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June 2016 Blog Posts (172)

ज़िंदगी को छलने लगी .....

ज़िंदगी को छलने लगी .....

गज़ब हुआ

एक चराग़ सहर से

शब की चुगली कर बैठा

एक लिबास

अपने ग़म की

तारीकियों से दरयाफ़्त कर बैठा

कोई करीबियों से

फासलों की बात कर बैठा

मैंने तो

तमाम रातों के चांद

उस पर कुर्बान कर दिए थे

अपने ग़मग़ीन पैरहन पर

हंसी के पैबंद सिल दिए थे

अपनी आंखों के हमबिस्तर को

मैं चश्मे साहिल पे ढूंढती रहा

नसीमे सहर से

उसका पता पूछती रही

उम्मीदों की दहलीज़

नाउम्मीदी की…

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Added by Sushil Sarna on June 30, 2016 at 8:35pm — 4 Comments

कहाँ तक ज़िन्दगी से भागियेगा (ग़ज़ल)

1222 1222 122

हर इक चेहरे पे था चेहरों का पर्दा
तभी तो खा गया आईना धोखा

तुम्हारी मौत मेरी ज़िन्दगी है,
अँधेरा रौशनी से कह रहा था

नहीं छोड़ेगी पीछा मरते दम तक,
कहाँ तक ज़िन्दगी से भागियेगा।

निहत्था आफ़ताब आया फ़लक पर,
अभी हमला भी होगा बादलों का।

वफ़ा की बात फिर करने लगा मैं,
रिएक्शन ये दवा का हो गया क्या?

"जय" अब तो छोड़ करना सौदा-ए-दिल
हुआ कंगाल तू सह-सह के घाटा

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on June 30, 2016 at 6:42pm — 13 Comments

मानवता के लिये जियो-पंकज

बहुत प्रताप था सम्राट अशोक

अब कहाँ है तुम्हारा सिंहासन?



बहुत जलवा था ज़िल्ले इलाही

कहाँ हैं अब मुग़लिया वंशज ?



जो महल जो हीरे जवाहरात

तूने खून से जुटाए थे न !

कोह-ए-नूर तो शो पीस ही रह गया

बादशाह सलामत?



तेरी खून पीने वाली तलवार

टीपू सुल्तान

बिक गयी- नीलाम हो गयी।

लेकिन तेरी वंशावली के

बूते की बात नहीं रही।।



गफ़लत में जीते हुए मौत से हारकर

सारी हेकड़ी और कौशल यहीं छोड़कर

जाना पड़ा तुमको भी महाराज… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 30, 2016 at 3:36pm — 4 Comments

अहसास

अजब मंजर था वो..

अथाह सागर,हाथ हिलाते साहिल पर खड़े कुछ अपने

आँखों में बिछोह का दर्द लिये,

और एक चोटी सी कश्ती पर स्वआर वो

ह्रदय पीड़ा युक्त रोरो धाराओं की हलचल से व्याप्त



आँखे अश्रु रोकने के असमंजस में

धीरे धीरे दूर होती कश्ती देख

मुड़ने लगे वे सब अपने



अचानक आया सागर में तूफ़ान

कश्ती लगी डगमगाने

उसे अहसास हुआ जब तक

फिर भी पुकारा उसने उन अपनों को

पर उसकी आवाज़ लहरों से टकराकर लौट आई

"एक हाथ भी आगे न आया ज़िन्दगी… Continue

Added by Dr. Arpita.c.raj on June 30, 2016 at 2:51pm — 1 Comment

जो हुआ जैसा हुआ अच्छा हुआ

जो हुआ जैसा हुआ अच्छा हुआ

कब हुआ है पर मेरा सोचा हुआ

ले रहा हूँ साँस तो मैं हर घड़ी

सच तो ये मुझको मरे अरसा हुआ

कौन सुलझाता ये मेरी मुश्किलें

हर कोई अपने में जब उलझा हुआ

मैंने सबको अपना ही माना मग़र

दिल से कोई कब मेरा अपना हुआ

कोशिशें नाकाम ही होंगी सभी

वक़्त कब लौटा भला बीता…

Continue

Added by deepak kumar shukla on June 30, 2016 at 1:00pm — 3 Comments

गजल(आ गये फिर ...)

