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लघुकथा – नकल /ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश"

परीक्षाहाल से गणित का प्रश्नपत्र हल कर बाहर निकले रवि ने चहकते हुए जवाब दिया, “ निजी विद्यालय में पढ़ने का यही लाभ है कि छात्रहित में सब व्यवस्था हो जाती है.”

“अच्छा .” कहीं दिल में सोहन का ख्वाब टूट गया था.

“चल . अब , उत्तर मिला लेते हैं.”

“चल.”

प्रश्नोत्तर की कापी देखते ही रवि के होश के साथ-साथ उस के ख्वाब भी भाप बन कर उड़ चुके थे. वही सोहन की आँखों में मेहनत की चमक तैर रही थी .

 ---------------------------

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Omprakash Kshatriya on July 20, 2015 at 7:00am — 11 Comments

हाइकू : सीख

    १

सही जगह

बोया सुकर्म बीज

महान फल

    २

दूर करता

अँधेरा व् दारिद्र

कुल दीपक

    ३

बाधाएं होती

परीक्षा आदमी की

जोश बढायें  

     ४

विपत्तियाँ जो

सर पर आ पड़ी

ज्ञान ने काटा

     ५

जंजीरें सभी

बनाती हैं गुलाम

लोहा या सोना

     ६

बनेंगे काम

गुरु व ईश्वर पे

श्रद्धा रखिये

    ७

देता जो स्वयं

अपने को…

Continue

Added by Manisha Saxena on July 20, 2015 at 12:00am — 4 Comments

ग़ज़ल : दुश्मनी हो जाएगी यदि सच कहूँगा मैं

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २

 

दुश्मनी हो जाएगी यदि सच कहूँगा मैं

झूठ बोलूँगा नहीं सो चुप रहूँगा मैं

 

आप चाहें या न चाहें आप के दिल में

जब तलक मरज़ी मेरी तब तक रहूँगा मैं

 

बात वो करते बहुत कहते नहीं कुछ भी

इस तरह की बेरुख़ी कब तक सहूँगा मैं

 

तेज़ बहती धार के विपरीत तैरूँगा

प्यार से बहने लगी तो सँग बहूँगा मैं

 

सिर्फ़ सुनते जाइये तारीफ़ मत कीजै

कीजिएगा इस जहाँ में जब न हूँगा…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 19, 2015 at 7:39pm — 8 Comments

गीतिका(मनन कु सिंह)

गीतिका(मात्रा भार-20 मात्राएँ)

हम यादों की बाती जलाते रहे।

तुम यादों के दीपक बुझाते रहे।

हम यादों के सपने सजाते रहे,

तुम सपनों की अर्थी उठाते रहे।

हम सपनों की मूरत बनाते रहे,

तुम मूरत की सूरत छिपाते रहे।

हम सपनों की सूरत दिखाते रहे,

तुम सूरत से अपनी लजाते रहे।

हम बातें वो लिखकर बताते रहे,

तुम बातें भी अपनी मिटाते रहे।

हम नज़रों में तुमको बिठाते रहे,

तुम नज़रों से दूरी बनाते रहे।

तुम बरसे भी कहाँ,बस छाते रहे,

तुम सूखी-सी रेती… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 19, 2015 at 7:30pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
'कॉमन' (लघुकथा ‘राज’)

 “वहीँ होगा तुम्हारा  लाड़ला इस वक़्त भी है न ? कितनी बार कहा दोस्ती बराबर वालों से ठीक है  सर्वेंट के उस लड़के से उसने क्या समझ के दोस्ती की? कुछ तो कॉमन हो... पर तुम क्यूँ समझाती, खुद भी तो.... छोटे घर की... छोटी सोच ...

