत खुश था

और जब मेरे पास है अकूत सम्पति

दुनिया मुझे खुशहाल समझती है

और मैं  तडपता हूँ बिस्तर पर

नींद के सुकून से भरे एक झोंके के…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 18, 2017 at 3:10pm — 10 Comments

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को' बुला रहा था।

वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।

सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"।
नहीं तो' ये आईना रहा था।

रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by रोहिताश्व मिश्रा on April 18, 2017 at 1:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल (12122-12122-12122-12122)

न बैठो इतने करीब मेरे कहीं मेरा दिल मचल न जाए

अब इतनी भी दूर तो न जाओ ये जान मेरी निकल न जाए ।।

 

जो बर्फ़ अरमानों पर जमी है तेरी तपिश से पिघल न जाए

पिघल गई गर तो मेरी आँखों की झील भर के उछल न जाए ।।

 

बड़ा ही शातिर ये वक़्त है फिर नई कोई चाल चल न जाए

मिलन से पहले घड़ी विरह की मिलन का लम्हा निगल न जाए ।।

 

तेरी छुअन से हुई वो जुम्बिश की दिल की धड़कन बिखर गई है

 न छूना मुझ को सनम दुबारा ये साँस जब तक सँभल न जाए…

Continue

Added by Gurpreet Singh jammu on April 18, 2017 at 10:50am — 14 Comments

शाइरी भी यार अब हम क्या करें

बह्र 2122 2122 212



हर जगह नफरत का आलम, क्या करें

ज़ह्र होता ही नही कम क्या करें ||



मौत का सामान ख़ुद इंसाँ हुआ

और जुबाँ उसकी हुई बम क्या करें ||



जो सहारे भाग्य के बैठा रहे

ऐसे का फिर राम गौतम क्या करें ||



कुछ नही अपना यहाँ यह जानकर

*जाने वाले चीज का ग़म क्या करें*



वक़्त से कोई बड़ा जब है नही

सर किसी के सामने ख़म क्या करें ||



इस हुनर पर हावी हैं मजबूरियाँ

शाइरी भी यार अब हम क्या करें… Continue

Added by नाथ सोनांचली on April 18, 2017 at 4:30am — 11 Comments

आँखों का दीवाना

तेरी आँखों ने

दीवाना बना दिया मुझको

में क्या था और

ये क्या बना दिया मुझको

क्या पता है हाल-ए-खबर तुझे

जो दे गयी है बेचैनी मुझे

क्यों समझते नही ख़ामोशी मेरी

क्या पता नहीं तुम्हें कहानी मेरी

कहते हैं सब ये शराफत है तेरी

पर कैसे बताऊँ तू ही तो मंज़िल है मेरी

सुनो ना जिसे सब लोग जिंदगी कहते हैं

तुम बिन उसे मैं अब क्या कहूँ

ये इश्क क्या है मालूम नहीं

पर इक दर्द सा सीने में है

दीवाना हूँ सादगी का तेरी

सुन ले आरजू इस दिल…

Continue

Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on April 17, 2017 at 8:17pm — 6 Comments

मीत बन जाइए....मनहरण घनाक्षरी...समीक्षार्थ..//अलका ललित

समीक्षार्थ

मनहरण घनाक्षरी ....(एक प्रयास)

***

 

आशा का प्रकाश कर

बांस को तराश कर

बांसुरी के सुर संग

गीत बन जाइए

.

हौसले पकड़ कर

आँधियाँ पछाड़ कर

बहती नदी सी इक

रीत बन जाइए

मछली पे आँख रहे

धरती पे पाँव रहे

आसमान छू के जरा

जीत बन जाइए

बहुत जीया है इस

दुनिया की सोच कर

अब अपने भी जरा

मीत बन…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on April 17, 2017 at 6:30pm — 14 Comments

मेरे भीतर की कविता

मेरे भीतर की कविता

अक्सर छटपटाती है

शब्दों के अंकुर

भावों की विनीत ज़मीन पर

अंकुरित होना चाहते हैं

ना जाने क्यों वे

अर्थ नहीं उपजा पाते हैं

मेरे भीतर की कविता फिर भी

जाकर संवाद करती है

सड़क किनारे बैठे

उस मोची पर जो

फटे जूते सी रहा है

बंगले की उस मेम साहिबा पर

जो अपना बचा फास्ट फुड

डस्टबिन में फेंककर

ज़ोर से गेट बंद करके

अंदर चली जाती है

लेकिन

अनुभूतियाँ ज़ोर मारती है

पछाड़े खाकर गिर जाती है

हृदय…

Continue

Added by Mohammed Arif on April 17, 2017 at 5:30pm — 12 Comments

आज की प्रेम कहानी

         प्रेम कहानी

मेरी भी है प्रेम कहानी,जिसमे राजा और है रानी|

मिल कर खोला दिल का राज ,नदी किनारे की है बात|

कहा तुम्हारा साथ चाहिए ,प्यार भरे ज़ज्बात चाहिए|

दिल की बाते देना बोल ,नीम नहीं मिश्री के घोल|

मृग नैनी सु अधरों वाली ,तेरे बिना मै खाली खाली|

मेरी भी है प्रेम  कहानी ,जिसमे राजा और है रानी|

लड़की का जवाब

यही बात तो सब है कहते ,साथ हमारे कभी न रहते\

कभी यहाँ है कभी वहाँ है ,रब ही जाने कहा कहा है|

कभी है राधा कभी…

Continue

Added by Pankaj sagar on April 17, 2017 at 12:53pm — 5 Comments

तरही गजल/सतविन्द्र राणा

तरही गजल

2122 2122 212



काफ़िया हमको मिला *अम* क्या करें

लाज़िमी कहनी ग़ज़ल हम क्या करें



सब दिवाने हैं दिखावे के यहाँ

और' हुनर के दाम हैं कम क्या करें?



