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एक अतुकांत रचना :फरियाद: मनोज अहसास

एक दुआ

साथ देने की गुजारिश के साथ

जाने अबकी बार खुदाया कैसी पूर्णमासी है

चाँद के पूरे दीदार की चाहत सुलग रही है माथे पर

और पैरों को हिला रहा है डर मंज़र खो देने का

सूनी आँखे ढूंढ रही हैं अपनी क्षमता से दूर

घुटने टेके, हाथ पसारे ,दुआ सहारे

हर दम

मर्यादा से बँधे खड़े हैं

और अम्बर का कैसा नज़ारा

इन नज़रों को सता रहा है

पेड़ों के पीछे चाँद के आने की आहट से

धड़ धड़ सीना धड़क रहा है

लेकिन

जो अंधियारे ,गहरे, काले बादल गरज रहे हैं

उनसे इन…

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Added by मनोज अहसास on April 2, 2018 at 7:02pm — 12 Comments

कह दिया किसने तुझको खुदा तू नहीं

212 212 212 212

रूह से मेरे अब तक जुदा तू नहीं ।

बात सच है सनम बेवफा तू नहीं ।।1

कर रहा एक मुद्दत से सज़दा तेरा ।

कह दिया किसने तुझको खुदा तू नहीं ।।2

जिंदगी से मेरे जा रहा है कहाँ ।

इस तरह अब नजर से गिरा तू नहीं ।।3

मेरे कूचे से निकला न कर बेसबब ।

दिल हमारा अभी से जला तू नहीं ।।4

वार कर मत निगाहों से मुझ पर अभी ।

सब्र मेरा यहाँ आजमा तू नहीं ।।5

लोग अनजान हैं कत्ल के…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 2, 2018 at 6:57pm — 9 Comments

'ओबीओ की आठवीं सालगिरह का तुहफ़ा'

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन



मेरी सारी वफ़ा ओबीओ के लिये

काम करता सदा ओबीओ के लिये




दिल यही चाहता है मेरा दोस्तो

जान करदूँ फ़िदा ओबीओ के लिये




आठ क्या,आठ सो साल क़ाइम रहे

है यही इक दुआ ओबीओ के लिये



मेरे दिल में कई साल से दोस्तो

जल रहा इक दिया ओबीओ के लिये…



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Added by Samar kabeer on April 2, 2018 at 3:00pm — 40 Comments

ओ बी की आठवीं वर्षगाँठ पर कुछ दोहे - लक्ष्मण रामानुज

ओ बी ओ में हो रहा, उत्सव का आगाज |

आठ  वर्ष  तक का सफ़र,साक्ष्य बना है आज  ||

 

दूर दृष्टि बागी लिए, खूब बिछया साज |

योगराज के यत्न से, बना खूब सरताज | |

 

काव्य विधा को सीखते, विद्वजनों…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 2, 2018 at 2:30pm — 27 Comments

माथे की बिन्दी

माथे की बिन्दी

कोई ताज़ी भूलें, कुछ नए आँसू

हमारा अब अलसाया-सा बन्धन

ले आता है ओठों पर रूक-रूक एक ही सवाल ---

सुबह से गोधूली तक के अल्प समय में 

तिरछी परछाइयाँ डूबने से पहले ही

मेरे प्यार, भूल गए तुम प्यार की पहचान

तुम कैसे इतने बदल गए ?

समुद्र से करती कोमल-स्पर्श संवेदित हवाएँ

लहरों के ओठ बन्द कर उन्हें सुलातीं थीं जो

उन हवाओं के भी जैसे  मिजाज बदल…

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Added by vijay nikore on April 2, 2018 at 11:00am — 10 Comments

गजल#(आज के दिन पर)

22  22  22  22

मूर्खों का सम्मेलन हो फिर,

बीतीं बातें,चिंतन हो फिर।1

उम्र हुई तो क्या होता है

सुन्नत,चाहे मुंडन हो फिर।2

अपने तर्क उठाते रहिये

औरों का बस खंडन हो फिर।3

जात-धरम अवसाद हुए कब?

मुँहदेखी हो,मंडन हो फिर।4

भाषा,भनिति अबला जैसी

नाच नचा लें,ठन-ठन हो फिर।5

पीठ नहीं पूजी जाये तो

चलते-फिरते अनबन हो फिर।6

पढ़ने से परहेज भला है

मतलब कुछ हो, लेखन हो…

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Added by Manan Kumar singh on April 1, 2018 at 9:08pm — 14 Comments

इक दूजे के संग ...

इक दूजे के संग ...
 