जैसे संस्कार हैं वही तो बच्चे को दोगी” व्हीस्की का घूँट गले में उतारते हुए मोहित बोला|

“हाँ पापा है न एक चीज कॉमन !! उसके पापा भी रोज ड्रिक करके इतनी रात  गए घर में आते हैं और उसकी मम्मी पर इसी तरह चिल्लाते हैं, मेरी मम्मी की आँखें भी बरसती हैं और उसकी…

Continue

Added by rajesh kumari on July 19, 2015 at 9:30am — 16 Comments

यादों को मंजूर नहीं है तेरा यूँ आना जाना

तुम मेरे हो या कोई पराये
निश्चित तो कर लेने दो
मेरी सूखी आँखों में
कुछ पानी तो भर लेने दो
या तो आकर ठहर ही जाओ
या फिर दूर चले जाओ
यादों को मंजूर नहीं है
तेरा यूँ आना जाना

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित

Added by umesh katara on July 19, 2015 at 8:54am — 3 Comments

गीत- इश्क का जला/एक कोशिश

मुखडा -१६
अन्तरा- १४
इश्क का जला,इश्क का जला।
इश्क का जला, इश्क का जला ।

दिल से मेरे निकले धुआँ
कैसे करूं ये गम बयाँ
ये बेबसी की दास्ताँ
है कौन समझेगा यहाँ
जो अब तलक दिल में रहा
वो भी न मुझको पढ़ सका
इश्क का जला------

इक बार भी सोचा नहीं
परखा नहीं समझा नहीं
दिल से कभी देखा नहीं
तूने मुझे जाना नहीं
मजबुरीयों ने रोक रक्खा
है मेरा हर रास्ता
इश्क का जला-------

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Rahul Dangi Panchal on July 18, 2015 at 11:58pm — 4 Comments

शहीद

बहुत सोचा तो लगा

सच ही तो कहते हैं

वे तो भर्ती होते हैं मरने के लिए

अवगत होते हैं

अपने कार्य के निहित खतरों से

पर एक बात समझ नहीं आयी

जब सामने से चलती हैं गोलियां

उनके पास भी तो होता है

भाग खड़े होने का विकल्प

पर वे भागते क्यों नहीं

देते हैं गोलियों का जवाब

पीघला देते हैं लोहे को

अपने सीने में कैद करके

बारूद को कर देते हैं बर्फ

वे धोखा नहीं दे पाते

अपनी मातृभूमि को

राजनेताओं की तरह

मेरी समझ में कुछ कमी है शायद…

Continue

Added by Neeraj Neer on July 18, 2015 at 8:18pm — 6 Comments

गाँठ ( लघुकथा )

" नीरू ! क्या हमारे दाम्पत्य में इतनी दूरी आ गई है , कि अब तुम्हे तस्वीरों में भी मेरा साथ गवारा नहीं ? "

" हम साथ थे ही कब ? बस कोरा भ्रम था । "

" हमारे बच्चे ...? क्या इन्हें भी भ्रम कहोगी ? "

" नहीं ...। तब मुझे हमारे बीच तीसरे की उपस्थिति का भान नहीं था । "

" लौट भी तो आया हूँ , चाहो तो गाँठ बाँध के रख लो , ताकि फिर कभी ...।"

" गाँठ तो तब भी बाँधी गई थी न , जब हमने सप्तपदी ली थी ? "

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by shashi bansal goyal on July 18, 2015 at 4:23pm — 3 Comments

फैसला (लघुकथा)

"हैलो रवि, घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी है। प्लीज मुझे यहाँ से निकल ले चलो। मैं मंगलसूत्र पहनूंगी तो तुम्हारे हाथों से वरना अपनी जान दे दूंगी।"

"सुजाता, पागल मत बनो। यही तो बढिया मौका है अपने पास....."

"क्या मतलब?"

"अरे, हम अपनी जिंदगी की शुरुआत करेंगे लेकिन तुम्हारी शादी के बाद। तुम दोनों तरफ का माल समेट लेना। शादी के अगले दिन जब तुम मिलनी पर आओगी। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा। फिर दोनों मिलकर ऐश करेंगे ऐश।"

प्यार में पागल हुई सुजाता ने पूरी प्लानिंग के साथ काम…

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Added by विनोद खनगवाल on July 18, 2015 at 2:32pm — 4 Comments

लघुकथा- अंतर

लघुकथा – अंतर

रवि महेश के अनर्गल प्रलाप को यह सोच कर अनदेखा कर देता है कि हाथी चले बाजार , कुत्ते भूके हजार, “ इस पागल के मुंह कौन लगे. जब मुंह दुखने लगेगा, चुप हो जाएगा.”

