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November 2014 Blog Posts (157)

बस इतना मेरा जीवन

बस इतना मेरा जीवन

मैं बच्चों में बच्चे मुझमें

बस इतना मेरा जीवन

 

वो ही मेरा सोना-चाँदी

उनसे मेरा तन-मन-धन

आने वाले कल की सूरत

जिनकी रेखा खींच रहा

कल पक के धन्य-धान करेंगी

मैं वो फसलें सींच रहा

मैं बच्चों में बच्चे मुझमें

बस इतना मेरा जीवन

 

सुबह मिल अभिवादन करते

मन हो जाता बहुत प्रसन्न

होड़ लगाए बढ़-चढ़ आते

सर बजा दें टन-टन-टन |

मैं बच्चों में बच्चे मुझमें

बस इतना मेरा…

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Added by somesh kumar on November 30, 2014 at 11:50pm — 7 Comments

हम याद तुम्ही को करते थे

हम याद तुम्ही को करते थे,

छुप छुप के आहें भरते थे,

मदहोश हुआ जब देख लिया

सपनों में अब तक मरते थे.

रूमानी चेहरा, सुर्ख अधर,

शरमाई आँखे, झुकी नजर,

पल भर में हुए सचेत मगर,

संकोच सदा हम करते थे.

कलियाँ खिलकर अब फूल हुई,

अब कहो कि मुझसे भूल हुई,

कंटिया चुभकर अब शूल हुई,

हम इसी लिए तो डरते थे.

अब होंगे हम ना कभी जुदा,

बंधन बाँधा है स्वयं खुदा,

हम रहें प्रफुल्लित युग्म सदा,

नित आश इसी की करते…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on November 30, 2014 at 8:58pm — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आग लगाते वो कुछ इस तरह जो धुआँ तक नहीं होता(ग़ज़ल 'राज')

२११२ २१२२  १२२१  २२१२ २२

लोग हुनरमंद कितने किसी को गुमाँ तक नहीं होता

आग लगाते वो कुछ इस तरह जो धुआँ तक नहीं होता

 

जह्र फैलाते हुए उम्र गुजरी भले  बाद में उनकी

मैय्यत उठाने कोई यारों का कारवाँ तक नहीं होता

 

आज यहाँ की बदल गई आबो हवा देखिये कितनी

वृद्ध की माफ़िक झुका वो शजर जो जवाँ तक नहीं होता

 

मूक हैं लाचार हैं जानवर हैं यही जिंदगी इनकी  

ढो रहे हैं  बोझ पर दर्द इनका बयाँ तक नहीं होता

 

 ख़्वाब सजाते…

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Added by rajesh kumari on November 30, 2014 at 7:05pm — 23 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल के 4 अशआर 

सन्नाटों पर खूब सितम बरपाती है
मेरे भीतर तन्हाई चिल्लाती है
संकल्पों के मन्त्र मैं जब भी जपता हूँ
मंज़िल मेरे और निकट आ जाती है
पूरी क्षमता से जब काम नहीं करता
मेरी किस्मत भी मुझ पर झल्लाती है
हर पल तुझ को याद किया करता हूँ मैं
याद विरह के दंशों को सहलाती है

मौलिक व अप्रकाशित .... 

Added by Ajay Agyat on November 30, 2014 at 5:23pm — 9 Comments

बुद्ध हो गये क्या

बुद्ध हो गये क्या?
शुद्ध हो गये क्या?

मज़ाक मज़ाक में!
क्रुद्ध हो गये क्या?

उसको देख देख!
मुग्ध हो गये क्या?

सफेदी दिखी है!
दुग्ध हो गये क्या?