2122 22 2

आ गये फिर गिरगिट जी
शुरू हुई अब गिट-पिट जी।1

रंग बदले कितने सब
हो गये हैं अब हिट जी।2

माप कोई जूते की
पाँव इनके हैं फिट जी।3

ढ़ाल लिया सबको शीशे
इस कला के डी.लिट. जी।4

राह इनकी रूकती कब
पास पड़े सब परमिट जी।5

रोशनी के ठेके हैं
बन गये हैं सर्किट जी।6

पास होते हरदम ही
काम आती बस चिट जी।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on June 30, 2016 at 7:10am — 2 Comments

ग़ज़ल

फ़ैलुन,फ़ैलुन,फ़ैलुन,फ़ैलुन,फ़ैलुन,फ़ा

.

इक तरफा यारी यार निभाऊँ क्यूँ कर ।।

फोकट में डेली चाय पिलाऊँ क्यूँ कर ।।(1)



रोज सुबह तू दूध जलेबी ठसक रहा,

ऊपर से नामी ग़ज़ल सुनाऊँ क्यूँ कर ।।(2)



बन हीरो भटक रहा खुर्राट निठल्ला,

तेरा खरचा अब और चलाऊँ क्यूँ कर ।।(3)



बनिया भी अपना पैसा माँग रहा है,

तेरी खातिर मैं नाक छुपाऊँ क्यूँ कर ।।(4)



सारे लफड़े-झगड़े तू देख सलट खुद,

तेरे लफड़ों में टाँग अड़ाऊँ क्यूँ कर ।।(5)



उस लड़की के…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on June 30, 2016 at 2:30am — 8 Comments

ग़ज़ल : न मुश्किल बढ़ा आजमाने से पहले

                 

122 – 122 – 122 - 122

               

न मुश्किल बढ़ा आजमाने से पहले

नजर को मिला दिल लगाने से पहले

 

सफ़र ज़िन्दगी का रहा फिर अधूरा

खुदा याद आया न जाने से पहले

 

वो दिन रात हलकान पैसे में देखो

करे मोल बाज़ार आने से पहले

 

तुम्हे भी तो आखिर यही सब मिलेगा

जरा सोच लो तुम सताने से पहले

 

मुहब्बत में शर्तें तो होती नहीं हैं

सही पाठ पढ़ लो ज़माने से पहले   

.

गयी…

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Added by munish tanha on June 29, 2016 at 5:30pm — 4 Comments

आक्रोश

क्या हुआ जो मौनी बाबा को आज क्रोध आ गया ? यह चर्चा चारों तरफ हो रही थी। सुबह से गली और चबूतरों पर बैठे लोग आश्चर्य प्रकट कर रहे थे। कि उनके जैसा संत क्यों क्रोधित हो गया। यह चर्चा करते हुए श्री बेनी बाबू ने कहा कि आखिर कोई तो बात ह ोगी िकवे इतने तैश में दिख रहे थे। जनार्दन जी का कहना था कि अरे भाई हो सकता है कि उन्हें या उनको समझाने वाले को कोई गलतफहमी हो गयी हो। इस रविन्द्र नाथ ने अपने जबड़े कसते हुए कहा कि क्या कहा जाय इस तरह से होना गांव की बदनामी का ही सबब हो सकता है । यदि बाबा गांव से जा…

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Added by indravidyavachaspatitiwari on June 29, 2016 at 2:00pm — No Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) - 9 (1)

.............. कल से आगे



‘‘उठो वत्स रावण !

‘‘तुम दोनो भी उठो कुंभकर्ण और विभीषण !’’

आवाज सुन कर तीनों अचंभित हुये, यह किसकी आवाज थी। यह तो पहले कभी नहीं सुनी थी। कितनी गंभीर फिर भी कितनी मृदु।

‘‘आँखें खोलो वत्स ! अपने प्रतितामह से साक्षात नहीं करोगे ?’’

