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तरही गज़ल - वो मिरी ताज़ीम में दीवारो दर का जागना “ ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122    2122    212

एक दिन है शादमानी की लहर का जागना

रोज़ ही फिर देखना है चश्मे तर का जागना

 

देख लो तुम भी मुहब्बत के असर का जागना

चन्द लम्हे नींद के फिर रात भर का जागना

 

चाँद जागा आसमाँ पर, खूब देखे हैं मगर

अब फराहम हो ज़मीं पर भी क़मर का जागना

 

बाखबर तो नींद में गाफ़िल मिले हैं चार सू

पर उमीदें दे गया है बेखबर का जागना

 

सो गये वो एक उखड़ी सांस ले कर , छोड़ कर

और हमको दे गये हैं उम्र भर…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 11, 2016 at 10:07am — 4 Comments

ग़ज़ल .........नहीं हैं लफ्ज़ मिलते शायरी के .....

बह्र ~ 1222-1222-122

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन 

मतला ...

नहीं ये आँख में आंसू ख़ुशी के

ये आंसू हैं किसी मुफलिस दुखी के 



ग़ज़ल कैसे लिखूं मैं लिख न पाती, 

नहीं है लफ्ज़ मिलते शायरी के.

 

नहीं आदत है हमको तीरगी की ,

जियें कैसे बता बिन रौशनी के.

 

बहुत ग़मगीन हैं दिल की फिज़ायें,

किसे किस्से सुनाएँ बेबसी के.

 

कहे हमने नहीं अल्फाज दिल के,

गुजर ही जायेंगे दिन जिन्दगी के.

 

अगर “आभा…

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Added by Abha saxena Doonwi on September 11, 2016 at 8:30am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अलसाई पलकों पे चुम्बन धर जाऊँगी (नवगीत 'राज ')

खोलो दिल के वातायन प्रिय मैं आऊँगी

अलसाई पलकों पे चुम्बन धर जाऊँगी

अलकन में नम शीत मलय की    

बाँध पंखुरी 

पंकज की पाती से भरकर  

मेह अंजुरी

ऊषा की लाली से लाल

हथेली रचकर

कंचन के पर्वत से पीली 

धूप  खुरच कर

कोना कोना मैं ऊर्जा से भर जाऊँगी

अलसाई पलकों पे चुम्बन धर जाऊँगी

सुरभित कुसुमो के सौरभ को

भींच परों में

चार दिशाओं के गुंजन को

सप्तसुरों  में

बन…

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Added by rajesh kumari on September 11, 2016 at 8:30am — 14 Comments

जिन्दगी की अलगनी पर शाइरी को साधना (ग़ज़ल)

बह्र : 2122 2122 2122 212

 

कुछ पलों में नष्ट हो जाती युगों की सूचना

चन्द पल में सैकड़ों युग दूर जाती कल्पना

 

स्वप्न है फिर सत्य है फिर है निरर्थकता यहाँ

और ये जीवन उसी में अर्थ कोई ढूँढ़ना

 

हुस्न क्या है एक बारिश जो कभी होती नहीं

इश्क़ उस बरसात में तन और मन का भीगना

 

ग़म ज़ुदाई का है क्या सुलगी हुई सिगरेट है

याद के कड़वे धुँएँ में दिल स्वयं का फूँकना

 

प्रेम और कर्तव्य की दो खूँटियों के बीच…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 10, 2016 at 10:30pm — 8 Comments

आदमी गुम हो गया है ख्वाहिशों के दरमियाँ (ग़ज़ल)

2122 2122 2122 212



रास्ते कुछ और भी थे रास्तों के दरमियाँ

मंज़िलें कुछ और भी थीं मंज़िलों के दरमियाँ



बेख़याली में हुई थी गुफ़्तगू नज़रों के बीच

हो गया इक़रार लेकिन धड़कनों के दरमियाँ



क्यों रहे इंसानियत से वास्ता इंसान का

जब है दीवार-ए-सियासत मज़हबों के दरमियाँ



रिश्ते-नातों को निभाने का कहाँ है वक़्त अब

आदमी गुम हो गया है ख्वाहिशों के दरमियाँ



ये हमारी दिल की दुनिया इस क़दर वीरान है

धूल उड़ती है यहाँ पर बारिशों के… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 10, 2016 at 8:15pm — 3 Comments