और महेश यह सोच कर अनर्गल प्रलाप करता है , “ दुनियां में बहुत से लोग ढीठ, बेशर्म, नालायक और पागल  होते है . जब तक उन्हें अंटशंट न बोला जाए और गालीगुप्ता न की जाए वे काम नहीं करते है.”

                           -----------------------------------

मौलिक और अप्रकाशित 

Added by Omprakash Kshatriya on July 18, 2015 at 12:44pm — 7 Comments

मैं

नही आता लगाना दिल करे हम क्‍या बताओ तुम

हकीकत जिन्‍दगी की याद मुझको मत दिलाओ तुम

 कभी बचपन नही देखा जवानी फर्ज में गुजरे

रहा तन्‍हा हमेशा मैं न मेरे पास आओ तुम

हुआ था प्‍यार मुझको भी मगर वो भूल थी मेरी

निभा सकता न अब मैं प्‍यार मुझसे दूर जाओ तुम

ग़ज़ल कहता नहीं हूँ मैं नहीं मैं गीत हूँ लिखता

लिखूँ आवाज बस दिल की न उसको गुनगुनाओ तुम

मिले है दर्द लाखो पर सदा ही मुस्‍कुराता हूँ

छुपे जो अश्‍क…

Continue

Added by Akhand Gahmari on July 18, 2015 at 12:30pm — No Comments

चट्टे-बट्टे (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘मंत्री जी ! ‘भाई’ अब फिर से नयी ‘डिमांड’ कर रहा है। पिछले हफ्ते डी.आई.जी. साहिब को ‘सेवा’ पहुँचाई है और अभी ‘पार्टी फंड’ भी जमा करवाना है । आपको तो पता ही है कि आपके इलेक्शन के वक्त भी हम किसी भी तरह पीछे नहीं हटे थे।  तो फिर कभी ‘भाई’ तो कभी पुलिस।  ऐसे कैसे चलेगा ?’

‘अरे परेशान काहे हो रहे हो। अब अकेले तुम्हारी वजह से ही तो इलेक्शन नहीं न जीते हैं हम... सभी ने साथ दिया था हमारा और ध्यान भी तो सभी का ही रखना पड़ेगा ना। और तुम घबरा काहे रहे हो, ऊ ससुरा जो पुल बना रहे हो ना उसमें से दो…

Continue

Added by Ravi Prabhakar on July 18, 2015 at 12:08am — 9 Comments

शादी की ज्यामितीय परिभाषा

दो सरल रेखाएं

जब एक बिंदु पर आकर मिलती हैं

एक ऋजु कोण का निर्माण करती हैं

ऋजु कोण से अधिक कोण

क्रमश:

घटती दूरी

और

फिर न्यून कोण

न्यूनतम करती हुई   

दोनों रेखाएं एक दूसरे से मिल जाती है

तब उनके बीच बनता है- शून्य कोण

समय की चोट खाकर

दोनों रेखाएं

अलग होती हुई

सामानांतर बनती है

और

अनन्त पर जाकर मिलती हैं

या फिर विपरीत दिशाओं में

और दूर

और दूर

होती…

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 17, 2015 at 8:55pm — 8 Comments

हिन्दी का विकास

क्यारी देखी फूल बिन ,माली हुआ उदास ।

कह दी मन की बात सब, जा पेड़ों के पास ॥

हिन्दी को समृद्धि करन हित, मन में जागी आस ।

गाँव गली हर शहर तक ,करना अथक प्रयास ॥

कदम बढ़ाओ सड़क पर ,मन में रख कर विश्वाश ।

मिली सफलता एक दिन ,सबकी पूरी आश ॥

सूरज चमके अम्बर में , करे तिमिर का नाश ।

अज्ञानता का भय मिटे, फैले जगत प्रकाश ॥

चंदा दमकी आसमान  ,गई जगत में छाय ।

हिन्दी पहुंची जन जन में, तब बाधा मिट जाय ॥

हिन्दी हमारी ताज अब, सबको रख कर पास…

Continue

Added by Ram Ashery on July 17, 2015 at 6:54pm — 3 Comments

अग्नि परीक्षा (लघुकथा)

लघुकथा - अग्नि परीक्षा –

"रचना, तू यह क्या कर रही है, मुझे तो यह तेरा कदम सही नहीं लग रहा, पति पत्नी के बीच की दरार को जितनी जल्दी हो घटाना चाहिये पर तू तो और बढा रही है "!