रौशनी ने दी है दस्तक देख लो

पर खड़ा है फिर भी ये तम क्या करें



बुलबुलों ने छोड़े जब से घोंसले

टहनियों की आँख हैं नम क्या करें



पास है जो वो भी तो अपना नहीं

*जाने वाली चीज का गम क्या करें



बैठकर सब साथ गम थे बाँटते

सिलसिला वो अब गया थम क्या… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 16, 2017 at 10:00pm — 16 Comments

"चिरनिद्रा- चिर-विश्रांति "/कविता - अर्पणा शर्मा

नदी के भँवर में घूमते पत्ते से,

जो खिंचता-जाता समाने उसमें,

जीवन है ड़ूबता- उतराता,

काल के नित गहराते भँवर में,

धवल आकाशगंगा के,

गहन काले गह्वर की मानिंद,

हमें आलिंगन में लेने को आतुर,

ओह ये मृत्यु ...!!

 

शनैः-शनैः सब समाता उसमें,

धीरे-धीरे खिंचते जारहे,

हम भी नित उसी ओर,

जन्म के साथ ही,

है शुरू होजाती,

यह गणना पलछिन,

यह माटी का पुतला ,

जीवित रहेगा ,

आखिर कितने दिन,



उलझते जीवन के व्यापार में… Continue

Added by Arpana Sharma on April 16, 2017 at 7:41pm — 11 Comments

ठहराव ..?

आदतन हर रोज़ सवेरे-सवेरे

बुझते विश्वास की गहरी पीर

मौन विवशता के आवेशों में

बहता मन में निर्झर अधीर

आस-पास लौट आता है उदास

अकस्मात अनजाने तीखा गहरा

गहरे विक्षोभों का सांवला

देहहीन दर्दीला उभार

ज़िन्दगी के अब ढहे हुए बुर्जों में

विद्रोही भावों के अवशेष धुओं में

है फिर वही, फिर वही असहनीय

अजीब बदनसीब अनथक तलाश

नियति के नियामक चक्रव्यूहों में

पुरानी पड़ गई बिखरती लकीरों…

Continue

Added by vijay nikore on April 16, 2017 at 5:28pm — 9 Comments

सलमान खान मर चुका है !

आत्महत्या

के कई ख्याल,

मेरे दिमाग में आते है

उस तरह

जैसे बच्चों को को अपने खिलौनों के आते है।

खुद को

बौना महसूस करता हूँ

हर उस सेकण्ड

जब भी जीवन-मृत्यु के चक्र के

बीच

देखता हूँ इतिहास में मरे हुए लोग।

बना रहा था

एक चित्र,

मोनालिसा की बहन का/

और

मेरी होने वाली बेटी को पीले रंग के ब्रश से प्यार है।

इस वक़्त

हमारे घर के एकमात्र टीवी में

बना हुआ था माहौल/ इटली के भूकंप का।

टीवी की धारारेखीय शक्ल ने… Continue

Added by बृजमोहन स्वामी 'बैरागी' on April 16, 2017 at 8:45am — 5 Comments

जब नज़र से उतर गया कोई

2122/1212/22

.

जब नज़र से उतर गया कोई,

यूँ लगा मुझ में मर गया कोई.

.

इल्म वालों की छाँव जब भी मिली

मेरे अंदर सँवर गया कोई.

.

उन के हाथों रची हिना का रँग

मेरी आँखों में भर गया कोई.

.

बेवफ़ाई!! ये लफ्ज़ ठीक नहीं,

यूँ कहें!!! बस,…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 16, 2017 at 8:00am — 16 Comments

उसके आँचल उड़ा नही करते

2122 1212 22



बेसबब वह वफ़ा नहीं करते । खत मुझे यूँ लिखा नहीं करते ।।



है मुहब्बत से वास्ता कोई । उस के आँचल उड़ा नहीँ करते ।।



लूट जाते हैं जो मेरे घर को। गैर वह भी हुआ नहीं करते ।।



बात कुछ तो जरूर है वर्ना । तुम हक़ीक़त कहा नही करते ।।



न्याय बिकता है इस ज़माने में । बिन लिए फैसला नही करते ।।



वह गवाही भी बिक गई कब की ।

अब भरोसा किया नही करते ।।



जश्न लिखता हयात को बन्दा ।

जिंदगी से डरा नहीँ करते ।।



है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 15, 2017 at 11:56pm — 5 Comments

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