ग़ज़ल - कब तक खिंजां का साथ निभाया करेंगे आप।

2212 121 122 121 21

चिलमन तमाम वक्त हटाया करेंगे आप ।

तश्वीर महफ़िलों में दिखाया करेंगे आप ।।



चुप चाप आसुओं को छुपाया करेंगे आप ।

कुछ बात मशबरे में बताया करेंगे आप।।



मुझको मेरे नसीब पे यूं छोड़िये जनाब ।

कब तक खिंजां का साथ निभाया करेंगे आप।।



तहज़ीब मिट चुकी है जमाने के आस पास ।

बुझते मसाल को न जलाया करेंगे आप।।



यह बात सच लगी कि मुकद्दर नही है साथ ।

मेरे ज़ख़म पे ईद मनाया करेंगे आप ।।



आजाद आसमा के परिंदे हैं बदजुबान… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 10, 2016 at 3:44pm — 2 Comments

रंग बिरंगे हाइकू

रंग बिरंगे हाइकु

*************

1.

ग्रीष्म की रुत

सांकल सी खटकी

पीली लू आयी

२. 

लिखती रही

रंगीन सा हाइकू

रात भर मैं

३. 

सफ़ेद छोने

बर्फ के सिरहाने

फाये रुई के

...आभा  

 

 

Added by Abha saxena Doonwi on September 10, 2016 at 12:32pm — 3 Comments

कुछ दोहे मेरे

चले बराती मेघ के ,गरज तरज के साथ |

ओलों ने नर्तन किये ले हाथों में हाथ |1|

 

आँखों में जब आ गए अश्रु की तरह  मेघ |

रोके से भी न रुके तीव्र है इनका वेग |2|

 

सूर्य किरण हैं कर रहीं नदिया में किल्लोल |

चमक दमक से हो रहा जीवन भी अनमोल |3|

 

 

आभा  

अप्रकाशित एवं मौलिक

Added by Abha saxena Doonwi on September 10, 2016 at 8:00am — 5 Comments

ग़ज़ल

बहर २१२२ २१२२ २१२२ २१२

दोस्तों के वेश में देखो यहाँ दुश्मन मिले

चाह गुल की थी मगर बस खार के दंशन मिले |

यारों का अब क्या भरोसा, यारी के काबिल नहीं

जग में केवल रब ही है, जिन से ही सबके मन मिले|

गुन गुनाते थे कभी फूलों में भौरों की तरह

सुख कर गुल झड़ गए तो भाग्य में क्रंदन मिले  |

कोशिशें हों ऐसी हर इंसान का होवे भला

उद्यमी नेकी को शासक से भी अभिनन्दन मिले |

देश भक्तों ने है त्यागे प्राण औरों…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on September 10, 2016 at 7:30am — 5 Comments

दोहे

बलात्कार पर कर रहे मोदी बिल को पेश ।

दलित नही महिला अगर होगा हल्का केस ।।



ब्लात्कार में भेद कर तोड़ा है विश्वास ।

अच्छे दिन अब लद गए टूटी सबकी आस ।।



कितना सस्ता ढूढ़ता कुर्सी का वह मन्त्र ।

मोबाइल के दाम में बिक जाता जनतन्त्र ।।



सड़को पर इज्जत लुटे मथुरा भी हैरान ।

न्याय बदायूं मांगता सब उनके शैतान ।।



नए सुशासन दौर में जनता है गमगीन ।

सौगातों में ला रहे वही सहाबुद्दीन ।।



छूटा गुंडा जेल से जिसका था अनुमान ।

जंगल… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 10, 2016 at 12:28am — 6 Comments