चक्षु को चक्षु से देखा
करते हमने द्वंद
हाथों में उलझे
हाथ देखकर…
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Added by Sushil Sarna on April 1, 2018 at 1:05pm — 9 Comments

लघुकथा--हठ


एक दिन तंग आकर ज़िंदगी मौत से बोली-" आख़िर तू मुझे कब तक डसती रहेगी ?"
मौत खिलखिलाकर बोली-" जब तक तू जीने की हठ करती रहेगी ।"

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on April 1, 2018 at 9:00am — 8 Comments

राजनीति की औकात (लघुकथा)

लव कुश के मुख से रामायण का गान सुनकर लोग अचंभित थे। लोगों में बातचीत हो रही थी," अयोध्या का और श्री राम चरित का वर्णन बहुत सुन्दर किया है।"

श्री राम दरबार में सीता जी के वनवास जाने के दृष्टान्त में लोगों की आँखों से झर झर आँसू बहने लगे।

इस वृत्तांत को सुनाते हुए लव और कुश के चेहरे पर क्रोध झलक रहा था।

किसीने पूछा,"बेटा तुम क्रोधित क्यों हुए?"

लव ने प्रतिप्रश्न किया ," ये कैसा न्याय कि किसी व्यक्ति के शक करने पर राजा ने रानी को देश से निष्कासित कर दिया.....!"

सब के झुके… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 1, 2018 at 8:24am — 13 Comments

मूर्ख दिवस के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर

सूँघा हमने फूल को, महज समझ कर फूल

था कागज का तो मना, अपना 'अप्रैल फूल'।१।



हम में  दस  ही  मूर्ख हैं, नब्बे  हैं  हुशियार

लेकिन ये दस कर रहे, हर दुख का उपचार।२।



मूरख कब देता भला, मूर्ख दिवस को मान

 इस पर कृपा कर रहा, सहज भाव विद्वान।३।



भोले भाले का उड़ा, खूब कुटिल उपहास

मूर्ख दिवस पर सोचते, वो हैं खासमखास।४।



दसकों से सर पर रहा, बेअक्लों  का…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 1, 2018 at 7:28am — 20 Comments

अंगारों का थाल

बेचैनी बढ़ रही धरा की,  

पशु-पक्षी बेहाल

सूरज बाबा सजा रहे हैं,

अंगारों का थाल

 

दिखते नहीं आजकल हमको,

बरगद, पीपल, नीम

आँगन छोड़, घरों में बालक,…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on March 31, 2018 at 8:30pm — 10 Comments

विहग निज चोंच में देखो,,,,,,

विहग निज चोंच में देखो,,,,,,

विहग निज चोंच में देखो, अहा! मछली दबोचे है|

फँसी खग कंठ में मछली, पड़े तन पर खरोंचे हैं ||

विहग औ मीन दोनों इक, सरीखे ही अबोले हैं |

मगर इक हर्ष दूजी भय, सँजोये आँख बोले हैं |१ |

उदर की भूख मिट जाए, यही चाहत विहग पाले |

वहीं पर मीन के देखो, पड़े हैं जान के लाले ||

सलामत जान की अपने, खुदा से चाहती मछली |

निवाला छूट ना जाए, यही मन सोचती बगुली |२ |



मौलिक और अप्रकाशित…



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Added by Satyanarayan Singh on March 30, 2018 at 1:30pm — 12 Comments

अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता ..गजल

बह्र -1212-1122-1212-22



बड़ा शह्र है ये अपना पता नहीं मिलता।।

यहाँ बजूद भी हँसता हुआ नहीं मिलता।।

दरख़्त देख के लगता तो आज भी ऐसा ।

के ईदगाह में अब भी खुदा नहीं मिलता।।

समाज ढेरों किताबी वसूल गढ़ता है।

वसूल गढ़ता ,कभी रास्ता नहीं मिलता।।

मैं पढ़ लिया हूँ कुरां,गीता बाइबिल लेकिन ।

किसी भी ग्रन्थ में , नफरत लिखा नहीं मिलता।।

मुझे भी दर्द ओ तन्हाई से गिला है पर।

करें भी क्या कोई हमपर फ़िदा नहीं…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 30, 2018 at 11:11am — 6 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

 मेरी चाहतें सब दहकने से पहले ।।

चले  आइये  सर  पटकने   पहले ।।

नहीं भूलती वो सुलगती सी रातें ।

मुहब्बत का सूरज चमकने से पहले ।।

सुना हूँ यहाँ हुस्न वालों की बस्ती।

मगर वो मिले कब भटकने से पहले ।।

है ख्वाहिश यही तुझको जी भर के देखूँ ।

क़ज़ा पर पलक के झपकने से पहले ।।

बहुत कोशिशें गुफ्तगू की हैं उनकी ।

अभी सर से चिलमन सरकने से पहले…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 30, 2018 at 3:30am — 7 Comments