तीनों ने आँखें खोल दीं। सामने सच में ब्रह्मा खड़े हुये उन्हें आवाज दे रहे थे। ठीक वही छवि जैसी मातामह ने बताई थी। कमर में गेरुआ अधोवस्त, कंधे पर यज्ञोवपीत अत्यंत गौरवर्ण, लंबा कद, लंबी सी धवल दाढ़ी और सुदीर्घ…

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Added by Sulabh Agnihotri on June 29, 2016 at 9:39am — 1 Comment


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -है फर्क बहुत मेरे तेरे गुलज़ारों में -( गिरिराज भंडारी

22   22   22   22   22   2   ( बहरे मीर )

है फर्क बहुत मेरे तेरे गुलज़ारों में

महज़ साम्य है विज्ञापित दीवारों में

 

तुम अच्छाई खोजो इन हत्यारों में

हम भी खुशियाँ खोजेंगे इन हारों में

 

कहीं खून से होली खेली जाती है

कहीं दूध है प्रतिबंधित त्यौहारों में

 

पत्थर होगा वो तुमने जो घर लाया  

मोम कहाँ मिलते हैं इन बाज़ारों में

 

फुट पाथों को तुम भी रौंदोगे इक दिन

हो जाती है यही तेवरी कारों…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 29, 2016 at 8:30am — 6 Comments

एक सिपाही की इच्छा

मेरी मौत पर आंसू न बहाना तुम,

मैं शहीद हूँगा इस देश की खातिर,

मेरी मौत पर एक जश्न मनाना तुम।



जिस मिट्टी में जन्म लिया,

इसकी रेत में खेलकर बड़े हुए,

पैरों से रौंदा जिसको मैंने,

अन्न खाया है जिस मिट्टी का,

मर जाऊं गर इस मिट्टी की खातिर,

मेरी मौत पर एक जश्न मनाना तुम ।



गर गिरें तुम्हारी आंखों से आंसू उस घड़ी,

मेरी तमन्ना है वो खुशी के आंसू हों,

इस पवित्र मिट्टी में समाते हुए,

मेरा कफन हरी वर्दी या तिरंगे का हो,

प्राण जाएं… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on June 28, 2016 at 6:41pm — No Comments

हाल-ए-दिल पूछने चले आये (ग़ज़ल)

2122 1212 22



हाल-ए-दिल पूछने चले आये।

जाइए, जाइए.....बड़े आये।



उनके नज़दीक हम गये जितने,

दरमियाँ उतने फ़ासले आये।



आपके शह्र, आपके दर पर,

आपका नाम पूछते....आये।



राह-ए-मंज़िल में करने को गुमराह,

जाने कितने ही रास्ते आये।



हुए रावण के अनगिनत मुखड़े,

राम-राज अब तो कोई ले आये।



ज़ीस्त का मस्अला नहीं सुलझा,

जाने कितने चले गए, आये।



ढूँढे मिलता नहीं हमारा दिल,

हाथ किसके न जाने दे… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on June 28, 2016 at 4:02pm — 22 Comments

आकलन सरकार का तो खूब करते आप हैं

२१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

आकलन सरकार का तो खूब करते आप हैं

पर न सोचा आपने कितने किये खुद पाप हैं

 

हुक्मरानों को किया पैदा भी खुद है आपने

इस तरह रिश्ते से उनके आप माई बाप हैं

 

इक मसीहा तो सफाई के लिए चिल्ला रहा

रोज क्या ये भी कहे बीमारियाँ अभिशाप हैं

 

गंगा तू  पावन करेगी पापी को वरदान ये

खुद सड़ेगी  कोढियों सी  कब मिले ये शाप हैं

 

बाँध सडकें पुल हुए कमजोर महलों वास्ते

लूट के ही माल से करते लुटेरे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on June 28, 2016 at 2:30pm — 4 Comments

मृग-से सुंदर नैन हैं

*महाभुजंगप्रयात सवैया*



करूं अर्चना-वंदना मैं तुम्हारी, महावीर हे ! शूर रुद्रावतारी!

कृपा-दृष्टि डालो दया दान दे दो, बढ़े बुद्धि-विद्या बनूं सद्विचारी।।

हरो दीनता-दुःख-दुर्भाग्य सारे, तुम्हीं नाथ हे! लाल-सिंदूरधारी!