"मॉ ,अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है,अब मेरी बर्दास्त की सीमा समाप्त हो चली है, हर वक्त ताने"!

"नहीं बेटी ,स्त्री की बर्दास्त का तो कभी अंत ही नहीं होता, फ़िर तेरे साथ तो दो बच्चों का भी जीवन जुडा है"!

"मॉ ,झगडे की मुख्य वज़ह भी तो ये बच्चे ही हैं, राकेश तो यह मानने को तैयार ही नहीं कि ये बच्चे…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on July 17, 2015 at 11:30am — 4 Comments

भीख ( लघुकथा )

" इतने पैसे नहीं हैं मेरे पास , सोच समझ कर माँगा और खर्च किया करो ", पति की आवाज़ उसके मन को मथ रही थी | काश उसने भी नौकरी की होती तो आज पार्टी के लिए पैसे मांगने की नौबत तो नहीं आती | यही सब सोचती किचन की ओर बढ़ी थी कि अचानक उसके कदम ठिठक गए | दरवाजे से उसकी नज़र पड़ गयी थी कामवाली पर जो नीचे रखे प्लेट्स में से निकाल कर पूरी वगैरह अपने पल्लू में बांध रही थी |

फिर उसने एक प्लेट में ढेर सारा खाने का सामान रखा और थोड़ी दूर से आवाज़ लगायी " बाई , ये प्लेट भी धुलने में रख देना "|

उसे बाई को…

Continue

Added by विनय कुमार on July 16, 2015 at 10:38pm — 12 Comments

बंधन (लघुकथा)

बंधन 

------

डाक्टर श्रीवास्तव की शुरू से आदत रही कि वे खुद और उनका स्टाफ समय पर अस्पताल पहुँचे। ज्यादातर वे समय से पहले अस्पताल पहुँच जाते ताकि अन्य राजकीय औपचारिकताओं के निर्वहन में खर्च होने वाले समय की प्रतिपूर्ति की जा सके और अधिक से अधिक मरीज देखे जा सकें। अपने सरल स्वभाव और मानवीय संवेदनाओं में अग्रणी होने के नाते क्षेत्र में बहुत लोंक प्रिय थे। मरीजों की भीड़ लगी थी और डाक्टर साहब तल्लीन थे सेवा भाव में। तभी मंत्री जी का आगमन हुआ। मंत्री का रूतबा और दबदबा दोनों ही कुछ ज्यदा…

Continue

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 16, 2015 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल : ख़ुदा बोलता है बशर में उतर कर

बह्र : १२२ १२२ १२२ १२२

ख़ुदाई जब आए हुनर में उतर कर

ख़ुदा बोलता है बशर में उतर कर

 

भरोसा न हो मेरी हिम्मत पे जानम

तो ख़ुद देख दिल से जिगर में उतर कर

 

इसी से बना है ये ब्रह्मांड सारा

कभी देख लेना सिफ़र में उतर कर

 

महीनों से मदहोश है सारी जनता

नशा आ रहा है ख़बर में उतर कर

 

तेरी स्वच्छता की ये कीमत चुकाता

कभी देख तो ले गटर में उतर कर

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(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 4:14pm — 12 Comments

जरुरी नहीं ( कविता )

जरुरी नहीं कि हम दोषी हों

मिल जाती है सजा

अक्सर निरपराध को भी

हो जाती हैं दुर्घटनाएं

बिना हमारी गलती के भी

जरुरी नहीं कि लोग

हमसे खुश ही हों

बिना वज़ह भी हो जाती हैं

गलतफहमियां

और बिगड़ जाते हैं रिश्ते

जरुरी नहीं कि जो हम सोचें

वो सही ही हो

क्यूंकि हर चीज़ का

होता है एक दूसरा भी पहलू

जो नहीं देख पाते हम

जरुरी नहीं कि हम जन्म लें

एक ऐसे वातावरण में

जो हो जीने के लिए आदर्श

पर ये बहुत जरुरी है कि

बनायें…

Continue

Added by विनय कुमार on July 16, 2015 at 4:03pm — 6 Comments

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