ग़ज़ल- वो कहे लाख चाहे ये सरकार है

212 212 212 212



वो कहें लाख चाहे ये सरकार है।

मैं कहूँ चापलूसों का दरबार है।।

मेरी लानत मिले रहनुमाओं को उन।

देश ही बेचना जिनका व्यापार है।।

कौम की खाद है वोट की फ़स्ल में।

और कहते उन्हें मुल्क़ से प्यार है।।

सब चुनावी गणित नोट से हल किये।

जीत तो वो गये देश की हार है।।

चट्टे बट्टे सभी एक ही थाल के।

बस सियासत ही है झूठी तकरार है।।

अब बयां क्या करे इस चमन को पवन।

शाख़ पर उल्लुओं की तो…

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Added by डॉ पवन मिश्र on September 9, 2016 at 9:02pm — 6 Comments

कृष्ण तुमने छल किया है

कृष्ण तुमने छल किया है.

छलिया हो तुम

सारी दुनिया को काम पर लगा दिया

कह कर ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’.

 

फ़ल की आशा किससे न करे?

तुमसे?

चलो, तुम तो सखा हो

मीत को सताना तुम्हारा हक है.

प्रेम भी तो करते हो.

पर तुम्हारे जो ये कारिन्दें है न,

जीना मुश्किल कर दिया है.

हक मांगने जाओ, तो तुम्हारी बात दुहराते हैं.

अब, तुम तो आओगे नही

हमसे काम लेने.

वैसे तुम्हारा काम तो मै बिना दाम भी कर देता.

तुम…

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Added by विजय कुमार अग्रहरि 'आलोक' on September 9, 2016 at 8:30pm — 2 Comments

ये दुनिया मेरी सल्तनत राजगी है-------ग़ज़ल

122 122 122 122
तेरे हुश्न में इक गज़ब ताज़गी है
भरूँ साँस में आस मन में जगी है।

नये काफियों की नई इक बह्र तुम
ग़ज़ल खूबरू जिसमें पाकीज़गी है।

तुम्हें चाँदनी से सजाया गया तो
अमावस को ईश्वर से नाराज़गी है

सिवा तेरे कोई भजन ही न भाये
यहाँ मन पे बस तेरी ही ख्वाजगी है

मेरे हाथ गर थाम कर तुम चलो तो
ये दुनिया मेरी सल्तनत राजगी है

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 9, 2016 at 7:33pm — 7 Comments

कविता -मजदूर दिवस

हे! सर्जक

मिट्टी,बालू,ईंट,पत्थर

जोड़ते, तुम्हारे हाथ

सड़क,पुल,बाँध बनाते-

तेरे हाथ

बड़े-बड़े फ्लैट-

मकान, होटल,

सुख-सुविधा

और ऐशो-आराम

जुटाते, तेरे हाथ

रिक्त-के-रिक्त०

बड़े और बड़े हो रहे

तुम और छोटे

गयी है तो सिर्फ प्रथा

बुर्जुआ सोच नहीं॰

तुम ठगे जाते हो-

नीतिगत प्रबंधन मे-

सड़े राशन और

खैराती अस्पतालों से

और तुम्हारा सम्मान

किया जाता है-

‘मजदूर दिवस’ मना कर०



मौलिक एवं…

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Added by PARITOSH KUMAR PIYUSH on September 9, 2016 at 7:30am — 1 Comment

मसाला तो है ही नहीं! (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

स्मार्ट फोन के पटल (स्क्रीन) पर सोशल साइट की एक तस्वीर को देखकर रोहित ने अपने मित्र विशाल से कहा- "यह चित्र किसी फ़िल्म का हो, या सच्ची घटना का, तुम तो यह बताओ कि बीच सड़क पर बिखरे हुए काग़ज़ों व दस्तावेज़ों के बीच अकेला ये कौन बैठा हुआ है? अभागा या अभागिन? शोषित या शोषिता?"