रातरानी और भौरा(कहानी )

 “ रात महके तेरे तस्सवुर में

 दीद हो जाए तो फिर सहर महके “

“अमित अब बंद भी करो !बोर नहीं होते |कितनी बार सुनोगे वही गजल |” सुनिधि ने चिढ़ते हुए कहा

प्रतिक्रिया में अमित ने ईयरफोन लगाया और आँखें बंद कर लीं |

कुछ देर बाद सुनिधि ने करवट बदली और अपना हाथ अमित की छाती पर रख दिया |पर अमित अपने ही अहसासों में खोया रहा और उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी |

“ऐसा लगता है तुम मुझे प्यार नहीं करते |” सुनिधि ने हाथ हटाते हुए कहा पर अमित अभी भी अपने ख्यालों में खोया…

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Added by somesh kumar on March 30, 2018 at 12:00am — 2 Comments

ग़ज़ल नूर की - जिसका मैं मुन्तज़िर रहा पल में वो पल गुज़र गया,

२११२/ १२१२ // २११२/ १२१२ 

.

जिसका मैं मुन्तज़िर रहा पल में वो पल गुज़र गया,

और वो लम्हा बीत कर अपनी ही मौत मर गया.

.

मेरा सफ़र तवील है दूर हैं मंज़िलें मेरी

दुनिया फ़क़त सराय है रात हुई ठहर गया.

.

कोई छुअन थी मलमली कोई महक थी संदली

ख़ुद में जो उस को पा लिया मुझ में जो मैं था मर गया.

.

सारे तिलिस्म तोड़ कर अपनी अना को छोड़ कर

तेरे हवाले हो के मैं अपने ही पार उतर गया.   

.

पीठ थी रौशनी की ओर साये को देखते रहे

“नूर” से जब नज़र…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 29, 2018 at 10:04pm — 12 Comments

पानी-पानी ...

पानी-पानी ...

ख़ून
ख़ून से ही
कतराता है
मगर
पानी से मिल जाता है
इसीलिये
रिश्ता
ख़ून का
हो जाता है
पानी-पानी
ख़ून के सामने

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 29, 2018 at 5:33pm — 12 Comments

खुली आँखें हैं और सोया हुआ हूँ ...संतोष

अरकान:-

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन

खुली आँखें हैं,पर सोया हुआ हूँ

तुम्हारी याद में डूबा हुआ हूँ।।



बदन इक दिन छुआ था तुमने मेरा

उसी दिन से बहुत महका हुआ हूँ।।



मुझे पागल समझती है ये दुनिया

तसव्वुर में तेरे खोया हुआ हूँ।।



जहाँ तुम छोड़कर मुझको गये थे

उसी रस्ते पे मैं बैठा हुआ हूँ।।



ख़ुदा का है करम 'संतोष' मुझ पर

हर इक महफ़िल पे मैं छाया हुआ हूँ।।

#संतोष_खिरवड़कर

(मौलिक एवं…

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Added by santosh khirwadkar on March 29, 2018 at 4:30pm — 12 Comments

कच्ची फसल  -  लघुकथा   –

कच्ची फसल  -  लघुकथा   –

"माँ, मुझे अभी और पढ़ना है। आप बापू को समझाओ ना। वे इतनी जल्दी क्यों मेरा विवाह करना चाहते हैं"?

"ठीक है बेटी। मैं आज एक बार और कोशिश करके देखती हूँ"।

श्यामा के स्कूल जाते ही, राधा खेत पर मोहन के लिये खाना लेकर पहुँच गयी।

"मैं सोच रही थी कि आज इस गेंहू की फसल को काट लेते हैं। जल्दी से फ़ारिग हो जायेंगे"।

"पगला गयी हो क्या राधा, । फसल पकने में वक्त है अभी।

"क्या फ़र्क पड़ता है, दो चार दिन पहले काट लेंगे तो। मुझे श्यामा को लेकर…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 29, 2018 at 10:51am — 16 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22



आज हद से गुजर गए कुछ लोग ।

फिर नजर से उतर गए कुछ लोग ।।

करके वादा यहां हुकूमत से ।

बेसबब ही मुकर गए कुछ लोग ।।

आशिकी उनके बस की बात कहाँ ।

चोट खाकर सुधर गए कुछ लोग ।।

अब कसौटी पे उनको क्या रखना ।

आजमाते ही डर गए कुछ लोग ।।

हर तरफ जल रही यहां बस्ती ।

कौन जाने किधर गए कुछ लोग ।।

छोड़िये बात अब मुहब्बत की

टूट कर फिर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 29, 2018 at 7:33am — 5 Comments

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