अपनों के पथ में!
रुद्ध हो गये क्या?
**************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on November 30, 2014 at 5:00pm — 12 Comments

अलबेला चाँद

पत्नी या प्रेमिका

चांद जैसी नहीं

सचमुच चाँद होती है

कभी लगती हेम जैसी

कभी देवि कालिका 

कभी अंधकार

कभी मानस मरालिका

अंतस में अमिय-घट

स्वर्गंगा पनघट

राका एक छली नट

अभ्र बीच नाचे तू

चपला का शुभ्र पट 

स्वयं में मगन  इतना

शीतल तू आह कितना

सताये न अगन

चातक भी बैठा चुप   

सहेजे निज लगन  

सोलह कला चाँद में

अहो ! षोडश शृंगार में

अरे—रे---…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2014 at 3:00pm — 6 Comments

दोहा...........पूजा सामाग्री का औचित्य

दोहा...........पूजा सामाग्री का औचित्य

रोली पानी मिल कहें, हम से है संसार।
सूर्य सुधा सी भाल पर, सोहे तेज अपार।।1

चन्दन से मस्तक हुआ, शीतल ज्ञान सुगन्ध।
जीव सकल संसार से, जोड़े मृदु सम्बन्ध।।2

अक्षत है धन धान्य का, चित परिचित व्यवहार।
माथे लग कर भाग्य है, द्वार लगे भण्डार।।3

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 30, 2014 at 12:00pm — No Comments

सहेजना

सहेजना  

बिखराव में समझ आता है

सहेजे का मोल

मनचाही चीज़ जब

आसानी से नहीं मिलती तो

याद आती है माँ/पत्नी//बहन  

सुबह-सुबह खाना पकाती

सेकेण्ड-सुई से रेस लगाती

हर पुकार पे प्रकट हो जाती

मुराद पूर्ण कर फिर जाती

कितना आसान बना देती है

ज़िन्दगी को,माँ/पत्नी/बहन  

सहेजना एक कौशल है

पर रोज़-रोज़ एक जैसे

को सहेजना बिना आपा खोये

समर्पण है प्यार है त्याग है

औरतें रोज़ इन्हें सहेजती हैं

और एक…

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Added by somesh kumar on November 30, 2014 at 9:33am — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बह्र-ए-रमल

2122, 2122, 2122, 2122, 2122, 2122, 2122

रात की काली सियाही जिंदगी में छा गई तो आप ही बतलाइये हम क्या करेंगे

चार दिन की चांदनी जब आदमी को भा गई तो आप ही समझाइये हम क्या करेंगे

जन्नतों के ख्वाब सारे टूटकर बिखरे हुए है, बस फ़रिश्ते रो रहे इस बेबसी को

दो जहाँ के सब उजालें तीरगी जो खा गई तो आप ही फरमाइये हम क्या करेंगे…

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Added by मिथिलेश वामनकर on November 29, 2014 at 10:30pm — 21 Comments

कविता जब तुम,होती हो संग-संग

जीवन जीने का चाव

जहां उग जाता है

कविता कहने का भाव

वहाँ से आता है

अनुभव के बाजारों से

जो लेकर आता हूँ 

उसे ही कविता बना के

जीवन में, मैं गाता हूँ

सुख-दुःख हों जीवन के

चाहे हों उत्थान-पतन

सब कविता की कड़ियों में

छिपा लेता हूँ , करके जतन

जीवन में रहते हैं मेरे नव-रंग

कविता जब तुम होती हो संग-संग !!

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित" 

 

Added by Hari Prakash Dubey on November 29, 2014 at 9:00pm — 10 Comments

तब तलक इस जहाँ में हवायें रहेंगी

212 212 212 2122



जब तलक इस जहाँ में हवायें रहेंगी

तेरे चेहरे पे मेरी निगाहें रहेंगी



कोई पागल कहे या कहे फिर दिवाना

बस तेरे वास्ते ही व़फायें रहेंगी



चाहता ही नहीं मैं तुझे भूलजाना 

मैं रहूँ न रहूँ मेरी चाहें रहेंगी



हर कदम पर बुलन्दी कदम चूमे तेरे

इस तरह की मेरी सब दुआयें रहेंगी



अक्ल के शहर में आ गया एक पागल

कब तलक बेगुनाह को सजायें रहेंगी



आजकल बिक रही दौलतों से बहारें

बस अमीरें के घर में फिजायें…

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Added by umesh katara on November 29, 2014 at 10:30am — 8 Comments

तनहा तनहा ही रहना है ! (ग़ज़ल)

२२ २२ २२ २२

फेलुन - फेलुन - फेलुन - फेलुन



तनहा तनहा ही रहना है !