"इसकी वेशभूषा, बैठने के अंदाज़ और घुटनों पर कसी हुई मांसपेशियों वाली भुजाओं की मुद्रा देखकर तो यह कोई दृढ़ संकल्पित, आंदोलित, कुछ परेशान सा युवक लग रहा है!"- विशाल ने उत्तर दिया।



"युवक नहीं, युवती है यार!… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 9, 2016 at 5:31am — 2 Comments

रात रो देते हैं बच्चे और जी जाता है वो (ग़ज़ल)

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २१२

 

धूप से लड़ते हुए यदि मर कभी जाता है वो

रात रो देते हैं बच्चे और जी जाता है वो

 

आपको जो नर्क लगता, स्वर्ग के मालिक, सुनें

बस वहीं पाने को थोड़ी सी खुशी जाता है वो

 

जिन की रग रग में बहे उसके पसीने का नमक

आज कल देने उन्हीं को खून भी जाता है वो

 

वो मरे दिनभर दिहाड़ी के लिए, तू ऐश कर

पास रख अपना ख़ुदा ऐ मौलवी, जाता है वो

 

खौलते कीड़ों की चीखें कर रहीं पागल उसे

बालने…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 9, 2016 at 12:07am — No Comments

दोहे (एक प्रयास ) /अलका चंगा

दोहे (एक प्रयास )

-.-

नैनन में ममता लिए,होंठों पर मुस्कान।

भिड़ जाए सन्सार से , जातक पे कुर्बान।।

-.-

अञ्चल में माँ सींचती,अमृत का भण्डार।

ऋषि हो चाहे देवता ,सीस झुकाते द्वार।।

-.-

संघर्षों से डरू नहीं ,माँ तुम हो जो पास ।

अंधेरे जब बढ़ गए,पाई तुमसे आस ।।

-.-

माता तुम जो बोलती, वहि मेरा है कर्म।

पाया भाव यहि तुमसे , जीवित रखना धर्म।।

-.-

कान्हा हो सुत रूप में ,चाहे हो बलराम।

मात यसोदा रूप है, नित्ये करो प्रणाम…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 8, 2016 at 3:30pm — 7 Comments

ये छुआ छूत घाव है भाई

बहर:-2122-1212-22

ये छुआ छूत घाव है भाई।।
आदमी का स्वभाव है भाई।।

उनसे रिश्ता जुड़ा जुदा तो है ।
अपना अपना झुकाव है भाई।।

लोग दर्दो गमो के मारे हैं ।
बस सजगता बचाव है भाई।।

ये बहर ही गजल का नक्शा है।
इसपे लिखना ही चाव है भाई।।

आज आमोद तुम भी रुस्वा हो।
अब ये कैसा पड़ाव है भाई।।..आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on September 7, 2016 at 11:09pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -तेरी ईंटें, न पत्थर हो के लौटें ( गिरिराज भंडारी )

तेरी ईंटें, न पत्थर हो के लौटें

1222   1222   122  

*****************************

ये रिश्ते भी न बदतर होके लौटें

तेरी ईंटें, न पत्थर हो के लौटें

 

ये चट्टानें , न ऐसा हो कि इक दिन

मैं टकराऊँ तो कंकर हो के लौटें

 

इसी उम्मीद में कूदा भँवर में

मेरे ये डर शनावर हो के लौंटें  

 

बनायें ख़िड़कियाँ दीवार में जब

दुआ करना, कि वो दर हों के लौटें

 

दिवारो दर, ज़रा सी छत औ ख़िड़की

मै छोड़ आया कि वो घर…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 7, 2016 at 9:15am — 29 Comments

ग़ज़ल

बहर : २ १ २ २  २ १ २ २   २ १  २  

 

आई जब तू जिन्दगी हँसने लगी

तू मेरे हर  सपने में रहने लगी |

धीरे धीरे तेरी चाहत बढ़ गई

देखा तू भी  प्रेम में झुकने लगी |

जिन्दगी का रंग परिवर्तन हुआ

प्रेम धारा जान में बहने लगी |

राह चलते हम गए मंजिल दिखा

फिर भी जीना जिन्दगी गिनने लगी |

देखिये शादी के इस बाज़ार में

हाट में दुल्हन यहाँ  बिकने लगी |

शमअ बिन तो तम…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on September 7, 2016 at 7:30am — 8 Comments

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