सदा हाथ आशीष का शीश पे हो, यही प्रार्थना हे! महाब्रह्मचारी।।



*कुण्डलिया छंद*



मृग-से सुंदर नैन हैं, ओष्ठ-अरुण-अंगार।

यौवन के हर पोर से, फूटे मधु की धार।

फूटे मधु की धार, तार उर के झंकृत कर।

काले-कुंचित केश, झूमते अहि से कटि…

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Added by रामबली गुप्ता on June 28, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) - 8

.............................. कल से आगे

‘‘महाराज थोड़ा सा राजभोग और लीजिये, मैंने अपने हाथों से बनाया है।’’ कैकेयी ने अनुरोध किया।

दशरथ और कौशल्या भोजन पीठिकाओं पर बैठे थे। कैकेयी परोस रही थी। दासियाँ पीछे हाथ बाँधे खड़ी थीं।

‘‘नहीं महारानी बहुत हो गया। अब नहीं खा पाऊँगा।’’

‘‘बहुत कैसे हो गया। थोड़ा सा तो लेना ही पड़ेगा।’’ कैकेयी ने जबरदस्ती राजभोग की एक कटोरी और रखते हुये कहा।

‘‘ले भी लीजिये न महाराज। आप तो राजभोग का ढाई सेर का पतीला एक साँस में खाली कर डालते…

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Added by Sulabh Agnihotri on June 28, 2016 at 9:37am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दो कुन्डलिया -- गिरिराज भंडारी

1- नाम वरों में छुप रहे

नामवरों में छुप रहे , सारे गलती बाज

सच के आगे किस तरह , मची हुई है खाज

मची हुई है खाज , खून उभरा है तन में

लेकिन कोई लाज , कहाँ कब दिखती मन में

सत्य गिनेगा नाम , कभी तो जानवरों में

आज छिपालो झूठ, किसी का नामवरों में

****************

2- गिरगिट मानव देख

धोती में अपनी कभी , नही देखते दाग

और लगाते हैं सदा , अन्य वसन में आग

अन्य वसन में आग , लगाते हैं वो सारे

जिनको डर है सत्य,  कहीं ना उनको…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 28, 2016 at 7:00am — 16 Comments

गजल (महफिल सजा हम आज ...)

महफिल सजा हम आज तक बैठे हुए

महबूब तो हैं बेवजह उखड़े हुए।1



अपनी वफा पे ढ़ा गये जुल्मो सितम

मुड़कर जरा देखा नहीं चलते हुए।2



आसान उनकी राह हमसे हो गयी

मुश्किल हुई अपनी चले गाते हुए।3



मौसम गया है लोढकर सारा शुकूं

बेकस हुए पादप तने बिखरे हुए।4



कसमस कथाएँ झेलती कलिका रही

बनठन चले हैं आज वे निखरे हुए।5



बहतीं कहाँ खुलकर हवाएँ अब यहाँ

हँसते हुए तारे अभी सहमे हुए।6



रूकता कहाँ बेखौफ कातिल मनचला

अंदाज…

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Added by Manan Kumar singh on June 27, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

वियोग-रस

पलों को बीतने में लग रहीं सदियां

बेक़रारी हो औ सुकूं आये कब हुआ है ये

हसीन पल भी ज़िन्दगी के नहीं कटते काटे

और वो हैं क़ि रुक गए दहलीज़ पे आते आते

छा गए हैं वो ख़्वाब में क़हर बन के

कि पलकें भी अब झुकाने में बहुत डर लगता

उनके जाने की तारीख तो मुकम्मल लेकिन

वो आंएगे कब इसका कहाँ पता चलता...

आँख के आंसू सब बयां करते है

भरे गले से शब्द कहाँ झरा करते हैं

ये वफा थी न थी अब परवा कहाँ किसको

टूट कर दिल तो बस आहे…

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Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on June 27, 2016 at 5:30pm — 3 Comments

जीने का अंदाज़ ....

जीने का अंदाज़ .....

अचानक क्या हुआ

हम बेआवाज़ हो गए

हमारे ही लम्हे

हमसे नाराज़ हो गए

कुछ भी तो न था

हमारे दरमियाँ

फिर भी सीने में

हज़ारों राज़ हो गए

हसरतें

लबों की दहलीज़ पर

दम तोड़ती रही

गर्म सांसें

लावे की तरह

राहे उल्फ़त में

एक जुगनू सी उम्मीद लिए

दौड़ती रहीं

हम दोनों के बीच में

क्या है शेष

जो हमको बांधे है

क्यों हम दोनों की आंखें

सागर में नहाई हैं

देखो ! उन…

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Added by Sushil Sarna on June 27, 2016 at 4:27pm — 6 Comments

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