दर्द सभी अपने सहना  है !!



रहता वो अपने मैं गुमसुम !

शांत नदी जैसे बहना है !!



उसको साथ मिला अपनों का !

अब उसको क्या कुछ कहना है



वो है नेता का साला तो !

क्या अब उसको भी सहना है !!



घर से जाते तुमने देखा !

कहिये उसने क्या पहना है !!



लड़का उसका बिगड़ा है तो !

घर फिर तो इसका ढहना है !!

"मौलिक और अप्रकाशित…

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Added by Alok Mittal on November 28, 2014 at 4:30pm — 13 Comments

बैठ गया

दहाने-ज़ख्म में वो कील कर के बैठ गया

वफ़ा की खुश्बुओं की झील कर के बैठ गया।



न कर सका जो अपने ख़्वाब की तरफदारी

वो अपनी अक़्ल को वकील कर के बैठ गया



नशा चढ़ा है सुर्खियों का इस क़दर उसको

कि अपने आप को जलील कर के बैठ गया।



फिर आज दिल ने मुझ को कू ए यार में टोका

फिर आज उससे मैं दलील कर के बैठ गया।



तुम्हारे बाद हिज़्र की हमारी हर शब को

फ़लक कुछ और ही तवील कर के बैठ गया।



वफा की राह तो थी दश्ते-कर्बला 'शेखर'

वो हक़ की चाह को… Continue

Added by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 27, 2014 at 10:24pm — 6 Comments

कहना है

मुझे जो कहना है कहूँगा

तुम चाहे जो सजा दो

छड़ी मार या तड़ी पार

फिर भी कहूँगा बारम्बार.

क्यों सपने दिखाते हो?

अपनी बातों में उलझाते हो

देश अब कराह रहा है

फिर भी तुम्हे सराह रहा है .

सपनों के साकार होने का

वख्त शायद आ गया है

अच्छे दिन कब आएंगे?

हर  जेहन में आ गया है.

जिस उंगली ने वोट किया

वो अब उठने लगी है,

शायद तुन्हारी इक्षाशक्ति

तुमसे रूठने लगी है.

कुछ करो न चमत्कार

जिसे जनता करे स्वीकार

फिर होगी…

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Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on November 27, 2014 at 9:30pm — 22 Comments

दर्द भरी सौगात मिली है

दर्द भरी सौगात मिली है।
तनहाई की रात मिली है।।

तेरे दिल में महफूज़ रहा।
ऐसी कोई बात मिली है।।

जिनके कारण जग से लड़ता।
उनसे ही अब मात मिली है।।

उनकी प्यास बुझाता कैसे।
खारेपन की जात मिली है।।

दर्द को ही तकिया बनाया।
ग़मों से अब निजात मिली है।।
*************************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on November 27, 2014 at 8:55pm — 15 Comments

अच्छा नहीं होता गुस्सा - जवाहर

अच्छा नहीं होता गुस्सा

पर हो जाता है

मन में गुस्सा

जब कभी

मन माफिक नहीं होता

कोई भी काम

नहीं मानते

अपने ही कोई बात

फिर क्या करें ?

हो जाएँ मौन ?

फिर समझ पायेगा कौन?

आप सहमत हैं या असहमत

क्योंकि

लोग तो यही कहेंगे

मौनं स्वीकृति लक्षणं

मन में रखने से कोई बात

हो जाता नहीं तनाव ?

तनाव और गुस्सा

दोनों है हानिकारक

तनाव खुद का करता नुक्सान

गुस्सा खुद के…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on November 27, 2014 at 10:20am — 18 Comments

मरघट का जिन्न (कहानी)

दो मित्र थे, |शेरबहादुर और श्रवणकुमार | नाम के अनुसार शेरबहादुर बहुत वीर और निर्भीक थे ,अन्धविश्वास से अछूते ,बिना विश्लेषण किसी घटना पर यकीन नहीं करते |दुसरे शब्दों में पुरे जासूस थे |बाल की खाल निकालना और अपनी और दूसरों की फजीहत करना उनका शगल था |श्रवणकुमार नाम के अनुसार सुनने की विशेष योग्यता रखते थे |एक तरह से पत्रकार थे ,मजाल है गाँव की कोई कानाफूसी उनके कानों से गुजरे बिना आगे बढ़ जाए |तीन में तेरह जोड़ना उनकी आदत थी इसलिए नारदमुनि का उपनाम उन्हें मिला हुआ था |पक्के अन्धविश्वासी और डरपोक…

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Added by somesh kumar on November 27, 2014 at 10:00am — 7 Comments

पैसों की बात (लघुकथा)

आज विधानसभा में मामला बहुत गर्म हो गया था। नेता विपक्ष के तो कपड़े तक फाड़ दिए। उनको धक्का-मुक्की में दो-चार थप्पड़-लात भी जड़ दिए गए।

"नेता जी, कल हमें आपका समर्थन चाहिए।"- मंत्री जी का फोन आया।

"कैसा समर्थन! हम कोई समर्थन-वमर्थन नहीं देंगें। कपड़े फाड़ने तक तो ठीक था लेकिन हमारी पिटाई भी हुई है।"- नेता जी ने नाराज होते हुए कहा।

"आपकी नाराजगी जायज है लेकिन कल अगर आपका समर्थन ना मिला तो हम सब की तनख्वाह ना बढ़ पाएगी।"

"अच्छा, पैसों की बात है! तो ठीक है हम मान जाते हैं…

Continue

Added by विनोद खनगवाल on November 27, 2014 at 9:30am — 19 Comments

गजल - "एक तरफा प्यार की ये बेबसी मत पूछिये"

2122 2122 2122 212



एक तरफा प्यार की ये बेबसी मत पूछिये ।

रात दिन रहती है कैसी बेखुदी मत पूछिये ।



अब खुशी का साथ छूटे एक अरसा हो गया ,

किस कदर गम से हुयी है दोस्ती मत पूछिये ।



बोलती आँखेँ हैँ मेरी और लब खामोश हैँ ,

किस तरह आवाज दिल की है दबी मत पूछिये ।



लाख रोयेँ लाख तडपेँ पर भला किस से कहेँ ,

वो दिखायेँ हमको कैसी बेरुखी मत पूछिये ।



वाह वाही कीजिये गर दिल छुये मेरी गज़ल ,

कैसे हम करने लगे हैँ शायरी मत पूछिये… Continue

Added by Neeraj Mishra "प्रेम" on November 27, 2014 at 3:06am — 26 Comments

तुम्हारा घोंसला

जैसे तुमने

तिनका तिनका जोड़ कर

धीरे-धीरे, बनाया अपना घोंसला

वैसे ही

तुमको देख-देख कर

बढ़ता रहा, मेरा भी हौसला

तुम एक- एक दाना चुग कर लायीं

अपने बच्चों को भोजन कराया

मैंने भी, वेसे ही खेतों में फसल लगायीं

दिन रात श्रम कर अन्न उगाया

धीरे धीरे रेत,बजरी ,सीमेंट ले आया

एक- एक ईंट जोड़कर

अपने सपनों का महल बनाया

जिस तरह तुमने अपने बच्चों को

उनके पैरों पर खड़ा किया

उड़ना सिखाया , उड़ा दिया, विदा किया…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 26, 2014 at 10:30pm — 28 Comments

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